दशहरा विशेष : क्या वाकई में राम से श्रेष्ठ था रावण? 1
यह सोलहो आने सच है कि राम की रावण पर हुई विजय एक योद्धा की दूसरे योद्धा पर विजय भर नहीं थी, बल्कि वो असत्य-स्वार्थ-दमन जैसे अधर्ममूलक तत्वों पर सत्य-त्याग-बलिदान की धर्म-भावना से पूर्ण उच्च जीवन-मूल्यों की विजय थी। इस विजय का उत्सव अनंतकाल से मनाया जा रहा है और अनंतकाल तक मनाया जाता रहेगा। रावण का यूँ ही दहन होता रहेगा और उसके बहाने ही हर वर्ष हम सबके भीतर छुपे रावणरूपी दोष भी थोड़ा-थोड़ा ही सही, दग्ध होते रहेंगे। और जिस दिन ये दोष पूरी तरह से दग्ध हो गए, वही दिन होगा रामराज्य की स्थापना का।

बीते कुछ वर्षों में यह एक चलन-सा बन गया है कि जब पूरा देश दशहरे पर राम की जयकार में मग्न होता है, कुछ लोग रावण की श्रेष्ठता का बखान करने में जुट जाते हैं। ऐसा करने वालों की मंशा पर तो अब क्या ही कहें, मगर इतना तो तय है कि उनके पास रामकथा के प्रमुख ग्रंथों (वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस) का भी ज्ञान नहीं है। अगर इन ग्रंथों का अध्ययन उन्होंने किया होता तो रावण की श्रेष्ठता के पक्ष में अपनी सुनी-सुनाई दलीलों की वास्तविकता से परिचित होते।

बहरहाल, ये रावणभक्त शायद ही रामकथा के अध्ययन का कष्ट करें, इसलिए मैं यहाँ उनके रावण की श्रेष्ठता संबंधी तर्कों की वास्तविकता रख रहा हूँ ताकि आसानी से सही जानकारी पा लें। मुझे यकीन है कि ये पढ़ने के बाद भी वे रावण की भक्ति नहीं छोड़ेंगे मगर इस कारण हम सत्य को कहने से रुक जाएं, इसका भी कोई लाभ नहीं है।

क्या वाकई में आदर्श भाई था रावण?

रावणभक्त कहते हैं कि रावण एक आदर्श भाई था। कुछ वामी देवियाँ वैसे भाई की कामना करती भी दिख जाती हैं। मगर वाल्मीकि रामायण पढ़ने पर ज्ञात होता है कि रावण इतना आदर्श भाई था कि उसने अपनी बहन के प्रिय पति की हत्या कर डाली थी। विश्वविजय में निकले रावण ने रसातल में जाकर शूर्पणखा के पति विद्युज्जिह को मारा था। वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड के तेईसवें सर्ग में यह प्रसंग मौजूद है।

दूसरी बात कि उसे यदि अपनी बहन के सम्मान की इतनी चिंता होती तो राम से सीधे युद्ध करता न कि सीता-हरण। सीता-हरण उसने केवल अपनी वासना-तृप्ति के लिए किया था, इसमें बहन के अपमान का बदला लेने या आदर्श भाई जैसी कोई भावना नहीं थी।

क्या रावण स्त्री की इच्छा का सम्मान करता था?

रावणभक्त कहते हैं कि रावण स्त्रियों की इच्छा का सम्मान करता था, इसलिए उसने सीता के साथ जबरदस्ती नहीं की। यह बहुत बड़ा झूठ है। रावण स्वभाव से बलात्कारी था। वेदवती, रम्भा आदि जाने कितनी स्त्रियों के साथ बलात्कार कर चुका था। रम्भा के बलात्कार के बाद उसे शाप मिला था कि अबसे किसी स्त्री से बलात्कार का प्रयास करने पर उसकी मृत्यु हो जाएगी, बस इसी कारण भयवश वो सीता के साथ जबरदस्ती नहीं कर सकता था। वाल्मीकि रामायण में यह बात खुद रावण ने स्वीकारी है।

क्या रावण ज्ञानी था?

ये बात तो लोग बहुधा कहते हैं कि रावण बहुत बड़ा ज्ञानी था। निस्संदेह उसे बहुत-सी विद्याओं का ज्ञान था, लेकिन मनुष्यता के बुनियादी मूल्यों के विषय में उसकी बुद्धि एकदम रिक्त थी। एक अच्छे पुत्र, भाई, पति और पिता से लेकर राजा तक किसी भूमिका में वो उत्तम सिद्ध नहीं हुआ। इन सब दायित्वों से ऊपर उसने अपने स्वार्थ व सुख को रखा व उसीके पीछे सबकुछ नष्ट करके खुद भी खत्म हो गया। अब ऐसे स्वार्थी व्यक्ति को ज्ञानी कहे जाने का मतलब समझ नहीं आता। बाकी जो ये कहा जाता है कि राम ने लक्ष्मण को रावण से ज्ञान लेने भेजा था, ये भी कपोल-कल्पित आख्यान है। वाल्मीकि या तुलसीदास किसी रामायण में यह प्रसंग नहीं मिलता।

अंत में, यह सोलहो आने सच है कि राम की रावण पर हुई विजय एक योद्धा की दूसरे योद्धा पर विजय भर नहीं थी, बल्कि वो असत्य-स्वार्थ-दमन जैसे अधर्ममूलक तत्वों पर सत्य-त्याग-बलिदान की धर्म-भावना से पूर्ण उच्च जीवन-मूल्यों की विजय थी। इस विजय का उत्सव अनंतकाल से मनाया जा रहा है और अनंतकाल तक मनाया जाता रहेगा। रावण का यूँ ही दहन होता रहेगा और उसके बहाने ही हर वर्ष हम सबके भीतर छुपे रावणरूपी दोष भी थोड़ा-थोड़ा ही सही, दग्ध होते रहेंगे। और जिस दिन ये दोष पूरी तरह से दग्ध हो गए, वही दिन होगा रामराज्य की स्थापना का।

पीयूष द्विवेदी
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में सियासत और साहित्य के विषयों पर निरंतर रूप से लिखते रहते हैं. मूलतः देवरिया जिले से हैं, फिलहाल नोएडा में निवास है.

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