Sunday, September 13, 2026
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पेपर लीक – एक वैश्विक समस्या

पुरवाई पत्रिका के पाठकों को यह जान कर शायद आश्चर्य होगा कि ब्रिटेन में भी  परीक्षा के पेपर लीक होने की घटनाएं हुई हैं। हाल ही का एक खास उदाहरण मई 2026 का है, जब कैम्ब्रिज असेसमेंट इंटरनेशनल एजुकेशन (A-लेवल/AS-लेवल)  – बारहवीं – के गणित और भौतिकी के पेपर चोरी होने और ऑनलाइन लीक होने के बाद रद्द कर दिए गए थे। इससे पहले के सालों में GCSE (दसवीं) परीक्षाओं पर भी ऐसी ही घटनाओं का असर पड़ा है।

मैंने हमेशा महसूस किया है कि भ्रष्टाचार को भारत की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में स्वीकार कर लिया गया है। यदि कोई इन्सान रिश्वत लेकर आपका काम कर देता है तो वह ईमानदार है, क्योंकि उसने ईमानदारी से रिश्वत लेकर आपका काम कर दिया। प्रसिद्ध शायर दिलावर फ़िगार का इस मुद्दे पर एक लोकप्रिय शेर है – “लेके रिश्वत फँस गया है, देके रिश्वत छूट जा/  ऐ गिरफ़्तारे-बला! मुश्किलकुशा रिश्वत ही है।”  यानी कि संकटमोचन रिश्वत ही है।

हम इतने भ्रष्ट हो चुके हैं कि अपने स्वार्थ के कारण बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करने से भी नहीं बाज़ आते। इस समय भारत की राजधानी में नीट पेपर-लीक को लेकर जो माहौल बना हुआ है, वो पूरे मसले को बहुत गंभीरता से सोचने को मजबूर करता है। इस संपादकीय को पढ़ने से पहले अपने आपसे एक सवाल अवश्य पूछिये“क्या आपने अपने जीवन में कभी कोई ऐसा काम नहीं किया है, जो कि भ्रष्टाचार के दायरे में आता हो। क्या आपने कभी ब्लैक में टिकट नहीं ख़रीदा?…”   हम तो ऐसा समाज हैं, जो विवाह के समय बहुत गर्व से कहता है, “जी लड़के की पगार तो पचास हज़ार है, मगर बीस हज़ार ऊपर से बन जाता है!”

पुरवाई पत्रिका समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझती है और गंभीर मुद्दों के साथ राजनीति करने में विश्वास नहीं रखती। इसी सिलसिले में 29 जून 2024 को हमने एक संपादकीय लिखा था – नीट… ‘नीट’ ना रहा…! इसे ख़ूब पढ़ा और सराहा गया। इस पर टिप्पणियां भी बहुत आईं। उस संपादकीय में हमने लिखा था, “जिन बच्चों के माता-पिता किसी भी कीमत पर अपने बच्चे को डॉक्टर बनाना ही चाहते हैं, वे पंद्रह बीस लाख रुपये पेपर लीक करवाने के लिए, इन्वेस्ट करने में झिझक महसूस नहीं करते। हमने पिछले संपादकीय में भी कहा था कि हम अपने आपको नहीं बदल सकते, मगर चाहते हैं कि सरकार हालात बदल दे। इस विवाद की जड़ में वे माता-पिता हैं, जो किसी भी कीमत पर अपने बच्चे को डॉक्टर बना देखना चाहते हैं। इसके लिए वे स्कूल कॉलेज के अध्यापकों/प्राध्यापकों; नेट के अधिकारियों; राजनीतिज्ञों; और प्रिंटिंग प्रेस के कर्मचारियों को किसी भी हद तक भ्रष्ट करने को तैयार हैं।” 

शिक्षा के क्षेत्र में यह भ्रष्टाचार भारत में महाभारत काल से चला आ रहा है। अर्जुन को क्लास में प्रथम लाने के चक्कर में गुरू द्रोणाचार्य ने कर्ण और एकलव्य को उस समय के आरक्षण सिस्टम से निपटा दिया। वैसे ‘पेपर लीक’ अंग्रेज़ी के शब्द हैं। और मेरा मानना है कि जिस देश की भाषा में कोई शब्द होता है, वहां वो वस्तु, स्थिति या प्रक्रिया मौजूद रहती है… इसीलिए उस भाषा में वो शब्द मौजूद है। जैसे ब्रिटेन में पनीर और घी नहीं होता… तो इसके लिए कोई शब्द भी नहीं है।

पुरवाई पत्रिका के पाठकों को यह जान कर शायद आश्चर्य होगा कि ब्रिटेन में भी परीक्षा के पेपर लीक होने की घटनाएं हुई हैं। हाल ही का एक खास उदाहरण मई 2026 का है, जब कैम्ब्रिज असेसमेंट इंटरनेशनल एजुकेशन (A-लेवल/AS-लेवल)  – बारहवीं – के गणित और भौतिकी के पेपर चोरी होने और ऑनलाइन लीक होने के बाद रद्द कर दिए गए थे। इससे पहले के सालों में GCSE (दसवीं) परीक्षाओं पर भी ऐसी ही घटनाओं का असर पड़ा है।

