आज के उत्तर आधुनिक विश्व ने रिश्तों का एक नया समीकरण दिया है – लिव– इन यानी एक ही छत के नीचे अविवाहित युवक- युवती का बिना कानूनी, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक वैवाहिक अनुष्ठान के दीर्धकालिक सहवास- यानी शादी जैसा रिश्ता । अमेरिका, कैनेडा, ब्रिटेन, डेनमार्क, चीन, फ्रांस के युवाओं में इसका चलन लगातार बढ़ रहा है। 1960 के दशक तक लिव-इन में रहना असंभव था। पश्चिम के अंधाधुंध अनुकरण के कारण भारत के महानगरों और आई . टी. संस्थानों की युवा पीढ़ी इस रिश्ते की ओर तेजी से झुक रही है। इस रिश्ते में न तलाक का भय है, न आर्थिक दबाव, न वैवाहिक दायित्व निभाने का कर्त्तव्य, न पारिवारिक सामाजिक उत्तरदायित्व। तर्क है कि लंबे समय तक साथ रहने के कारण एक- दूसरे को जानने- समझने की आसानी रहती है। लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि लिव-इन नियमों और संस्थानों को नष्ट कर रहा है, सभ्यता- संस्कृति को चुन्नौती दे रहा है। इसीलिए कल तक वैश्विक समाज लिव-इन को व्यभिचार ही मानता था। जबकि आज लिव-इन को अनैतिक भले ही कह लें, लेकिन यह अवैध नहीं रहा। लिव- इन के प्रचलन का एक कारण स्त्री के दमन, शोषण, दोयम दर्जे की प्रतिक्रिया भी कहा गया है और शिक्षित, आर्थिक रूप से स्वावलंबी, अस्तित्व सजग स्त्री के पुरुषीय दबावों से विद्रोह को भी माना गया है। समाज की अस्वीकृति और तिरस्कार इस रिश्ते के साथ जुड़ा है। रिश्ता टूटने पर सबसे अधिक तकलीफ स्त्री को ही होती है और लिव- इन के बच्चों को समाज की, परिवार की मर्यादाओं को निभाने की न समझ मिलती है,ही उन्हें चिंता इनकी हो सकती है।  
धीरे- धीरे बहुत से देशों ने समय- समय पर कानून बना इस रिश्ते को मान्यता भी दे दी है । हालांकि इस्लामिक देशों में आज भी लिव- इन अवैध है। यहाँ तक कि इन देशों में सिर्फ विवाहित टूरिस्ट ही होटल के एक कमरे में रह सकते हैं। 
वैश्विक इतिहास पर दृष्टिपात करें तो प्रथम अविवाहित युगल आदम और हव्वा का माना जा सकता है। वेदों में भी आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा है- ब्रह्म विवाह, देव विवाह, आर्ष विवाह, प्रजापत्य विवाह, ,असुर विवाह,  गंधर्व विवाह, राक्षस विवाह, और पैशाच विवाह। कल के गंधर्व विवाह जैसा ही आज का लिव- इन है। दुष्यंत- शकुंतला का विवाह इसी कोटि में आता है। भारत के बालीवुड जगत में विवाहित- अविवाहित अनेक लिव-इन जोड़े हैं। किसी ने बाद में शादी कर ली, किसी ने रिश्ता तोड़ लिया और कोई ऐसे ही निभा रहा है। बिपाशा बसु और जॉन अब्राहम 9 वर्ष साथ रहने के बाद अलग हो गए। रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ लिव- इन में रहने के कुछ देर बाद अलग हो गए। कंगना रनौत और विवाहित आदित्य पंचौली के रिश्ते ने तो सब को विस्मित कर दिया। अंकिता लोखंडे और सुशांत सिंह राजपूत 6 साल लिव-इन में रहे। लारा दत्ता और केली दोरजी आदि लिव-इन में रहने वाले अनेकों नाम हैं। विवाहित महेश भट्ट और प्रवीण बाबी का लिव- इन भी चर्चित रहा। सुष्मिता सेन के लिव-इन तो चर्चा विषय रहे ही हैं- सुष्मिता सेन- विक्रम भट्ट, सुष्मिता सेन- रणदीप हुड्डा, सुष्मिता सेन- रोहमन शाल आदि। नीना गुप्ता और विवियन रिचर्ड का रिश्ता भी सब जानते हैं। 
