प्रिय सुभि,
आज हमारे विवाह को सतरह वर्ष हो गये। साथ रहते हुए न जाने कितनी बातें मन ही मन कहता रहा। तुम मुझे कालेज में मिली। तुम्हारे लम्बे बाल, तुम्हारी आवाज, स्टेज पर तुम्हारा गाना, तुम्हारा इंजीनियरिंग में कुर्ता-सलवार पहनना, बहुत कुछ ऐसा था, जो मम्मी से मिलता था। मेरी मम्मी मेरे लिए दुनिया की सबसे सही और सुन्दर स्त्री थी। शायद इसीलिए मैंने जो भी कुछ सीखा मम्मी से सीखा। मेरे अन्दर मम्मी ने सच्चाई, ईमानदारी, सादगी, संस्कार कूट-कूटकर भरे नहीं, वे उन्हें देखकर स्वतः मेरे भीतर उतरते चले गये।
शराब पीना, सिगरेट पीना, कालेज के लड़कों की तरह उल्टे-सीधे काम करना, गन्दे चित्र देखना, इन सबसे मुझे नफरत थी। कभी-कभी सोचता, ज्यादा अच्छा होना भी ठीक नहीं होता। शायद यह अच्छाई कालेज में आकर मुझे ढोनी भारी दिखाई दे रही थी। लड़के मेरा मजाक बनाते थे। मगर मैं इसे छोड़ नहीं सकता था। यह मेरी आत्मा पर लिपटी थी। न जाने क्यों तुम्हें देखते ही मम्मी की छवि याद आ जाती थी।
मम्मी के लिए मैं दुनिया का सबसे इंटेलिजेंट और सुन्दर बच्चा था। जब मैं हकलाता तो मेरा मन करता कि अपनी जीभ को चाकू से काटकर फेंक दूँ। मैं छिप-छिपकर रोता। कभी-कभी भगवान को गालियाँ देने का मन करता। क्यों उसने मेरी जबान पर यह ताला लगा दिया था। यह ताला ठीक उसी समय लगता, जब मैं पूरी शिद्दत से किसी के ऊपर क्रोध जाहिर करना चाहता। कभी-कभी मम्मी के सामने अपनी पीड़ा कहता। मम्मी कहतीं – ईश्वर जानता है कि तुम गुस्से में बेकाबू हो जाते हो, इसलिए वह तुम्हें उस समय चुप करा देता है। भगवान जो करता है, अच्छे के लिए करता है।
मम्मी के पास हर बात का आशावादी जवाब था। मेरी मम्मी बहुत बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ लेने के बाद भी हाउसवाइफ बनी थीं। कभी-कभी पापा से बात करते हुए मैं यह बात समझ चुका था कि मेरी एक्स्ट्रा स्मार्ट इंटेलिजेंट मम्मी ने मेरे लिए मेरी बहन के लिए अपने सपनों को अलमारी में तह लगाकर रख दिया था। चार साल तक मैं तुम्हें देखता, मन ही मन पसन्द करता रहा, मगर कभी इजहार नहीं किया। यह बात मेरे मन में राज ही रह जाती, भगवान अगर उस दिन हमारी मुलाकात तुमसे इस तरह न करवाते। तुम होस्टल के बाहर बैठी सामान लिये रो रही थी।
और हम सब भी घर जाने की तैयारी में थे। आँधी, तूफान और बारिश का मौसम था। मेरे पापा को सुबह मुझे लेने लखनऊ आना था और तुम्हें कानपुर जाना था। मैंने अपने सहपाठी सौरभ से कहा, ”सुभि शायद सामान लिए रो रही है।“ उसने कहा, ”लगता तो ऐसा ही है।“ मेरी हिम्मत आज भी तुमसे बात करने की नहीं थी। सौरभ ने ही जाकर पूछा कि क्या बात है ? तुमने बताया था कि तुम्हारा धर्मभाई आने को कहकर गया था। वह अपनी गर्लफ्रैंड के साथ व्यस्त हो गया था। रात के नौ बजे थे। सुबह मेरे पापा को आना था। हम दोनों ने डरते-डरते तय किया – एक घंटा आने एक घंटा जाने का, तुम्हें बस में बैठाकर तुम्हारे घर छोड़ आते हैं। यद्यपि मुझे मेरे पापा के सामने न होने पर भी आसपास ही महसूस होते थे।
हम दोनों तुम्हें बस में बैठाकर तुम्हारे घर छोड़ आए। वहाँ तुम जाते ही इतना व्यस्त हो गयी कि मम्मी-भाई से मिलकर हमें थैंक्यू कहना भूल गयी। हम दोनों ने सुबह खाना खाया था। भूख से बुरा हाल था। तुम्हारी मम्मी ने जो चावल खाने को दिये, वे शायद खराब हो चुके थे। सो हमसे ‘खाए नहीं जा रहे आंटी, अब हम चलते हैं।’ कहकर वापस आ गये थे। आते-आते मैं तुम्हें एक बार देखना व बाय करना चाहता था। शायद सौरभ भी। या पता नहीं, शायद नहीं भी। मगर तुम नहीं आई थीं।
सुबह पापा के साथ मैं घर आ गया था। कभी-कभी तुम याद आ जाती थी। फिर एक दिन फेसबुक पर तुमने ‘साॅरी, तुम्हें थैंक्यू भी नहीं कह पाई’ के साथ फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी थी। मुझे जैसे मन की मुराद मिल गयी थी। उसके बाद हम बातें करने लगे थे। जो काम चार साल में नहीं हुआ, फेसबुक ने कर दिया था। हम अक्सर देर तक बातें करते रहते थे। मेरी तरह तुम्हारा भी कोई दोस्त नहीं था। फिर एक दिन तुम्हारी मम्मी ने तुमसे कहा था – ”कहीं वह तुमसे प्यार तो नहीं करता?“ यह तुमने ही मुझे बताया था। तब तुमने कहा था – “अरे नहीं मम्मी, हम बस दोस्त हैं। ऐसे ही बात करते हैं।“ तुमने मुझसे पूछा था – ”डू यू लव मी?“ मैं ‘हाँ’ नहीं कह पाया था। मैंने कहा था – ”हम तो सबसे प्यार करते हैं, तुम्हारी मम्मी से भी, भाई से भी, दोस्तों से भी।“ और इसी तरह बात करते-करते हम एक-दूसरे को ज्यादा पसन्द करने लगे थे।
