वह  उठने को  तैयार हो गई ।  मिसेज पांडे बाहर तक छोड़ने आईं। वह उनके दूसरे बच्चे को देखने आई थी  । 
 ‘अब आप भी दूसरा कर लो …बिटिया पर्याप्त बड़ी हो गई है ! ‘ मिसेस पांडे ने उससे कहा है  । वह अंग्रेजी की प्रोफ़ेसर हैं  । बहुत शुद्ध हिंदी बोलती हैं  । मृणाल के साथ उनकी अच्छी पटरी है  । मृणाल  तो आम ग्रहणी है । लेकिन उसकी जानकारियां आम गृहिणियों से ज्यादा फैली  हुई है । उसकी समझदार बातें , सलीके का फैशन , नए से नए विषयों की जानकारियां कई स्तरों पर बुद्धिजीवी पुरुषों से भी एक कदम आगे दिखाई देती हैं। मिसेस पांडे और मृणाल सहेलियां हैं । बहुत बार, बहुत से लोगों द्वारा जो सुन चुकी है मृणाल, आज वही बातें मृणाल को मिसेज पांडे ने भी कहा ।
घर बाहर जहां जाती है वह , सभी एक ही बात जरूर बोल देते हैं – अब दूसरा बच्चा हो ही जाना चाहिए । बिटिया  सात साल की हो गई है । मृणाल पिछले 4 सालों से यही एक बात सुन रही है । पता नहीं क्यों लोग उसके पीछे पड़े हैं । अरे जब उसे और उसके पति को कोई फर्क नहीं पड़ता तो लोगों को क्या मतलब ? लेकिन लोगों को तो मतलब है । लोगों को तो इन्हीं सब बातों से मतलब होता है । उसकी सास ननदें जिठानी या मायके में मम्मी भाभी सभी कभी डायरेक्ट कभी इनडायरेक्ट एक बच्चा होने वह भी लड़की होने की नेगेटिव पहलू बताते रहते हैं । वह जब कहती है कि क्या गारंटी है कि दोबारा लड़का होगा ? लोग उसे यूं देखते हैं मानो वह दुनिया की सबसे बेवकूफ औरत है । अरे अब तो अल्ट्रासाउंड सोनोग्राफी वगैरह पुरानी बातें हो गई , अब तो एरिक्सन पद्धति का जमाना है । आराम से एक्स वाई गुणसूत्रों को अलग किया जाता है और बेटा दिलाने वाले वाई गुणसूत्र का निषेचन कराया जाता है । इस प्रक्रिया की सफलता की गारंटी 70 फीसदी  होने का दावा भी किया जाता है ।  इस बारे में पढ़ा तो उसने भी था । लेकिन इसे पढ़कर भी उसके मन में वही भाव उमड़े जो पहले उपलब्ध तकनीकों के बारे में थे  । चाहे वह 5 महीने के गर्भ का अल्ट्रासाउंड द्वारा पता लगाना हो या फिर डेढ़ महीने में ही गर्भाशय से द्रव निकाल कर उसकी जांच कर पता लगाना हो कि अंदर नर भ्रूण है या मादा। इन सब की परिणीति तो वहीं जाकर होनी है । मादा का तिरस्कार । यानी अगर पहली संतान लड़की है तो दूसरी फिर लड़की नहीं चाहिए । ताजुब है , पहली संतान लड़का होने पर लोग दूसरी संतान के समय इस तरह की चूहा दौड़ में शामिल नहीं होते । इनके लिए तो लड़की हो गई तो भी ठीक वाली स्थिति रहती है  ,लड़का हो गया तो फिर तो बोनस ही समझो ।मृणाल बहुत से ऐसे दंपतियों को जानती है जो पहला बच्चा लड़का होने पर दूसरा लड़की चाहते हैं , लेकिन लड़की पाने के लिए वह वैसी कवायद नहीं करते जैसा कि लड़का पाने के लिए देखने में आती है ।