ब्रिटेन में जब पेपर लीक होता है, तो एग्ज़ाम बोर्ड सख़्त कार्रवाई करते हैं। जो छात्र लीक हुए मैटीरियल का इस्तेमाल या उसे शेयर करते हैं, उन्हें अयोग्य घोषित किए जाने जैसी कड़ी सज़ा मिलती है; वहीं, जिन प्रभावित उम्मीदवारों की धोखाधड़ी में कोई भूमिका नहीं थी, उन्हें आम तौर पर कोर्स के दूसरे हिस्सों में उनके प्रदर्शन के आधार पर “असेस्ड मार्क्स” (आकलन के आधार पर अंक) दिए जाते हैं।

परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के प्रवक्ता ने कहा, “हम जानते हैं कि इन खास विषयों की पढ़ाई करने वाले छात्रों, उनके परिवारों और स्कूलों के लिए यह घटना कितनी निराशाजनक और दुखद रही है।” ब्रिटेन में कंज़रवेटिव, लेबर, लिबरल डेमोक्रैटिक पार्टी, रिफ़ार्म पार्टी, ग्रीन पार्टी और स्कॉटिश नेशनल पार्टी। मगर इस एडमिनिस्ट्रेटिव चूक को लेकर किसी भी राजनीतिक पार्टी ने लंदन की सड़कों पर दंगे नहीं करवाए। यह एक राष्ट्रीय समस्या है… इसे सभी दलों  को एक साथ मिल बैठ कर हल करना है। राजनीतिक रोटियां यहां नहीं सेंकी जाती हैं। भारत में यह समस्या कितनी गंभीर है… इसके लिए पुरवाई पत्रिका ने वर्ष 2000 से लेकर वर्ष 2026 तक के तमाम पेपर लीक घटनाओं का लेखा-जोखा निकालने के लिये थोड़ा सा श्रम किया। पिछले दो दशकों में भारत में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के 90 से ज़्यादा मामले सामने आए हैं, जिनमें से कम से कम 15 मामले केंद्रीय एजेंसियों द्वारा आयोजित परीक्षाओं से जुड़े हैं। सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) द्वारा आयोजित ऑल-इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट (AIPMT) 2004 को प्रश्न-पत्र लीक होने के बाद रद्द कर दिया गया था।

इससे एक साल पहले, प्रतिष्ठित कॉमन एडमिशन टेस्ट (CAT) का पेपर लीक होने के कारण इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (IIMs) में हड़कंप मच गया था।2006 में, सीबीआई ने 52 लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की, जिनमें कई डॉक्टर भी शामिल थे। इन पर आरोप था कि उन्होंने AIIMS, नई दिल्ली द्वारा आयोजित ‘ऑल-इंडिया पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल एंट्रेंस एग्जामिनेशन’ के प्रश्न-पत्र लीक करने के लिए ‘Docu-Pen’ (एक एडवांस्ड पेन-साइज़ स्कैनर) का इस्तेमाल किया था।पाँच साल बाद, 2011 में, AIIMS के पोस्टग्रेजुएट एंट्रेंस एग्ज़ाम में एक हाई-टेक चीटिंग रैकेट ने गड़बड़ी की। दो डॉक्टरों को गिरफ़्तार किया गया और जांचकर्ताओं को पता चला कि मास्टरमाइंड्स ने एग्ज़ाम हॉल से क्वेश्चन पेपर की तस्वीरें बाहर भेजीं और ब्लू-टूथ ईयर-पीस के ज़रिए उन उम्मीदवारों को जवाब भेजे, जिन्होंने कथित तौर पर 25 लाख से 35 लाख रुपये दिए थे। उसी साल, उत्तर प्रदेश में AIEEE के क्वेश्चन पेपर लीक हो गए और कथित तौर पर 6 लाख रुपये में बेचे गए, जिसके कारण CBSE को परीक्षाएं टालनी पड़ीं।  2015 में, AIPMT भी पेपर लीक के विवाद में फंस गया। उस साल जून में, कई राज्यों में फैले चीटिंग रैकेट का पता चलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षाएँ रद्द कर दीं।  कथित तौर पर संगठित गिरोहों ने वहट्सएप और ब्लू-टूथ के ज़रिए प्रश्नों के उत्तर भेजने के लिए इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का इस्तेमाल किया, जिससे 6.3 लाख से ज़्यादा प्रत्याशी प्रभावित हुए।

साल 2017 में, 11 लाख से ज़्यादा उम्मीदवारों ने नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट (NEET-UG) के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था। यह परीक्षा संगठित नकल रैकेट और देश भर में कई बार प्रश्न-पत्र लीक करने की कोशिशों से प्रभावित रही थी।पटना में, दो मेडिकल छात्रों समेत पांच लोगों को कथित तौर पर प्रश्न-पत्र लीक करने की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार किया गया, जबकि पणजी में चार लोगों को उम्मीदवारों की जगह परीक्षा देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। एक साल बाद, मेडिकल प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की जिम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को सौंप दी गई। SSC कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल (CGL) परीक्षा 2017-18 भी प्रश्न-पत्र लीक होने के आरोपों के कारण जांच के दायरे में आ गई, जिसके बाद CBI जांच शुरू की गई।2021 में, NEET-UG के दौरान पेपर लीक के आरोप सामने आए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा परीक्षा कराने का आदेश देने से इनकार कर दिया, लेकिन जयपुर में कई गिरफ्तारियां हुईं। इसके बाद 2024 में NEET-UG पेपर लीक ने देश भर में विवाद खड़ा कर दिया, जिसमें बिहार पुलिस और CBI ने बिहार और झारखंड में कई गिरफ्तारियां कीं। सितंबर 2021 में, CBI ने JEE (Main) 2021 परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर एक प्राइवेट कंपनी के खिलाफ मामला दर्ज किया। जांचकर्ताओं के अनुसार, एक प्राइवेट एजुकेशनल इंस्टिट्यूट, उसके डायरेक्टर, सहयोगियों और परीक्षा-केंद्र के कर्मचारियों ने ऑनलाइन परीक्षा प्रक्रिया में हेरफेर की। आरोप था कि सोनीपत के एक खास परीक्षा केंद्र से मोटी रकम के बदले उम्मीदवारों को रिमोट एक्सेस के ज़रिए मदद दी गई, जिससे वे बेहतरीन NITs में एडमिशन पाने में कामयाब हो सके।2021 में, प्रश्न-पत्र लीक होने के बाद सेना ने सोल्जर (जनरल ड्यूटी) की भर्ती के लिए अपनी अखिल भारतीय कॉमन एंट्रेंस एग्जामिनेशन (CEE) को रद्द कर दिया था। मिलिट्री इंटेलिजेंस और पुणे पुलिस के संयुक्त अभियान ने इस रैकेट का पर्दाफाश किया, जिसके परिणामस्वरूप सेवारत अधिकारियों, सैनिकों और आम नागरिकों को गिरफ्तार किया गया।

