(1)
विश्व-समाज में व्यक्ति का जन्मोत्सव मनाने के करोड़ों उदाहरण मिल जाएंगे, किन्तु मृत्योत्सव मनाने के उतने उदाहरण दिखाई नहीं पड़ते हैं; कहने को तो मृत्योत्सव के भी बहुत-से उदाहरण मिल जाएंगे, किन्तु मरणोपरांत व्यक्ति के अवदान को याद कर उत्सव मनाने के उदाहरण बहुत ही कम दिखाई पड़ते हैं। ऐसे ही कम व्यक्तियों में एक नाम— दिनेश सिंह, जिनकी ख्याति नवगीत के उन्नायक के रूप में है, यहाँ उद्धृत करना चाहूँगा। कवि, आलोचक, सम्पादक दिनेश सिंह का जन्म रायबरेली (उ.प्र.) के एक छोटे से गाँव गौरारूपई पीर अलीपुर (पोस्ट- लालूमऊ) में 14 सितम्बर 1947 को हुआ था। पिता भानुप्रताप सिंह— अपनी माँ के इकलौते पुत्र, माँ सावित्री सिंह और दादी रामलली सिंह— संवेदनशील गृहणियाँ और दादा रघुराज सिंह— अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित तालुकदार, तिस पर भी उनका जन्मोत्सव उस तरह से न मनाया जा सका जिस प्रकार से सामान्य से सामान्य परिवार में इकलौते पुत्र का मनाया जाता है। कारण सिर्फ यह कि उस समय परिवार में उनके दादा की तेज-तर्रार दूसरी पत्नी और उनके ‘प्यारे बच्चों’ को ही तरजीह दी जाती थी— बाकी लोग तो रामभरोसे अपना जीवन जी ही रहे थे। 
बालक दिनेश के पिता, जो जात-पाँत एवं छुआ-छूत के धुर-विरोधी थे, स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सा अधिकारी हो गये तो घर-परिवार में विचार होने लगा कि सब लोग (माँ और दिनेश) आने वाले समय में पिता के साथ ही रहेंगे— जहाँ-जहाँ उनकी पोस्टिंग होगी, वहाँ-वहाँ चले जाया करेंगे; किन्तु कई बार जो विचार किया जाता है, वह समय के साथ फलित हो यह जरूरी नहीं— “होइहि सोइ जो राम रचि राखा/ को करि तर्क बढ़ावै साखा” (बाबा तुलसीदास)। बालक दिनेश के जन्म के पाँच वर्ष बाद ही उनके पिता का आकस्मिक निधन हो गया, सारे सपने बिखर गए, खुशियाँ गम में बदल गयीं और वह जैसे-तैसे अपनी दादी और माँ के सहारे बड़े होने लगे। संवेदनशील एवं सजग दिनेश सिंह ने पढ़ना-लिखना जारी रखा— प्रारंभिक शिक्षा प्राइमरी पाठशाला खजुर गाँव से 1956 में, इंटरमीडिएट बैसवारा इण्टर कॉलेज, लालगंज से 1963 में, स्नातक रणवीर रणन्जय सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अमेठी से 1976 में। स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के काफी पहले, 1971 में, उनका उत्तर प्रदेश शासन के स्वास्थ्य विभाग में स्वास्थ्य निरीक्षक के पद पर चयन हो गया। सरकारी नौकरी लगने से समय कुछ अनुकूल तो जरूर हुआ, किन्तु घर-परिवार की स्थितियाँ जस-की-तस रहीं। इसलिए रोजी-रोटी का सहारा मिलते ही गाँव छोड़ दिया और घर-जमीन भी छोड़ दी— यानी कि उनके हिस्से में वह छोटी-सी नौकरी और माँ (जो जीवन-पर्यन्त उनके साथ रहीं) आयीं। इंटरमीडिएट करते ही 1964 में उनका एक भद्र महिला— मान कुमारी से विवाह हो ही चुका था, किन्तु उनकी लाड़ली बेटी— शुभा (प्रीति) का जन्म लगभग दो दशक बाद 1983 में हुआ। 2006 में बेटी का विवाह पड़ोस के गाँव अम्बारा पश्चिम के हंसराज सिंह भदौरिया के साथ कर दिया गया [इस विवाह की एक रस्म— तिलकोत्सव में तिलोई और लालगंज से दिनेश सिंह, उनके मानस पुत्र— राजेन्द्र राजन, डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया, डॉ विनय भदौरिया आदि के साथ मेरा भी उक्त गाँव में लड़के वालों के यहाँ जाना हुआ था]। 
(2)
बड़ी-बड़ी आँखें, चौड़ा माथा, साँवला रंग, गठीला बदन, धीर-गंभीर भाव-भंगिमाएँ, मोटे-मोटे होठों पर अजीब-सी मुस्कान लिए दिनेश सिंह जब चौदह वर्ष के हुए तब उन्हें काव्य सृजन की प्रेरणा एवं संस्कार उनके चाचा रामबाबू सिंह, जो इलाहबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे, से मिली, किन्तु गीत के प्रति अवधान एवं रुचि विकसित करने में ‘पुरवा जो डोल गयी’ (गीत) और उसके यशस्वी रचनाकार डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया, जो उनके कक्षा अध्यापक भी रह चुके थे, का विशेष योगदान है। कहते हैं कि उन दिनों दिनेश सिंह के ऊपर कविता का भूत इस कदर सवार था कि वह अक्सर रात-रात-भर नदी किनारे, खेत-खलिहानों में, चाँदनी रात में किसी निर्जन स्थान पर प्रकृति को निहारते रहते थे या कभी आसपास होने वाले कवि-सम्मेलनों में काव्य-पाठ सुनने के लिए घर से भाग भी जाया करते थे। उनका इस प्रकार से भाग जाना कितना सही था, कहना मुश्किल, किन्तु उनकी यह भाग-दौड़ उम्र भर चलती रही— गौरारूपई से लालगंज, रायबरेली, अमेठी, तिलोई, लखनऊ, अयोध्या आदि— यानी कि उनकी यात्राएँ चलती रहीं, जीवन का संघर्ष चलता रहा और उसी गति से लेखनी भी चलती रही। उनकी इन्हीं यात्राओं में एक यात्रा राजनीति के गलियारे की भी रही— राजा रणंजय सिंह (अमेठी) के सलाहकार, राजा संजय सिंह के अभिन्न मित्र-सलाहकार, संजय गाँधी के विशेष सलाहकार और राजीव गाँधी के 24 प्रमुख सलाहकारों में से एक के रूप में। 
यहाँ राजनीतिक गलियारे की एक घटना याद आ रही है— उन दिनों ख्यात राजनेता संजय गाँधी (14 दिसंबर 1946 – 23 जून 1980) के नेतृत्व में उ.प्र. विधान सभा चुनाव (आठवीं) के लिए कांग्रेस पार्टी से टिकट बांटे जा रहे थे। संजय गाँधी दिनेश सिंह के अथक परिश्रम, ईमानदारी, समसामयिक वैचारिकी और सक्रिय जन-पक्षधरता से बहुत प्रभावित थे, शायद इसीलिये उन्होंने पार्टी का पहला टिकट सहर्ष दिनेश सिंह को देने की घोषणा की— किन्तु, दिनेश सिंह ने टिकट यह कहकर लेने से इंकार कर दिया कि वे पार्टी के एक कार्यकर्ता होने के नाते देश-हित में पार्टी के लिए कार्य करना चाहते हैं और यह कार्य बिना चुनाव लड़े भी किया जा सकता है। उस समय टिकट के लिए कांग्रेस पार्टी में काफी खींचतान चल रही थी। संजय गांधी ने जब त्यागपूर्ण जीवन जीने वाले दिनेश सिंह के इस प्रकार के शब्द सुने तो वह उनका हाथ पकड़कर स्टेज पर ले गए और सारी बात बताते हुए कांग्रेसियों से कहा कि उ.प्र. के भावी शिक्षा मंत्री दिनेश सिंह ही होंगे। इस बार समय ने फिर करवट ली— संजय गाँधी एक विमान दुर्घटना में चल बसे— दिनेश सिंह के लिए यह दुख असहनीय था। संजय गाँधी की मृत्यु के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया और भारी मन से साहित्य साधना करने लगे। 
(3)