मृणाल को याद आता है जब वह पहली बार मां बनने वाली थी । हर नजर उसके हाव-भाव में बेटा पैदा होने की संभावना व्यक्त करती । मीठा अच्छा लगता है ? बेटा ही होगा ! उसके चलने बैठने उसके शरीर के ऊभार ।पेट आगे की ओर निकला है  ,या पीछे का हिस्सा जरा भी भारी नहीं है , यह सब लक्षण लड़का होने के ही है ।मृणाल सिर्फ मां बनना चाहती थी । उसे एक स्वस्थ बच्चा चाहिए था । लड़का हो या लड़की । वह नहीं चाहती थी लड़की होने पर कोई उसका स्वागत निराशा से करे । वह यह भी नहीं चाहती थी कि लोग ‘ अरे पहलौटी है , आगे भगवान लड़का भी देगा  ‘ कहकर सांत्वना वाले शब्द उसे सुनने पड़े । मृणाल चालाक बहुत है । कुटिल चलाकी नहीं , समझ भरी चालाकी। जो परिस्थितियों को सहज ही अपने पक्ष में कर ले । मृणाल याद करती है , उसने कैसा माहौल बनाया था उस समय अपने और अपने होने वाले बच्चे के पक्ष में जिसके बारे में उसे पता नहीं था कि वह लड़की होगी या लड़का । कोई कहता कि इसे जरूर लड़का होगा इसका पेट का आकार देखो । मृणाल तुरंत बोल पड़ती, -नहीं , उसे तो लड़की चाहिए  , खूब सुंदर सी लड़की । मैंने तो मनौती भी मान रखी है , मेरी बेटी होगी तो मैं देवी के दर्शन करने जाऊंगी । उसके बाल उतरवाने विंध्याचल देवी जाऊंगी । ‘बड़ी बुढ़ियाँ उसे बरज देतीं -अरे मनौती ही मांगनी है तो लड़का पैदा होने की मांगों  …लड़की पैदा होने की मनौती क्या मांगना ? 
डॉक्टर ने तीसरे और चौथे महीने में अल्ट्रासाउंड भी करवाया , बच्चे की ग्रोथ देखने के लिए । लोगों ने उसे सलाह दी थी , डॉक्टर से पूछ लेना , वह कुछ रुपए अतिरिक्त लेकर बता देगा , गर्भ में लड़का है या लड़की । लेकिन मृणाल को उसमें कोई रुचि नहीं थी । उसने अपने पति से कभी जिक्र नहीं किया कि उस ने डॉक्टर से पूछा था या नहीं । लेबर रूम में भी जब डॉक्टरों और नर्सों ने उसका ध्यान बंटाने के लिए पूछा कि उसे क्या चाहिए ? लड़का या लड़की ! उसने वहां भी यही बोला था  ,मुझे लड़की चाहिए । डॉक्टर ने हंसकर कहा था , चलो कोई तो है जिसे लड़की चाहिए । पीड़ा के क्षणों में उसके इतने दिनों का चला आ रहा एक निष्पाप नाटक उसका सच बन गया था । एक गर्वीली सोच उसपर तारी हो गई थी , हां शायद वह शताब्दियों बाद दूसरी गांधारी पैदा हुई है , जिसने संतान के रूप में बेटी की चाहना की है  ।और जब डॉक्टर ने उसे बताया कि उसे बेटी हुई है क्या वह उसे गोद में लेना  चाहेगी ?  उसने तुरंत हां कह दी , और लेबर टेबल पर ही वह बैठ गई थी । डॉक्टर ने अभी टांके भी नहीं लगाए थे । पर वह अपनी पीड़ा भूल चुकी थी । खुशी से उसकी आंखों में आंसू छलक पड़े । डॉक्टर नर्सें हैरान थीं, शायद आज से पहले उन्होंने इस शहर में किसी लड़की के पैदा होने पर ऐसी प्रतिक्रिया नहीं देखी थी । मृणाल तो लाल कंबल में लिपटे अपनी बेटी के गोलमोल चेहरे को ही देख रही थी । बच्ची उसे मिचमिचाती हुई एक आंख से देख रही थी दूसरी आँख मिची हुई थी, शायद चकाचौंध रोशनी की वजह से। सास ने कहा लड़की लड़की किये थी , लड़की ही पैदा हो गई ।