तुम मुझसे हर बात शेयर करने लगी थी। मैं तुमसे हर बात शेयर करने लगा था। मैं तुम्हारा घर देखकर सोचता था कि मेरे पापा हमारा घर तुम्हारे घर की तरह मेनटेन क्यों नहीं रखते? मेरे पापा आर्थिक स्थिति में तुम्हारे पापा से मजबूत होते हुए भी मुझे कमतर लगते थे। मैं शायद तुमसे कभी दोस्ती न करता, मगर एक दिन मैं अपनी मम्मी के सामने अपने हकलेपन की वजह से परेशान होकर रो रहा था। मम्मी ने कहा, ”तू किसी लड़की से दोस्ती कर ले।“ मैंने मम्मी से कहा – ”यह आप कह रही हो मम्मी?“ मम्मी बोली – ”मैं तुझे खुश देखना चाहती हूँ। मैं तुझे रोता नहीं देख सकती। तू चाहे जो भी कर, मगर खुश रह।“ मेरी मम्मी का इशारा शराब पीने से था। मेरी मम्मी पापा के शराब पीने के कारण से पापा से नफरत करती थी मगर बेटे की खुशी के लिए मुझे शराब पीने को कह रही थीं। मगर मैं यह कैसे कर सकता था? मेरा पापा से नाममात्र का वार्तालाप था। मेरे भीतर सब कुछ मम्मी का था। पापा की जो चीजें मम्मी को नापसंद थीं, वे मुझे भी नापसंद थीं। तुमसे बात करता तो लगता, मेरी मम्मी की सारी बातें तुम्हारे अंदर भी हैं। मैंने तय किया कि तुम्हें जाॅब के लिए कभी मना नहीं करूँगा। तुमने कहा भी था कि मैं जाॅब नहीं छोडूँगी। हम दोनों की प्लेसमेंट हो गयी थी, मगर हम दोनों अलग-अलग शहर में जाॅब कर रहे थे। फिर जब हम दोनों ने वैष्णोदेवी जाने का प्लान बनाया तो मैंने वहाँ तुम्हें माँगा, जबकि मेरी सबसे बड़ी इच्छा अपने हकलेपन से मुक्ति पाना थी।
वहाँ से आने के बाद मम्मी ने पूछा – ”तू तो कहता है, तू मुझसे कभी झूठ नहीं बोलता?“ पता नहीं, मम्मी में कौन-सी जादुई शक्ति थी, जो बिना बताए सब कुछ समझ चुकी थी कि मैं तुम्हारे साथ गया था। मैंने मम्मी को हर एक बात बताई। बाद में मम्मी ने कम्प्यूटर पर ग्रुप में तुम्हारी फोटो भी पहचान ली थी। मैं जानता था, मेरी मम्मी के लिए मेरी खुशी सर्वोपरि थी। फिर उस दिन जब अचानक तुम मेरे घर आई। मैं डर गया था। पता नहीं, मम्मी क्या सोचेंगी? क्या रिएक्शन देंगी? मैंने तुम्हारे जाने के बाद मम्मी से पूछा था – ”वो आपको कैसी लगी?“ वह बोली थीं -”मेरे लिए तेरी खुशी मेरी खुशी है। यह अलग बात है, वह अच्छी है – इत्तफाक है कि वह सुन्दर है। मगर रास्ते से भी किसी बदसूरत को पकड़ लाता तो उसे भी मैं इतने ही सम्मान से बहू का दर्जा देती, प्यार करती।
मेरी मम्मी गलत नहीं हो सकती, यह विश्वास दिन-पर-दिन अटल होता रहा। तुम्हारे आने के बाद जब मेरे पापा तुझसे मेरी मम्मी की चुगली करते तो तुम्हें बुरा लगता। तुम मुझे बतातीं। मगर धीरे-धीरे मम्मी-पापा के झगड़े में जैसे मम्मी पापा से बोलतीं, तुमने मुझसे बोलना शुरू कर दिया। मैं अब मम्मी से चिढ़ने लगा था। मुझे लग रहा था कि तुम मम्मी से सीख रही हो क्योंकि मैं पापा जैसा नहीं था। अब मुझे झगड़े में पापा के साथ खड़ा रहना ही ठीक लगता था। मैं पापा की गलत बात को भी सही ठहराने लगता था और मम्मी की सही बात को भी गलत ताकि तुम मेरे ऊपर हावी न हो जाओ। बाद में मैं अपनी गलती महसूस करता। इससे मम्मी दुखी और पापा के साथ मुझसे भी रूखी हो जाती। मम्मी पापा के प्रति व्यवहार में कठोर क्यों थी, मैं जानता था। इसके जिम्मेदार पापा ही थे। मगर मैं चाहता था कि तुम मेरा पूरा सम्मान करो। तुम कुछ बातों में मेरी पापा से तुलना करती ओर मुझे ताना मारती थीं। जहाँ मैं मम्मी की नजर में सबसे स्मार्ट, इंटेलिजेंट था, तुम्हारी नजर में डफर था। तुम्हें हर चीज अपने घर जैसी चाहिए थी, जबकि मैं अपनी जैसी जाॅब मिली, कर रहा था। तुम्हारे और अपने रिश्तों के बीच संतुलन बना रहा था। जब-जब मम्मी हमारे पास आतीं, तुम उनकी नकल करने लगतीं तो मुझे लगता कि मम्मी को तुमसे दूर ही रखना चाहिए। मगर जब तुम ”तुमसे नहीं होगा, पापा से बोल दो, वे कर देंगे“ कहतीं, मुझे लगता कि मैं किसी काबिल नहीं हूँ। तुम आफिस तक मुझे कहने के बजाय पापा को ले जाती, जबकि मुझे भी उसी आफिस में जाना होता था। हर काम मुझे बताने के बजाय पापा को बताती। मेरे अन्दर जितना आत्मविश्वास मेरी मम्मी ने भरा था, उसे निकालकर तुमने मेरे अन्दर हीनभावना भर दी थी। मैं आफिस में सबके मजाक का विषय बन चुका था। तुम्हारे अपने रिश्तों में भी खुद को नालायक महसूस करने लगा था। तुम जब कहतीं – ”फलाँ पन्द्रह लाख का पैकेज ले रहा है, फलाँ बीस लाख का पैकेज ले रहा है“, मुझे लगता कि तुम मेरी खामियाँ गिना रही हो। मैं किसी काबिल नहीं हूँ। मैं पीड़ित होकर मम्मी को बुलाता। वह आतीं, मैं फिर उसके साथ दुर्व्यवहार करता, वे फिर चली जातीं। धीरे-धीरे मैं अपने खोल में सिमटता गया। अब मम्मी से भी अपनी बात नहीं कहता। मम्मी के लिए भी मैं ऐसा नाकारा बच्चा बन गया जो खुद को नहीं सँभाल सकता। मेरी सेहत खराब रहने लगी। मैं नौकरी से असंतुष्ट रहने लगा। ऐसा नहीं था कि तुम मेरे खाने-पीने का ध्यान नहीं रख रही थीं, मगर मुझे किसी चीज में आकर्षण नहीं था। यहाँ तक कि तुममें भी नहीं था। अब मैं जीवन को ढो रहा था, जिसे तुम ऐसी दौड़ में लगे लोगों के पीछे खड़ा कर ‘आगे बढ़ो, आगे बढ़ो, बढ़ना सीखो’ कह रही थी, जबकि तुम्हारा पैकेज मुझसे कम था। तुम भी तो मेरे साथ ही इंजीनियरिंग से पासआउट होकर आई थीं। तुम मुझे हर पल ऐसी दुनिया में धकेलने को परेशान थी, जहाँ नोटों की गड्डियाँ बरसती हैं। घर में फल आते थे, सड़ जाते थे, मेरी तो कुछ खाने-पहनने की इच्छा ही मर गई थी।
उस दिन रात-भर बिजली नहीं आई थी। शायद कोई डिफेक्ट हो गया था। बाहर काम करते हुए टाॅर्च भी डिसचार्ज हो गई थी। मोमबत्ती भी पता नहीं, कहाँ रखी थी। तुम नींद में बेहोश थीं। मैं जाग रहा था। गर्मी की वजह से बार-बार पानी पी रहा था। मोबाइल ढूँढ़ने के चक्कर में तुम्हारा पैर पकड़ लिया था। दरवाजा, बिस्तर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। सोफे पर चादर डालकर सोने की कोशिश में था, मगर उस पर पैर लटक रहे थे। मैं मोबाइल ढूँढ़ने के चक्कर में अँधेरे में कभी मेज, कभी दरवाजे, कभी टीवी से टकरा रहा था। डर रहा था कि उनके ऊपर से कोई सामान न गिर जाए। तुम उठीं और हाथ लगाकर ढूँढ़ती हुई बाथरूम में चली गईं।