अक्खड़ एवं फक्कड़ दिनेश सिंह की पहली कविता ख्यात संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा संपादित ‘नया प्रतीक’ (1970) में प्रकाशित हुई थी। उनकी यह कविता मुझे अभी तक उपलब्ध नहीं हो सकी है, किन्तु उसी दौरान इस पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर प्रकाशित मूसलाधार बारिश के दुष्प्रभावों को रेखांकित करता उनका एक चर्चित गीत अवश्य हाथ लग गया— “ऐसी बरसात कौन झेले/ अजगर हैं पानी के रेले।/ दिन का एहसास/ घड़ी से/ भूमि की तलाश/ छड़ी से/ किसको क्यों टेरते मुरैले?/ ऐसी बरसात कौन झेले।/ बादल हैं औढर-दानी/ हरी दूब पानी-पानी/ नीम चढ़े खेत के करैले।/ ऐसी बरसात कौन झेले।” कहते हैं कि उन दिनों अज्ञेय जी के संपादकत्व में छपना बड़ी बात थी। कहते तो यह भी हैं कि उन दिनों ख्यात संपादक डॉ धर्मवीर भारती के संपादकत्व में ‘धर्मयुग’ में छपना भी बड़ी बात थी, लेकिन अपनी बेजोड़ कविताई के कारण दिनेश सिंह को ‘धर्मयुग’ में भी कई बार ‘स्पेस’ दिया गया। ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित उनका एक लोकप्रिय गीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ— “कल मड़वे बेल चढ़ेगी/ दूज की अटारी से देखना।/ जोत जलेगी सारी रैना/ मन्त्र पढ़ेंगे सुग्गा-मैना/ लहर-लहर/ बिजुरी से दांत मढ़ेगी/ तनिक होशियारी से देखना।/ झूमेंगे आंधी-पानी/ नाचेगी चूनर-धानी/ फूलों से/ बैरन बरसात सजेगी/ छिपकर फुलवारी से देखना।” फिर क्या था—  देश की अनेकों बड़ी-छोटी पत्र-पत्रिकाओं में उनके गीत, कहानियाँ एवं छन्दमुक्त कविताएँ (बाद में आलेख, रिपोर्ताज, ललित निबंध, समीक्षाएँ आदि भी) ‘स्पेस’ पाने लगीं। इसी दौरान उनका पहला काव्य-संग्रह— ‘पूर्वाभास’ (1975) साहित्यालोचन प्रकाशन, शहराराबाग, इलाहाबाद से प्रकाशित हो गया, जिसमें उन्तीस गीत, सोलह कविताएँ एवं सात मौसमी छड़िकाएँ संग्रहीत हैं। बकौल दिनेश सिंह इस काव्य संग्रह की अधिकांश रचनाओं का सर्जना-समय 1971-1973 के बीच का है, क्योंकि 1973-1975 के बीच उन्होंने ‘परित्यक्ता’ (महाकाव्य), ‘अँधेरा घिर आने पर’ (कहानी संग्रह) तथा ‘गोपी शतक’ (काव्य) की रचना की थी। 25 दिसंबर 1975 को लिखी गयी उक्त काव्य संग्रह की भूमिका में दिनेश सिंह को सशक्त कवि मानते हुए अवधी के मूर्धन्य साहित्यकार आद्या प्रसाद मिश्र ने भी ‘परित्यक्ता’ की सर्जना के संबंध में संकेत किया है— “गहन भाव, सुंदर शैली, परिमार्जित भाषा युक्त दिनेश जी का ‘पूर्वाभास’ उनके सत्तरोत्तरी पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर होने का एक पुष्ट प्रमाण है…. दिनेश जी का ‘परित्यक्ता’ महाकाव्य पौराणिक आख्यान पर आधारित एक अनूठा काव्य है” (पूर्वाभास, पृ. iii)। इस कृति में तत्कालीन व्यक्ति, समाज, राष्ट्र एवं प्रकृति से संबधित सरोकारों को बड़ी सहजता से उकेरा गया है, हालांकि कहीं-कहीं पर इसमें नवगीत के तत्व भी उद्घाटित हुए हैं। बानगी के तौर पर ‘अब चलो कुछ और आगे’ गीत की कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं— “अब चलो कुछ और आगे, और आगे कुछ सुनाओ/ अब प्रलय की यह कहानी बंद कर दो/ नव सृजन के सुर सजाओ।/ अब दहकने भी लगी है यह कछारी रेत/ सहमी नाव है/ अब शहर को दौड़ती है हर नदी/ और प्यासा गाँव है/ सूख ना जाएँ कहीं ये ओंठ के दल/ हो सके तो आँख का पानी गिराओ” (पूर्वाभास, पृ. 14)। कहने का आशय यह कि जैसे-जैसे उनकी रचनात्मक भाव-संवेदन और वस्तुपरकता की काव्य-जगत में चर्चाएँ होने लगीं, वैसे-वैसे वे काव्य-मंचों पर भी प्रतिष्ठित होने लगे। उनकी आवाज का जादू और पढ़ने का अंदाज़ उन्हें लोकप्रिय बना रहा था। इसी दौरान (शायद 1977 से) उन्होंने चर्चित एवं स्थापित कविता पत्रिका— ‘नये-पुराने’ का संपादन प्रारंभ किया (ओसाका नगर में स्थित ओसाका विश्वविद्यालय, जापान के वाचनालय में प्रारंभिक दौर में प्रकाशित अंक अब भी मौजूद हैं), जिसकी सराहना आज भी देश-विदेश में होती रहती है। शायद इसीलिये ख्यात साहित्यकार वीरेन्द्र आस्तिक का कहना है— “दिनेश सिंह को केवल नवगीतकार कहना सही नहीं होगा। वास्तव में वे गीत-नवगीत के क्षेत्र में एक वर्कशॉप थे। गीत को लोक-संपृक्त करने में ‘नये-पुराने’ का आनुष्ठानिक योगदान अब इतिहास बन चुका है” (संकल्प रथ, सित. 2012, पृ. 8)। 
दिनेश सिंह की छवि कुशल सम्पादक एवं निर्भीक साहित्यकार की रही है। इस संदर्भ में यहाँ एक संस्मरण जोड़ना चाहूँगा— जब मैं उनके कुशल निर्देशन में ‘नये-पुराने’ का ‘कैलाश गौतम स्मृति अंक’ (जुलाई 2007 में प्रकाशित) अस्पताल कालोनी (मोहनगंज) में रहकर तैयार कर रहा था, तब उन्होंने (उस समय वह बोल लेते थे, यद्यपि पैरालिसिस के कारण 2009 के आसपास उनकी बोलने की शक्ति भी चली गई थी) ‘नये-पुराने’ के पिछले अंकों को मुझे सौंपते हुए कहा था कि इन अंकों को ठीक-से पढ़ लीजिये ताकि इस अंक के कार्यकारी संपादक (यद्यपि पत्रिका के उक्त अंक हेतु कार्यकारी संपादक के रूप में मेरा नाम न जोड़े जाने के लिए मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक निवेदन कर दिया था, जिसे उन्होंने बहुत बाद में सहर्ष स्वीकार भी कर लिया था) के रूप में बेहतर संपादन कर सको। तदनुसार उस अंक हेतु लगभग 550 पृष्ठ की उपलब्ध सामग्री को उनके निर्देशन में कुशलतापूर्वक संपादित कर 250-300 पृष्ठों में समेटा गया था। इसी दौरान उन्होंने भारत में आपातकाल के समय की कुछ बातें भी मुझे बतायीं थीं। उनमें से एक-दो बातें मुझे अब भी याद हैं— आपातकाल के दौरान आकाशवाणी (लखनऊ) से उनका एक गीत (जो कुछ समय पहले ‘धर्मयुग’ में छप चुका था) उन्हीं की आवाज में प्रसारित हुआ था, बोल थे—  “टिकुली में सूरज है/ है हसुली में चन्द्रमा/ ऐसे में रूप को क्षमा।/ पानी से भी पतले/ हवा से हलके/ जो हैं वे हवा हैं न पानी हैं/ पानी के संग-संग उड़ रहे हवाओं में/ जो हैं वो राजा हैं, रानी हैं/ सिंहासन को लगा रोग राज-यक्षमा/ ऐसे में भूप को क्षमा।” इस गीत के प्रसारित होते ही हड़कंप मच गया। परिणामस्वरूप आकाशवाणी (लखनऊ) के तत्कालीन निदेशक को सख्त निर्देश दिए गये कि यह गीत दोबारा प्रसारित न किया जाय और न ही इस गीतकार को कभी गीत पढ़ने के लिए आकाशवाणी बुलाया जाय। दिनेश सिंह कहाँ चुप रहने वाले थे? उनके भीतर नैतिकता और राष्ट्रीयता की स्वतंत्र धारा प्रवहमान थी, सो उन्होंने ‘दिनेश, रायबरेली’ नाम से एक लेख आपातकाल को केन्द्र में रखकर लिख दिया, जिसे मुम्बई से प्रकाशित ‘ब्लिट्ज’ अखबार (संपादक— आर.के. करंजिया) ने जस-का-तस छाप भी दिया। दिनेश सिंह के इस ‘सरकार-विरोधी’ (किन्तु मूल्यबोधी) लेख को नोटिस किया गया और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजने के आदेश भी कर दिये गये। कई महीने ‘अंडरग्राउंड’ रहकर किसी तरह वह इस आफत से बच पाये।    