मृणाल ने लड़की का सब कुछ बड़े शौक से किया। खूब धूमधाम से मनाई पहला जन्मदिन मुंडन कंनछेदन सबकुछ किया । कई देवी स्थानों पर जाकर दिखावे की मनौतियां पूरी की । पति की इच्छा जानने की उसने कोई जरूरत नहीं समझी । बच्चा उसे पैदा करना है ,पैदा करने की पीड़ा उसे सहनी है , और अगर वह लड़की पैदा करके खुश है तो उसे और किसी की चाहत से कोई मतलब नहीं । मृणाल ने तो हंसी हंसी में पति से कह भी दिया था , अगर तुम्हें बेटा चाहिए और तुम सिर्फ बेटे के लिए मुझे बार-बार जांच के अमानवीय प्रक्रिया से गुजारने की सोचे बैठे हो तो मुझसे यह सब नहीं होने का । तुम दूसरी शादी कर लो मुझे कोई एतराज नहीं ऐसा भी नहीं ।
पता नहीं क्यों जिसे वह कभी कमी नहीं  मानती , लोग कोच कोच कर उसी ओर उसका ध्यान दिलाना चाहते हैं । उसकी जिंदगी में यह कमी है , और यह आसानी से भर सकती है । उसे समय रहते अपनी जिंदगी की इस कमी को भर लेना चाहिए । माना पति पत्नी दो बच्चे उसमें भी एक लड़का एक लड़की कंपलीट फैमिली माने जाते हैं , लेकिन जरूरी है जिंदगी में सब कुछ कंप्लीट हो ही जाए । फिर अपनी जिंदगी का यह अधूरापन उसका खुद का चुना हुआ है लोगों को क्यों इतना मतलब रहता है ? और फिर सबको तो सब कुछ मिल नहीं जाता । सब की जिंदगी में कुछ न कुछ कमी तो रहती ही है  ,या शायद नहीं रहती ।आजकल चाहने पर सब कुछ पाया जा सकता है । बस तरीकों को आजमाने की हिम्मत होनी चाहिए । 
लोगों मे अपार हिम्मत है। पति के एक दोस्त हैं, सुनील जी। पहली बेटी के बाद बेटे के चक्कर में दो एबॉर्शन कराये। तीसरी बार कनफर्म लड़का था। डॉक्टर ने बहुत से एतिहात बताये। सबका पालन किया गया। छठें महीने मे किसी रिश्तेदार की शादी मे शामिल होने के लिए  250 कि. मी.  की यात्रा  की उन्होंने । उसी रात रक्तस्राव हुआ और बच्चा एबॉट हो गया। अगली बार उन्होंने कोई चेक वेक नहीं कराया,  बेटी हुई  ।अब वो सबको ज्ञान देते फिरते हैं कि, किस्मत मे जो लिखा है, उससे ज्यादा नहीं  मिलता  । ईश्वर  के विधान मे व्यवधान  डालना अनुचित है  ।कोई भी तकनीकी  ईश्वर  के फैसले को नहीं बदल सकती। बेटा पैदा हो भी गया और भाग्य मे नहीं रहा तो दुर्घटना का शिकार  होकर हाथ से जाता रहेगा। 
मृणाल हमेशा ही तो अपने मन का नहीं कर पाती । कभी-कभी उसे भी हार माननी पड़ती है । उसका संकल्प है, एक ही बच्चा हो । पर इसके लिए नियोजित भी तो रहना होता है।  पति को इन सब से कोई मतलब नहीं । यह तो मृणाल का सिर दर्द है  ।वह copper-t लगवाए मल्टीलोड लगवाये या पिल्स ले। पिल्स उसे सूट नहीं करती । copper-t वगैरा लगवाने से वह डरती है । उसे तो आश्चर्य होता है कैसे वह मां बन गई  ।वह 9 महीने और वह सरकारी अस्पताल का लेबर रूम याद आते ही उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं । कैसे बीते थे वह 9 महीने । जब जब वह डॉक्टर के पास चेकअप के लिए जाती डॉक्टर हाथ डालकर एग्जामिन करती । उसका जी कैसा तो हो जाता । आंखें आंसुओं से भर जातीं । उसके गालों पर बहते आंसू देख कर डॉक्टर और भी झल्ला जाती। 