प्रवेश परीक्षाओं के अलावा, स्कूली स्तर की परीक्षाओं पर भी असर पड़ा है। 2018 में, CBSE की 10वीं कक्षा के गणित और 12वीं कक्षा के अर्थशास्त्र के प्रश्न-पत्र लीक हो गए थे, जिससे 20 लाख से ज़्यादा छात्र प्रभावित हुए थे। 2024 में, UGC-NET परीक्षा को रद्द कर दिया गया, क्योंकि कथित तौर पर प्रश्न-पत्र की गोपनीयता भंग हो गई थी; इसके बाद NTA के तत्कालीन महानिदेशक सुबोध कुमार सिंह को उनके पद से हटा दिया गया।2026 में, NEET-UG के प्रश्न-पत्र लीक होने के आरोपों और उसके बाद दोबारा परीक्षा कराने की नौबत आने के कारण NTA एक ​​बार फिर चर्चा में आ गया।मोटे तौर पर यह समझ लेना होगा कि राज्य एवं केन्द्र स्तर पर प्रश्न पत्र लीक होना कोई नई समस्या नहीं है।

भारत पर एक हज़ार साल तक विदेशियों ने राज किया है और हमारे व्यक्तित्व एवं आचरण भीतर तक भ्रष्ट हो चुके हैं। हमें समस्या को सड़कों पर उतार कर उन्हें और विकट नहीं बनाना है। भारत के सांसदों को समझना होगा कि उन्हें दूसरे दलों की टांग खींचने के लिए नहीं चुना गया है। चाहे सत्ता पक्ष हो या फिर विपक्ष – सबका एक ही उद्देश्य होना चाहिए कि आम आदमी की समस्याओं से कैसे निपटा जाए।  हमें दूसरे की लकीर छोटी करने के प्रयासों से बाहर निकल कर अपनी लकीर लंबी करनी होगी। तू-तू मैं-मैं छोड़ कर ‘हम’ बन कर सोचना होगा।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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37 टिप्पणी

  1. वाकई सही कह रहे हैं मिल कर हल करना चाहिए और ब्रिटेन में अधिक राजनीतिक समझदारी है लेकिन यहां का विपक्ष किसी न बहाने मोदी सरकार को हटाना या नीचा दिखाने की कोशिश में रहता है अब क्योंकि विपक्ष समझ गया है कि वो चुनाव में जीत नहीं सकता है तो वो सड़कों पर अराजकता फ़ैला कर जीतना चाहता है. .और ये बात मोदी सरकार ने समझने में देरी कर दी इसके लिए उसने देरी से प्रधान का इस्तीफा लिया लेकिन अब अगर सरकार सतर्क नहीं होगी तो ये बार बार करने की कोशिश होगी

      • सादर नमस्कार।
        यह बात औचित्यपूर्ण है कि सर्वप्रथम बच्चों के माता-पिता को भ्रष्टाचार से दूर रहना पड़ेगा
        बच्चों को मेहनत के बल पर डॉक्टर इंजीनियर आदि बनाने के संस्कार देने होंगे। सरकार को तो ईमानदार रहने की बहुत ही आवश्यकता है अन्यथा ।भ्रष्टाचार कभी समाप्त नहीं होने वाला। “जैसा राजा वैसी प्रजा”का सिद्धांत तो ले डूबेगा देश को । जब हम रिश्वत देंगे नहीं तो लगा कौन? संपादकीय का विषय बहुत ही सामयिक और महत्वपूर्ण है।

        • क्षमा जी, सही कहा… यदि हम रिश्वत देंगे नहीं तो कोई लेगा कैसे… हार्दिक धन्यवाद।

  2. आज का संपादकीय भारत में एक तूफ़ान का सा असर पैदा कर चुका है।युवा शक्ति इस अपनी अस्मिता और आक्रोश का माध्यम मान रही है।सियासत अपने अंदाज़ में मुखरित हो आहुति डालने पर आमादा है।
    संपादकीय उसे भारत के साथ साथ वैश्विक मुद्दे की तरह भी बताता है और वह भी बेहद संवेदनशीलता और औचित्यपूर्ण तथ्यों के साथ।
    साथ ही साथ आम जन और पाठकों को झकझोरता भी है कि भ्रष्टाचार का संचरण और उन्नयन करने में उनकी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी की सियासती सिस्टम की।
    सटीक और खरा संपादकीय।

