भावना गौड़ की कलम से - विविध भावों और संभावनाओं के झूले में झुलाती रॉकिंग चेयर 5
समीक्षक – भावना गौड़
भारतीय मूल की लेखिका अरुणा सब्बरवाल वर्षों से लंदन में रह रही हैं, लेकिन भारत की पारंपरिक संस्कृति को उन्होंने बहुत करीब से जाना है, अतः विदेशी आवरण में लिपटी हुई उनकी कहानियों की आत्मा में भारतीयता की झलक मिलती है। अरुणा जी ने सेवानिवृत्ति के बाद अपनी लेखन यात्रा का आरंभ  किया। इनका कहानी संग्रह “रॉकिंग चेयर”  ऐसी पंद्रह कहानियों का संकलन है, जो मुख्यतः लंदन में रहने वाले भारतीयों के जीवन से जुड़ी समस्याओं के हल निकालता हुआ प्रतीत होता है। प्रतिरोधों के प्रति इनका दृष्टिकोण समाधानपरक है। इन्होंने कुछ ऐसे विषयों पर भी अपनी कलम चलाई है, जिनके बारे में बात करना आज भी भारतीय समाज में वर्जित समझा जाता है। इनकी सभी कहानियां कुछ कहने का प्रयास करती हैं। कुछ ऐसा, जो किसी न किसी प्रकार से सामाजिक कल्याण की ओर ले जाए, जो लीक से हटकर हो। यह कहानी संग्रह प्रेम की अनेक दास्तानें कहता है, इसमें वह प्रेम नहीं, जो शारीरिक वासनाओं के पूर्वाग्रह से युक्त है, बल्कि यह तो शाश्वत विशुद्ध प्रेम है। थर्ड जेंडर का हृदय भी प्रेम से लबरेज हो सकता है और पुरुष के हृदय में नारी रूप धारण करके भी प्रेम पाने की कामना जन्म ले सकती है, ऐसे अनूठे विषयों पर भी अरुणा जी ने अपनी कलम चलाई है। वे निषिद्ध विषयों पर भी विचारणीय प्रश्न करने का साहस रखती हैं। प्रेम ही नहीं, विश्वासघात और उपेक्षा की भी दास्तानें इस कहानी संग्रह में मौजूद हैं, जो पाठकों को विभिन्न परिधियों पर विचरण करने का विस्तृत फलक देती हैं। इनकी कहानियां, मात्र कहानियाँ न होकर समाज से किए गए प्रश्न हैं, जो कहानियों का रूप धरकर मन मस्तिष्क को झकझोर जाते हैं। कहानियों का परिवेश लंदन का होने के कारण कहानी की भाषा में अंग्रेजी वाक्यांशों का प्रयोग स्वाभाविक है। “आउट ऑफ द बॉक्स थिंकिंग” वाली ये कहानियां किसी की कमी उजागर करने के लिए उसे कटघरे में नहीं खड़ा करतीं, बल्कि उन कमियों को दूर किए जाने के मार्ग सुझाती हैं। इनकी कहानियों में प्रकृति के सजीव चित्रण इनके प्रकृतिप्रेमी होने का संकेत देते हैं। उम्र के इस पड़ाव में इनकी लेखनी की परिपक्वता संग्रह की हर कहानी में नज़र आती है।
      बच्ची के साथ कुकर्म करने वालों के प्रति रोष जताना हो, या समाज में विधवा स्त्री का आक्रोश व्यक्त करना हो, इनकी कहानियां प्रचंड स्वर में आवाज़ उठाती हैं और सकारात्मक स्थितियां उत्पन्न करके पाठकों में आशावाद का संचार करती हैं। कैंसर के कारण वक्षहीनता की शिकार युवती की पीड़ा हो या दिल की खतरनाक बीमारी का शिकार मासूम शिशु, थर्ड जेंडर की त्रासदी से गुजरता व्यक्ति हो या ट्रांसजेंडर के अकेलेपन का दंश झेलता व्यक्ति, अरुणा जी ने अपनी कहानियों के माध्यम से हर वर्ग के अनकहे दर्द को उकेरने का प्रयास किया है।