पहले जब तुम रात में लाइट में भी बाहर बने बाथरूम में जाती थीं तो मुझे उठाती थीं। मैं जानता था कि तुम भूतों से डरती हो। मैं चुपचाप तुम्हारे साथ उठकर चल देता था। तुम झगड़े में भी ‘बाथरूम जाना है’ कह देती थी। आज इतने घुप्प अँधेरे में बाहर इतनी दूर अकेली बाथरूम चली गईं। शायद तुमने मेरे साथ ही डर को भी उखाड़कर दिल से फेंक दिया था। हम अलग-अलग कमरों में सोते थे। मुझे तुम्हारा वह डर अच्छा लगता था। उसकी वजह से तुम सो नहीं पाती थी। मेरे देर से आने पर झगड़ा करती थी। कहीं रहना पड़े तो तुम्हारे पास किसी के सोने का इंतजाम करना पड़ता था। तुम्हें किसी के पास सोने को कहता था। अब तुम चार-पाँच दिन न हो तो बाहर रहने पर भी फोन नहीं करती थी। अकेले सो जाती थी। सामान किरयाना से फोन कर मँगवा लेती थी। झुँझलाते हुए भी तुम्हारा किश्तों में सामान मँगवाना जो मुझे उस वक्त बुरा लगता था, अब मुझसे न मँगवाने पर क्रोध आता था। मुझे तुम्हारी मुझ पर निर्भरता मुझसे जोड़ती थी। मेरी वैल्यू ही खत्म हो गयी थी।
यद्यपि तुम्हारी तबीयत खराब होने या मेरी तबीयत खराब होने पर हम एक-दूसरे का ख्याल रखते थे, मगर उसमें मानवीयता थी, प्रेम जैसा कुछ नहीं था। मेरे पैसे अब तुम्हारे पैसे नहीं थे। तुम्हारे पैसे अब मेरे नहीं थे। तुम्हारे लिए कुछ खर्च करते अब मैं हिसाब लगाने लगा था। तुम भी कुछ ऐसा ही कर रही थी। यद्यपि मैं जानता था कि तुम इतनी कंजूस हो कि अपना पैसा खुद पर कभी खर्च नहीं करोगी, सब बेटी के लिए जोड़ती रहोगी। फिर भी मुझे तुम्हारे अकाउंट में बढ़ता पैसा तकलीफ दे रहा था। मेरा सब घर में खर्च हो जाता था। मैं तुम्हें खुद पर निर्भर क्यों देखना चाहता था, समझ नहीं आ रहा था। तुम्हें नहीं पता, कई बार तुम्हारी फेसबुक खुली रह जाती थी। जब तुम उसे मेरे मोबाइल पर चलाती थी। मैं जो व्यक्ति तुमसे खुलकर या आत्मीयतापूर्वक बात करता था, चुपके से अनफ्रेंड कर देता था। पता नहीं क्यों, तुमसे रिश्ता न होने पर भी मैं तुम पर केवल अपना एकाधिकार चाहता था। जब तुम अकेली ट्रेन में बैठकर मायके चली गई तो मैं बहुत बेचैन हो उठा था। हर वक्त तुम्हारे पास बैठने, बात करने वाले व्यक्तियों की कल्पनाएँ करता रहा। बहुत ज्यादा गुस्सा आ रहा था तुम पर। पता नहीं क्यों, इतनी परेशानी झेलने के बाद भी मैं साए की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहता था। तुम इससे बिलबिला जाती थी। ठीक मेरी मम्मी की तरह ही बिहेव करती थी। जब तुम अकेली होती थी, मुझे इच्छा नहीं होती थी, तुमसे सटकर बैठूँ, मगर किसी का तुम्हारे साथ सटकर बैठना बरदाश्त नहीं था। तुम्हारे मुँह खोलते ही मैं तुम्हारी बात काटता था। मन में तुम्हारी कही बात से चिढ़ जाता था, मगर तुम्हें किसी और से बात करते देखकर परेशान हो उठता था। यह शायद तुम्हारे साथ भी होता होगा।
हम दोनों बेटी के लिए पूरी तरह समर्पित थे। जरा-सी लापरवाही होते ही मैं तुमसे झगड़ता और तुम मुझसे। वह ऐसा पुल थी, जिसका एक सिरा मुझे तुमसे, तुम्हें मुझसे जोड़ता था मगर उस पुल को पार कर हम कभी नहीं मिलते थे। तुम्हारे कहे शब्द मेरे सम्मुख एक मजबूत दीवार बनकर खड़े रहते थे। शायद तुम्हारे सामने भी खड़े रहते होंगे। यद्यपि तुम जुबान के मामले में मुझसे कम कठोर थी। मैं कम बोलता था, मगर घुटन इकट्ठी हो जाने और स्वभाववश ज्यादा कड़वा, तीखा, विषैला बोलता था। तुम उससे घायल हो जाती थी, यह तुम्हारे चेहरे के बदलते भाव और टपकते आँसुओं से पता चलता था। तुम्हारा मम्मी से बतियाना, भाग्य को कोसना मुझे भीतर से खोखला करता था। कुछ दिन बाद तुम सामान्य हो जातीं, मगर मैं टूट चुका होता था। अब तुम कहीं घूमने जाने, शाॅपिंग करने का प्लान करने पर भी मना कर देती थी। हम दोनों अपने-अपने भीतर टूटते-बिखरते जा रहे थे। जिस प्रेम की वजह से शादी की थी, वह कहीं नहीं था। खुद को जोड़ने में, सँभालने में तुम मुझसे ज्यादा सक्षम थीं। मेरे परिवार के लिए, तुम एक स्मार्ट स्त्री थी, मेरे लिए भी थी। मैं तुम्हारी स्मार्टनेस और उपलब्धि पर खुश भी होता था। मगर मुझसे ज्यादा स्मार्ट होना या कहा जाना मुझे ईष्र्याग्रस्त कर देता था। ऐसे में मैं तुमसे झगड़ा करने लगता था, मीनमेख निकालने लगता था। मेरे रसोई में कुछ काम करने पर शायद तुम भी ऐसा सोचती होगी, वैसे कभी-कभी तारीफ भी कर देती थी। खाना बनाना, घर आए मेहमान को कुछ बनाकर देना तुम्हें पसंद नहीं था। वह सब बाजार से मँगवाती थी। मैं चाहता था कि तुम कार चलाना सीखो, मगर मेरे बिना तुम गाड़ी लेकर निकल जाओ, यह मुझे अच्छा नहीं लगता, जबकि मैं जानता था कि मैं ऐसा करता था। पता नहीं, मुझे तुम्हारा हर काम अपने घेरे के अन्दर ही अच्छा लगता था। मैं बदलने की कोशिश करता था, मगर मैं ऐसा ही था। तुम्हें हर बात अपने तरीके से करने और मनवाने की आदत थी। तुमसे लड़-झगड़कर भी मैं वही करता, जो तुम्हें पसन्द होता, मगर हर बार मेरे अन्दर एक टीस छूट जाती। मैं तुम्हारे इशारों पर क्यूँ नाचूँ?