    • भाई सूर्य कांत जी पेपर लीक सच में वैश्विक मुद्दा है। एक मैच्योर राजनीतिक सिस्टम उससे एक टीम की तरह निपटता है। भारत का विपक्ष हमेशा चुनावी मोड में रहता है।

  3. बेहतरीन विश्लेषण। पेपर लीक पर शख्त कानून बनाने चाइए। दंड जितना कठोर होगा, परीक्षा प्रबंधन बेहतरीन होगा। कई देशों में इस पर कानून शख्त है, इसलिए घोटाला न के बराबर है।
    पेपर लीक जैसी एक समकालीन समस्या को लेकर पुरवाई का संपादकीय बहुत ही प्रासंगिक है।

  4. सुविचारित,शोधपरक और व8विवेकपूर्ण सम्पादकीय के लिए अकूत बधाई तेजेन्द्र जी ।

  5. इस बार का संपादकीय -‘पेपर लीक – एक वैश्विक समस्या’ जैसे ज्वलंत मुद्दे पर केंद्रित है। आज इस मुद्दे ने पूरे देश में उथल-पुथल मचा दी है। छात्र सड़कों पर उतरकर इसका समाधान मांग रहे थे। फिलहाल उसका पटाक्षेप हो चुका है।
    वैश्विक स्तर पर हुए पेपर लीक पर आपकी रिसर्च काबिले-तारीफ है। पूरे संपादकीय में इसकी गूंज सुनी जा सकती है।
    रिश्वतखोरी को मैं इन सभी मामलों की जड़ मानता हूं। यहां रिश्वत देने वाले हैं तो लेने वाले भी हैं।
    दरअसल मैं भारतीय समाज की बात करूंगा। हमारा समाज दोहरा जीवन जी रहा है। एक वह जीवन जिसमें रिश्तेदार, इष्टमित्र और परिवार के लोग आते हैं। यहां हमारी घरेलू आवश्यकताएं प्रायः पूरी हो जाती हैं। दूसरी सरकारी ऑफिस वाली जिंदगी है। यह आमजन के लिए बहुत ही उबाऊ, थकाऊ और त्रासद होती है। यहां बिना कुछ लिए दिए जल्दी काम होता ही नहीं है। ऑफीसर्स/क्लर्क कागजों में सौ कमियां निकालकर लोगों को भटकाते रहते हैं। सारा कुछ इन्हीं के हाथ में होता है। सालों काम पड़े रहते हैं। लोग थक-हारकर कुछ ले-देके अपना काम निकलवा लेते हैं। अब आप ही बताइए कौन बच सकता है इस लेन-देन से। अर्थात भारत में तो हर आदमी ने कभी न कभी कुछ न कुछ लिया दिया होगा।
    छोटी-छोटी परीक्षाओं में भी बहुत से अभिभावक परीक्षा केंद्रों पर पाल्यों के लिए जुगाड़ लगाते मिल जायेंगे। बड़ी परीक्षाओं का खेल तो सामने ही आ गया है। पीड़ित छात्रों के आगे सरकार को भी झुकना पड़ा ।
    प्रश्न उठता है कि परीक्षाओं में पेपर लीक सालों से हो रहे हैं तो सरकारें अभी तक चेती क्यों नहीं? संसद सत्र क्यों चलाए जाते हैं! अब तक कठोर कानून क्यों नहीं बनाए गए? जब सरकारों के सिर पर आती है,तब कठोर कानूनों की बात कही जाती है। अब पचास साल पहले वाले कानून न चल पाएंगे। इसलिए संशोधन बहुत जरूरी है।
    भारत सरकार और विपक्ष की तुलना इंग्लैंड से नहीं की जा सकती है। भारत एक उपमहाद्वीप है, जिसमें भाषा, जाति और धर्मों का बोलबाला है। जिस जाति धर्म के वोट जिस पार्टी को मिलते हैं उनका झुकाव उसी तरफ दिखने लगता है। राजनीतिक पार्टियों के नेता भी एक दूसरे से सार्वजनिक रूप से कम ही मिलते हैं। सत्ता पाने के लिए हर बात पर एक दूसरे की नुक्ता चीनी करना उनकी बाध्यता है। वैसे सत्ता पाने का प्रयास बुरा नहीं है, पर दुश्मनी की हद तक तो बुरा ही कहा जाएगा। एक स्वस्थ राजनीति तो कतई नहीं। मुझे नहीं लगता है कि कभी सरकार और विपक्ष एक साथ मिल-बैठकर किसी समस्या का समाधान निकाल पाएंगे। यहां तो अपनी ढपली अपना राग का ही शोर गूंजता है।
    इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर बहुत बात हो रही है। हर व्यक्ति अपनी तरह की बात कर रहा है। आपने इस मुद्दे की तह में जाकर उसकी वास्तविकता को अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। यही इस संपादकीय की उपलब्धि है।

    • प्रिय भाई लखन लाल पाल जी, आपने संपादकीय के हर पहलू को जांचा परखा है। आपकी टिप्पणी संपादकीय को समझने में मदद करेगी।