आज भारत में भी लिव-इन सम्बन्ध क़ानूनी दृष्टि से वैध हैं। हालाँकि आधुनिक काल में इनका प्रचलन काफ़ी बढ़ा है, पर फिर भी सामाजिक रूप से उन्हें व्यापक मान्यता प्राप्त नहीं हुई है। विवाहेतर संबंध की बात तो साहित्य शास्त्र में है ही। पुरुष और महिला के बीच स्वेच्छा से सहवास संबंध/ मैत्री भी लिव- इन जैसी स्थिति ही है, जिसे मूलत: विवाहित पुरुषों द्वारा अपनाया जाता है। कृष्णा सोबती के दिलो दानिश की महक और कृपा नारायण  के बीच ऐसे ही संबंध है। लेकिन तब इस स्त्री के लिए रखैल सम्बोधन था। प्रभा खेतान के छिन्नमस्ता उपन्यास में तिलोचमा और प्रिया के ससुर शुभेन्दु सेन के लिव- इन सम्बन्धों के पक्ष में उनकी बेटी नीना भी नहीं है।  नायिका प्रिया की छोटी नानी भी नाना के साथ लिव- इन में ही थी। यह संबंध समाज के लिए असामाजिक और संतान के लिए लज्जित करने वाले ही रहे हैं।    
उषा प्रियम्वदा के भया कबीर उदास नितांत अकेलेपन और बीमारी के आतंक से थोड़ी- बहुत मुक्ति पाने के लिए क्षत- विक्षत लिली डेढ़ साल की बीमारी के बाद अनिश्चित समय के लिए गोवा चली आती है और वनमाली के पैरेगान होटल और काटेज में ठहरती है। वनमाली का स्पर्श उसे सुख देता है- 
“खुली बांह पर हल्का स्पर्श, जैसे तितली के फूल ने चूमा हो।“
उसका चुंबन हैरान कर जाता है। आजपा जाप की तरह उसकी प्रतीक्षा की आदत हो जाती है। लेकिन कैंसर द्वारा मिला आधा- अधूरा शरीर और जीवन उसे निराशाओं और उदासियों में धकेलता रहता है। दोनों पार्टियों में जाते हैं। घूमते हैं। समुद्र तट पर वनमाली और लिली बढिया, ठंडी, सफ़ेद, खुशबूदार वाइन पीते हैं। वनमाली का संसर्ग लिली में जिजीविषा भरता है। संबंध कुछ-कुछ लिव- इन की ओर ही मुड़ रहे हैं। लिली निश्चय करती है-
“अतीत का पृष्ठ बदल दो, वर्तमान में रहो, भविष्य को देखो।“   
उषा प्रियम्वदा के नदी की गंगा का पति पत्नी उत्पीड़न की सारी हदें पार कर देता है। वह उस ठंडे पराये देश में बिना पासपोर्ट, वीज़ा, रुपए-पैसे के, बच्चों को साथ ले, पत्नी को छोड़ आता है। ह स्त्री अंधेरे अकेले घर में, कीमोथैरेपी लाउन्ज में, समुन्द्र किनारे के खारे पानी और तर ठंडी बालू पर तड़पती रहती है- वह अवांछित है, उसकी किसी को जरूरत नहीं। घर- परिवार से विस्थापन उसे आत्महत्या की ओर धकेलता है। उपन्यासकार कहती है- 
“एक बार अगर ज़िंदगी की गाड़ी पटरी से उतर जाये तो फिर वापस आना दुरूह ही नहीं, असंभव होता है।” 
