“चाय पिभौ की”
“पिलाय दा! जरिये सा दिहौ” पत्नी ने बैठे-बैठे ज़वाब दिया। 
अपनी टूटी टाँग के ठीक तरह से सेट न हो पाने के कारण लँगड़ा कर चलते  इक्यासी बरस के बूढ़े ने अपनी चाय की तलब झेलते हुए, आख़िरकार चाय बनाने का मन बनाकर पत्नी से भी पूछ लिया। पत्नी की हामी सीने में उठते गुबार की तरह सँजोए वह धीरे-धीरे कमरा, ओसारा, फिर कमरे जितना ही बड़ा आँगन पार करता हुआ रसोई घर पहुँचा। सॉसपैन में पानी चढ़ाकर इधर-उधर नज़र दौड़ाई। टेबुल, अलमारी के खुले आले, बंद आले सब जगह एक-एक कर नज़र दौड़ाते हुए खीझ झुर्रियों में उतरने लगी, “फेरो रख दी होगी ओसारे वाले बेंच के ऊपर डलिया में। जानती है एतना पार करके आने-जाने में दम हाँफ जाता है, मगर नै समझने के लिए तैयार नै है। उसको त लगता है कि हम ई उमर में भी दारा सिंह है। हमको कुछ होता है थोरियो।” भनभनाते हुए फिर आँगन पार कर ओसारे तक गया। नज़र दौड़ाई तो आलू के बीच अदरक दिख गया। अदरक ली और कमरे की खिड़की से सटे पलंग पर बैठी पत्नी को अनदेखा कर चुपचाप आँगन पार करने लगा। 
   पिछले कई महीनों से आँखों से दिखना लगभग बंद हो गया था। “लगता है मोतियाबिंद पूरा पक गया, तभिये सूझना बंद हो गया है। दिल्ली वाली डाकटरनी बोलिये दी थी कि जल्दी ऑपरेशन करवाइए नहीं तो ….।”  अदरक कूटते हुए उँगली बीच में आ गई। “ओह! माँ!” कराह फूट पड़ी। कलेजा टिसुआ गया। “सोचे थे, यहाँ बाकी इलाज हो जाएगा। लेकिन किसको फिकर है। किससे क्या कहें? ई त जानती है लेकिन न भूलियो के बेटा सब से नै कहती है कि बाप को आँख का ऑपरेशन के लिए कहा है। इसके लिए सोचो। न इसको समझ आता है, न बाकी सबको! कैसे आएगा हम उसके तरह अपना रोना नै रो सकते हैं। हमको नै आता है कहना। अरे आँख नै है उ लोग को, देखता नै है कि बूढ़ा कैसे तलमल करके चलता है। गिरगिरा जाएगा त क्या होगा? तब यही बुढ़िया करेगी सेवा। ओकता जाएगी त छोड़ देगी लेटाने गूँ-मूत में।” बुदबुदाता बूढ़ा अचानक चुप हो गया। अपने ही कहे की कल्पना कर सिहर उठा। हे भगवान!” गला भर आया, मानो अपने कहे को सच होने से रोके जाने की प्रार्थना भीतर कहीं गहरे में उतर आई हो। 
 एक ठंडी आह के साथ चाय का कप रख कर छन्नी से में चाय डालने लगा तो आधी चाय बाहर बह निकली। 
“ओह! स्लैपो गंदा हो गया। देखेगी त फिर भनभनाएगी कि जेतना काम नै करते हैं ओतना घिना देते हैं।” चाय वाली जगह पर कपड़ा डाल कर थरथराते हाथों से कप थामे वह फिर धीरे-धीरे आँगन पार करने लगा। कलेजा आजकल धौंकनी-सा चलने लगता। 
  “ह’ला ! अब छकनियो नै सूझै छै। आधौ चाय त गिरये गेलै।” इतनी तकलीफ़ झेलने के बाद भी भर कप चाय न पी पाने का दु:ख चेहरे पर उभर आया। 
“ ओह! फेरो चुट्टी लगतै!” पत्नी की चिंता में ख़ुद को शामिल न पाकर मन आहत हुआ। खीझ शब्द बनकर उभरी, “तोरा चुट्टी के पड़ल छौ। हमरौ हाथ म चाय गिर जैतयै अभी”
“त के कहे छौं तोरा बनावेल। अपने हुलुर-हुलुर करै छहौ।” पत्नी ने बुरा-सा मुँह बनाकर कहा। चाय अपना महत्व खो चुकी थी। बोली की कड़वाहट ने फीकी चाय को और बेस्वाद बना दिया था। 
   ‘नौकरी से रिटायर हुए, लेकिन घर नै बैठे कभी ताकि घर को जिस तरह मेंटेन करते आई है, वह करती रहे। अट्ठत्तर बरस तक टाइप मशीन खटखटाना कैसा होता है, ई क्या बूझेगी! इसको हमेशा लगते रहा की मन बहलाव करने जाते हैं बाहर। …. अब त दू बरस से ऊ भी बंदे है। चार बार हाथ-पैर टूटा। डाक्टरवा साला पैसा ऐंठने के लिए दोनों बार गलत पलास्तर कर दिया। लूल्हा जैसा हो गया बायाँ हाथ। मगर कोई उस साले को एक सब्द नै बोला। जैसे जैसे सरीर गिर रहा है, कलेजा थरथरा रहा है मेरा। भीतर से एक जरा सक्ति नै लगता है। किसको बोलें? क्या बोलें?’ 
