नई चेतना का फ़लसफ़ा कहता 'शब्द को प्रवेश करने दो' 3
समीक्षक : पवन गहलोत
कवि, कथाकार, नाटककार और आलोचक हरीश अरोड़ा का नया काव्य संग्रह शब्द को प्रवेश करने दोअपने बेहद मनोरम आवरण पृष्ठ से के साथ ही अपने अंदर समाहित कविताओं के द्वारा पाठकों को एक सुखद अनुभूति प्रदान करता है। प्रस्तुत काव्य संग्रह में सम्मिलित कविताओं के शब्द जब पाठक की भावभूमि में प्रवेश करते हैं तो अनुभूति के साथ ही एक नई चेतना की फसल लहलहाने लगती है। इनकी कविताओं को पढ़ते हुए पाठकों के चिंतन के आयाम को विस्तार मिलता है तथा साथ ही एक कलमकार की वेदना को आकार देने में लगी उसकी मेहनत से भी पाठकों का साक्षात्कार होता है। 
हरीश अरोड़ा बेहद सजग एवं संवेदनशील कवि के रूप में जाने जाते हैं। शिक्षा जगत के साथ ही साहित्य जगत में भी उनकी एक विशिष्ट पहचान है। जब वे गंदे हो गए शहर, युद्ध की घोषणा, नदी की किताब, रात की देह, माँ के आँचल और खामोश जिंदगी के साथ ही पानी के गीत की बात करते हैं तो अनायास ही जितनी सघनता से हृदय से एक आह….!निकलती है, उनकी कविताओं को पढ़ते हुए उनके कथन के शिल्प को देखकर इतनी तीव्रता से एकवाह…!भी निकलती है। 
बहना चाहता है 
मेरे भीतर 
पानी का एक सोता। 
आओ 
हम संभाले उसे 
और 
जगह दें अपने भीतर की सूखी नदी में —
जब फूटेगा 
वहाँ एक झरना 
तो केवल 
नदी की प्यास नहीं बुझाएगा 
बल्कि 
साथ ही लाएगा 
मादक बसंत भी 
सूखी धरती के पोर-पोर में भर देगा 
सृजन की धाराएँ।  
समांतर चलती इस आह….!और वाह…!के संयोजन के रासायनिक समीकरण के फलस्वरुप जो यौगिक प्राप्त होता है, पाठक उसे एक बहुमूल्य सौगात के रूप में अपने अंतर्मन में सदा के लिए सहेज कर रख लेने को विवश जान पड़ता है। और आश्चर्य की बात यह है कि यह विवशता उसे अपनी कमजोरी नहीं बल्कि उपलब्धि महसूस होती है। उनकी कविताएँ रोमांच के गलियारों से गुजरकर अनुभूति की पगडंडी से होती हुई कब चेतना के राजपथ पर विचरण करने लगती है इसका पता ही नहीं चलता। 
अपनी कविताओं में उन्होंने सत्ता और साहित्य में स्पष्ट अंतर बताने के साथ ही  पाठकों को जल संरक्षण के लिए चेताने का सार्थक प्रयास किया है। जब वे पानी के खोने की आवाजका जिक्र करते तो उनकी दायित्वबोध का अंदाजा सहज ही  लगाया जा सकता है –
 क्या तुमने 
 कभी आवाज़ सुनी है 
 पानी के खोने की ??