पराये देश में यह अवसन्न करने वाली नियति- उसे एक ठौर देती है- अर्जुनसिंह का। एक सम्पन्न, दया- करुणा से भरा, चार बच्चों का पिता, धार्मिक प्रवृति का ट्रांस्पोर्टर। आलीशान सी-व्यू होटल के सजे-सजाये दो कमरे, मुग्ध प्रेमी, नित्य नए उपहार, उसके निवास के लिए फार्म हाउस खरीदने की योजना, आत्म सम्मान से जीने का अवसर- गंगा जीवन सरिता को ऐसे ही बहने देना चाहती है। आत्मकेंद्रित पति पुरुष ने उसके साथ क्रूरता और अन्याय किया है। आत्महत्या का प्रयास विफल रहता है। प्रिय पुत्र को उसने पल- पल मरते देखा है। वह बुरी तरह टूटी हुई, थकी हुई और हताश है। ऐसे में अर्जुनसिह के साथ लिव- इन संबंध उसमें आत्मविश्वास भरते हैं, जीवन जीने की शक्ति देते हैं। लेकिन दो- तीन महीने बाद ही अर्जुन सिंह का अवैधानिक कामगारों के फर्जी कागज बनवाने के अपराध में पुलिस द्वारा पकड़े जाना, गंगा के जीवन में विस्थापन ला देता है। घर शेयर करने के सिलसिले में वह मात्र एक सप्ताह के लिए एरिक एरिक्सन के सम्पर्क में आती है और उसके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर या रूम शेयर करने के कारण उससे भी लिव- इन के शारीरिक संबंध स्थापित हो जाते हैं। लिव- इन उपेक्षिता गंगा का आत्मविश्वास लौटाने लगता है कि वह अभी युवती है। मानों एरिक से उसके संबंध देहराग से, ऐंद्रियता से आगे आत्मराग के हैं, अतीन्द्रिय हैं। लेकिन अपनी रिसर्च यानी बाल कैंसर पर शोध के लिए एरिक का स्विट्ज़रलैंड चले जाना गंगा के जीवन में फिर विस्थापन लाता है। विदेश की धरती पर यह अकेली स्त्री उत्तरी कैलिफोर्निया में रह रही कैंसर पीड़ित प्रवीण बहन की मृत्यु के बाद उसके लकवाग्रस्त पति की अविवाहित पत्नी बन जाती है। बार- बार का लिव-इन न उसे कोई खुशी दे पाया न ज़िंदगी संवार सका। उषा प्रिंयंवदा ने आकाश गंगा के जीवन को आदर्श नहीं कहा। कहती हैं-          
“जब हम एक परिस्थिति से गुज़र रहे होते हैं तब हमें उसी समय का सच दिखाई पड़ता है- आगे पीछे का तो बाद में समझ में आता है।”
सुषम बेदी के अंतिम उपन्यास पानी केरा बुदबुदा को उनके लंबे जीवन अनुभवों का मार्मिक दस्तावेज़ कह सकते है। यहाँ नायिका पिया का जीवन संघर्ष, द्वंद्व, चिंतन, समझौते, छटपटाहटें नैसर्गिक रूप से चित्रित हैं। पात्र मनोविद होते हुये भी मन:रोगी हैं, सर्वज्ञानी होते हुये भी मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, संतप्त है, भटक रहे हैं। विदेश की धरती पिया को दांपत्यगत अत्याचारों से विद्रोह के लिए स्पेस देती है और वह तनावग्रस्त, कड़वे- कसैले दाम्पत्य को झटक समय- स्थानानुसार, देशकालानुसार नया संसार गढ लेती है। अपने अकेलेपन, अपनी आज़ादी का पूरा सुख लेती है। कड़वा- कसैला दाम्पत्य उसे बताता और महसूस करवाता है कि विवाह जीवन का अंत हो सकता है, उद्देश्य नहीं। विदेश की धरती उसे अत्याचारों से विद्रोह के लिए स्पेस देती है। दामोदर से मुक्त होते ही वह नए जीवन, जीवन साथी की खोज में दिखाई देती है। अनुराग का सान्निध्य और साहचर्य उसे मादकता, सरूर और सुकून देते हैं, जबकि निशांत अपनी बेमुरव्वती, बेशर्मी, बेहयाई, विरूपता की हद तक की स्पष्टवादिता के बावजूद उसे बांधता है। वह वर्षों लिव-इन में रहती है। यह कश्मीर से दिल्ली और दिल्ली से अनिच्छा से अर्थसजग पति के साथ अमेरिका पहुँची एक अस्तित्व चेतन डॉक्टर लड़की की कहानी है। उसमें दुर्घटना बने दाम्पत्य का अध्याय बंद कर अपनी निर्णय क्षमता से आगे बढ्ने  की शक्ति है।