‘ठीक से पैर मोड़ो, ढ़ीला छोड़ो और यह आंसू क्यों?  मैंने क्या मारा पीटा है ? उफ बाबा…  मुझसे नहीं होता ! ” डॉक्टर लगातार बड़बडा़ती। वह रुलाई रोककर डॉक्टर के कहे अनुसार करने का प्रयत्न करती। अपनी तकलीफ अपनी पीड़ा अपनी अटपटी सी मानसिक स्थिति वह किसी से भी नहीं बांट सकती थी । उल्टियां करती वह दोहरी हो जाती । सांत्वना के दो शब्द उसे नहीं सुनाई पड़ते।  उसकी सास 6बच्चों की मां थीं।  दो बेटियां और तीन बेटे उन्होंने  मृणाल को लाने से पहले ब्याहे थे।   बेटियां और बहूयें सभी दो-दो तीन-तीन बच्चों को जन्म दे चुकी थीं ।मृणाल  कोई पहली तो नहीं थी इस घर में जो मां बन रही थी । पति भी उसकी रोज-रोज की कराहटें सुनकर झल्ला उठता । उसकी सभी तकलीफ का उसके पास एक ही जवाब होता –  आखिर सभी औरतें तो मां बनती हैं … यह तकलीफ तो सभी को होती होगी । वह कोई आसमान से उतरी परी तो है नहीं ।  डॉक्टर ने भी सब कुछ नॉर्मल बताया था । कोई एक्स्ट्रा केयर नहीं  , बेड रेस्ट नहीं …आराम से रोजमर्रा के काम करो । मृणाल सोचती है , ‘ डॉक्टरों को खासतौर से गाइनोक्लोजिस्ट को तो थोड़ा सा मनोवैज्ञानिक भी होना चाहिए । पहला बच्चा , और शादी हुए भी ज्यादा दिन नहीं हुए थे  ,संकोच और डर से वह सारा काम करती । पूरा दिन चलती रहती । पैर सूज कर मोटे हो जाते । दर्द से लगता कमर टूट जाएगी । लेकिन जब डॉक्टर कहती हैं सब कुछ नॉर्मल है , तो फिर कोई बहू के मलिन हुए चेहरे की फिक्र क्यों करेगा ? 
मृणाल सोचती है , ‘पुराने जमाने की यह परंपरा अच्छी थी,  बहू का पहला बच्चा मायके में होना चाहिए । जहां बच्चा पेट में आया नहीं कि बहू को मायके भिजवा दिया जाता था । फिर वह बच्चा पैदा होने के भी तीन चार महीने बाद आती थी ।
और यह आजकल के डॉक्टरों की नई नई नई थ्योरी । पति को तो प्रेगनेंसी में भी सेक्स चाहिए । मृणाल ने अपनी तकलीफ परे  कर ,  बच्चे को आगे किया -बच्चे को नुकसान पहुंच सकता है । पति ने कई कई पत्रिकाएं लाकर थमा दीं -लो डॉक्टर कहते हैं प्रेगनेंसी में सेक्स करने से कोई खतरा नहीं होता । कुछ विशेष परिस्थितियों में ही यह वर्जित है । सामान्य अवस्था में नहीं । और मृणाल की स्थिति तो डॉक्टरों  के अनुसार बिल्कुल सामान्य थी । लेकिन मृणाल को तो तकलीफ होती थी । दुनिया की हर औरत को होती होगी । प्रेगनेंसी में शायद ही कोई औरत सेक्स की इच्छा करती हो । वह मजबूरी में सिर्फ पति की संतुष्टि के लिए करती । ऊपर से पत्रिकाओं में डॉक्टरों की सलाहें कितनी निर्मम होती हैं ? प्रेगनेंसी में सेक्स कुछ विशेष आसनों में किया जाए तो दुखदाई नहीं होता । अरे कोई इन्हें बताए पूरा प्रेगनेंसी पीरियड ही दुखदाई होता है । अपने शरीर के अंदर एक और जीव को धारण करना क्या कोई आसान काम होता है ? और फिर प्रसव के बाद भी क्या कुछ कम मुश्किलें होती हैं ? मृणाल ने तो कान ही पकड़ लिया था , उसे दूसरी बार मां बनना ही नहीं । पर खुद के सोचने से ही क्या कुछ संभव है ? बिटिया 6 महीने की थी । उस महीने उसका मासिक पिछली डेट को क्रॉस कर गया था । मृणाल चिंतित हो रही थी । ऐसा होने का मतलब खतरे की घंटी । उसका मासिक चक्र हमेशा 5 दिन पहले होता है । कभी 7 दिन पहले भी । लेकिन डेट के बाद कभी नहीं आता । उसने पति को बताया  ।’