  6. सादर नमस्कार सर….
    मुझे इस मुद्दे पर आपके विचार पढ़ने की प्रतीक्षा थी.. मुझे यह लग रहा था कि शायद आप इसपर कुछ लिखेंगे…
    आपने पूरा विवरण दिया है पेपर लीक का… सभी जानकारी दी है….
    बहुत दुःख हो रहा है… कि युवा पीढ़ी प्रोटेस्ट करते करते अपनी दिशा न भूल जाए… इसका पूरा ध्यान सरकार को रखना है… पर सबसे पहले माता पिता भी देखें कि किस तरह वे अपने बच्चों के जीवन के साथ खेल रहें हैं… उनका स्वार्थ आग बनकर देश की नैतिकता को जला रहा है..
    दुःखद…
    अंत में आपका संवाद ग्रहणीय है… उसपर अवश्य विचार करना चाहिए…
    साधुवाद…

    • आदरणीय अनिमा जी, पुरवाई पत्रिका किसी राजनीतिक दल अथवा किसी एनजीओ के साथ नहीं है। हमारा समर्थन केवल भारत के साथ है। जो भारत के लिये अच्छा है वही हमारे लिये सही है।

  7. आप भी हवा में लट्ठ घूमा रहें हैं, सांख्यिकी आंकड़े प्रस्तुत कर क्या कहना चाहते हैं ? शिक्षा में प्रयोग के नाम पर जो हो रहा है वह कतई वैज्ञानिक सोच को विकसित नहीं करता। परीक्षा तो मजाक हो गयी है, निजी विश्वविद्यालय दुकान की तरह संचालित हो रहे हैं। विश्व विद्यालय, महाविद्यालय परिसर राजनीति का अखाड़ा, तो परीक्षा का सामना ऐसे ही करेंगे। युवा अपने भविष्य को लेकर आशंकित हो तो वह सड़क पर आयेगा ही। संपन्न पेपर खरीद लेते हैं,उसका आक्रोश जायज है।

  8. जितेन्द्र भाई: आपके इस सम्पादकीय ने तो दिमाग़ की सारी जड़ों को हिला दिया। आपने भ्रष्टाचार को लेकर जो आंकड़े दिए हैं उनको इकठ्ठा करके हम सब के साथ साझा करने के लिए बहुत बहुत साधुवाद। NEET के पेपर लीक के मामले में नैशनल टैस्टिंग एजैंसी और ‘पेपर लीक माफ़िया’ का बहुत बड़ा हाथ है। मेरे थोड़ी जानकारी इकठ्ठा करने के बाद पता चला कि पेपर बनने के बाद, प्रैस तक पहुंचाने, पेपर को छापने, छपने पर प्रैस से उठाने और परीक्षा केन्द्रों तक पहुंचाने का काम किसी बाहरी एजैंसी को outsource किया जाता है। ऐसा भी पता चला है कि यह outsource एजैंसियां भी बदलती रहती हैं। परीक्षा वाले दिन हर छात्र को पेपर मिलता है जहाँ पर छात्र पैंसिल से काग़ज़ पर छपे प्रश्नों के उत्तर offline देते हैं। इस पूरे सफ़र की जानकारी, और पेपर में कौन कौन से सवाल हैं, को हासिल करने के लिए माफ़िया के अपने लोग पता लगाने में पूरे उस्ताद हैं। उसके बाद लाखों की कीमत में पेपर कैसे बिकता है और क्या क्या धांधलेबाजी होती है उसका दुबारा ज़िकर करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह सब को पता है।
    एक बात जो मेरी समझ से बाहर है वो यह कि NAT इस NEET की या और परीक्षाओं को online क्यों नही करती। इस approach में पेपर बनने के बाद उसके छात्रों तक पहुँचने का जो सफ़र है वो एक दम डायरैक्ट हो जाएगा और बीच के दलालों को पेपर लीक करके लाखों कमाने के लिए इसका तोड़ ढूण्डने के लिए थोड़ी महनत करनी पड़ेगी। वैसे समय के साथ साथ वो लोग इसका भी तोड़ निकाल लेंगे, फिर भी इस से कुछ दिन के लिए तो राहत मिलेगी, इस में कोई शक नहीं।
    तरस आता है मुझे उन बच्चों पर जो दिन रात महनत करने के बाद भी एक ऐसे हादसे का शिकार हो जाते हैं जहां पर ‘भ्रष्टाचारी तेरा ही आसरा’ का केवल नारा ही नहीं बल्कि इसे अंजाम देने की हरकतें खुले आम देखने को मिलती हैं।

    • विजय भाई आपने अपनी टिप्पणी में जो सुझाव दिये हैं, सरकार को उन पर ध्यान देना चाहिये।