पानी केरा बुदबुदाकी पिया चील तो नहीं, पर चिड़िया अवश्य है, उसमें उड़ने की तीव्र इच्छा है। सड़क की और जीवन की लय वह जानती भी है और पहचानती भी, इसीलिए संयत है। यह लय उसका बेटा रोहण भी पहचानता है।  
उपन्यास सोचने के लिए नई ज़मीन देता है। एक आदिम, असामाजिक, संसार रचा जा रहा है। पुरुष अगर पति है तो पत्नी पर निरंकुश अधिकार चाहता है और अगर प्रेमी अथवा लिव-इन साथी है, तो भी अपने लिए स्वछंदता। नायिका जिस संतुलित आदम की तलाश में है, वह शायद बना ही नहीं। बेटा रोहण कहता है, “कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसा पुरुष तुम चाहती हो, वैसा होता ही नहीं। आज तक मैं जितना समझ पाया हूँ वह यह कि रिश्ते कभी पर्फेक्ट नहीं होते।“   
पिया की बेचैनियां सार्वदेशिक हैं। यह उस अत्याधुनिक परिवेश की कहानी है, जहां सेक्स कोई दुराग्रह नहीं है। 
बहुत सी पंक्तियाँ सूत्र वाक्यों की तरह उभरती हैं-
कितने अजीब हैं यह मर्द- औरत के रिश्ते! साथ चल रहे हों तो जैसे सारी दुनिया साथ चल रही होती है और जब टूटते हैं तो भीतर को तोड़ मरोड़ जाते हैं। — कैसी नियति है रिश्तों की भी। विवाह हो तो भी छीजते जाते हैं, न हो तो इस तरह हिलाकर रख देते हैं ।“
प्रवासी उपन्यासकार स्वदेश राणा के कोठेवाली का कथाक्षेत्र विभाजन पूर्व के गुजरात से लेकर अमृतसर और लंदन तक फैला है और कथा समय 1930 से 1970 तक का है। 1930 का वह समय जब मनोरंजन के नाम पर अमीर और समर्थ लोगों के घर में मरफ़ी का रेडियो हुआ करता था और पूरा मुहल्ला इसका आनन्द उठाता था। हर शनिवार लाहौर देर शाम रेडियो से गज़लें सुनने के लिए रायसाहब बदरीलाल की हवेली में मुहल्ले के पुरुष एकत्रित होते थे। सब गजल गायिका बदरुनिसा की आवाज़ पर पागल थे। और 1939 की एक शाम बदरीलाल लाहौर रेडियो पर अपनी सिर्फ इश्किया गज़लें सुनने की फर्मायश पहुंचाने गुजरात की गंदे नाले के पार बसी रंगरेज बस्ती में कुम्हारिन माँ और रंगरेज पिता की मरासन कहलाने वाली बेटी बदरून्निसा के घर ही पहुँच जाते हैं और फिर बार-बार आने का सिलसिला चल पड़ता है और पत्नी के मरते ही बदरीलाल बिना विवाह, बिना किसी कागजी कार्यवाही के बदरुनिस्सा को अपने घर बिठा लेते हैं- यानी लिव- इन। स्वदेश राणा ने लिव-इन की संतान की सामाजिक स्थिति भी चित्रित की है। माँ के लिव- इन की सज़ा बेटी भी भोगती है। करन ताहिरा से शादी तो करता है, लेकिन उसे इतना स्पष्ट है कि जिससे उसने शादी की वह ताहिरा नहीं, वह सिर्फ बदरूनिस्सा की बेटी है, बदरीलाल जिसका मुरीद तो था, पर शौहर नहीं। एम. ए. पास ताहिरा को देश में लोग अति हेय दृष्टि से देखते हैं।