(4)
अपने क्षेत्र में कविरूप में प्रतिष्ठित दिनेश सिंह के समकालीन जीवनानुभूतियों से लैस लोककल्याणकारी गीत— ‘बैरागी की फिकर’, ‘चलो देखें’, ‘लौट नहीं जाना’, ‘प्रश्न सब बैताल के’, ‘बासंती आठ पहर रोये’, ‘किस्से गुलनार के’, ‘छिन बदरी, छिन धूप’, ‘दूर के ये ढोल’, ‘सारा घर आग-आग हो गया’ आदि [बाद में इन गीतों को ‘नवगीत दशक- तीन’ (1984) और ‘मैं फिर से गाऊँगा’ (2009) में प्रकाशित किया गया] लोगों की जुबान पर चढ़ने लगे थे। इन गीतों का जुबान पर चढ़ने का मुख्य कारण भाव, भाषा, कथ्य, शैली आदि दृष्टियों से नवोन्मेषी होना ही था। उस समय सहृदय भावक यह भी देख रहे थे कि वर्तमान सृजन सन्दर्भों की गहरी समझ रखने वाले दिनेश सिंह को गरीबी, भुखमरी, लाचारी से जूझ रहे ‘बैरागी’ और उनकी किशोर बेटी की तार-तार होती इज्जत की ‘फिकर’ किस प्रकार से हिलाकर रख देती है—  
बैरागी की फिकर
अँगुरी-अँगुरी बाँसों बढ़ गयी। 
मुँह-औंधी आमदनी/ सिर-ऊँचे खर्चे हैं
खर्चों के पीछे/ लखमनिया के चर्चे हैं
पटवारी का लौंडा/ लौंडा परधान का
बाँट रहे गली-गली/ किस्सों के पर्चे हैं 
पर्चों की कुल खबर
सारी अनपढ़ बस्ती पढ़ गयी। (नवगीत दशक- तीन, पृ. 116-117)
गाँव क्या, शहर क्या— जहाँ देखो वहीं मदांध धनपतियों, दबंगों, गुंडों, लुच्चों ने भले आदमियों का जीना हराम कर रखा है। इन विषम स्थितियों के चलते वर्षों से हमारे देश के ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों के बच्चे, बुजुर्ग एवं महिलाएँ सबसे अधिक पीड़ित हैं। यह गीत भी यही कह रहा है। किन्तु, यह सबकुछ चुपचाप सह लेना भी ठीक नहीं। शायद इसीलिए जन-समस्याओं से परिचित कराते हुए दिनेश सिंह अपने गीत— ‘चलो देखें’ में  समझ, सूझबूझ एवं तर्कबुद्धि से प्रतिरोधी चेतना को उकसाते-जगाते दिखाई पड़ते हैं— “चलो—/चलकर रास्ते में पड़े/ अंधे कूप में पत्थर गिराएँ,/ रोशनी न सही,/ तो आवाज ही पैदा करें/ कुछ तो जगाएँ” (नवगीत दशक- तीन, पृ. 116-117)। ‘व्यवस्था के विरोध’ में इस कवि का इस प्रकार से मैदान में उतर जाना स्वाभाविक ही है, क्योंकि उसका यह कार्य ‘व्यवस्था’ को बेहतर बनाने के लिए ही तो है— यह हम सब जानते ही हैं, पत्र-पत्रिकाएँ भी यह सब जानती रही हैं। कहने का अर्थ यह कि उस समय पत्र-पत्रिकाएँ उनके इस प्रतिरोधी स्वर को खूब ‘स्पेस’ दे रहीं थीं। पत्र-पत्रिकाएँ ही नहीं, नवगीत के पुरोधा डॉ शम्भुनाथ सिंह ने भी उनके गीतों को ‘नवगीत दशक— तीन’ (1984) तथा ‘नवगीत अर्द्धशती’ (1986) में संकलित कर उनकी रचनात्मकता को काफी विस्तार दिया था। व्यावहारिक भाषा की लय को समोये उनकी गीतात्मकता के सहज विस्तार का अपना सुख तो जरूर था, किन्तु उनका दुःख एवं संघर्ष भी कहीं कम न था। इस दृष्टि से ‘मैं फिर से गाऊँगा’ की भूमिका में की गयी ख्यात नवगीतकार गुलाब सिंह की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है— “जिजीविषा और संघर्ष को परिभाषित करते समय हमें दिनेश सिंह की उस तस्वीर से भी जुड़ना पड़ेगा, जो समय और दुर्योगों के विरुद्ध है” (पृ. 4)।” आखिर क्यों?— यह भी जानना जरूरी है। दुर्घटनाओं से चोटिल शरीर, हृदयरोग, पारिवारिक समस्याएँ, अवसाद, रेत-सी-फिसलती जिंदगी और असीम को जानने-समझने की जिज्ञासा उन्हें गोकुलभवन-अयोध्या खींच ले गयी, जहाँ उनकी भेंट ब्रह्मलीन पूज्य गुरुदेव परमहंस श्री राममंगल दास जी से हुई। कालांतर में पूज्य गुरुदेव ने उन्हें दीक्षित कर अपनी अहैतुकी कृपा का दर्शन भी कराया। 
(5)
गुरुदेव की इस अहैतुकी कृपा का सुफल था या कुछ और कि बीसवीं सदी के अन्तिम दशक में दिनेश सिंह में नई ऊर्जा का संचार हुआ और उन्होंने अस्पताल कालोनी, मोहनगंज (तिलोई) के ‘सर्वेन्ट क्वार्टर’ में रहते हुए 1997 से 2000 के बीच अपनी पत्रिका— ‘नये-पुराने’ (अनियतकालीन) के छह अंक निकालकर नवगीत के क्षेत्र में इतिहास रच दिया— लम्बी सम्पादकीय के साथ नवगीत, आलोचनात्मक आलेख, विशिष्ट गीतकार पर आलेख, साक्षात्कार, समीक्षाएँ, चिट्ठी-पत्री आदि स्तम्भ देश-विदेश में चर्चा का विषय बनने लगे। [लगभग इसी समय साहित्य जगत में दो बड़े कार्य और हुए— ‘काव्य परिदृश्य अर्द्धशती (पुनर्मूल्यांकन): भाग— एक और दो’ (ललित आलोचक डा. सुरेश गौतम, 1997) और ‘धार पर हम’ (सं. वीरेन्द्र आस्तिक, 1998) का प्रकाशन]। इन बेहतरीन अंकों में गीत-नवगीत-कविता को लेकर दिनेश सिंह की वैचारिकी पूरी तरह से सम्प्रेषणीय, स्पष्ट एवं अर्थपूर्ण दिखाई पड़ती है— यह मैं नहीं कह रहा हूँ, ‘नये-पुराने’ के अंक कह रहे हैं, उनके सम्पादकीय (इन्हें वेब पत्रिका ‘गीत-पहल’ पर भी पढ़ा जा सकता है) कह रहे हैं, उसमें छपने वाले लेखक कह रहे हैं, आलोचक कह रहे हैं, पाठक कह रहे हैं।  
तत्कालीन भारतीय समाज और साहित्य को समझने के लिए जरूरी है कि ‘नये-पुराने’ के माध्यम से कुछ और बातों पर विचार किया जाय। पिछले दो-तीन दशकों से शिविरबद्ध कवियों, लेखकों, समीक्षकों की विकेन्द्रित स्थिति को देख रहे दिनेश सिंह को ‘नये-पुराने’ गीत अंक—एक की संपादकीय में कहना पड़ा— ‘‘आज कविता विवादों के घेरे में है। कवि-समीक्षक अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग लेकर बैठे हैं।” दिनेश सिंह के लिए ‘कविता’ सिर्फ गीत-नवगीत नहीं है, वह अपने आलेखों और सम्पादकीयों में कविता की सभी प्रमुख विधाओं की प्रासंगिकता पर सम्यक विचार-विश्लेषण करते रहे हैं। ‘नये-पुराने’ गीत अंक—छह की संपादकीय में वह कहते भी हैं— “यहाँ तक आते-आते फ्रीवर्स या वर्सलेस कविता तथा गीत के बीच बातचीत की एक शुरूआती स्थिति बन सकी, जिससे और कुछ हो न हो दोनों विधाओं के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों पर अध्येयताओं की नज़र जरूर पहुंची है।” शायद तभी ‘नये-पुराने’ के इन अंको की समीक्षा करते हुए शीर्ष आलोचक नामवर सिंह ने दूरदर्शन के एक पॉपुलर प्रोग्राम— ‘सुबह सबेरे’ में इनकी मुक्त कण्ठ से सराहना की थी। इतना ही नहीं, उन्होंने ख्यात साहित्यकार कैलाश गौतम के नवगीत संग्रह— ‘सिर पर आग’ के लोकार्पण समारोह में भी कहा था कि ‘नये-पुराने’ के माध्यम से दिनेश सिंह ने जो मानक नवगीत के लिए तय किये हैं, उस प्रकार की नवगीत कृति यदि उनके समक्ष आयेगी तो वह उस पर अपना विचार अवश्य रखेंगे। यह कोई सामान्य उपलब्धि तो नहीं? 