अरे एकाध दिन ऊपर नीचे तो होता है , इसमें इतनी चिंता कैसी…?  ‘दो दिन और गुजर गया । अब तो मृणाल को घबराहट सवार हो गई । पति यूरिन टेस्ट का उपकरण घर ही ले आया । टेस्ट पॉजिटिव आया। वह हिल गयी थी। बिटिया अभी सिर्फ 6 महीने की है । शरीर अभी संभला नहीं है । अभी भी वह घर के कामकाज और बच्चे की परवरिश में सामंजस्य नहीं बैठा पाई थी । कैसे हो पाएगा दो बच्चों का! और फिर उसने तो सिर्फ एक ही बच्चे के बारे में सोचा था । पति भी चिंता में पड़ गया । दूसरा बच्चा मानो फिर से खर्चा । फिर से कहीं लड़की हो गई तो ? मृणाल से बोले , ‘एक बिटिया तो है ही  ,अब दूसरी भी हो गई तो ?और यह मृणाल टेस्ट कराने को कहो तो हत्थे से उखड़ जाएगी । मृणाल यूँ भी अपसेट थी । अबॉर्शन कराना नहीं चाहती थी , लेकिन नहीं कराने का मतलब बच्चे को पैदा करना और फिर ढेरों मुसीबतें । अंदर ही अंदर वह अपने दिल को कड़ा कर रही थी । पति चायनीज चार्ट लेकर बैठ गए । इस हिसाब से तो लड़की ही पैदा होगी । मृणाल सोच में पड़ गई थी । यूँ भी उसे बच्चा नहीं चाहिए था और अगर चाइनीज चार्ट की बात सही निकली तो फिर से लड़की घर में कोई नहीं चाहेगा । खुद उसे लड़की लड़का से कोई अंतर नहीं पड़ता । लेकिन लड़की तो उसके पास है ही फिर वह लड़की क्यों चाहेंगे । लेकिन वह एबॉर्शन इस लिए थोड़ी  करायेगी।  इस चाइनीज चार्ट में पता नहीं कितनी सच्चाई होती है ? है तो बिल्कुल अवैज्ञानिक , पर  कुछ लोग तो बहुत मानते हैं । उसके पति के  एक मित्र तो डंके की चोट पर कहते हैं  – उनके दोनों बच्चे चाइनीज पद्धति से ही हुए हैं । पहले उन्हें लड़का चाहिए था  , तो लड़का पैदा हुआ । दूसरी बार लड़की के लिए ट्राई किया । दोनों बार सही साबित हुआ । 
मृणाल ने निर्णय लेने में दो दिन लगा दिए  थे , अंत में वह राजी हो गई थी । आखिर , इतनी छोटी बच्ची है  ।फिर उसे दूसरा नहीं चाहिए । एक बार कष्ट उठा ले । फिर उसी अजीब से आकार वाली टेबल पर लेटना होगा पैर उठाकर  ।लेकिन उन सब से तो गुजरना ही था । अबॉर्शन का अनुभव कितना खराब होता है । मृणाल भावुक प्रवृत्ति की है , शायद इसलिए उसे ऐसा लगा हो ।पर प्रसव की पीड़ा कितनी भयानक होती है लेकिन बाहों में बच्चा आते ही  स्त्री सब भूल जाती हैं  । लेकिन एबॉर्शन के बाद कितना डिप्रेशन महसूस हुआ था । लगा कुछ  छिन गया है । एक अपराधबोध सा हफ्तों सालता रहा उसे । मन में एक कचोट भी थी । भले चाइनीज चार्ट फिजूल की चीज हो  , लेकिन अगर उसके अनुसार लड़का पैदा होने के चांसेज होते तो भी क्या वह यूं ही फटाफट एबॉर्शन के लिए तैयार हो जाती ? यह प्रश्न पूछती जरूर है वह अपने आप से । लेकिन उत्तर देने में डरती भी है  । वह अपने आपको विश्वास दिलाना चाहती है  ,उसने एबॉर्शन लड़का लड़की जैसे फिजूल मुद्दे को लेकर नहीं कराया , उसे कोई बच्चा नहीं चाहिए था इसलिए कराया  ।