धीरे-धीरे तुम मेरे घेरे को तोड़ती हुई बाहर जा रही थी और मैं तुम्हारे बढ़ते वजूद से आतंकित हो उठा था। मैं सोचता था, तुम मेरे बिना चार कदम ही शायद चल पाओ। जिस दिन तुम चार के बजाय आठ कदम चल लेती थी, मुझे लगता था कि तुमने मेरे अस्तित्व को नकार दिया है। मेरा वजूद कराह उठता था। अब हममें सिर्फ जरूरत-भर की ही बात होती थी। मेरे बहस करने पर तुम चुप हो जाती थी। फिर अपनी माँ से कमरा बंद कर रो-रोकर बात करती थी। मुझे लगता, तुम्हारे सारे बदलाव और स्वभाव की जिम्मेदार तुम्हारी माँ है, जो सिर्फ अपनी चलाती थी। मैं तुम्हारे पापा जैसा नहीं बन सकता था, जिसे खाना खाने और पैसा कमाकर देने जो भी तुम्हारी मम्मी करती, उसे सराहने के अलावा कुछ पता नहीं था। मेरे घर में मेरे पापा की चलती थी। बदलाव मुझमे भी आया था। मम्मी और एकाध दोस्त से मैं भी बात करता था। तुम्हें भी ऐसा ही लगता था या नहीं, पता नहीं। मैं जहाँ भी तुम्हें साथ लेकर जाता, तुम्हारा सबके आकर्षण का केन्द्र बनना या तुम्हारे आकर्षण का कोई केन्द्र मैं सहन नहीं कर पाता था। मेरे स्वभाव में यह कमी शायद मेरे पिता से आ गई थी जो मुझे मेरी मम्मी से पता चली थी। अधिकारवाद की इस भावना को मैंने जड़ से मिटाने की कोशिश की, मगर कभी-कभी थोड़ा असर हो जाता था। मैं अपने भीतर से अपने पिता को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया। शादी के बाद जब मेरे पिता का यह व्यक्तित्व भी मुझ पर हावी होता तो मेरी माँ भी तुम्हारा ही साथ देती। मैं आग-बबूला हो जाता। सारी औरतें मुझे खलनायिका लगतीं। अपनी मासूम बहन भी, जो बड़ी होने के बाद भी मुझे जवाब नहीं देती थी। डरती थी या जवाब देना बेकार समझती थी, पता नहीं। जब मम्मी तुम्हारा पक्ष लेती तो मम्मी से बुरी तरह चिढ़ जाता था। तुम्हारे आने के बाद मेरे मन में मम्मी के प्रति संवेदना खत्म होती जा रही थी और मम्मी इसे तुम्हारी चुगलखोरी का असर समझ रही थी। वह धीरे-धीरे मुझसे दूर होती गई। दोनों स्त्रियों के नकार में जब मेरी बहन के भी सुर मिलने लगे तो मैं क्रश्ड पर्सनेलिटी बन गया, जिसके लिए हर स्त्री मक्कार थी। मैं गलत था, जानता था मगर यह भावना मुझ पर हावी रहती थी। अक्सर मेरे तर्क भी गलत होते थे। मैं मम्मी को वापस उस साँचे में फिट करने की कोशिश कर रहा था, जिसमें वह स्वयं को मिसफिट पाती थी ताकि तुम्हें उस साँचे में फिट कर सकूँ, क्योंकि तुम मम्मी से बहुत कुछ सीखती जा रही थी। ऐसा मुझे लगता था। मैं यह तो चाहता था कि तुम बिल्कुल पति की हर समय सेवा में तत्पर अपनी मम्मी जैसी बनो, जबकि मेरे पिता तुम्हारे पिता के बिल्कुल विपरीत थे। शराब पीना, स्त्री के हाथ में पैसे न देना, हर काम अपने हिसाब से करना, किसी भी जगह स्त्री को आगे या साथ न रखना – यह सब हमारे परिवार का कल्चर था। जबकि मैंने तुम्हें जाॅब से मना नहीं किया था। घर में जैसे तुम चाहती थी, वैसा ही करने की कोशिश करता तथा यह तुम्हारे पिता की खूबी थी, माँ की नहीं, मैं जानता था। वैसे इसके अलावा मुझे तुम्हारी माँ की कोई आदत पसन्द नहीं थी, जो सब तुममें थी कि वह घर को अपटूडेट रखती थी। कभी-कभी इसकी अति मुझे और मेरे घर वालों को परेशान कर देती थी। क्योंकि तुम्हारी प्राथमिकताएँ खाना बनाने के बजाय रसोई साफ रखना थी। खाना बाजार से भी आ सकता था। खाना हमेशा काम वाली ही बनाती थी। जब वह भाग जाती थी तो बाजार से ही खाना पड़ता था या जितने दिन मम्मी होती थीं, वह बनाती थीं। तुम्हें हर काम मुझसे बेहतर मेरे पिता जी कर लेंगे, यही लगता था। तुम हर काम उन्हें बतातीं। तुम मुझे नाकाफी समझती हो, यह बात मुझे खाती थी। तुम्हारी तरफ बढ़ने की कोशिश करता तो मम्मी के कहे वाक्य – ”आदमी तो कुत्ता होता है। उसे अपनी भूख से मतलब। काम निकला, चला अपने रस्ते“ जैसे शब्द मेरे-तुम्हारे बीच दीवार बन चुके थे। उस वक्त में उनका अर्थ नहीं समझता था, मगर आज वे मेरे व्यक्तित्व को निर्देशित कर रहे थे। मैं चाहता था, जो राय मेरे पिता के बारे में मम्मी की थी, वह मेरे बारे में तुम्हारी न बने। फिर तुम्हें रसौली हो गई। डाक्टर ने कहा – ”बच्चा कन्सीव नहीं होता तो आपरेशन करना पड़ेगा। तुम्हारी सिस्ट का इलाज प्रेगनेंसी है। बड़ी रसौली छोटी को खत्म कर देती है, जैसे बड़ा पेड़ छोटे पौधे को पनपने नहीं देता। बच्चा भी एक प्रकार की बड़ी रसौली ही है।“ तब मैंने ईश्वर से प्रार्थना की। हमारी बेटी हुई, जो अनेक जिम्मेदारियों में फँसाने बनाने के साथ हमारे तनाव को बुहारती थी, खुशी देती थी। मुझमें कोई कमी नहीं है, यह स्वीकार करती थी। मेरे लिए इतना काफी था।
मेरी बहन को डिलीवरी के बाद जब उसकी सास ने ठीक से नहीं रखा तो वह मम्मी के कहने पर अपने तीन महीने के बच्चे को लेकर हमारे पास आ गई। वह तो यहाँ रहना भी नहीं चाहती थी, मगर मम्मी तुम्हारी देखभाल में थी, इसलिए वह मजबूर थी। तुम अपने घर भाग गई। जब तक वह वापस नहीं गई, तुम वापस नहीं आई। जबकि मेरी मम्मी-बहन हमेशा तुम्हारा ध्यान बेटी-बहन की तरह रखती थी। मैं जानता हूँ, तुम मेरे अलावा किसी को जवाब नहीं देती थी। मगर तुम्हारी बताई बात मेरे गुस्से का ट्रिगर दबाती ।अब तुम  चार पांच दिन तक बाहर रहने पर भी, जिसके बारे में तुम कुछ भी बताती, मैं उसी से दुर्व्यवहार कर बैठता। बाद में पछताता, अपराधबोध से ग्रस्त होता। माफी भी माँगनी पड़ती।