दिनेश सिंह निष्पक्ष एवं तटस्थ सम्पादक, आलोचक एवं कवि रहे हैं। उनके अवदान को रेखांकित करते हुए साहित्य अकादमी से प्रकाशित ‘श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन’ (2001) की सम्पादकीय में सुपरिचित साहित्यकार कन्हैया लाल नंदन ने लिखा है— “बीती शताब्दी के अंतिम दिनों में तिलोई (रायबरेली) से दिनेश सिंह के संपादन में निकलने वाले गीत संचयन— ‘नये-पुराने’ ने गीत के सन्दर्भ में जो सामग्री अपने अब तक के छह अंकों में दी है, वह अन्यत्र उपलब्ध नहीं रही। गीत के सर्वांगीण विवेचन का जितना संतुलित प्रयास ‘नये-पुराने’ में हुआ है, वह गीत के शोध को एक नई दिशा प्रदान करता है। गीत के अद्यतन रूप में हो रही रचनात्मकता की बानगी भी ‘नये-पुराने’ में है और गीत, खासकर नवगीत में फैलती जा रही असंयत दुरूहता की मलामत भी। दिनेश सिंह स्वयं न केवल एक समर्थ नवगीत हस्ताक्षर हैं, बल्कि गीत विधा के गहरे समीक्षक भी” (पृ. 67)। यद्यपि यह टिप्पणी दिनेश सिंह के बारे में बहुत कुछ कह देती है, तथापि कुछ और टिप्पणियाँ यहाँ जोड़ी जा सकती हैं। दिनेश सिंह के दिवंगत होने पर कानपुर से ख्यात कवि-आलोचक वीरेन्द्र आस्तिक ने ‘संकल्प रथ’ पत्रिका (सित. 2012) में भारी मन से लिखा था— “शाश्वत रचनात्मकता की भूमि तैयार करना ही दिनेश सिंह का वैशिष्ट्य था। दिनेश सिंह जैसा साहित्यिक कद और अपनापन अब मिलना मुश्किल है। उन्हें मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि!” (पृ. 13)। एक कार्यक्रम में रायबरेली के प्रतिष्ठित साहित्यकार रामनारायण ‘रमण’ दिनेश सिंह की तुलना महाप्राण निराला से कर भावविभोर हो गये थे, तो वहीं प्रबुद्ध नवगीतकार डॉ विनय भदौरिया ने कहा था कि नवगीत को पुनर्स्थापित कर चर्चा के केंद्र में लाने का सार्थक प्रयास जिन रचनाकारों ने किया है, उनमें डॉ शम्भुनाथ सिंह के बाद दिनेश सिंह का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। कहने का आशय यह कि दिनेश सिंह गीत-नवगीत-कविता-आलोचना के प्रति पूर्ण समर्पित एवं समर्थ व्यक्तित्व थे, जिसका नोटिस समय-समय पर उपर्युक्त लेखकों ने ही नहीं, बल्कि लाल बहादुर वर्मा, राजेन्द्र यादव, रवीन्द्र कालिया, प्रभाकर श्रोत्रिय, गिरिराज किशोर, ज्ञानरंजन, अखिलेश जैसे इतिहास, नयी कविता और कहानी के तमाम समर्थकों और विद्वानों ने भी लिया है।   
उपर्युक्त टिप्पणियों से तो यही लगता है कि दिनेश सिंह ने पूरे जतन, जोखिम एवं जिम्मेदारी से साहित्यिक पत्रकारिता की। मिशन के रूप में साहित्यिक पत्रकारिता करने वाले दिनेश सिंह का स्वास्थ्य इक्कीसवीं सदी में बद-से-बदतर होता चला गया— कार के पेड़ में टकराने से सिर में चोट, गर्दन की डिस्क खिसकने से सर्वाइकल की समस्या, पैर का टूटना, हृदयरोग, पक्षाघात, नींद न आना, हाथों का काँपना, आर्थिक तंगी आदि, तिस पर भी उन्होंने हार नहीं मानी। वह लगातार काम करते रहे और उन्होंने ‘नये-पुराने’ के तीन अंक— ‘जगदीश पीयूष की रचनाधर्मिता’ (2005, अतिथि संपादक— रवींद्र कालिया, ज्ञानपीठ के तत्कालीन निदेशक), ”कैलाश गौतम स्मृति अंक’ (2007, विशेष सहयोग— अवनीश सिंह चौहान) एवं ‘बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता’ (मार्च 2011 में ‘खबर इण्डिया’ एवं अगस्त 2011 में ‘रचनाकार’ पर ई-अंक प्रकाशित, कार्यकारी संपादक— अवनीश सिंह चौहान) निकाले, जिन्हें साहित्य-जगत में हाथों-हाथ लिया गया। कहने का आशय यह कि भारत, नेपाल, जापान, अमेरिका (मॉन्ट्रियल, कनाडा में विजय माथुर द्वारा पत्रिका के अंक संरक्षित) आदि देशों के जागरूक एवं सहृदयी पाठक-विद्वान ‘नये-पुराने’ की मूल्यनिष्ठ एवं समाजोपयोगी साहित्यिक पत्रकारिता को बड़े मनोयोग से देखते, सुनते, समझते रहे हैं।
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इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ में दिनेश सिंह की दूसरी और तीसरी कृति— ‘टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर’ (2002) और ‘समर करते हुए’ (2003) प्रकाशित हुई (इनमें से एक नवगीत संग्रह उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ से पुरस्कृत भी हुआ)। उधर ‘नये-पुराने’ का प्रकाशन मित्रों-शुभचिंतकों के सहयोग से जैसे-तैसे चल ही रहा था; इधर (शायद 2005 में) वह स्वास्थ्य विभाग से रिटायर कर दिए गये, किन्तु यहाँ भी उनका संघर्ष समाप्त न हुआ। उनका फण्ड और पेंशन रिलीज करने के लिए चार प्रतिशत की घूस माँगी गयी— उन्होंने घूस देने से मना कर दिया तो कई वर्षों तक उन्हें फण्ड और पेंशन ही नहीं मिली। [दिनेश सिंह का सिद्धांत रहा कि वह न घूस लेंगे, न घूस देंगे और घूस लेने-देने वालों का पुरजोर विरोध भी करेंगे। इसी सन्दर्भ में यहाँ एक संस्मरण याद आ रहा है — उन दिनों दिनेश सिंह की तैनाती स्वास्थ्य निरीक्षक के रूप में मोहनगंज-तिलोई) में थी। सीएमओ, रायबरेली का निरीक्षण के लिए उधर आना हुआ। निरीक्षण के दौरान उसने दिनेश सिंह से कहा कि उसे प्रत्येक झोलाछाप डॉक्टर, हकीम, मेडिकल स्टोर, होटल, भोज्य एवं पेय-पदार्थ के उत्पादकों एवं विक्रेताओं आदि से प्रति माह घूस चाहिए। यह सुनकर दिनेश सिंह सन्न रह गये और जब उन्हें क्रोध आया तो वहाँ पर आसपास के लोगों का जमावड़ा लग गया। डर के मारे सीएमओ अपनी जीप छोड़ भाग खड़ा हुआ। दिनेश सिंह अब भी गुस्से में थे, अतः उन्होंने उसकी जीप को ही खड्डे में धकेल दिया। इस अपमान एवं अवमानना का बदला लेने के लिए कुपित सीएमओ ने उन्हें सस्पेंड कर दिया] ऐसी स्थिति में यदि वह चाहते तो किसी बड़े आदमी से मदद ले सकते थे, किन्तु उन जैसा स्वाभिमानी व्यक्ति ऐसा कहाँ कर पाता है— “भूखों मर जाना/ मेरे मानस की मैना/ राजा से भीख नहीं माँगना” (‘मैं फिर से गाऊँगा’, पृ 26)। जब आर्थिक स्थितियाँ बिगड़ने लगीं तब (2007 में) वह मोहनगंज छोड़कर सपत्नीक अपने पैतृक गाँव— गौरारूपई चले गये। वहाँ पहुँचे तो और अधिक बीमार पड़ गये। कोई देखने वाला था नहीं, सो कुछ समय बाद उनकी बोलने की शक्ति भी चली गयी। इसी दौरान मित्रों के सहयोग से उनकी चौथी कृति— ‘मैं फिर से गाऊँगा’ (नवगीत, 2009) प्रकाशित हुई। इन नवगीत-संग्रहों के प्रकाशन के बहुत पहले उन्होंने ‘गोपी शतक’ (सवैया छंद में राधा-कृष्ण के प्रेम एवं माधुर्य को रेखांकित करती श्रेष्ठ रचना), ‘नेत्र शतक’ (उनकी माँ के नेत्रों की ज्योति चले जाने पर ममतामयी माँ को समर्पित सवैया छंद), ‘परित्यक्ता’ (शकुंतला-दुष्यंत की पौराणिक कथा को आधुनिक सन्दर्भ देकर मुक्त छंद की महाकाव्य रचना), तीन छंदमुक्त कविताओं के संग्रह, एक कहानी संग्रह और एक गीत एवं कविता से संदर्भित समीक्षकीय आलेखों का संग्रह आदि की सर्जना भी की थी, किन्तु वे संग्रह बिना छपे ही कहाँ चले गये, अब तक पता नहीं चला है। 