  उसने गहरी सोच के साथ सिगरेट का ढेर सारा काला धुआँ कलेजे में भर, एकबारगी उगल दिया। भीतर का गुबार अब धुएँ के छल्ले के रूप में चेहरे के सामने नाच रहा था। वह जब भी उदास होता तो सड़क किनारे वाले ओसारे की रेलिंग से सटकर खड़ा हो जाता या बैठ जाता और सिगरेट से कलेजा जलाता रहता। डॉक्टर ने मना किया, मगर साठ साल की आदत भला नसीहत सुनती है!
  ‘कान से भी कम सुनाई देने लगा है। सात साल से जाते-जाते ई भी चला गया लगता है। अंधा-बहरा, लूला-लँगड़ा  होकर कै दिन खेप सकेंगे, भगवाने जाने! मेरे जाने के बाद उसका क्या होगा? अभी नै समझती है, समझेगी जब नै रहेंगे। उसका ई राज-पाट रहेगा की नै, भगवाने जाने। बेटा सब पर बरी भरोसा है उसको। भगवान करे बेटा पुतोहू उसको सुख से रखे। हमको तो सब जानवरे समझता है या बिना कलेजा का इंसान!’ 
उसे लगा, आँख की कोर पर कुछ गरम बूँदें लटकने लगी हैं मानो गालों पर ढुलकने से पहले अनुमति चाह रही हो। उसने सिगरेट मसला, नीचे छज्जे पर फेंका, लूँगी का निचला हिस्सा उठाकर चेहरे पर फेरा। अपनी गीली संवेदना को इसी तरह बचपन से छिपाता आ रहा है वह, आज कैसे उजागर होने दे कि वह भीतर से कठोर नहीं, जिद्दी नहीं, किसी भी हाल में झुकने वाला नहीं! नहीं, वह किसी के सामने उजागर नहीं करेगा कि उसके जज़्बात भी सिसकते हैं। भरे-पूरे परिवार के बीच सुकून के दो पल बिताने का अरमान सीने में खौलते अपनी ही तपिश से राख़ हो रहा तो हो। अब क्या, जब भी डोर टूट जाय!
वह  फिर खँखसते हुए लूँगी में मुँह पोछने लगा। सिर उठाया तो सामने पत्नी को अजीब-सी नज़रों से घूरते देखकर अकचका गया।“घर म तौलिया नै छै की?” पत्नी का व्यंग्य-वाण चुभा तो तिलमिला कर आग उगल दिया, “की होय गेलै एकरे म मुँह पोछ लेलिये त? मुँह म गोबर लगलौ छै की?” “तोरा स त कुच्छो कहने बेकार छै” पत्नी बड़बड़ाती हुई वापस कमरे में चली गई तो उसे बोध हुआ कि इस तरह बोलना नहीं था। 
क्यों अक्सर खीझ जाता है मन? क्यों नहीं कह पाया कि अब फिर आँगन पार करके दूसरे ओसारे के छोर पर रखे अलना पर सहेज कर रखे तौलिए को लाना अपने आप में बड़ा काम है। वह जब तक वहाँ जाता तब तक तो बूँदें कोर से…’ ‘नहीं…. जो समझती है, समझती रहे। नहीं देना है कोय सफाई हमको। चाहती है घर जैसे समेट दी, वैसे दिन भर रहे। उसी का ओलाहना देते रहेगी की समेटने में केतना समय केतना मेहनत लगता है, हम समझते नै हैं और घर गंदा करते रहते हैं त रखे समटल सामान, हमको जैसे आराम होगा वैसे करेंगे।’ 
   हाँफता हुआ वह वहीं पास रखी धूप से बदरंग हो चुकी प्लास्टिक की कुर्सी पर धम्म से बैठ गया। ‘सबको लगता है बुढ़वा पगला गया है। लगता है त लगे। कोय नै है मेरा जो हमरा दरद  समझ सके। एक ठो एक बेर खाना पहुँचा जाता है। खाते रहो रात तक वही। बाकी को उहो मतलब नै। यही दिन के लिए हड्डी गला दिए खट खट कर की बुढ़ारी में दु ठो गरम रोटी के लिए भी तरस जाएँ। उ गाछ म पानी पटवाने लंगराते हुए उत्ता