तुम्हें एक शब्द भी बच्चे की तरह वह कहते, उनका तुम तक पहुँचने से पहले मैं उनसे झगड़ पड़ता। मुझे अपने मम्मी-पापा से अपेक्षा थी, न शिकायत लेकिन तुम्हारी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए मेरे मन में उनके प्रति भी जहर भर गया कि उन्होंने मेरे लिए कुछ नहीं किया, जबकि कभी-कभी मैं सोचता था कि जो उन्होंने मेरे लिए किया, मैं अपनी बेटी के लिए कर पाऊंगा? तुम्हारे मेरे जीवन में आने के बाद मैं ऐसा कम्प्यूटर बन गया, जिसमें तुम मनचाहा सोफ्टवेयर अपलोड कर जैसे चाहे आपरेट कर सकती थी। मेरी प्राथमिकताएँ, व्यवहार, रिश्ते, सोच तक तुम मैनेज कर रही थी।
मेरे जीवन तक की तुम डायरेक्टर थी। मैं, मैं नहीं रह गया था। इसके बावजूद तुम खुश नहीं थी। मैं तुम्हें खुश नहीं रख पा रहा था। मैं अपनी मम्मी के प्रति जीवन-भर सँजोई हमदर्दी-संवेदना खोकर उन्हें एक स्त्री की नजर से देखने लगा था, जिसके पास शिकायतों का पुलिन्दा था, जिसे कोई खुश नहीं रख सकता था, जबकि वह तो किसी से अपेक्षा व शिकायत रखने वाली स्त्री  नहीं थी। मुझसे भी नहीं रखती थी। कभी-कभी मम्मी की गोद में लेटकर पहले की तरह रोने का जी करता था, जो मेरी सारी पीड़ा, सारा ताप हर लेती थी, मगर वह तो जीते जी अपने दिल पर तुम्हारी वजह से पत्थर रखकर अलग हो गई थी। मुझसे, हमारी बेटी से भी मोह त्याग दिया था। अब मुझे लगता है, दुनिया में पुरुष के लिए एक ही रिश्ता निःस्वार्थ और सच्चा होता है – माँ का और उसके बाद बहन का जो कभी अपेक्षाएँ नहीं रखती।
प्यार देती हैं कि उनका भाई, उनका बेटा खुश रह सके। त्याग करती हैं। मेरी मम्मी-बहन अपने ही घर में आकर न रह सकें, यह कितना पीड़ादायक होता होगा उनके लिए। वे बेटे-भाई को दुआ देती हैं, उनकी खुशी के लिए प्रार्थना करती हैं। दूर भी रह लेती हैं। जब मैं मम्मी के पास जाकर परेशानी में लेट जाता था, मुझे सोया जानकर मेरे सिर पर हाथ रखती थी, वैसा प्यार, कोई पत्नी तो क्या कर सकती है। शादी के कुछ समय तक लगा शायद तुम करती हो, मगर बाद में महसूस हुआ कि शादी में स्त्री अपने सुख-सुविधाओं, अपेक्षाओं के लिए एक जादूगर ढूँढ़ती है। शायद सब ऐसी न होती हों, मगर मुझे ऐसा ही लगा। मैं तुम्हें प्यार करता हूँ – यह सोचकर मैंने सोचा, शायद तुम भी मुझे प्यार करती हो। मगर इस वक्त जो महसूस हो रहा है, वही लिख रहा हूँ। कभी-कभी मैं सोचता था कि मुुझे मिली पैतृक सम्पत्ति जो सिर्फ घर ही थी, मेरी बहन भी हिस्सेदार है। वह उस घर में आकर मजबूरी में कुछ दिन नहीं रह सकती। मगर तुम यह सुनते ही आसमान सिर पर उठा लोगी – ”मैं रोकती हूँ क्या?“ गुम हो जाओगी, मुर्दा सूरत बना लोगी। मैं चुप रहता था। मेरी मम्मी तो कामवाली को ताजी रोटी देकर बासी  खुद खा लेती थी। मैं भी अपने लिए जीने वाला इंसान नहीं था। अचानक किसी के आने पर वह सब्जी दूसरों को देकर चाय से रोटी खा लेती थी। यह सब मेरे व्यक्तित्व में भी आप ही था। अपनी प्राथमिकताएँ, दूसरों की प्राथमिकताओं से पीछे रखना। तुम स्वभाव में इसके बिल्कुल विपरीत थीं, जबकि मैंने तुममें मम्मी की छवि देखकर पसन्द किया था। शायद मैं तुम्हें समझ नहीं पाया या तुम मुझे समझ नहीं पाई। मेरी मम्मी अकेली रहती रही। उसके बाद एक दिन मुझे उसके सोते-सोते मरने की खबर मिली। मैं अपनी मम्मी को अपने पास नहीं रख पाया, यह अपराधबोध मुझे खाता रहा। जिस कम्पनी में मैं काम करता था, मुझे लगता था, वह मेरा दोहन कर रही है तथा पैसा दे नहीं रही है। वास्तव में आईटी कम्पनियों में कुछ लोग मजदूरों की तरह ही होते हैं। मैं उन्हीं मजदूरों की जमात में था। तुम कहती थी, उसकी तरह स्मार्ट बनो। इसकी तरह स्मार्ट बनो। अपनी मम्मी का सबसे स्मार्ट बच्चा अब सबसे फिसड्डी बच्चा बन गया था। एक कोल्हू के बैल की तरह दो ब्रेड खाकर मैं 11 बजे जाता, रात को साढ़े ग्यारह बजे घर आता। रात को देर से सो पाता, सुबह देर से उठता। तुम मुझे ‘ये खा लो’, ‘ये पी लो’ कहती, मगर मेरी जीने की भी इच्छा नहीं थी, खाने की क्या होती? जैसे सब काम, एक जिम्मेदारी समझकर करता। सो जाता, खुशी किसे कहते हैं, मुझे पता नहीं था। घर में बेटी के आने के बाद उसकी छोटी-छोटी बातों से कुछ अच्छा लगता, मगर जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, जीवन नीरस होता गया। जिम्मेदारियों ने मुझे समय से पहले बूढ़ा बना दिया था। तभी मम्मी घर आती तो मैं मम्मी को नाॅर्मल करने को तब तुम्हें डाँटता, तुम्हें नाॅर्मल करने को उन्हें। उनके साथ बहस करता, मगर उनके न रहने पर अब मुझे वे सारी बातें खा रही थीं। मैं एक ऐसी फुटबाल की तरह था, जिसे माँ बहस होते ही तुम्हारे पाले में धकेल देती थी और तुम बहस होते ही मम्मी के पाले में। स्वयं को सिद्ध करता मैं थकान, कमजोरी, उत्साहहीनता से जूझता। लोगों की बातें सुनता – सोशल सर्किल बनाओ, खुश रहा करो। दूसरे भी तो जाॅब करते हैं। बस जैसे-तैसे जीवन की गाड़ी घसीट रहा था। हमारे बीच में संवादहीनता पसरती जा रही थी। जैसा रिश्ता मम्मी-पापा का तीस साल में हुआ, वैसा हमारा ग्यारह साल में हो चुका था। धीरे-धीरे मेरे जेहन में यह बात बैठ गई – शायद मुझमें कमी है, मुझे जीना नहीं आता। मैं हर मोर्चे पर फेल हूँ। आफिस में रात-भर मेहनत करता सुबह लेट पहुँचता तो लोग मुझे देखकर हँसते। एक-आध बार उनसे मित्रता करने की कोशिश की। महँगे होटलों में पार्टी करना, शराब-बीयर