  9. पुरवाई-अंक 26जुलाई2026 का यह अंक— भारत में पेपर लीक मामला पर केंद्रित है । यह समस्या प्रासंगिक और सही दृष्टिकोण की मांग करती है, जो संपादक तेजेंद्र शर्मा जी के समरस चिंतन में समाहित है । उनका यह दृष्टिकोण इस एक वाक्य से स्पष्ट हो जाता है-
    “तू-तू मैं-मैं छोड़ कर ‘हम’ बन कर सोचना होगा।”
    यह ‘हम’ शब्द विश्व भावना से जुड़ा हुआ है। राजनैतिक विचारों की शुद्धता ( निर्मलता नहीं) के लिए इस अंक के सम्पादकीय को पढ़ना और पढ़ाया जाना चाहिए- गली कूचों तक । ये विचार दलगत राजनीति से ऊपर उठकर “लोक तंत्र “ की राजनीति करने की प्रेरणा से युक्त हैं ।
    सम्पादकीय के आरंभ में महाभारत कालीन उदाहरणों से लेकर कैम्ब्रिज, ब्रिटेन आदि के पेपर लीक संबंधी मामलों का हवाला देते हुए तंत्र के साथ मुख्यतः समाज में उच्च महत्वाकांक्षाओं को भ्रष्टाचार की जड़ बताया गया है, जो सौ फीसदी सही है । सम्पादक ने अपने उच्चस्तरीय शोध परक दृष्टिकोण का परिचय दिया है । इसलिए इस बार के सम्पादकीय में उनके नाम के आगे पी-एच.डी. वाला या मानक अथवा इस स्तर की सम्मान सूचक उपाधि “डॉ “ लगाना असहज नहीं लगा- ‘डॉ. तेजेंद्र शर्मा’। यह उनके साहित्यिक व्यक्तित्व में नैसर्गिक रूप से विद्यमान है । साहित्य के क्षेत्र में 100 से अधिक कहानियाँ लिखने वाले इस कथाकार की प्रसिद्धि को उसकी रचनात्मकता अक्षुण्ण घोषित करती है ।
    बहुत बधाई ।
    अंक के अन्य प्रखंड पूर्वतः पठनीय और अकादमिक स्तर पर संग्रहणीय हैं ।
    शुभ कामनाएँ ।

    मीनकेतन प्रधान
    भारत

    • भाई मीनकेतन जी, जिस स्नेह और अपनेपन से आपने संपादकीय पर टिप्पणी लिखी है, उसे महसूस कर रहा हूं। आपने तो इंडेक्स में ग़लती से टाइप किए ‘डॉक्टर’ को भी खोज लिया। दिल से शुक्रिया।

  10. सादर अभिवादन सर
    यह हमेशा से ही एक बड़ी समस्या रही है । इस तरह के स्वार्थ परक खेल में उन बच्चों के साथ सबसे ज्यादा बुरा होता है जो खूब मेहनत करते हैं तथा जिनके माता पिता अपनी सारी पूंजी उनकी पढ़ाई पर खर्च कर देते हैं । ऐसे में पेपर लीक हो जाना उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय होता है । सब अपने बारे में सोचते हैं । इतने सालों से जब इस तरह पेपर लीक हो रहे हैं और बच्चे निराश होकर आत्महत्या तक कर लेते हैं तो अब तक तो इस पर सख्ती से निपटने के लिए कोई तो कानून बना होना चाहिए था । पता नहीं कब सब अपने स्वार्थ की राजनीति छोड़ देश के बारे में और ऐसी गंभीर समस्या के निराकरण के विषय में सोचेंगे ।
    आभार आपका इतना विश्लेषणात्मक संपादकीय के लिए।
    सादर

    • रेणुका जी, आपकी टिप्पणी संपादकीय के साथ पूरा न्याय करती है। हार्दिक धन्यवाद।

  11. ​आदरणीय सर,
    सादर प्रणाम।
    ​’पुरवाई’ का ताज़ा संपादकीय ‘पेपर लीक – एक वैश्विक समस्या’ समय के एक अत्यंत संवेदनशील, यथार्थवादी और ज्वलंत संकट पर बेहद संतुलित, निष्पक्ष और आँखें खोल देने वाला विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय समाज की दैनंदिन जीवनचर्या में गहराई से पैठ चुके भ्रष्टाचार पर प्रहार करते हुए, जिस तरह आपने पाठक को अपने ही भीतर झाँकने के लिए विवश किया है, वह आपके एक निर्भीक संपादक और सजग विचारक के रूप को दीप्तिमान करता है। इस क्रम में काका हाथरसी की यह पंक्तियाँ बरबस याद आती हैं, जो हमारे सामाजिक छद्म पर सीधा प्रहार करती हैं—
    ​“कह काका कबिराय, क्यों काँप रहा रिश्वत लेकर,
    पकड़ा जा यदि रिश्वत लेते, तो छूट जा रिश्वत देकर।”
    ​भारत में पिछले ढाई दशकों के दौरान शिक्षा-व्यवस्था में घटित धांधलियों के प्रामाणिक ब्यौरे के साथ-साथ, मई 2026 में ब्रिटेन की कैम्ब्रिज परीक्षाओं के पर्चे लीक होने का संदर्भ देकर आपने इसे केवल भारत का कोढ़ न मानकर एक ‘वैश्विक विसंगति’ के रूप में रेखांकित किया है। ब्रिटेन के परिपक्व राजनीतिक ढाँचे, जहाँ ऐसी प्रशासनिक चूक को राष्ट्रीय त्रासदी मानकर सभी दल एक मंच पर आते हैं, की तुलना भारत की अवसरवादी और दंगे उकसाने वाली दलगत राजनीति से करके आपने हमारी राजनीतिक चेतना के खोखलेपन को बहुत सहजता से उजागर किया है।
    ​यह भ्रष्ट व्यवस्था केवल परीक्षा हॉल तक सीमित नहीं है, बल्कि उच्च शिक्षा और अकादमिक तंत्र की जड़ों तक में अपने पाँव पसार चुकी है। विश्वविद्यालयों में ‘खास लोगों’ को ध्यान में रखकर विज्ञापनों का निकाला जाना, साक्षात्कार का केवल औपचारिक स्वांग होना और पूर्व-निर्धारित नामों पर मुहर लगना; इस खोखले तंत्र की वह नग्न सच्चाई है, जिसका दंश मैं अपने जीवन में झेल रहा हूँ। हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज़ी जैसे तीन-तीन साहित्यिक विषयों में परास्नातक, बी.एड्., सी.आई.जी., यूजीसी-नेट और पी-एच्.डी. करने एवं दर्जनों पुस्तकों के लेखन-संपादन सहित सैकड़ों शोध-पत्रों व समीक्षाओं के सृजन के बावजूद, जब मुझे केवल भ्रष्ट व्यवस्था की नाकामी के कारण आज भी अपने जीवन में निरंतर संघर्ष करना पड़ रहा है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारा संपूर्ण अकादमिक ढाँचा कितना जर्जर और खोखला हो चुका है।
    ​परीक्षा व्यवस्था की तकनीकी खामियों, ‘आउटसोर्सिंग’ के नाम पर सेंधमारी करने वाले माफिया तंत्र और दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले मेधावी छात्रों के मानसिक उत्पीड़न जैसे अत्यंत गंभीर व्यावहारिक पक्षों को जिस तरह आपने धरातलीय सच्चाई से जोड़ा है, वह विचारणीय है। द्रोणाचार्य, एकलव्य और कर्ण के पौराणिक प्रसंगों के माध्यम से शिक्षा में व्याप्त युगों पुराने संस्थागत पक्षपात को रेखांकित करना तथा भाषाई बनावट से सामाजिक मानसिकता को जोड़ना आपकी सूक्ष्म और तलस्पर्शी दृष्टि का परिचायक है। अभिभावकों की अंधी महत्त्वाकांक्षाओं, रिश्वतखोरी को सहज स्वीकार्यता देने वाली सामाजिक ग्रंथि और राजनीति से ऊपर उठकर ‘तू-तू मैं-मैं’ छोड़ ‘हम’ बनने की आपकी आकुल पुकार वास्तव में हमारे लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों को सजग कराने वाली है।