और एक हफ्ते भी तो नहीं हुए थे एक हफ्ते में कोई जान तो पड़ी नहीं होती । तो वैसे ही हुआ जैसे डिस्चार्ज अंदर ना करके बाहर कर दिया । उसका पति यही तो करता था । उसे कंडोम इस्तेमाल करने से परहेज था । ‘अरे तुम निश्चिंत रहो मैं अंदर डिस्चार्ज नहीं करूंगा ‘ और बाद में उसके पेट पर से वीर्य को पोछते हुए बोलता  – ‘लो , इतने सारे लड़का लड़की इसमें पुछ गये। 
और ऐसे ही गफलत में वो फंस गई थी । एबॉर्शन के बाद उसे समझ आ गई , आदमी के भरोसे रहना बेवकूफी है । उसे ही कुछ ही इंतजाम करना होगा । और उसने मल्टीलोड लगवाने का फैसला कर लिया था । एक बार फिर उसी यातना से गुजर ना फिर से उसी अजीब से टेबल पर पैर को मोड़कर लेटना । 
आदमी क्या कल्पना भी कर सकता है औरतें किन किन यातनाओं से गुजरती हैं । शायद इसलिए एक औरत लड़की पैदा करना नहीं चाहती है । मृणाल अब ऐसे किसी दर्द से नहीं गुजरना चाहती  ।यकीनन जब कोई स्त्री बेटी नहीं पैदा करना चाहती तो उसके कारण वह सारे के सारे दर्द की याद होती होगी जो उसने एक स्त्री होने के नाते स्वयं झेले हैं । स्त्री और पुरुष दोनों भिन्न कारणों से बेटी नहीं चाहते । पुरुष को बेटी ना चाहना बेटा चाहना मतलब उसका वंश आगे बढ़ना कन्यादान से बचना और एक बड़ी जिम्मेदारी जो बेटी के रूप में उसे मिलती है उन सब से बचना भी होता है। मृणाल फिर से उन दिनों से गुजारना नहीं चाहती । उसे तो दूसरी बार मल्टीलोड लगवाने भी डेढ़ साल होने को आया  । लेकिन अब उसे अपना फैसला डगमगाता नजर आता है । लोगों के तर्कों को वह काटने की कोशिश करती है । मम्मी का कहना है  ,बिटिया को भी तो कोई अपना कहने वाला चाहिए  । मां बाप हमेशा तो नहीं रहते । मृणाल सोचने लग पड़ती है  , वह खुद तो चार भाई बहन मे सबसे बड़ी थी । उसे याद आता है कैसे वह सब की चिंता करती रहती थी । कोई बहन या फिर भाई घर से बाहर गया है , आने में थोड़ी भी देर हुई   वह चिंता में घुलने लगती । सबको लेकर एक असुरक्षा हावी रहती है उस पर कहीं ऐसा ना हो जाए कहीं यह ना हो जाए । वह जानती है , आज अगर वह अपने पति को छोड़कर चली जाए तो कोई उस की सरपरस्ती नहीं बनने का । सबकी अपनी अपनी दुनिया है । अपनी जिंदगी अपने आप में हर कोई अकेला । उसे तो याद भी नहीं पड़ता उसने अपनी कोई बात अपने भाई-बहनों से शेयर की होगी । सबके अपने अपने दोस्त हैं, अपनी अपनी दुनिया ।  हां उसे हमेशा अपने भाई-बहनों की फिकर लगी रहती थी । वह जिंदगी में सफल हो उनके साथ कोई दुर्घटना ना हो , उनके साथ ऐसा ना हो वैसा ना हो …ये चिंतायें उसकी आज तक बनी हुई हैं।  उसे नहीं पता उसके भाई बहन भी एक दूसरे के बारे में ऐसा ही सोचते होंगे ।