पीना, उनके बिल भरना – यह सब नापसन्द होने की वजह से निभा नहीं पाया। आफिस में सम्मान पा सकूँ, जीवन में सामंजस्य बैठा सकूँ, मैं पूजा-व्रत करता। आफिस में मैं ऐसा व्यक्ति था, जिसकी याद किसी भी प्रोजेक्ट में कुछ गड़बड़ हो जाने, बिगड़ जाने पर मिस्त्री की तरह आती। मैं सब ठीक कर सकता हूँ, यह बात फैलने से मुझे टीम लीडर बना दिया गया। मगर मेरा रौब-दाब न होने से किसी से काम करवाने के बजाय सारा काम मुझे खुद ही करके देना पड़ता। इसी बीच मेरी टीम में एक फ्रेशर लड़की सौम्या ने ज्वाइन किया। मैं जो भी काम देता, वह उसे करने की कोशिश करती, मगर जल्दी घर जाना चाहती। सब कुछ उसे मुझे ही सिखाना पड़ता। पता नहीं क्यों, उसका व्यवहार ऐसा था कि मैं उसकी गल्तियों पर भी गुस्सा नहीं होता था क्योंकि वह मुझे सर-सर कहती। मुझे बहुत स्मार्ट-इंटेलिजेंट समझती। मेरा मोरल बूस्ट-अप करती थी। मेरा काम में मन लगने लगा था। थोड़ा रिलेक्स होता जा रहा था। उसकी सुबह कही गुडमाॅर्निंग से मेरा मूड फ्रेेश हो जाता था। मैं उसका वेट करता, वह एस.एम.एस.नहीं करती तो चैक करता। उदास हो जाता। कोई परेशानी तो नहीं, जानने की कोशिश करता। तुम्हारे पास तो मेरे लिए सामान की लिस्ट इच्छाओं का पिटारा, शिकायतों का अंबार तथा मेरी जिम्मेदारियों के बोरे ही थे। ऊपर से दूसरे-तीसरे दिन भाग्य को कोसना-रोना। वह काम सीखने के साथ-साथ हल्की-फुल्की खुशी भी देती थी। धीरे-धीरे वह अपनी लाइफ शेयर करने लगी थी। यद्यपि मैं उससे कम ही खुलता था। मगर उससे बात करके मुझे अच्छा लगता था। मेरा सारा बोझ आधा हो जाता था। उसके पास होने से लोेग मुझे स्पेशल समझते। इसका खामियाजा भी मैं भुगतता, वह जब चाहे छुट्टी माँग लेती। मुझे उसका काम भी करना पड़ता। धीरे-धीरे वह मेरे लिए आवश्यक बन गई मगर हमारी सिर्फ एस.एम.एस. या आफिस में ही बात होती। आफिस मीटिंग में या किसी प्रोजेक्ट पर काम करते उसकी मौजूदगी से मेरी ऊर्जा दोगुनी हो जाती। वह थोड़ी माॅडर्न थी। कभी हम अकेले में मिलते तो कहती, हम दोस्त हैं, गले मिल सकते हैं। आफिस आती तो हाथ मिलाती। मैं औपचारिकता पूरी करता या अवाॅयड कर जाता। धीरे-धीरे उसने अपने आपको अपने में समेट लिया। वह अपने पति की कोई कमी वाली बात बताती तो वह चीज अपने व्यवहार में खोजता, उसे दूर करने की कोशिश करता। यही सोचता, तुम्हें भी तो इससे दिक्कत होती होगी। उसकी वजह से हमारी जिंदगी थोड़ी पटरी पर आ गई थी। मैं घर में थका-बुझा चिड़चिड़ा होकर नहीं आता था। वह दूर से ही जैसे प्राणवायु देने का काम कर रही थी। हम दोनों अपने-अपने दायरे में थे, इसके बावजूद जानते थे, हम दोनों की गृहस्थी में गड़बड़ थी। मैं इसे गड़बड़ मानने के बजाय अपनी असफलता मानता था। वह तुम्हारी तरह अपने पति की कमियाँ, यद्यपि वे कमियाँ मुझमें नहीं थीं। फिर भी हम मित्र थे। मैं उससे पर्सनल बातें कम शेयर करता था। मैं उसे पसन्द करता हूँ, इसका अहसास उसे था। वह मुझे पसन्द करती है, यह सारे आफिस के लोगों को पता था। मैं केवल उसकी वजह से अब स्वयं को हीरो महसूस करता था। जहाँ पन्द्रह-बीस दिन बीस जोड़े कपड़े होने पर एक ही पेंट पहन लेता था, अब कपड़े रोज बदलकर जाता था। वह मेरे जीवन में तुम्हारे द्वारा खाली की गई जगह भरती जा रही थी। उस दिन मेरी फेसबुक खुली रह गई थी। तुमने मैसेंजर खोलकर सारे इनबाॅक्स चेक कर लिए, यद्यपि मैं उन्हें डिलीट करता रहता था। थोड़े-बहुत ही थे, यद्यपि हम औपचारिक बात ही करते थे। तुमने इस बात का बतंगड़ बनाकर घरवालों को बताने के बजाय खामोशी इख्तियार कर ली। मुझसे दूरियाँ बना लीं। हम दोनों एक ही घर में दूसरों की नजर में पति-पत्नी थे, मगर अजनबी थे। तुम कोई काम बतातीं, मैं कर देता था। मैं कोई काम बताता ही नहीं था। तुमने मुझसे ही नहीं, मेरे घर वालों से भी दूरियाँ बना ली थीं। मेरी मम्मी, मेरी बहन के यहाँ रहकर तीन महीने  में गई, तुम अपनी जिन्दगी में खुश थी। एक ही शहर में होते हुए हम उसे देखने तक नहीं गये। उसके बाद उसके मरने की सूचना मिली। मैं अपनी मम्मी को पास नहीं रख पाया, यह अपराधबोध मुझे आज भी है।
तुमने अपने अलग दोस्त बना लिए थे। हमेशा की तरह अपनी मम्मी से बातें शेयर करती जो कहती थी, तुमने किया तुम भुगतो। बेटी के लिए तुमने जाॅब छोड़ी, उसका सारा फ्रस्ट्रेशन मुझ पर उतारा। तुम न बोलकर भी अपने मुर्दा, दुखी चेहरे से मुझे मार डालती थी। अब तुमने नई जाॅब जाॅयन कर ली थी। तुम अपनी जिन्दगी में खुशी थी, ऐसा मुझे लगा था। थी या नहीं, पता नहीं। मगर सौम्या पति से रिश्ता न होने, असंतुष्ट होने के बावजूद तुम मेरे जीवन में थी। इसलिए दूर थी, मैंने भी इसीलिए उसे दूर ही रखा। हम दोनों के बीच कभी-कभी औपचारिक बात होती थी। शायद उसने किसी को दोस्त बना लिया होगा। शायद उसकी जिन्दगी पटरी पर आ गई होगी। अब वह मुझसे खुलती नहीं थी। मैं तुम्हारी नजर में ही निकम्मा-नाकारा नहीं था, अपनी बेटी की नजर में भी था। वह हर बात में तुम्हारे सुर में सुर मिलाती थी। जो बात तुम मेरे पीछे मेरे बारे में कहती, वह मुझे मेरे मुँह पर कहती थी, मैं समझ जाता था कि यह फीडबैक कहाँ से हुआ। मैं समझता था, तुमने हमारी मित्रता की बात हल्के में ली है, मगर तुम इसे मेरे-अपने सारे रिश्तेदारों में धीरे-धीरे फैला चुकी थी। तुमने अपने प्रति मेरी उदासीनता को इसका जिम्मेदार मानकर मुझे बदचलन इंसान घोषित