अर्चना पेन्यूली के वेयर डू आई बिलांग का सुरेश कहता है- जीवन साथी खोजना घर खोजने के समान है। दोनों से जीवन भर का नाता होता है। सुरेश लिंडा के साथ चार वर्ष लिव- इन में रहने के बाद शादी करता है, क्योंकि डेनमार्क में भी अवैध बच्चों को हरामी मानते हैं। लिंडा तलाक के बाद लिंडसन आदि के साथ रहने लगती है, मॉर्गन के साथ मोन्स क्लिफ घूमने जाती है और सुरेश अतुल विपुल का वीक एंड फादर बनकर रह जाता है। डॉ. देव की बेटी तलाक के बाद पिता की उम्र के किसी डेनिश के साथ लिव- इन में रहने लगती है। रीना मार्टिन के साथ कुछ महीने लिव- इन में रहती है। यहाँ लिव-इन रेलेशनशिप जीवन शैली का सामान्य अंग है। यहीं से विवाह संस्था की अवमानना, इसके प्रति अनास्था की शुरुआत होती है। दैनिक भास्कर के एक समाचार के अनुसार-
दस में से चार अमेरिकनों की मानें तो विवाह अब खत्म होती जा रही संस्था बनकर गया है और खुशहाल परिवार के लिए शादी करना जरूरी नहीं समझा जा रहा। अमरिकी जनगणना के आंकडों के मुताबिक 18 साल या इससे ज्यादा के व्यस्कों की विवाह की दर 52 फीसदी रह गई है। – – – टाइम मैगजीन के एक सर्वे में पता चला है कि 15 फीसदी बच्चों के माँ- बाप या तो अलग रहते हैं या उनका तलाक हो चुका है। 14 फीसदी बच्चों के माता- पिता ने कभी शादी नहीं की। जबकि छह  फीसदी बच्चों के माता-पिता बिना शादी किए उन्हें पाल रहे हैं। 39 फीसदी लोग मानते हैं कि विवाह का चलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।- – – जॉन हौपिन्स यूनिवर्सिटी के सोशियालोजी के प्रोफेसर एंड्रयू चेरलिन ने कहा, इस देश में शादी आज भी जरूरी है, लेकिन यह पारिवारिक जीवन पर हावी नहीं होता। 
दिव्या माथुर का उपन्यास शाम भर बातें उस देश और काल का है, जहां शादी के बिना रहने का रिवाज सा हो गया है। रणजीत का जीवन दर्शन है कि शादी की मुसीबत पालने से खुल्लमखुल्ला ऐश करना कहीं बेहतर है। सरूर और जूली लिव- इन में हैं। मीना भी बिना शादी के एक मुसल्ले के साथ रह रही है। रवीन्द्र ने पत्नी जीतो के होते हुये भी ईस्ट हैम में दूसरी औरत रखी हुई है। 
अनिल प्रभा कुमार का सितारों में सूराख का मूल विषय है कि बंदूकें अमेरिकी इतिहास, राजनीति और संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। गन कल्चर यानी सभ्य देश का असभ्य जन- जीवन। कहा जाता है कि अमेरिका की औरतें प्रगतिशील और स्वतंत्र विचारों की हैं। लेकिन इस अवधारणा में छेद यह है कि यहाँ बंदूक संस्कृति की सबसे अधिक शिकार स्त्री ही हुई है। हत्यायेँ उनके लिव- इन पुरुष साथियों द्वारा भी की जाती हैं। गायिका जेनिफर फॉक्स का बॉय फ्रेंड उसकी सफलता से जलता है और इसीलिए वह उसकी तीन गोलियों का निशाना बन पाँच वर्ष अस्पताल में रहने के लिए अभिशप्त है। 