दूर बाहर एंगना म चल जाएगी, बेटा सिनी आए त आगे-पीछे डोलेगी लेकिन हमरे नाम पर दरद बढ़ जाता है। उसका उमर बढ़ा है और हम जो उससे पाँच साल बड़े हैं हमारा हड्डी मजबूत है । हाँ, है जबतक जिंदा हैं जो बना कर खा सकेंगे, खाएँगे। …. जब देखो तब जवानी का रोना रोते रहेगी। एतना किये ओतना किए, हम जो बासठ साल तक ओवर टाइम कर-कर के बाहर मरते रहे और इसके अलावा भोर से अलग काम भी, दवा खा-खा कर बीमारी दबाते रहे त सबको लगता है माइये को कष्ट है बाप को नै। क्या नै किये बाल-बच्चा के लिए — उसके लिये! मोतियाबिंद का ऑपरेशन जहाँ चाही, वहाँ करवाए, पेट का भी, और बाकी बेमारी का भी। उ खोजती रही की हम घर में झुलवा झुलाते काहे नै रहे , अरे बाहर नै खटते त ऐसे पाल लेती बाल-बच्चा, सबका पढ़ाई-लिखाई, दवाय-दारू। हम कब आराम किये? हाथ-पाँव टूटा त बिस्तर पर पड़ना आराम है? उ सेवा करके खड़ा की है। इसलिए बोली सह लेते हैं, लेकिन अब …’ 
    सोचों से संघर्ष करते-करते बैठा न रहा गया तो एकदम से उठ खड़ा होने की कोशिश में टूटन वाली जगह पर दर्द की लहर दौड़ गई। डॉक्टर ने बता दिया की ‘ओस्टियोपोरोसिस है, मतलब हड्डी जाली। अब ज़रा भी चोट लगने से भी हड्डी टूट जाएगी।’ “अपने भर त संभल के चलते हैं लेकिन केतना संभलेगा बूढ़ा सरीर।” बुदबुदाता हुआ धीरे-धीरे आँगन पहुँचा और टहलने लगा। देर तक बैठे रहने से पैर जाम से हो गए थे। नसों में शून्यता दौड़ रही थी। 
‘खुला एंगना वाला एक मंज़िला मकान का सुख का बराबरी नै है भले टाँग साथ नै दे। चाँदनी रात में खुला एंगना में बैठने-टहलने का सुख सब दरद भुला देता है। साथ साल निभ गया ई एंगना के साथ भी। केतना याद जुड़ा है इससे। हमरे साथ ई भी बूढ़ा हो रहा है।’
वह मुस्कुराया, “खुसनसीब हो दोस्त! हमसे ज्यादा उ तुमको मानती है तुमरा देखभाल करती है तभिये त एतना चिक्कन हो। एकदम जवान! उसपर से फूल-पत्ती भी सजा रखी है तुमरे ऊपर।” वह धीरे से हँसा। आँगन से बात करना अच्छा लगा उसे और उसकी शांति भी। चाँद निकल आया था। हल्की-हल्की हवा मन की जलन पर मरहम लगाती-सी लगी तो वहीं किनारे उपेक्षित से पड़े नेवार की खाट पर हौले से बैठ गया। यादें हिलोरें मारने लगीं तो हाथ खाट सहलाने लगे।
 ‘कितने शौक से खरीदा था इसे। समय के साथ ई भी फालतू हो गया। अब अजर-गजर सामान का बोझ ढो रहा है। कबाड़! हम भी त कबाड़े हैं ई घर के लिए। आज तक अपना कमाई पर जीते हैं तब ई हाल है! भगवान न करे, कभी कोनो बेटा के मोहताज होंय।’                              
  डर की काली छाया उसके भीतर उटुंग कर बैठ गई। वह पसीने से तर होने लगा। गला सूखता महसूस हुआ, मगर कमरे में जाने का मन नहीं हुआ। ‘जिंदगी भर सिर उठाकर जिये हैं। कोय बोल नै सकता है, किसी का करजा खाए हों। रखा पैसा भी सब निकल गया। एतना समझाए की दू पैसा जमा रहने दो मगर इसको त हमेशा हमरे पर सके बना रहा की किसी छिनार को दे आते हैं। अभियो सक का बेमारी कहाँ गया है इसका। हम चुप रहे त समझी हम गुनहगार हैं और घिनाई और उछाली हमरा इज्जत। लोग एक बार मरता है,हम त….. । इसका एक दिन इसको ले डूबेगा। समझेगी हमरे जाने के बाद….।’