कर दिया था, जबकि मैं उम्र-भर सदाचरण से ही परेशान रहा। मैंने खुद को सामान्य करने की बहुत कोशिश की, मगर मेरी जिन्दगी में किसी चीज के प्रति कोई आकर्षण नहीं था। न तुम्हारे प्रति, न किसी अन्य स्त्री के प्रति। बस मैं अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहता था। अपनी बेटी की पढ़ाई, शादी की जिम्मेदारी यद्यपि जाॅब ज्वाइन करने के बाद तुम्हें इसकी भी जरूरत नहीं थी। तुम एक सफल महिला थी, सम्पूर्ण थी। मैं उस दिन के इंतजार में था, जब मेरी बेटी सेटल हो जाए। तुम्हें मेरी जरूरत है, ऐसा नहीं लगता था। तुम हमेशा यह दिखाने की कोशिश में रहती थी कि देखा, मैं सब कर सकती हूँ। इस वक्त मैं कहाँ हूँ, पता नहीं लिख रहा हूँ। मैं आत्महत्या भी नहीं करूँगा। मुझे किसी स्त्री में न रुचि है, न विश्वास। तुमसे कोई अपेक्षा, न शिकायत, बस ऐसा लगता है कि एक कैद से मुक्ति मिल गई है। कोई घुड़दौड़ जिसका एक सवार मैं भी था, खत्म हो गई है। तुम्हें भी अपने पिंजरे से मुक्त कर दिया है। तुम अपनी दिन में दो-चार बार तुम अपने भाग्य पसंद शादी स्त्री की अपेक्षाओं पर चाहे वो ग़लत ही हो कोसती थी, तुम्हें भी शायद बेहतर लगे। हममें दुखी-सुखी, अपराधी-निर्दोष, काबिल-नाकाबिल कौन था, पता नहीं। बस एक बार जो पूरा सच तुमसे कभी कहा नहीं था, जान लो, इसलिए पत्र लिखा। मैं इन वर्षों में पता नहीं, कहाँ खो गया। यही जानना चाहता हूँ। जिन्दगी का बोझ उतारना चाहता हूँ, मगर मरकर नहीं। मम्मी कहती थीं, आत्महत्या कायर करते हैं। कम से कम उनके बाद उनकी इस बात की तो लाज रख लूँ।
हर वक्त शादी, पसन्द, भाग्य को कोसने वाली स्त्री के प्रति पुरुष कैसे आकर्षित रह सकता है, यह बात मेरी समझ से परे है। शायद तुम समझ पाओ, वैसे भी तुम मुझसे अधिक समझदार हो। तुम्हारी नजर में मैं असफल इसलिए था, क्योंकि बड़ा पैकेज नहीं ले पाया, जबकि मैंने तुम्हें खुश करने के लिए कामवाली के न आने पर बरतन धोए, पोंछा लगाया, कपड़े तो हमेशा ही धोए। तुम्हें पति की नहीं, अपनी माँ की तरह नोट छापने वाली मशीन की कामना थी। वह बन नहीं पाया। नोटों से ज्यादा लगाव था नहीं, मम्मी जेब में पचास रुपये जबरदस्ती डालती थी, जो धोते वक्त ज्यों के त्यों निकलते थे। तुम बेटी की जिम्मेदारी से मुक्त हो, आजाद हो। विदेश में जाकर बेतहाशा धन कमाने की जो ख्वाहिश मैं पूरी नहीं कर सकता था, खुद कर सकोगी। तुम्हारी कामना का बोझ उतारकर हल्का लग रहा है। यह भी आश्चर्यजनक बात ही है, तुम्हारा न होकर भी पूरी जिन्दगी तुम्हारा ही रहा, किसी का नहीं हो सका। अपनी माँ का भी नहीं। तुमने दो बार आत्महत्या की कोशिश की, मैं उसके बाद जीवित नही हो सका। यही सोचता रहा कि क्या मैं इतना बुरा हूँ जो तुम्हें अपना जीवन समाप्त करने की इच्छा हो जाए। उसके बाद डर से तुम्हारे कहने पर नीम को आम, आम को नीम कहता रहा। तुम जैसे चलाती रही, चलता रहा। मेरे भीतर मेरा सब खत्म होता रहा। एक लाश की तरह जीता, अधूरा महसूस करता, ताने सुनता रहा। मेरी मम्मी मुझे बोझ समझती थी। घर में शान्ति रहे, इसलिए घर छोड़कर गाँव में भाग जाती थी। मेरी चिन्ता में दिन-रात घुलती थी। ‘इसका ध्यान रखना’ कहकर जब चलती थी, उसकी आवाज का भारीपन और आँखों की नमी उसकी पीड़ा का अंदाजा करा देता था। अब इन बातों से कोई फायदा नहीं है। मगर सिर्फ इसलिए पत्र लिखा, पुरुष को हर हालत में स्त्री की अपेक्षाओं पर, चाहे वे गलत ही हो, खरा क्यों उतरना चाहिए? न उतर पाए तो वह दुखी होने का ढिंढोरा पीट-पीटकर उसे कायर, नालायक, कमजोर, नपुंसक घोषित कर सकती है। पुरुष क्या करे? उसकी अपेक्षा कोल्हू के बैल की तरह खटकर थाली में पड़े खाने तक है, वह अपने दुख किससे कहे? वैसे तुमने पत्नी की तरह मेरा ध्यान रखा, मुझे दुख इस बात का रहा कि मेरी हर कोशिश के बावजूद तुम दुखी, अभावग्रस्त, भाग्यहीन बनी रही, ताने मारती रही, जबकि हमारे पास खुश रहने के लिए सब कुछ तो था। एक अच्छा घर, एक बड़ी गाड़ी, एक प्यारी स्वस्थ बच्ची, एक सम्मानित जाॅब, मगर शायद ही कोई पल ऐसा रहा हो, जब तुमने मुझे महसूस कराया हो कि तुम मुझे पाकर खुश थी, इसलिए मैं तुमसे अलग हो रहा हूँ। मैंने तुम्हारी जिन्दगी ग्रहण की तरह लगकर खत्म की, इसके लिए क्षमाप्रार्थना के साथ –
गौरव कुमार सिंह
तुम्हारा फीका लड्डू
लड्डू नाम तुमने ही मुझे दिया था।
चौदह साल बाद। रात के नौ बजे। उसके फोन पर मित्र का एस.एम.एस. आता है – तुम्हारे पिता जी नहीं रहे। सुबह होगी अन्त्येष्टि। पढ़ते ही वह बैठ जाता है। दिमाग में बचपन से लेकर घर छोड़कर आने तक की फिल्म चलने लगती है। आँसू टपकने लगते हैं। हवा में वही मुर्दा जिस्म जैसी गंध जो उसके दादा-दादी माँ के मरने पर आई थी, आ रही है। वह दो जोड़ी कपड़े बैग में डालकर जाने की सोचता है। फिर सोचता है, अब क्या करूँगा जाकर? जाना तो चाहिए। अब किस मुँह से जाऊंगा? यही सोचते-सोचते दस बज जाते हैं। दिन-भर का थका है, बिस्तर पर पड़ा है।
दो-तीन घंटे रोने के बाद चार बजे आँख खुलती है। उठकर बैग लेकर बस में बैठ जाता है। गढ़मुक्तेश्वर से रुड़की पहुँचने में एक-सवा घंटा लगता है। रास्ते-भर चुप बैठा हुआ सोच रहा है, क्या सोचेगी उसकी बेटी-दामाद? होंगे वहाँ बुआ, फूफा और उनके बच्चे, वह भी। पिता के प्रति भी तो कुछ फर्ज था उसका। बहुत कुछ चलता रहता है मन में। वह घर पहुँचता है तो अन्त्येष्टि के लिए ले जाने की तैयारी पूरी हो रही है। सभी उसे देखकर हतप्रभ रह जाते हैं। परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अरथी कंधे पर रख लेता है। लोग खुसर-पुसर करने लगते हैं। औरतें रोने लगती हैं। उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं।