और बड़ा परिवार सुरक्षा कब देता है ? मृणाल ने तो ऐसा महसूस ही नहीं किया । बचपन से एक असुरक्षा चारों ओर घिरी रहती थी ।कमाने वाले सिर्फ पापा हैं । 6 लोगों का परिवार । पापा कभी सिर दर्द की शिकायत भी करते तो घर में असुरक्षा का वातावरण घिर जाता था । वह हमेशा सोचती, अगर वह सिर्फ एक या दो भाई बहन होते तो भी क्या चिंताएं इतनी ही गहरी होतीं। व्यक्ति विशेष के स्वास्थ्य की चिंता करना एक अलग बात है , लेकिन उस चिंता के साथ सारी जिंदगी की सुरक्षा जुड़ी हो तो ये चिंता सिर्फ प्यार या परवाह न होकर एक तरह की स्वार्थपना भी है। 
मृणाल को लगता है उसने आधी जिंदगी तो सिर्फ बेकार की चिंताओं में जाया कर दी । रिश्ते भावनाएं सब व्यक्ति को कमजोर ही बनाते हैं । मृणाल याद करती है कुछ साल पहले वह कैसी हुआ करती थी ? छोटे-छोटे बच्चे उसे कितने प्यारे लगते थे । सारी दुनिया के बच्चों के लिए उसके मन में मातृत्व  हिलोरे लेता था । लेकिन जैसे ही खुद मां बनी  , कैसा तो परिवर्तन  आ गया । मुद्दत से शायद उसने किसी और बच्चे को ध्यान से देखा ही नहीं । उसकी सारी दुनिया सारी आशाएं आकांक्षाएं सिर्फ उसकी बेटी तक सीमित हो गई हैं। बड़ी मुश्किल से उसके दिल में किसी और बच्चे के लिए प्यार उमड़ता है । मृणाल को लगता है अगर एक और बच्चा हो गया तो वह तो और स्वार्थी और आत्म केंद्रित हो जाएगी  । और फिर एक और बच्चा होने का मतलब और जिम्मेदारियां । एक व्यक्ति की आय में इस जमाने में गुजारा हो पाएगा भला? अपने पापा को देखा है क्लास वन ऑफिसर होकर रिटायर हुए । अपना मकान रिटायर होने के 1 महीने पहले ही बना पाए । खुद के लिए कभी कार नहीं खरीद पाए लेकिन लड़कियों को शादी में देना पड़ा । मृणाल अपने ससुर को देखती है , कॉलेज के प्रिंसिपल के पद से रिटायर हुए  । पूरी जिंदगी बच्चों को ही सेटिल करते रहे। न खुद के लिए कुछ कर पाए न हीं पत्नी को कोई सुख दे पाए ।  पहले के लोग शायद यूँ ही जीने को सुख मानते हैं । ढेर सारे बच्चे  ,एक की जिम्मेदारी  निबटी, दूसरे की तैयार । आधी जिंदगी यूं ही गुजर गई । बची आधी में नाती नतुवर  ,बेटे पोते पोतियो का जमघट  ।उन्हीं के लिए जिए , उन्हीं में लबराये  मर गये। एक सामान्य भारतीय गृहस्थ कि यही जिंदगी होती थी । ‘अपने लिए जीना ‘शब्द तो इधर के एक दशक में उभरा है । खासतौर पर औरतों में । हर साल एक बच्चा पैदा करना ,और सुबह से शाम तक बच्चा और उनके बाप की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लोगों की नजरों में बड़ी सुखी औरत बनकर जिंदगी की सारी उम्र गुजार देना  ।आज औरत अपने आप को इस भूमिका में फिट करने को तैयार नहीं । उसके पास ढेरों काम है । वह पढ़ाई करती है , फिर नौकरी करती है  ,जो नौकरी नहीं भी करती हैं, वह भी तमाम कार्यों में व्यस्त रहती हैं । उन्हें ब्यूटी पार्लर जाना होता है , किटी पार्टी अटेंड करनी होती है । बच्चों को पढ़ाना होता है । उनके स्कूल जाकर टीचरों से मिलना जुलना होता है । टीवी सीरियल्स देखने होते हैं , फिर उन पर बातें भी करनी होती है । आजकल फुर्सत कहां है ? 