शीर्षक कहानी “रॉकिंग चेयर” एक लैंगिक असमर्थ व्यक्ति की दर्दभरी दास्तान है। ऐसा व्यक्ति जो समाज के डर से अपनी इस कमी को छुपाने की कोशिश में स्वार्थी रिश्तेदारों की साज़िश का शिकार होता है, क्या होता है जब उसकी खुद की बेटी को ही उसकी इस असमर्थता का पता चलता है? लेकिन कहानी में रहस्य यह भी है कि जब व्यक्ति संतानोत्पत्ति में समर्थ ही नहीं है तो उसकी बेटी आई कहाँ से ? सच्चाई जानते हुए भी समाज की कड़वाहट से बचने के लिए वह बार-बार मुँह पर ताला लगा लेता है। क्या इस भँवर से वह निकल पाता है, ऐसे अनेक प्रश्नों से भरा प्रश्नपत्र पाठकों के सम्मुख रखता यह कहानी संग्रह पूरा पढ़ने के बाद भी काफी देर तक पाठकों का विचारमंथन करता रहता है।
              हम मनुष्य प्रकृति की अनुपम कृतियां हैं। स्त्री हो या पुरूष, दोनों ही समाज की उन्नति के लिए समान रूप से उत्तरदायी हैं। हम निर्जीवों की तरह मात्र परिमाण ही नहीं रखते, बल्कि अपने मस्तिष्क के प्रयोग से परिणाम को बदल देने की भी क्षमता रखते हैं। स्वस्थ मस्तिष्क के रहते कोई जीवन व्यर्थ नहीं हो सकता। हाँ, इतना अवश्य है कि नकारात्मक परिवेश व्यक्ति का आत्मविश्वास डिगा सकता है, लेकिन आत्मीयता का स्पर्श इस नकारात्मकता की दीवार को चूर-चूर भी कर सकता है। अपने ही पति द्वारा “व्यर्थ” कहकर तिरस्कृत की गई स्त्री के संघर्ष को दर्शाती कहानी है, “इंग्लिश रोज़”। यह कहानी जीवन से निराश उन युवतियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है, जो सामाजिक परिवेश के कारण शारीरिक कमियों को अपनी खुशियों का समापन मानकर जीवन से विरक्त हो जाती हैं। यह कहानी बताती है कि टूटकर बिखरना सदैव विनाश नहीं, बल्कि नवसृजन का उदघोष भी हो सकता है।
वर्ष 2020 सम्पूर्ण विश्व में कोरोना वायरस के रूप में अपना विनाशकारी प्रभाव छोड़कर गया। आम गृहणी से लेकर बड़े बड़े डॉक्टर तक, हर कोई अपने-अपने तरीकों से इस महामारी से लोहा लेने में लगे रहे, लेकिन क्रूर कोरोना वायरस के पंजे से कोई नहीं बच पाया। कोरोना की भयावहता को दर्शाती कहानी है, “लाल जोड़ा”। कोरोना वायरस की चपेट में कैसे हंसते खेलते जीवन पलक झपकते ही काल के गाल में समा गए, सिहरन पैदा करने वाली इस कहानी में लेखिका ने “सच कहूँ तो मुझे लंदन की नेशनल हेल्थ सर्विस पर अधिक भरोसा है”, इस छोटी सी पंक्ति द्वारा भारतीय स्वास्थ्य विभाग की बदहाली को आईना दिखाने का भी प्रयास किया है।
कई बार हमारे अपने मन की पहेलियां भी इतनी उलझी हुई होती हैं कि हम खुद भी उन्हें नहीं सुलझा पाते। जिन लोगों का बचपन रूढ़िवादी परिवारों में बीता हो, उनके लिए जातपात की ऊँचनीच को न मानने का अपराधबोध मन से निकाल पाना आसान नहीं होता। ऐसे में वे ऊपरी तौर पर कितने भी आधुनिक बनने का स्वांग करें, ऊंची-नीची जाति को लेकर पूर्वाग्रह की कील उनके दिल में चुभती ही रहती है, जिसके कारण वे कभी-कभी वो सब भी करने को विवश हो जाते हैं, जो