(7)
विलियम शेक्सपीयर ने कभी कहा था कि सुंदर विचार जिनके साथ होते हैं, वे कभी अकेले नहीं होते। ऐसा ही कुछ इधर भी दिखायी पड़ रहा है, देखिये—  
लगा खिड़की से सटी
चुपचाप
गीतांजलि खड़ी है
और चारों ओर
बिखरी हैं हजारों पुस्तकें। — शलभ श्रीराम सिंह
पारंपरिक प्रणयधर्मी गीतों पर हजारों पुस्तकें लिखी गयी हैं और उन पर शलभ श्रीराम सिंह की उपर्युक्त टिप्पणी काफी सटीक बैठती है। किंतु दिनेश सिंह के गीत-संग्रह— ‘टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर’ को पढ़ने पर लगता है कि गीतांजलि स्वयं इस पुस्तक को उठाकर इसमें अपना चेहरा देखने का प्रयास कर रही है, ऐसी स्थिति में निश्चय ही यह गीत संग्रह उन हजारों पुस्तकों में अनूठा है। दिनेश जी भावाकुल मन की बात, प्रेम के पवित्र प्रवाह तथा उसके आधुनिक चलन को कहने के बहुत से तरीके जानते हैं, उनको इन रागबंधों से जुड़े जीवन और परिवेश की गहरी समझ है और इस विषयवस्तु को मूर्त रूप देने के लिए जिस प्रविधि का वह प्रयोग करते हैं, उससे लगता है कि वह प्रेमगीत परंपरा एवं प्रयोग को भी भली-भाँति जानते रहे हैं। इसीलिए प्रेम-भाव की चरम तन्मयता में उन्होंने अपनी रागात्मक अनुभूतियों को इस काव्यकृति में बखूबी गाया है और अपनी प्रेम-लड़ियों को सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जोड़कर तथा आम-भाषा एवं सहज-संगीत में पिरोकर प्रणयधर्मी गीत साहित्य को और अधिक विस्तृत फलक प्रदान किया हे। इस दृष्टि से ‘टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर’ की समीक्षा में ख्यात कलमकार नीलम श्रीवास्तव का कहना है— “अपने देश में आज की सामाजिक संचेतना की कविताएँ दरअसल सारी धरती पर उग आये विषवृक्षों की सफाई का अभियान चला रही हैं ताकि उस पर प्रेम की फसल उग सके। उस फसल की नर्सरी दिनेश सिंह के गीतों में मिल जाती है” (‘समर करते हुए’, पृ 120)। 
चोहत्तर गीतों से सुसज्जित इस गीत-कलश पर नायिका-भेद तथा नख-शिख वर्णन कर किसी प्रेयसी की भाव-भंगिमाओं को नहीं उकेरा गया है, बल्कि लीक से हटकर प्रेमी की मनोदशा, संवेदना का आवर्तन एवं प्रेम से संदर्भित उसके अनुभवजन्य दृष्टिकोण का यथार्थपरक एवं सटीक चित्रण किया गया है। ऐसा चित्रण अंग्रेजी साहित्य में रॉबर्ट ब्राउनिंग के ‘ड्रामेटिक मोनोलॉग्स’ में देखने को मिलता है, जिसमें प्रेम के सारे कार्य-व्यापार नायक के मानस-पटल पर ही होते हैं और उसके इन मनोभावों से पाठक का सीधा परिचय बनता है। कवि (दिनेश सिंह) द्वारा अपनी इस कृति में प्रेमी के मानसिक स्तर पर उतरकर प्रेम के विविध रंगों को इतनी बेबाकी से प्रस्तुत करना श्लाघनीय है— कभी वह प्रेम में डूबकर प्रणयी दिल की व्याकुलता को प्रकट करता है, तो कभी प्रकृति से प्रेरित उसके मन की उत्कण्ठा एवं उल्लास को व्यक्त करने लगता है; कभी वह ‘राग और आग’ की भट्टी में तपने लगता है— “एक राग/ एक आग/ सुलगाई है भीतर/ रातों भर जाग-जाग/ हम लंगड़े-लूले/ फिर कदम्ब फूले” और “वत्सल-सी,/ थिरजल-सी/ एक सुधि बिछी भीतर/ हरी दूब मखमल-सी/ कोई तो छूले/ फिर कदम्ब फूले।” उसकी यह मनोकामना किसी क्षणिक आवेग से प्रेरित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भी एक आधारभूत कारण है— “पिया कहाँ?/ हिया कहाँ/ पूछे तुलसी-चौरा/ बाती बिन दिया कहाँ/ हम सब कुछ भूले/ फिर कदम्ब फूले” (टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर, पृ. 13), बाती का दिया से जो अटूट रिश्ता है उसी को प्रेमी-युगल के मध्य प्रकट कर कवि प्रेम के मर्यादित स्वरूप की पुष्टि करता है। इसका आशय यह कि कवि प्रेम की मूलभूत संवेदना एवं संस्कार को सँजोये-सँवारे रखकर प्रीति की निर्मल-धारा को सतत प्रवाहित देखना चाहता है, जिससे इस स्वस्थ एवं सुंदर कला के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाया जा सके— “कोई बिछुआ रुनझुन-रुनझुन बोले/ घूँघट पट कोई विव्हल मन खोले/ आवेग जगाए छंद-सृजन की लय/ घर भर में शिशु की किलकारी डोले/ करने को इतना भर होता/ जीने का अर्थ मुखर होता” (पृ. 22)। यहाँ पर ललित आलोचक डॉ सुरेश गौतम द्वारा ‘काव्य परिदृश्य : अर्द्धशती (पुनर्मूल्यांकन) : खण्ड-2’ में दिनेश सिंह के रचनाकर्म पर की गई टिप्पणी उद्धृत करना चाहूँगा— “अंचलीय लोक-तात्विकता के रस में नहाकर शब्द-तंत्र अर्थ-सौंदर्य की अनेक परतों को कोमलकृशी नववधू के घूंघट की तरह खोलता है। अर्थ सौंदर्य के दिपदिपाते बांक-सौंदर्य में घूंघट का सलोनापन बाँधने वाला है” (पृ. 409)।
मार्मिक एवं प्रभावी अभिव्यक्ति और बिंबात्मक प्रस्तुति के माध्यम से ‘टेढ़े मेढ़े ढाई आखर’ के तमाम गीतों— ‘फिर कदम्ब फूले’, ‘ओ रे मेरे मन’, ‘नाव का दर्द’, ‘ओ रे पिया’,  ‘अकेला रह गया’, ‘तुम्हारे बाद जाने के’, ‘क्या कहूँ’, ‘तेरे बिना’, ‘प्रिया-प्रिया रटते-रटते’, ‘हम तुम’, ‘कहाँ महकाओगे’, ‘स्वप्न देखने वालो’, ‘उल्टे दिन हुए’, ‘बहुत मुश्किल’, ‘सुख की चिन्ताएँ’, ‘चिड़े की व्यथा’ आदि में कविवर दिनेश सिंह प्रेम की उद्दात्ता को जिस प्रकार से गीतायित करते हैं, उससे प्रेम की गहराई, पवित्रता एवं गरिमा तो प्रदर्शित होती ही है, वर्तमान में प्रेम की प्रचलित प्रणालियों के चलते प्रेम-मूल्यों में आयी गिरावट भी व्यंजित होती चलती है। इस बात को दिनेश सिंह कुछ इस प्रकार से कहते हैं— “काठ की तरह कठियाये कविता-समय में हवा की तरह भागती आज की जिंदगी हर पुरानी चीजों से टकराती फिर रही है और उन्हें नष्ट कर रही है, जिसमें सबसे अधिक मानवीय आवेग ही चुटहिल हुए हैं। उन चोटों के निशान भी इन गीतों में देखे जा सकते हैं, जबकि मन के उदात्त आवेग का मौसम ढल रहा हो और वस्तुपरकता की नई चाहतों ने दिल के लिए मरने-मिटने की चाहत को दबाया हो” (सन्दर्भ, पृ. 9)। वास्तव में अब प्रेम-सम्बन्धी स्थितियाँ काफी-कुछ बदल गयीं हैं। बाजारवाद एवं विज्ञापनवाद की लहर में प्रेम भी व्यापारिक अनुबंधों की भेंट चढ गया है, जिससे प्रणय-सन्दर्भ में आस्था, विश्वास एवं समर्पण की संवेदना खण्डित हो रही है—
