लेखक हर बार एक नया जन्म लेकर नौसिखिया ही रहता है – अलका सरावगी 3

कलि-कथा वाया बाइपास, शेष कादंबरी, कोई बात नहीं, एक ब्रेक के बाद जैसे चर्चित उपन्यास लिखने वाली साहित्य अकादमी सम्मान से विभूषित वरिष्ठ लेखिका अलका सरावगी से पुरवाई टीम की बातचीत –

सवाल – नमस्कार अलका जी, पुरवाई से बातचीत में आपका स्वागत है। आपका उपन्यास कलिकथा वाया बाइपास 1998 में प्रकाशित हुआ और वर्ष 2001 में आपको इस उपन्यास केलिये साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिल गया। आप शायद हिन्दी की सबसे युवा लेखक रही होंगी जिसे यह सम्मान मिला। उस पुरस्कार के बाद आपके लेखकीय व्यक्तित्व में क्या बदलाव आए?
अलका – मेरा ख़याल है कि किसी पुरस्कार से लेखन में कोई बदलाव नहीं आता। लोग सोच लेते हैं कि पुरस्कार से एक चुनौती खड़ी हो जाएगी कि लेखक बेहतर लिखकर दिखाए। सच तो यह है कि वैसे भी यह चुनौती हर नई रचना के समय रहती है। मेरे गुरुवर अशोक सेक्सरिया को इस बात की आशंका ज़रूर थी कि कम उम्र में मिला बड़ा पुरस्कार मेरी रचनात्मकता को नुक़सान पहुँचाएगा, किन्तु मुझे ख़ुशी है कि उनकी यह आशंका समय के साथ निर्मूल साबित हुई।
सवाल – आपने बाल साहित्य भी लिखा है, कहानियाँ भी और उपन्यास भी। आप किस विधा में अपनी बात अधिक सहजता से कह पाती हैं?
अलका – बाल साहित्य तो बहुत कम लिखा है हालाँकि इच्छा रखती है कि और लिखूं। पहला उपन्यास लिखने के बाद ही कहानियां लिखना छूट गया।मुझे लगता है कि उपन्यास का बड़ा फलक आपको यह आज़ादी देता है कि आप उसमें अपनी बातें कई आयाम में और कई narrative voices में कर सकें। इसलिए अब सातवाँ उपन्यास, ‘ कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ आपके सामने है।
सवाल – जब से भाजपा सरकार सत्ता में आई है बहुत से लेखकों ने कुछ मुद्दों को लेकर पुरस्कार वापसी जैसे सख़्त निर्णय लिये। आपकी नज़र में यह एक सहज प्रतिक्रिया थी या फिर इसके पीछे आप किसी प्रकार की राजनीति देखती हैं?
अलका – लेखक अपने सोच के अनुसार सत्ता के विरुद्ध बोलने की हिम्मत करते आए हैं। समय चारण-वृत्ति की पूजा नहीं करेगा। किंतु साहित्य अकादमी पुरस्कार न लौटाने के मेरे अपने निर्णय के पीछे यह विचार था कि किसी ख़ास समय में सत्ता पर क़ाबिज़ किसी विचारधारा के विरोध में हम एक संस्था के इतिहास और उसकी अर्थवत्ता को कम नहीं कर सकते..और पुरस्कार-क्लब के बाहर के लोगों के पास विरोध करने का कोई रास्ता है या नहीं?
सवाल – कोरोना वायरस ने हमारे जीवन में मूल-भूत परिवर्तन पैदा कर दिये हैं। सोशल मीडिया पर तो कोरोना से जुड़े साहित्य की बाढ़ ही आ गयी है। आप इस स्थिति को कैसे महसूस करती हैं। क्या यह बहती गँगा में हाथ धो लेने वाला साहित्य स्थाई होगा?… और फिर आपने इस काल में साहित्य रचना की तो किन दबावों में की?