 वो आवाज पानी से नहीं आती 
 पर आवाज 
 पानी की ही होती है 
 उसके कराहने की 
 धीरे-धीरे सिमटकर मरने की 
 सूखे तालाब की पपड़ियों के भीतर 
 उसके चटकने की 
 या फिर 
 गर्म  हवा में 
 खाली कुओं की थाप — 
 ये सब आवाज़ें 
 पानी के खोने की ही तो हैं। 
जीवन के छोटे-से-छोटे पहलू पर ध्यान दिए जाने से न केवल उनकी पैनी दृष्टि बल्कि संवेदनशीलता का भी पता चलता है, फिर चाहे वह सितार का राग हो या फिर एक स्त्री के काम की चर्चा। इसके साथ ही सरल संकेतों में अपनी बात कह जाने का उनका कौशल भी प्रभावित करता है।
मानवीय संबंधों में संवेदना के घटते स्तर को लेकर चिंता हो या फिर संबंधों को बनाए रखने के लिए चिट्टियाँ लिखे जाने की अभिलाषा, उनके हृदय की कोमलता और चेष्टा की सजगता सहज ही दृष्टिगोचर होती है।  उनकी रचनाओं के विषय भले ही विविध हो लेकिन उनका एकमात्र उद्देश्य पाठकों की सुप्त चेतना में स्पंदन लाना भर है।
अपने हृदय में अपार वेदना को समेटे, अपनी हर अनुभूति को पाठकों के समक्ष रख देने को आतुर उम्मीद, हिम्मत और हौंसले से लबरेज यह कवि व्यवस्था की अव्यवस्था से क्षुब्ध होने के बावजूद बीते दिनों के लौटने के प्रति आशान्वित है और संवादशून्यता की चिटकनियों से सदियों से बंद पड़ी रिश्तों की खिड़कियों को खोलने की पैरवी करता है।
ज़िंदगी की जटिलताएँ 
शब्दों के जटिल फलसफ़ों से नहीं 
सुलझी हुई अस्मिताओं से 
करती हैं संवाद 
और सुलझा लेती हैं 
सारे मसले 
बैठकर 
शब्दों के दरमयाँ। 
अपनी कविताओं में उन्होंने आम बोलचाल की भाषा के साथ ही साहित्यिक शब्दों का सहज समावेश तो किया ही है लेकिन जब वे सेंसेक्स, रेशनल और डिस्कशन जैसे अंग्रेजी के शब्दों को भी बिना किसी व्यवधान के अपनी कविताओं में प्रयोग करते हैं तो इससे उनका भाषाई कौशल भी प्रमाणित होता है। कहीं-कहीं उनकी कविताएँ रोमांच तो पैदा करती है लेकिन वे पाठकों के संशय को अधिक देर तक कायम नहीं रहने देते और और उनका परिचय एक विलक्षण अनुभूति से करवाते हैं। उनकी कविता का एक विशिष्ट गुण यह है कि वह पाठक के हृदय में समाहित होकर उसकी ही चेतना का हिस्सा बन जाती हैं। और जब कवि की अभिव्यक्ति पाठक को स्वयं की अनुभूति लगने लगती है तो यही एक कवि की सच्ची सफलता है। इस कसौटी पर हरीश अरोड़ा एकदम खरे उतरते हैं।
उनकी अधिकतर कविताएँ विशुद्ध मौलिकता का प्रमाण हैं और पाठकों के विचारों को फलने-फूलने के लिए एक नई जमीन उपलब्ध कराती हैं। 
अपनी रचनाधर्मिता के लिए वे कभी भी किसी बनाए बने-बनाए रास्ते का अनुसरण नहीं करते बल्कि स्वयं अभिव्यक्ति का एक ऐसा मार्ग बनाते हैं जिस पर चलकर आगे आने वाले लेखकों की पीढ़ी को अपनी साहित्यिक लक्ष्य को प्राप्त करने में सुगमता होगी।
निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि प्रेरणा पथ को खोजती पीढ़ी को पुरस्कार स्वरूप प्राप्त यह संकलन मानव समाज में प्रेम, पवित्रता और पुरुषार्थ की भावना को प्रसारित करने की पुण्य प्रतिज्ञा को पुष्ट करता है। कवि का यह पावन प्रयास प्रशंसनीय है।
कृति:  शब्द को प्रवेश करने दो (कविता संग्रह); कविः डॉ० हरीश अरोड़ा। प्रथम संस्करण:  2021; पृष्ठ संख्याः 116 (सजिल्द); मूल्य: ₹ 250 ;  प्रकाशक: आर० के० पब्लिकेशन, मुम्बई ।

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