प्रिया-प्रिया रटते-रटते ही/ खोये रहे खयालों में
खुली हवा की नई सुर्खियाँ/ चढ़ी प्रिया के गालों में 
कंचन काया की नादानी/ और विपाशा भीतर की
कई निगाहों में बस जाने की/ प्रत्याशा भीतर की
जीने की लय बनकर आई/ स्वयं समय की चालों में। (पृ. 41)
और रस, अलंकार, वक्रोक्ति, ध्वनि के माध्यम से समकालीन स्थितियों पर कटाक्ष करता यह बंध भी प्रस्तुत है— 
नये समय की चिड़िया चहकी/ बहकी हवा/ बजे मीठे स्वर
सारंगी के तारों जैसी/ काँप रही/ जज्बातों की लर 
छुप-छुपकर मिलती रहती है/ अपने दूजे खसम-यार से
बचे समय में मुझसे मिलती/ गलबाहें दे बड़े प्यार से
उससे लेती छाँह देह की/ मुझसे लेती ढाई आखर। (पृ. 101)
वर्तमान समय के ऐसे प्रेमियों के चारित्रिक एवं नैतिक पतन से प्रेम की गरिमा धूल-धूसरित हुई है। इसका मुख्य कारण आज की अतिभौतिक मानसिकता ही है जिसमें चमड़ी और दमड़ी का व्यापार बड़ा चोखा माना जाता है। शायद इसीलिये ऐसे प्रेमी बिकने-बिकाने, खरीदने-बेचनें में ही विश्वास रखते हैं और मुनाफा कमाने की तरकीबें भिड़ाते हैं— “यों कि बिकने और लुटने के लिए/ खाली कसम” और “उस तरह सीखा/ सनम से प्यार करना/ जिस तरह सीखा/ खुला व्यापार करना”, ऐसे में उनके लिए सच्चे प्यार के माने कुछ नहीं। चूँकि व्यापार में झूठ और अवसरवादिता का बड़ा महत्व है— “अवसरों में ही सभी जीते यहाँ”, एक सच्चा प्रणयी दिल इस व्यापार में कदापि टिक नहीं सकता— “मेरे पास झूठ की पूँजी तनिक नहीं/ कैसे टिक पाऊँगा मैं व्यापार में।” यानी कि आजकल प्रेम में छल और धोखे का प्रयोग हो रहा है और खोखले मीठे बोलों का भी— “सही बोल दिल के दिल में रहे/ ओंठों पर चासनी चढ़ा लिया” और “गढ़ रही सच्चाइयाँ धोखा/ और धोखे से मिले दो दिल/….बन गये हैं प्यार के काबिल।” अब ऐसे प्रेमी यह भी मानते हैं कि अब समय नहीं “उस प्यार का/ जो कि दीवाना बना दे”, बल्कि अब “जमाना है पास आते आदमी को/ तूल देकर तूलने की” — इसी को प्रेम करने एवं प्यार पाने का ‘शॉर्टकट’ माना जाने लगा है। इसीलिये अब यह बात बहुत मायने नहीं रखती है कि इस दिखावे में कितनी हकीकत है और कितना फसाना— “यहाँ दिखावे की हद तक सब आते हैं/ पर्दे के पीछे असलियत छिपाये हैं/ भीतर-बाहर से गँधाते तन-मन को/ खुशबू के हम्मामों में नहलायें हैं।” इस बनावटी खुशबू में ऐसे प्रेमी मधहोश हो गये हैं और जो प्रेमी ऐसा नहीं हो पाते या कर पाते, “वे बदनाम हैं” और असफल भी। यह नयी सोच की, नये ढंग की, नये प्यार की, नयी उड़ान किसको कितना आतंकित करती है और किसको कितनी राहत देती है, यह उसके व्यक्तिगत स्वभाव एवं संवेदना पर निर्भर करता है। निष्कर्षतय: कहा जा सकता है कि बच्चन, अंचल, नेपाली, रमानाथ अवस्थी, भारतभूषण, नीरज, शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, शिवबहादुर सिंह भदौरिया, रवीन्द्र भ्रमर, ओम प्रभाकर, सोम ठाकुर, कैलाश गौतम, किशन सरोज, नचिकेता, वीरेन्द्र आस्तिक, शचीन्द्र भटनागर, बुद्धिनाथ मिश्र, मधुकर गौड़, श्याम निर्मम, शतदल, कुँवर बेचैन आदि द्वारा पल्लवित और पोषित प्रेम-गीतों की लंबी परंपरा को “आधुनिक जीवनबोध को केन्द्र में रखकर बदली हुई प्रणयी भंगिमाओं” (सन्दर्भ, पृ 10) के माध्यम से समृद्ध करता यह गीत संग्रह जरूरी रूप से पठनीय एवं संग्रहणीय है।
(8)
प्रेम के आधुनिक सन्दर्भों के प्रति सजग रहते हुए अब हमें दिनेश सिंह की एक और महत्वपूर्ण कृति— ‘समर करते हुए!’ (नवगीत संग्रह, 2003) की ओर भी बढ़ना होगा। कथ्यगत एवं शिल्पगत नवीनता एवं परिपक्वता से लैस बयासी नवगीतों के इस संग्रह में कवि कलम के प्रयोग एवं बुद्धि कौशल के बल पर अदम्य साहस एवं अटूट विश्वास से परिपूर्ण होकर, उन सभी विडंबनापूर्ण स्थितियों एवं असंगत तत्वों से, जोकि समय के साँचे में अपना आकार लेकर मानवीय पीड़ा का सबब बनी हुई हैं, युद्धरत दिखाई पड़ता है। लगता है कि विराट जीवनानुभवों से समृद्ध ये रचनाएँ अपनी जगह से हटतीं-टूटतीं चीजों और मानवीय चेतना एवं स्वभाव पर भारी पड़ते समय के तेज झटकों को चिन्हित कर उनका प्रतिरोध करने तथा इससे उपजे कोलाहल एवं क्रंदन के स्वरों को न्यूनाधिक कम करने हेतु नये विकल्पों को तलाशने के लिए महासमर में जूझ रही हैं— “व्यूह से तो निकलना ही है/ समर करते हुए/ रण में बसर करते हुए।/ हाथ की तलवार में/ बाँधे कलम/ लोहित सियाही/ सियासत की चाल चलते/ बुद्धि कौशल के सिपाही/ जहर-सा चढ़ते गढ़े जजबे/ असर करते हुए/ रण में बसर करते हुए” (पृ. 114)। 
वैश्विक-फलक पर तेजी से बदलती मानवीय प्रवृत्तियों एवं सामाजिक सरोकारों के नवीन खाँचों को रेखांकित करते इन नवगीतों में जहाँ एक ओर नए बोध के साथ जीवन-जगत के विविध आयाम अभिव्यक्त हुए हैं, वहीं आहत मानवता को राहत पहुचाने और उसके कल्याण हेतु सार्थक प्रयास करने की मंशा भी उजागर हुई है। इस अनूठी भाव-धारा को गति देता यह नवगीतकार भारतीय लोक-जीवन के कटु यथार्थ से अवगत ही नहीं कराता, बल्कि समय के साथ उपजी विसंगतियों के प्रत्यक्ष खतरों का डटकर मुकाबला करने की हिम्मत भी देता है, यथा— “धार अपनी माँजकर/ बारीक करना तार-सा/ निकल जाना है/ सुई की नोक के उस पार-सा/ जिंदगी जी जाएगी/ इतना सफर करते हुए/ रण में बसर करते हुए।” महत्वपूर्ण बात यह है कि जिंदगी जीने के लिए किया जाने वाला यह ‘सफर’ संचार संसाधनों से संपन्न इस युग में ही तय करना है। लेकिन इसके कुछ खतरे भी हैं— संचार क्रांति के इस युग में जहाँ भौगोलिक दूरियाँ घटी हैं और एक मिली-जुली संस्कृति का उदय हुआ है, वहीं अर्थलिप्सा, ऐन्द्रिय सुख एवं आपसी प्रतिस्पर्धा की भावना में भी बड़ा उछाल आया है। इन्हीं उछालों के असंतुलन से जीवन मूल्यों में जबरदस्त टूटन देखने में आयी है, जिससे आपसी प्रेम संबंध तार-तार हो रहे हैं। यद्यपि कुछ आशाएँ-प्रत्याशाएँ अब भी शेष हैं, जिन्हें कवि अपनी सहृदयता, सहजता एवं वात्सल्य से कुछ इस प्रकार से व्यंजित कर रहा है—