अलका – कोरोना काल में बहुत सी आंतरिक और बाहरी उथल-पुथल का अनुभव हम सभी कर रहे हैं। बहुत सारे सवाल हैं जो हम अपने आपसे पूछ रहे हैं-ये प्रकृति और मनुष्य के रिश्तों को लेकर भी हैं और मनुष्य-मनुष्य और उसके साथ टेक्नालॉजी के रिश्तों को लेकर भी हैं। सोशल मीडिया पर बहुत सारी सामयिक प्रतिक्रियाएं कई बार आपके अपने अनुभवों को शब्द देती हैं.. मैं इस काल में पिछले सात-आठ दशकों तक फैला समय लेकर लिख रही थी। घर में बंद होना मुझे एकांत और बची हुई ऊर्जा दे रहा था। उपन्यास पूरा कर मैंने दो किताबों का हिंदी में अनुवाद भी कर लिया!
सवाल – भारत में हर मुद्दे पर राजनीति करने की परम्परा सी रही है। मज़दूर (जिन्हें की प्रवासी मज़दूर कहा गया) – जब अचानक पैदल और सिर पर सामान उठाए परिवारों को साथ लिये वापिस गाँव चल दिये, तो आप जैसी संवेदनशील लेखिका ने कैसा महसूस किया?
अलका – जब प्रवासी मज़दूर शहरों में अपनी बस्ती छोड़ अपने गाँव की ओर पैदल चल पड़े, तो मैंने बीस साल पहले लिखे ‘कलिकथा वाया बाईपास’ के अंतिम अध्याय को खोलकर पढ़ा। यह भविष्य के ऐसे समय की कल्पना पर आधारित था, जब प्रदूषण के कारण पेड़-पौधों के मरने से मशीन से चलनेवाली हर चीज़ को बंद कर दिया गया है। तब लोग अपने गाँव की ओर लौट चलते हैं क्योंकि शहरों की नरक जैसी ज़िंदगी से कमाए धन की उनके लिए कोई उपयोगिता नहीं रह गई है। मुझे अब पता चला कि मेरी कल्पना कितनी अधूरी थी क्योंकि इन मज़दूरों की अमानवीय तकलीफ़-मौत-दुर्घटना की सम्भावना की उसमें कोई बात नहीं की गई थी।
सवाल – हिन्दी साहित्य में एक धारा नारी विमर्श की भी है। कुछ लेखिकाएं इस धारा में तथाकथित बोल्ड लेखन भी करती हैं। कहीं कहीं नारेबाज़ी भी महसूस होने लगती है। आपके लेखन के बारे में कहा जाता है कि आपका संपूर्ण लेखन सामाजिक संस्कृति का आदर्श प्रस्तुत करता है। आपके साहित्य पर कहीं से भी अश्लीलता का आरोप नहीं लगाया जा सकता। आपके नारी पात्र कम बोलते हैं मगर बात ऊर्जा से करते हैं। आपने लेखन का यह मार्ग क्यों अपनाया?
अलका – नारी को दोयम दर्जे पर रखने के प्रतिकार करने का जो साहित्य है, यदि उसमें कुछ बोल्डनेस या नारेबाज़ी दिखती है तो यह शायद समय के दौर की माँग मानी जा सकती है। फिर भी मुझे लगता है कि नारी सिर्फ़ नारी की तक़लीफ़ को ही लिखे, यह उसकी शक्ति को एक तरह के ghetto में बंद करना है। कहीं लोग मान लेते हैं कि नारी की दृष्टि इतनी संकुचित है कि वह बड़े मसलों—सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक वग़ैरह पर लिख ही नहीं सकती। रामचंद्र शुक्ल के इतिहास की तरह उसे एक फ़ुट्नोट में नीचे जगह मिलती रहेगी या साहित्य के ‘कैनन’ में एक अलग समूह की तरह जगह मिलेगी।
सवाल – इटली के साथ भारत के विशेष रिश्ते हैं। मगर आपके साहित्य के इटली के साथ विशेष रिश्ते हैं। आपके तीन तीन उपन्यासों का इतालवी भाषा में अनुवाद हुआ है। वहीं कलिकता वाया बाइपास तो विश्व की कई भाषाओं में अनूदित हुआ है। यह ग्लोबल स्वीकार्यता आपके लेखन को कितना विस्तार देती है?… इटली और फ़्रांस के अपने कुछ अनुभव साझा करना चाहें तो…?