आजकल ना पहले की तरह आसान जिंदगी है न सीमित  सपने । अब जिंदगी में सब कुछ चाहिए और सब कुछ हासिल करने के लिए हर आदमी तो नेताओं अफसरों की तरह घोटाले कर नहीं सकता । बेहिसाब आबादी वाले इस देश में अभी कुछ प्रतिशत इमानदार लोग बचे हैं । मृणाल और उसके पति भी उन्हीं कुछ लोगों में हैं । दुकान से सामान लेने के बाद अगर दुकानदार बचे हुए पैसे ज्यादा लौटा दे तो , मृणाल उन पैसों को तुरंत वापस कर देती है । कहीं पड़े हुए अगर पैसे मिल जाएं तो उन्हें भी भिखारियों  जरूरतमंदों को दे देती है । ऐसी इमानदारी पर उसे गर्व है । अपनी इन मासूम ईमानदारीयों को बचाए रखने और जिंदगी को आराम से जीने के लिए मृणाल जैसे लोगों को नियोजित रह कर चलना ही पड़ता है । जिंदगी को प्लान करना पड़ता है ।
पर यह सारी बातें वह सब को तो नहीं बता सकती । लोगों को तो उसकी बड़ी चिंता होती है । लोग उसके हितैषी हैं। उम्र है कि बीती जा रही । समय पर दूसरा बच्चा कर लेना चाहिए ,नहीं तो बाद में बडी़ परेशानी होती कभी कभी मृणाल को अपने निर्णय पर संदेह होने लगता है । कहीं वह गलत तो नहीं कर रही । कहीं बाद में उसे अपने इस निर्णय पर कि, वह सिर्फ एक ही बच्चा रखेगी , पछताना न पड़े । फिर तो समय भी बीत चुका होगा । चाहने पर भी कुछ नहीं कर सकेगी । अभी तो उसकी उम्र ही क्या है ? मात्र 36 साल । आजकल तो इस उम्र में लड़कियों की शादी होती है । और बच्चा होते होते 40 साल हो जाते हैं । तो क्या करें वह?  कभी-कभी उसे पति पर बहुत चिढ़ मचती है। कभी इस बारे में कोई बात ही नहीं करता । उसे क्या चाहिए ?  अभी अगर मृणाल दूसरा बच्चा पैदा करने का निर्णय ले ले तो वह निर्लिप्त भाव से मान लेगा । ऐसा जताते हुए कि, जैसी मृणाल की मर्जी । उसकी कोई जवाबदेही ना हो जैसे ।
डोरबेल ने उसे सोचों के जंगल से बाहर ला दिया। उसकी मौसेरी बहन थीं शुभा दिद्दा। लो, अब ये भी उसे ‘एक बच्चा और’ का ज्ञान देंगी। पर वह उन्हें मौका ही नहीं देगी। उनके बेटे की शादी हुए आठ साल होने को आये ,अभी तक कोई इशू नहीं है। इस बाबत उसने कभी नहीं पूछा। मृणाल को ये सब पूछना पाछना बड़ा अॉकवर्ड लगता रहा है। पर आज उसने सोचा है – पूछेगी। चाय की ट्रे टेबल पर रखते हुए उसने बात शुरू की – और दिद्दा, शुभम के क्या हाल हैं… कब खुशख़बरी आ रही  आपके यहाँ?  
दिद्दा की तो मानों दुखती रग और दुखा दी मृणाल ने । बिसूरने लगीं – अरे ये आजकल के लड़के लड़कियाँ… इन्हें बच्चे नहीं चाहिए। कुत्ते पलवा लो इनसे बस। चार कुत्ते घर में पाले हैं और वीकेंड पे दोनों मिया बीवी मुहल्ले के आवारा कुत्तों के देखभाल में टाइम स्पेंड करते। मेरा तो मन नहीं होता उनके घर हैदराबाद जाने का। पोते पोतियां खिलाने की हसरत ही रह जायेगी जानो…. 
मृणाल अवाक हुई दिद्दा की बातें सुनते हुए उनकी अँसुआई आँखों में भरी पीड़ा को देख रही थी और सोच रही थी – जमाना बहुत बदल रहा है। कहाँ वो एक बच्चा, दो बच्चा के गणित मे उलझी हुई है, अब तो शायद परिवार विदाउट बच्चा का नया कांसेप्ट अडॉप्ट करने वाली पीढ़ी सामने आ रही  ।पता नहीं क्यों ,इस नये फार्मूले पर दिखाई देने वाले जीवन के नये पैटर्न की झलक मृणाल को विचलित कर रही, चिंता मे डाल रही।
हिंदी की चर्चित कहानीकार. हंस, कथादेश, परिकथा, कथाक्रम, सखी(जागरण), निकट, अर्यसदेंश, युगवंशिका, माटी, इन्‍द्रपस्‍थ भारती आदि देश की प्रमुख पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित. आकशवाणी से कहानियों का निरतंर प्रसारण. संपर्क - sapnasingh21june@gmail.com

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