श्मशान में बेटा होने के नाते वह मुखाग्नि देता है। वह सोचता है, बस यही फर्ज था क्या मेरा? श्मशान आने के बाद रास्ते से ही भाग जाने का मन होता है, मगर तीजा-तेरहवीं की रस्में जब जीते जी कुछ नहीं किया तो? रस्मों में क्या रखा है? घर आता है। बुआ उसे पकड़कर रोने लगती है। तीन साल से बिस्तर पर था तेरा बाप, आकर भी नहीं देखा? वह पत्थर बना खड़ा रहता है। बेटी दूर खड़ी रोती रहती है। सुमि की आँखों से आँसू टपक रहे हैं। कितना बदल गई है इतने सालों में। कमजोर और साँवली भी हो गई है। ”सारे फर्ज इसी ने पूरे किए हैं इतने सालों में। कीड़े पड़ जाते उसमें, तीन साल से सेवा कर रही है। असली बेटा तो ये थी उसका।“ बुआ कह रही थी। ”चल मिट्टी का मुँह देख लिया, आ गया, दाग दे दिया। उसकी आत्मा को शान्ति मिल जाएगी।“ बुआ कह रही थी। किसी की भी समझ नहीं आ रहा था कि उससे बात कैसे शुरू करें। कहीं कुछ गलत लग गया और दोबारा भाग गया तो? बेटी के दोनों बच्चे चुपचाप खड़े देख रहे थे। बेटी अब बिल्कुल अपनी माँ जैसी दिख रही थी। बीच-बीच में मिलने वाली औरतें आ जाती थीं, रोने लगती थीं। कमरे में एक तरफ उपला सुलगा हुआ था। वह बाहर कोने में पड़ी कुर्सी पर सबसे अलग बैठा है। उसकी बुआ का लड़का उसे पानी का गिलास थमा देता है। वह चुपचाप लेकर पी लेता है। पड़ोस से आए खाने से प्लेट में लगाकर उसकी बुआ उसे खाना दे देती है। बुआ के बच्चे अपनी कुर्सियाँ लेकर उसी के पास बैठ गए हैं। मगर अपनी बातें कर रहे हैं। बुआ उन बच्चों को भी प्लेट दे देती है। वह प्लेट लेकर साइड में रख देता है। उसकी बुआ का बेटा प्लेट उठाकर दोबारा हाथ में दे देता है। बुआ कहती है, इसमें से एक टुकड़ा उपले के पास मिनस दे, थोड़ा सा पानी भी, कड़वी रोटी है, खानी पड़ती है, खा ले। वह उठकर प्लेट से रोटी और गुड़ जमीन पर मिनसकर पानी घुमा देता है। फिर आकर जैसे-तैसे रोटी धकेल लेता है। सुमि उसी तरह काम में लगी है। कभी-कभी आते-जाते उसके चेहरे पर नजर पड़ जाती है, मगर वह उसकी तरफ नहीं देखती। वह इतने साल कहाँ रहा? क्यों रहा? क्यों नहीं आया? कोई नहीं पूछता। पंडित तीजे में दोनों को पास बैठाकर हवन करवा रहा है। उसे अपने फेरे याद आ जाते हैं। पंडित द्वारा भरे वचन याद आते हैं। वह चुपचाप पंडित द्वारा बताई क्रिया को दोहरा रही है। बुआ कहती है – ”पंडित जी, नवरात्रे हैं। तेरहवीं तेरह दिन में करेंगे तो सबके यहाँ नवरात्रों की आन पड़ जाएगी।“ ”कल को चौथे में सब निपटा दो।“ पंडित उनकी बात का आशय समझकर कहता है। सब मिलकर तेरहवीं के लिए धर्मशाला-हलवाई बुक करने जा रहे हैं। वह चुपचाप बैठा सोच रहा है – इस सारे काम की जिम्मेदारी तो उसकी थी। वह अपनी जेब से पैसे निकालकर अपनी बुआ के लड़के को देता है। रख लो, कहीं जरूरत पड़ेगी तो दे देना। वह बिना कुछ बोले रख लेता है। वह पूछता है – ”पास वाली धर्मशाला ठीक रहेगी भैया?“ वह ‘हाँ’ में  गरदन हिला देता है। चौथे के बाद सब मेहमान अपने घर जा रहे हैं। उसकी बुआ उसके पास बैठी है। सुमि लड्डू देकर सबको विदा कर रही है। ”अब तक तो तेरे बाप के सहारे दिन काट लिए इसने, अब ध्यान रखना बहू का। जो हो गया, सो हो गया।“ वह चुप है। समझ नहीं आता, क्या जवाब दे। किस मुँह से रुके? किस मुँह से जाए? बेटी के बच्चे आकर खड़े हो गए हैं। बुआ कहती है – नानू को नमस्ते करो। दोनों बच्चे नमस्ते कर लेते हैं। उसके दिल में दोनों के चेहरे देखकर मोह उमड़ पड़ता है। बेटी चाय के कप लेकर आई है। उसकी तरफ भी चाय बढ़ाती है। वह उठा लेता है। नाती पास आकर खड़ा हो गया है। ”नानू, आप इतने दिन कहाँ थे? मम्मी कहती थी आप बाहर गए हो।“ वह उसे उठाकर गोद में बैठा लेता है। ”अब यहीं रहेगा, तेरे पास ही।“ बुआ कहती है। ”भैया, आपके तो सारे बाल उड़ गए।“ उसकी बुआ का बेटा कहता है। वह हौले से मुस्करा देता है। उसकी बेटी माँ अकेली कैसे रहेगी तेरहवीं तक रुकी है। बुआ कहती है – ”यू तो निपट गया सब, पर तेरह दिन तो आदमी की आत्मा अपनों में भटकती ही है।“ अब बेटी के दोनों बच्चे उसके साथ खेलते रहते हैं। बुआ को छोड़कर सभी मेहमान लौट गए हैं। उसकी बेटी के बच्चों के स्कूल खुले हैं। वे भी अपने पापा के साथ घर जा रहे हैं। जाते वक्त दामाद नमस्ते करता है। बच्चे भी ‘नानू नमस्ते’ कहकर पाँव पर हाथ लगाते हैं। वह उनके सिर पर हाथ रख देता है। बेटी की आँखों से आँसू टपक रहे हैं। वह मम्मी से मिलकर खूब रोती है। बुआ उसे चुप करती है। फिर वह अपने पापा के पास आकर उसे पकड़कर रोने लगती है। उसकी भी आँखों से आँसू झरते रहते हैं। काफी देर बाद बुआ उसे अलग करती है। ‘ध्यान रखना मम्मी का’ कहकर वह चल देती है। उसे नहीं लगता, वह अब जा पाएगा।

1 टिप्पणी

  1. माँ, पत्नी और इन दोनों के बीच पति और पुत्र के रूप में एक पुरुष , त्रिकोणीय संबंधों की खूबसूरती व कुरूपता के सूक्ष्म तंतुओं को कुशलता से उजागर कर पारिवारिक रिश्तों की खूबसूरती कायम रखने हेतु आवश्कयक चिंतन प्रदान करती है यह कहानी । डा. पुष्पलता जी को बधाई

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