अलका – इटालियन भाषा में तीन उपन्यासों का अनुवाद मुझमें विस्मय और आनंद जगाता है। फ़्रांस और जर्मनी में छोटे-बड़े शहरों में घूमकर अपनी रचना का पाठ करते हुए मैंने महसूस किया कि सांस्कृतिक फ़र्क़ के बावजूद मनुष्य की प्रतिक्रियाएँ, भावनाएँ समान हैं। एडिनबर्ग में लोग मेरे पाठ में ख़ूब हँस रहे थे। बाद में पता चला कि वहाँ भी साउथ/नॉर्थ कलकत्ता में रहनेवालों की तरह उन्हें ऊँची/नीची निगाह से देखा जाता है !
सवाल – कर्मकाण्ड में आपका कितना विश्वास है। आपकी कहानियों से तो हमें महसूस होता है कि आप धर्म को डरे हुए इन्सान की शरणगाह ही मानती हैं?
अलका – कर्मकांड में मेरा मन नहीं लगता। पर मैं ऐसे लोगों के साथ रहती हूँ जिनके लिए यह जीने का तरीक़ा और सम्बल है। अच्छी बात यह है कि हम एक-दूसरे को अपने-अपने तरीक़े से जीने देते हैं।
सवाल – आपके लेखन में इतिहास का इस्तेमाल है, स्मृति का इस्तेमाल है। इतिहास और स्मृति के बीच वर्तमान भी मौजूद है। कलिकथा वाया बाइपास से आपने इस तकनीक का इस्तेमाल करना शुरू किया। इस तकीनक को आपने कैसे विकसित किया? इसमें नॉस्टेलजिया और यथार्थ को आप किस तरह जोड़ पाती हैं?
अलका – बहुत अच्छा प्रश्न है। नोस्टैल्जिया या स्मृति और यथार्थ को जोड़ना नहीं पड़ता। वे जुड़े हुए ही हैं। पर हम जानबूझकर अपने इतिहास को भूलना चाहते हैं क्योंकि या तो वह हमें असुविधा में डालता है या उसे भूलने से हमें कोई असुविधा नहीं होती। मैं इसे voluntary amnesia कहती हूँ। पहले उपन्यास में ही मैंने सोचा कि हमें प्रस्तर-युग और तूतनख़ामन के बारे में स्कूल में पढ़ाया गया था, किंतु हमारे ही शहर में घटे 1943 के बंगाल के अकाल के बारे में क्यों नहीं बताया गया था?
सवाल – क्या कुछ नया पढ़ने का भी अवसर मिलता रहा है? विदेशी लेखन के अतिरिक्त क्या आपको अपनी युवा पीढ़ी के लेखन को भी देखने परखने का अवसर मिला है?… कुछ लेखक ऐसा आभास देते हैं कि जल्दी में हैं, तो वहीं कुछ लेखक अहसास दिलाते हैं कि वे दूर तक चलेंगे। क्या आप अपने अपने लम्बे लेखकीय जीवन से जुटाए अनुभव उनके साथ साझा करना चाहेंगी?
अलका – सोशल मीडिया पर नया लेखन देखती रहती हूँ और मुझे अच्छा लगता है कि मेरा लेखकीय अनुभव जितना पुराना है, उतना ही नया है। आपके पास हर बार एक नई कहानी होती है जो एक नए समय की नई दुनिया में या पुराने ही समय के एक नए इलाक़े में नई परिस्थितियों में बनती रहती है। इसलिए मुझे लगता है कि लेखक हर बार एक नया जन्म लेकर नौसिखिया ही रहता है।

1 टिप्पणी

  1. अल्का जी का साक्षात्कार अच्छा लगा कुछ बातें रेखांकित करने
    वाली हैं । मुख्यतः “नारी सिर्फ नारी की तकलीफ़ को ही लिखे”।
    एकदम दुरुस्त विचार मेरा भी मानना है कि नारी को स्वकेन्द्रित
    हो जाना चाहिए तभी उसे सन्दर्भो में अंकित किया जावेगा ।
    सधन्यवाद
    डॉ प्रभा मिश्र

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