अर्चना पेन्यूली के कैराली मसाज पार्लर की नैन्सी जिस देश भारत से है, वहाँ विवाह आजीवन निर्वहन का संकल्प है। तलाक की दर दो प्रतिशत है। तलाक सामाजिक रूप से एक धब्बा है और इसकी वैधानिक प्रक्रिया भी सुगम नहीं है। स्त्री के लिए विवाह का रक्षा कवच सांस्कृतिक ज़रूरत है। यूरोप में स्त्री- पुरुष का बिना शादी के साथ रहना बहुत ही सामान्य समझा जाता है। नायिका नैन्सी से शादी से पहले लार्स दो स्त्रियॉं के संग रह चुका है। लार्स की माँ लारा भी पति के इलावा दो पुरुषों के साथ रह चुकी है। जबकि भारतीय संस्कृति इसकी इजाजत नहीं देती। भारतीय और पाश्चात्य मूल्यों में छत्तीस का आंकड़ा है। ऐसे में कितना छोड़ना है और कितना लेना है- संभ्रम बना रहता है। उनके उपन्यास पॉल की तीर्थयात्रा की नीना (पहले पति ओलिवर के साथ कोई सवा साल, दूसरे पॉल के साथ सात साल और तीसरे) प्रेमी पीटर के साथ लिव-इन थोड़ा सा समय ही रह पाती है। 
नीना पॉल के कुछ गाँव गाँव, कुछ शहर शहर में नौकरी का समय आने पर नायिका निशा और साइमन एक ही शहर, एक ही घर में रहने का निर्णय लेते हैं। यहाँ तक कि नानी की भारत यात्रा के प्रसंग में निशा अपने साथी साइमन को भी साथ ले जाना चाहती है।
हंसा दीप के केसरिया बालम में लिव- इन का उल्लेख अगली पीढ़ी के संदर्भ में किया गया है। यूनिवरसिटी में आकर आर्या अवि के साथ लिव- इन में रहने लगती है, लेकिन इस लिव- इन में भी सम्बन्धों के स्थायीत्व की एक मूल्यवत्ता है। उपन्यास के अंत तक आते- आते अवि कोरोना काल में ही उसे फोन पर प्रपोज करता है और कोरियर से सगाई की अंगूठी भेजता है।  
उषा प्रियंवदा के नदी सुषम के पानी केरा बुदबुदा की स्त्रियाँ पीड़क वैवाहिक सम्बन्धों के बाद लिव- इन का चयन कर रही हैं। यह दूसरी पारी है।  इसे पटरी से उतरी गाड़ी को पटरी पर लाने का प्रयास भी कह सकते हैं और खुली हवा में सांस लेना भी। जबकि स्त्री हर बार टूटन की चुभन से आहत है। स्वदेश राणा की कोठेवाली और अर्चना पेन्यूली के वेयर डू आई बिलांग में लिव-इन के बच्चों की पारिवारिक, सामाजिक स्थिति पर भी बात की गई है। दिव्या माथुर के शाम भर बातें में तो लिव- इन फैशन हो गया  है। उषा प्रियम्वदा के भया कबीर उदास में रागात्मकता है। अनिल प्रभा कुमार सितारों में सूराख में आत्मीय लगावहीनता और हिंसा की बात करती हैं। हंसा दीप के केसरिया बालम के पात्र लिव- इन के बाद दाम्पत्य बंधन का चयन करते हैं।  
आज  लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा शादी के विकल्प के रूप में कार्य कर रही है। समाज में बदलते सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के कारण लोग लिव-इन रिलेशनशिप के प्रति झुक रहे हैं।  लिव- इन की सोच संस्कृति के लिए खतरा है। बिना बुनियाद के रिश्ते का टिकना आसान नहीं होता। यह संबंध समाज के लिए असामाजिक, संस्कृति के लिए चुन्नौती और संतान के लिए लज्जित करने वाले ही रहे हैं।

डॉ. मधु संधु, पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, 

हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब।

1 टिप्पणी

  1. साहित्य में लिव इन संबंधों को व्यापक फलक पर प्रस्तुत करता सारगर्भित आलेख।लेखिका ने परिश्रम किया है।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.