    ​सादर, सद्भावनाओं सहित।
    ​आपका
    चन्द्रशेखर

    • भाई चंद्रशेखर जी, आपकी टिप्पणी की हमेशा प्रतीक्षा रहती है। कितना गहरा उतरते हैं आप संपादकीय में। हर बिंदु पर विस्तार से बात करते हैं।

  12. सर ! सही बात। निश्चय ही पेपर लीक करने मामला नया नहीं है लेकिन जंतर-मंतर में जो हुआ वो सम्यक आंदोलन के बजाय अराजकता उत्पन्न करना उद्देश्य अधिक प्रतीत होता है

  13. भारत में राजनीतिक दलों को अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने से मतलब है। इसके लिए चाहे कुछ भी हो जाए।

  14. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    जिस तरह से नीट की परीक्षा को लेकर भारत में एक जलजला सा रहा संपादकीय के लिये भी विषय संभावना थीं,जबकि 2 साल पहले ही इस विषय पर संपादकीय आ चुका।
    लेकिन अबकी बार नए रंग और नये तेवर की बात है।

    जैसा की शीर्षक से ही स्पष्ट है कि अबकी बार का विषय भी शिक्षा व्यवस्था में बढ़ते भ्रष्टाचार को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में
    देखने का प्रयास है।

    संपादकीय को पढ़कर पता चला कि प्रश्नपत्र लीक होना केवल भारत की समस्या नहीं ,बल्कि विकसित देशों, विशेषकर ब्रिटेन, में भी ऐसी घटनाएँ होती रही हैं।
    महत्वपूर्ण यह है कि
    वहाँ इस समस्या का निराकरण निष्पक्ष ढंग से किया जाता है। यही सही तरीका भी है कि समस्या का समाधान फिर चाहे वह कोई सी भी समस्या क्यों न हो, निष्पक्षता से ही होना चाहिए तो विवाद की स्थिति उत्पन्न ही न हो।भारत में तो अब यह संभव ही नहीं।
    यहाँ तो इसे सरकारी नियमों की तरह स्वीकार कर लिया गया है।

    संपादकीय सबसे बड़ी विशेषता इसका तथ्यपरक आधार है।आपने वर्ष 2000 से 2026 तक भारत में हुए अनेक प्रमुख पेपर लीक मामलों का क्रमवार उल्लेख किया है। AIPMT, AIIMS, CAT, NEET, JEE, UGC-NET तथा CBSE जैसी परीक्षाओं के उदाहरणों के माध्यम सिद्ध किया कि यह समस्या किसी एक परीक्षा या एक सरकार तक सीमित नहीं है,बल्कि वर्षों से से चली आ रही परंपरा की तरह हो गई है।
    आपने व्यवस्था के साथ ही समाज की मानसिकता पर भी प्रश्न उठाया है कि भ्रष्टाचार केवल नेताओं या अधिकारियों तक सीमित नहीं है; इसमें वे अभिभावक भी सहभागी हैं जो किसी भी कीमत पर अपने बच्चों को सफल देखना चाहते हैं। निश्चित रूप से आपकी इस बात का हम समर्थन करते हैं। किसी ने अपने काम करने के लिए देने के लिए हाथ उठाये होंगे जो लेने की आदत पड़ गई।आपके सोच की यह नैतिक गहराई पाठकों को आत्ममंथन के लिये प्रेरित करती है।