वैश्विक फलक पर/ गीत की संवेदना है अनमनी
तुम लौट जाओ/ प्यार के संसार से मायाधनी
यह प्रेम वह व्यवहार है/ जो जीत माने हार को
तलवार की भी धार पर/ चलना सिखा दे यार को
हो जाए पूरी चेतना/ इस पंथ की अनुगामिनी। (पृ. 14)
भौतिकता एवं पाशविकता के कारण व्यापक स्तर पर उपजी संवेदनहीनता की रोकथाम एवं उपचार करने के लिए प्रेम की जिस संजीवनी का प्रयोग करने की बात यह कवि करता है, उससे इस समर में बसर करने की आस तो बँधती ही है, इससे समय की विषयाग्नि से निःसृत नए दुःखों से पार भी पाया जा सकता है— “सिर पर/ सुख के बादल छाए/ दुःख नए तरीके से आए।/ सुविधाओं की अँगनाई में/ मन कितने ऊबे-ऊबे हैं/ तरुणाई के ज्वालामुख,/ लावे बीच हलक तक डूबे हैं/ यह समय/ आग का दरिया है/ हम उसके माँझी कहलाए/ दुःख नए तरीके से आए।” परिणामस्वरूप आज की पीढ़ी की मानसिकता में आए इस जबरदस्त बदलाव का आलम यह है कि साधन-संपन्नता के बावजूद भी उसके मन में असंतोष की गाँठें उभरती रहती हैं जिसके चलते वह जमाने की चमक-दमक से आकर्षित होकर नित नयी महत्वाकांक्षाएँ पालने-पोसने में लगा रहता है और जब इनको पूरा करने में वह सफल नहीं हो पाता तब उसकी स्थिति बड़ी ही दयनीय हो जाती है— “कई रंग के फूल बने काँटे खिल के/ नयी नस्ल के नये नमूने बेदिल के।/ आड़ी-तिरछी-टेढ़ी चालें/ पहने नयी-नयी सब खालें/ परत-दर-परत हैं पंखुरियों के छिलके।/ फूले नये-नये मिजाज में/ एक अकेले के समाज में/ मेले में अरघान मचाए हैं पिलके।/ भीतर-भीतर ठनाठनी है/ नोंक-झोंक है, तनातनी है/ एक शाख पर झूला करते हिलमिल के।/ व्यर्थ लगें अब फूल पुराने/ हल्की खुशबू के दीवाने/ मन में लहका करते थे हर महफिल के” (पृ. 17)। 
आज की भागदौड़-भरी जिंदगी में बाजारवाद की जकड़न, भौतिक महत्वाकांक्षाओं से सामाजिक मूल्यों का विघटन, राजनीति में जीवन-मूल्यों का अवमूल्यन, नैतिक आदर्श की भावना का स्खलन, जीवन की रागात्मक अभिव्यक्ति में असंतुलन आदि के चलते देश-दुनिया की स्थिति बिगड़ रही है। इस सन्दर्भ में दिनेश सिंह की ‘समर करते हुए’ में दी गयी टिप्पणी महत्वपूर्ण है— “इस बेसुरे कविता-समय में मनुष्य-जीवन की वस्तुपरकता देश-काल को जो धरोहर-पूँजी के रूप में धरने को दे रही है उसके बूते अगली पीढ़ी को वैभव का पाठ पढ़ाने के अलावा सामाजिक राग का कोई मानवीय अध्याय खोलते नहीं बन रहा है। इस नयी संस्कृति का भाव इस देश की सुपरिचित सांस्कृतिक भाव-लय से मेल नहीं खा रहा है। ऐसी कठिन परिस्थिति में हिंदी गीत की साहित्यिक और सांस्कृतिक सीमाओं और संभावनाओं के संकेतों को इन गीतों में तलाशने का काम मैं अपने सुधी पाठकों पर ही छोड़ता हूँ” (प्रसंग, पृ. 10-11)।
नए समीकरणों के बीच वर्तमान जीवन के मर्म को निरखने-परखने वाली दिनेश सिंह की गीतधर्मिता में जिन तत्वों का समावेश हुआ है वे तर्क के सीमेंट एवं यथार्थ के मौरंग से बड़ी वस्तुनिष्ठता एवं स्वाभाविक भावबोध के साथ खुद के गढ़े गए प्रतीकों-बिंबों के माध्यम से रूपायित होते हैं। इन रचनाओं में समय के सच की जितनी सहज अभिव्यक्तियाँ हैं, गहराई में उतरने पर बौद्धिक आयामों के कपाट भी उतने ही स्पष्ट रूप से खुलते चले जाते हैं— 
दर्द दिल में हर समय धड़का करे
हमें कुछ ऊपर उठाकर
ओंठ सच के बहुत मुखरित हो रहे
मुँह लगाए हुए बाकी टाकियाँ
वार्ताओं-मशविरों की आड़ में
झूठ का मुँह कुचलती चालाकियाँ
वैभवों के पाप बदले पुण्य में
विभव का सागर नहाकर। (पृ. 24)
इस नवगीत संग्रह में व्यावहारिक भाषा-लय को पकड़कर आधुनिक जीवन के तानों-बानों को कभी सीधे सहज रूप में तो कभी वक्रता के साथ करीने से व्यंजित किया गया है। जीवन की संश्लिष्टता तथा अडिग आस्था का निरूपण करते इन गीतों की आंतरिक अन्विति तथा उसको-उकेरने उभारने हेतु अद्भुत दृष्य संयोजनों में इस प्रयोगधर्मी कवि की संवेदना को कोई भी सहयात्री आसानी से महसूस कर सकता है। कहने का आशय यह भी कि विचारों की मौलिकता, अछूते बिम्बों का सटीक प्रयोग, लोकजीवन की सहज अनुभूतियाँ, जीवन-मूल्यों की सार्थक पड़ताल, विज्ञान बोध की व्याप्ति, शिल्प का वैविध्य, भाषा का टटकापन, सहज सम्प्रेषणीयता, जनधर्मी चेतना आदि तत्वों से आलोकित इस नवगीत-संग्रह को नयी दृष्टि से देखने-परखने की आवश्यकता है।
(9)
दिनेश सिंह भलीभाँति जानते थे कि मनुष्य को अपने जीवन में उच्चतम विकास करने के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष यूँ ही नहीं हो जाता, उसके लिए मनुष्य को अपनी भूमिका तय करनी होती है— कई बार संघर्ष स्वयं मनुष्य की भूमिका तय कर देता है। शायद इसीलिये उमंगों एवं उम्मीदों के ब्रह्म-कमल पर अपनी मस्ती में विराजमान अद्भुत गीतकार दिनेश सिंह जीवन-पर्यन्त संघर्ष करने से कभी नहीं कतराए, जिसके प्रमाण के रूप में बयासी नवगीतों को समोये उनकी चौथी काव्य पुस्तक— ‘मैं फिर से गाऊँगा’ (2009), जिसकी अधिकांश रचनाओं की सर्जना दिनेश सिंह की दूसरी कृति के प्रकाशन के बहुत पहले की गयी थी, के शीर्षक गीत की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—
मैं फिर से गाऊँगा
बचपना बुलाऊँगा/ घिसटूँगा घुटनों के बल/
आँगन से चल कर/ लौट-पौट आँगन में आऊँगा।
मैं फिर से गाऊँगा। 
पोखर में पानी है/ पानी में मछली है
मछली के ओंठों में प्यास है
मेरे भीतर/ कोई जिंदगी कि फूल कोई
या कोई टूटा विश्वास है 
कागज की नाव/ फिर बनाऊँगा
पोखर में नाव कहाँ जायेगी
लेकिन कुछ दूर तो चलाऊँगा।
मैं फिर से गाऊँगा। (पृ 11-12)
(10)