  ‘धड़ाक’ से टीवी वाले कमरे का दूसरा दरवाज़ा खुला। यह दरवाज़ा गुसाई ओसारे की तरफ़ खुलता है जहाँ से परिवार के बाकी भाइयों के घर जाने का रास्ता है और नीचे से आने का भी। लोहे का दरवाज़ा आँगन से जुड़ा है। सेपरेट। दरवाज़ा खुलने के तरीके से वह समझ गया कि ननहु आया है। छोटा बेटा। नजीक में अपना मकान बनाया है रोज़ रात को घर जाते हुए एक झलक देख जाता है। टीवी वाले कमरे की एक खिड़की आँगन से सटे ओसारे में खुलती है जिससे भीतर से  आँगन भी दिखता है और कमरे में रोशनी रहने पर आँगन से कमरे का नज़ारा। टीवी की आवाज़ में बातचीत भले ही स्पष्ट सुनाई न दे।
   “बाबूजी?”
“कोन ची करै छौ बाहर म अकेल’ला?”
“कोन ची करतै, सुथनी! पता नै कोन हुड़िया सम्पत रखलौ रहै छै बाहर म! ई नै की बैठ क बोलौं बतियावौं” 
  पत्नी के शब्द कानों में पिघले शीशे की तरह उतरे तो लावा की लहक से वह तड़प उठा। बेटे से मिलने की इच्छा से उठता-उठता वह फिर वैसे ही निढाल-सा बैठा रहा। बेवजह! इंतज़ार करता रहा कि बेटा बाहर आकर मिलेगा, हाल-चाल पूछेगा। खड़े-खड़े ही सही, उससे बैठ कर बात करने और उसके मन की गति को समझने का समय तो किसी के पास नहीं। 
घड़ी की सूई खिसकती-खिसकती बहुत आगे बढ़ गई। दुकानें धड़ाधड़ बंद होने लगीं। दुकानों के बंद हो जाने पर सड़क विधवा की सूनी मांग-सी लगने लगती।
 “खाना नै खैभौ की? की कर रहै छौ सांझे स ?”
“सुथनी” पत्नी के सवाल पर बूढ़ा चीखा। आक्रोश विष बनकर उसके तन-मन में फैलता रहा। पत्नी भूल चुकी थी कि ये उसके ही कहे शब्द हैं जो अभी-अभी लौटाए गए।
“टोरौ यही बोली के चलते कोय बेटा-पुतोहू साथ नै रहल छै। उमर हो गेलै लेकिन बोली के टेढ़पनी नै जाय छै।” पत्नी गुस्से से कमरे में बड़बड़ाती रही।
  “अब त हमरौ साथे जैतै टेढ़पनी। उ दिन घर म घी के दीया जलहइयौ की घर स काल कट गेलै और खूब सुख स रहियौ बेटा पुतौहु के साथ। अब बेसी दिन नै देखबौ हमरा” होंठ बुदबुदाते रहे, आँखें भी बेईमान हो गईं। गरम बूँदें ठिठकी नहीं, आँगन का एकांत पाकर ढुलक ही गईं…..
तीन कविता संग्रह, दो कहानी संग्रह, दो बाल साहित्य, दो आलोचना संग्रह, 40 से अधिक पुस्तक अनुवाद, धारावाहिक ध्वनि रूपक एवं नाटक, रंगमंच नाटक लेखन, 20 से अधिक चुनिंदा पुस्तकों में संकलित रचनाएँ, बतौर रेडियो नाटक कलाकार कई नाटकों में भूमिका. विभिन्न उच्चस्तरीय पत्रिकाओं में सतत लेखन. सत्यवती कॉलेज,दिल्ली में अध्यापन. सम्पर्क - dr.artismit@gmail.com

2 टिप्पणी

  1. अत्यंत सुन्दर, भावपूर्ण और ह्रदयस्पर्शी..! संवेदनशीलता से परिपूर्ण,अति व्रद्ध दम्पति का एकाकी जीवन..! व्रद्ध पुरूष के मन की वेदना.. अश्रु बन बहती जो वह छिपाने का प्रयास करता..!

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