    रिश्वतखोरी पर दिलावर फ़िगार के शेर का उद्धरण तथा “पगार के ऊपर से बनने” जैसी सामाजिक प्रवृत्तियों का उल्लेख काबिले गौर है।
    महाभारत के द्रोणाचार्य, अर्जुन, कर्ण और एकलव्य का संदर्भ बताते हैं कि पक्षपात और अवसरों की असमानता जैसी समस्याएँ नई नहीं हैं। बस समय-समय पर रूप और रंग बदलते रहे ।
    आपकी इस बात से पूरी तरह सहमति है कि चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष! दोनों का उद्देश्य एक ही होना चाहिये ,कि आम आदमी की समस्याओं से कैसे निपटा जाए? सामूहिक रूप से मिलकर समस्या का समाधान निकालना होगा!
    सामयिक समस्या को संपादकीय में उठाकर आपने इसका महत्व बढ़ा दिया।
    तथ्यपरक जानकारियों के लिये आपके परिश्रम को प्रणाम

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपने संपादकीय के हर पहलू को खंगाल कर अपनी विस्तृत टिप्पणी लिखी है। स्नेह बनाए रखें।

  15. बहुत मेहनत से लिखी है पेपर लीक की कहानी ।
    सभी संबंधित मुद्दों पर भरपूर प्रकाश डाला है। बहुत बहुत बधाई । आशा है कि हमारे देश की सरकार संज्ञान लेगी ।

  16. बहुत सटीक और संतुलित संपादकीय! भारत में हर बात सड़कों पर या अनशन से तय होती है जिसमें मूल मुद्दे की बात के अलावा सब होता है। भ्रष्टाचार इतना गहरे बैठा है जड़ों में कि कुछ बदलने की आशा दूर के ढोल लगते हैं। आपने वैश्विक और विशेष कर इंग्लैंड की तुलना में जो भी लिखा, वह लोगों की सोच पर असर करे, यही मनाते हैं।

  17. तेजेन्द्र जी हमेशा अपने संपादकीय में देश और समाज के ज्वलंत विषय उठाते हैं। शिक्षण से जुड़े होने की वजह से इस विषय ने मुझे और भी प्रभावित किया। उन्होंने जो ब्रिटेन (मैं कहूँगी सभी विकसित पश्चिम देशों में) और भारत का पेपर लीक होने का जो तुलनात्मक विश्लेषण किया है, बिल्कुल सही है। मैंने भी पाया कि वेस्ट में परीक्षाओं में नियमों का पालन बड़ी सख्ती से और ट्रांसपेरेंट होता है। इस लेख ने कई विचार जगा दिए। तेजेन्द्र जी पुरवाई का अगला अंक इसी विषय पर केंद्रित रखे

  18. आदरणीय तेजेंद्र जी, लंदन में रहते हुए आप भारत की गतिविधियों पर पैनी दृष्टि रखते हैं तथा विषय की गहराई में उतरकर उसका तुलनात्मक स्वरूप प्रस्तुत कर देते हैं। पाठकों को इससे बहुत लाभ होता है। प्रस्तुत संपादकीय पढ़ने पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए जिनसे मैं पहले परिचित नहीं थी। आपने बताया इस विवाद की जड़ में (संदर्भ पेपर लीक) वे माता-पिता हैं, जो किसी भी कीमत पर अपने बच्चों को डॉक्टर बना देखना चाहते हैं। 15- 20 लाख रुपए पेपर लीक करवाने के लिए इन्वेस्ट करने में झिझक महसूस नहीं करते। इसके लिए वे स्कूल, कॉलेज के अध्यापकों -प्राध्यापकों नेट के अधिकारियों, राजनीतिज्ञों और प्रिंटिंग प्रेस के कर्मचारियों को किसी भी हद तक भ्रष्ट करने को तैयार हैं। यह भी जानकारी मिली कि ब्रिटेन में भी इस तरह के मामले हुए हैं किंतु दोनों देशों में फ़र्क यह है कि वहां कंजरवेटिव पार्टी हो, डेमोक्रेटिक हो अथवा अन्य कोई हो एडमिनिस्ट्रेटिव चूक को लेकर किसी भी राजनीतिक पार्टी ने सड़क पर देंगे नहीं करवाए, क्योंकि इस तरह की समस्या को राष्ट्रीय समस्या माना जाता है। राजनीतिक रोटियां नहीं से
    सेंकी जाती हैं।
    यह एक श्रम- साध्य कार्य है कि 26 वर्ष के आंकड़े आपने प्रस्तुत कर दिया है। ये मामले चिंता जागृत करते हैं; बहुत से ऐसे भी होंगे जो दबे रह गए।
    प्रवेश परीक्षाओं के अतिरिक्त स्कूल स्तर की परीक्षाएं भी इस समस्या से ग्रस्त रही हैं, जिससे बहुत से छात्र प्रभावित हुए हैं यह भी सोचने की बात है। अत्यंत जरूरी बात से अपने संपादकीय को समाप्त करते हुए अपने लिखा है कि भारत के सांसदों को समझना होगा कि उन्हें दूसरे दलों की टांग खींचने के लिए नहीं चुना गया है। चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सबका एक ही उद्देश्य होना चाहिए कि आम आदमी की समस्याओं से कैसे निपटा जाए। पूरा
    संपादकीय पढ़ने के पश्चात् एक ही बात दिमाग में आती है कि पैसे के दम पर, नैतिक-अनैतिक तरीके अपना कर सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा मनुष्य को उसकी मनुष्यता से वंचित कर देती है!

    • विद्या जी, आपने संपादकीय में प्रस्तुत समस्या, आंकड़े और सूचना के साथ-साथ चिंताओं को भी समझा है। आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

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