हिंदी-काव्य एवं आलोचना की धरा पर आलोकधर्मी अग्निलीक खींचने वाले दिनेश सिंह किशोर होते ही कवि हुए, प्रौढ़ होते ही कवि, आलोचक एवं संपादक हुए और जीवन-पर्यन्त कवि, आलोचक एवं संपादक ही बने रहे— वह साहित्य और जीवन को एक दूसरे को पर्याय मानकर जीवन-भर उस सत्य की खोज में लगे रहे, जिसे उपनिषदों में ‘नेति-नेति’ कहकर शब्दबद्ध करने का प्रयत्न किया गया। सहज-सौम्य-सुबोध दिनेश जी ने तत्कालीन शहर-गाँव-समाज में हो रहे आमूल-चूल परिवर्तनों, फ़ैल रहीं असंगतियों-अव्यवस्थाओं, बढ़ रहीं चिंताओं-मलामतों को बखूबी जान-समझ कर बड़ी साफगोई से अपने साहित्य-संसार को रचा है। शायद इसीलिये उन्होंने सदैव अपनी कविताओं, कहानियों, गीतों, नवगीतों आदि में ही नहीं, बल्कि आलोचना एवं संपादन में भी ‘असत्य-अशिव-असुंदर’ का पुरजोर विरोध किया है और सत्य, अहिंसा, प्रेम, विवेक, ज्ञान, संयम, सदाचार, उदारता, आस्था, शांति एवं अनुशासन का सार्थक पाठ पढ़ाया है— कई बार अपनी चिंतनपरक आतंरिक यात्रा से तो कई बार पारदर्शी एवं निष्कलुष जीवन-शैली से; कई बार अपने अर्थ दृष्टि से समृद्ध व्यावहारिक शब्दों से तो कई बार अपने उदग्र, उदात्त टेढ़े-मेढ़े ढाई आखरों से— क्योंकि यही सब कुछ तो ‘जीने का अर्थ मुखर’ कर देते हैं। शायद इसीलिए डॉ वीरेंद्र सिंह ने अपनी आलोच्य पुस्तक— ‘समकालीन गीत : अन्तः अनुशासनीय विवेचन’ (2009) में दिनेश सिंह के साहित्यिक अवदान को करीने से रेखांकित किया है। 
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इस सृष्टि में जीवन (सृजन) और मृत्यु (विलय)— दोनों काल के आधीन हैं। काल एक व्यापक सत्ता है— जीवन से लेकर मृत्यु तक की तमाम अवस्थाएँ इसी में अपना आकर ग्रहण करती हैं। इसलिए दोनों ही सत्य हैं और दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। अनूठी कहन और बेबाक शैली के लिए ख्यात दिनेश सिंह भी अपने एक गीत में यही कहते हैं— “काल है/ जो साथ चलता है/ मृत्यु तक/ जीवित क्षणों में।” इस स्थिति के प्रकाश में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन 2 जुलाई 2012 को मुक्तचेता दिनेश सिंह का अपने गाँव में ही गोलोकवास हो गया। उनके पार्थिव शरीर को गंगा जी के तट पर स्थित गेगासो घाट ले जाया गया— “जब उनके पार्थिव शरीर को गेगासों घाट पर आग दी गयी तो वे बिल्कुल अकेले थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि पूरे समय, जब तक कि वे भस्म में नहीं बदल गये, कोई दूसरा शव नहीं आया। वर्ना तो शमशान में शवों की भीड़ ही लगी रहती है। और जैसे ही हमलोग दिनेश सिंह की अस्थियों को गंगा में विसर्जित कर चुके वैसे ही दूसरा शव शमशान में आता हुआ दिखाई दिया। मुझे लगा कि प्रकृति ने अंत समय में उनके सम्मान का पूरा ख़याल रखा। वे अपने सम्मान, स्वाभिमान में सदा ही अकेले रहे और अंतिम समय भी वह ‘हंस अकेला’ वैसे ही उड़ चला— अपने पीछे साहित्य की समृद्धि, गीतों की भरपूर गुनगुनाहट और व्यक्तित्व की आकर्षक यादों को छोड़ता हुआ” (रमाकांत, दिनेश सिंह स्मृति विशेषांक, पृ 5)। दिनेश सिंह के दिवंगत होने पर भोपाल के वरिष्ठ साहित्यकार राम अधीर ने ‘संकल्प रथ’ पत्रिका के दिसंबर (2012) अंक में कुछ लेख दिनेश सिंह की रचनाधर्मिता पर केंद्रित किये, तो वहीं रायबरेली के चर्चित कवि-आलोचक रमाकांत ने ‘यदि’ पत्रिका का ‘दिनेश सिंह स्मृति विशेषांक’ सम्पादित कर 16 फरवरी 2013 को रायबरेली में इसका भव्य लोकार्पण भी करवाया। इस लोकार्पण समारोह में दिनेश सिंह की धर्मपत्नी, बेटी, दामाद, धेवता सहित रामनारायण रमण, ओम प्रकाश सिंह, शीतलदीन अवस्थी, आनन्द स्वरूप श्रीवास्तव, रमाकांत, ओम धीरज, जय चक्रवर्ती, वीरेश प्रताप सिंह, शमसुद्दीन अज़हर, अवनीश सिंह चौहान आदि लोग मौजूद थे। इस लोकार्पण समारोह में रमाकांत द्वारा कही गयी एक और बात यहाँ रखकर अपनी लेखनी को विराम देने की अनुमति चाहूँगा— “यद्यपि दिनेश सिंह ने गीत-नवगीत के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किया है, उनके अवदान का सम्यक मूल्यांकन अभी किया जाना शेष है।” 
  
सन्दर्भ:-
आस्तिक, वीरेन्द्र, “दिनेश सिंह और मैं : एक ऐतिहासिक दास्तान”, संकल्प रथ, सितंबर 2012
——, धार पर हम, शाहदरा : आलोक पर्व प्रकाशन, 1998
कन्हैया लाल नंदन, श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन, दिल्ली : साहित्य अकादमी, 2001
गौतम, सुरेश, काव्य परिदृश्य : अर्द्धशती (पुनर्मूल्यांकन) : खण्ड- 1 और 2, अल्मोडा : श्री अल्मोड़ा बुक डिपो, 1997
चौहान, अवनीश सिंह, “यदि पत्रिका का दिनेश सिंह स्मृति विशेषांक लोकार्पित”, पूर्वाभास : मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014, वेब लिंक : http://www.poorvabhas.in/2014/02/blog-post_18.html
रमाकांत (सं), “दिनेश सिंह स्मृति विशेषांक”, ‘यदि’ (समय की साहित्यिक पत्रिका), मुराईबाग (डलमऊ), रायबरेली, वर्ष 11, अंक- 15, फरवरी 2014  
सिंह, शम्भुनाथ, नवगीत दशक- तीन, शाहदरा : पराग प्रकाशन, 1984 
सिंह, दिनेश, पूर्वाभास, इलाहाबाद : साहित्यालोचन प्रकाशन, 1975 (पृ 70)
सिंह, दिनेश (सं), ‘नये-पुराने’ : गीत अंक- एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सीतापुर : राजेन्द्र राजन, द्वारा नेहरू युवा केंद्र, 1997-2000  
——, टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर, लखनऊ : सुलभ प्रकाशन, 2002 (पृ 103) 
——, समर करते हुए, गौरारूपई : मकसद प्रकाशन, 2003 (पृ 120) 
——, मैं फिर से गाऊँगा, इलाहाबाद : अनुभूति प्रकाशन, 2010 (पृ 112) 
——, ‘नये-पुराने’ गीत अंक- एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह के सम्पादकीय, ‘गीत-पहल’ : https://geetpahal.webs.com/nayepuranese.htm 
सिंह, वीरेंद्र, समकालीन गीत : अन्तः अनुशासनीय विवेचन, जयपुर : रचना प्रकाशन, 2009
श्रीवास्तव, नीलम, “टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर का अशेष गुंजन”, दिनेश सिंह कृत समर करते हुए, गौरारूपई : मकसद प्रकाशन, 2003

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