उनके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत होता है। लेखिका ने अपनी कहानी “कील” द्वारा मन में गड़ी ऐसी कील को उखाड़ फेंकने का प्रयास किया है। अपना घर-परिवार छोड़कर एक अंजान घर को अपना बनाने का सपना आँखों में लिए नारी के लिए कौन सा घर अपना होता है, जहाँ वह सुकून से साँस ले सके? क्या उसका कोई घर होता भी है? खोखले रिश्तों के बंधन में छटपटाते हुए भी अपने अस्तित्व का संघर्ष करती हुई नारियों के दर्द को समर्पित कहानी है, “उसका घर”। अत्यंत भावुक कर देने वाली इस कहानी में मौत के सन्नाटे का विवरण रोंगटे खड़े कर देता है।
“आवाज होती पर, पर मर जाती थी, कोई अनुगूंज नहीं बचती थी… यह कैसे पेड़ थे… कैसी हवा थी…  हरकत रहित… जिसमें ना सुर ना ताल… उसने खाँस कर देखा… खाँसी भी मर गई थी, जैसे प्रेरणा… उसकी दोस्त… अब उसकी कभी आवाज नहीं आएगी…
इस कहानी में “औरत भी कोई याद रखने की चीज़ है क्या?” कहकर लेखिका ने नारी को अस्तित्वहीन समझने वाले पुरुषों की मानसिकता को एक वाक्य में पिरो दिया है। यह हर उस स्त्री की कहानी है, जो जीवनपर्यंत परिवार के प्रति समर्पित होते हुए भी “यूज़लेस” कहकर पलभर में भुला दी जाती है।
आज विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि शरीर के किसी अंग के काम न करने पर उसे काटकर शरीर से अलग किया जा सकता है और उसकी जगह किसी दूसरे व्यक्ति का अंग प्रत्यारोपित करके व्यक्ति को पूरी तरह स्वस्थ बनाया जा सकता है। दूसरों को जीवन देने के लिए आज अनेक व्यक्ति मरणोपरांत अंग दान करते हैं, लेकिन जब अंगदान किसी जीवित व्यक्ति का करना पड़े, तो क्या गुज़रती होगी उसके जन्मदाताओं पर! सोचकर ही सिहरन होने लगती है। इसी सिहरन में डूबी कहानी है, “छोटा सा शीशमहल”.. कहानी पढ़ते हुए नायक और नायिका दोनों का दर्द परत दर परत खुलता जाता है। दर्द नायक का बड़ा है या नायिका का, यह फैसला पाठकों को स्वयं करना होगा।
 यूँ तो मज़ाक-मज़ाक में हम जाने-अनजाने न जाने क्या-क्या बोल जाते हैं, लेकिन “शब्द कभी मरते नहीं” कहानी बताती है कि कभी-कभी यूँ ही बोले गए शब्द भी स्मृति पटल पर इतने गहरे अंकित हो जाते हैं कि बरसों बाद भी उनकी वेदना हृदय से नहीं निकल पाती। “अतीत की आवाज़ हमेशा हमारी मौजूदा ज़िंदगी से टकराती रहती है।” प्रारंभ में मासूम सी प्रेमकथा लगने वाली यह कहानी अपने अंदर दर्द की गहरी टीस समेटे हुए है।
प्रवासी बच्चों की ज़रूरतों के लिए जब उनके अभिभावक उनके पास लंदन में रहने जाते हैं, तो वहाँ के सर्वथा भिन्न वातावरण में सामंजस्य बिठा पाना उनके लिए आसान नहीं होता। स्थितियां तब और भी बदतर हो जाती हैं जब बच्चे अत्यंत व्यस्त हों और वे अकेले हों। विदेश की ऊपरी चमक-दमक जल्द ही उबाऊ लगने लगती है। वे आत्मग्लानि से भरकर खुद को अपाहिज समझने लगते हैं। ऐसे अभिभावकों के प्रति संतान को उनके दायित्व का एहसास दिलाती हुई कहानी है, “परदेस में पतझड़”। इस कहानी के द्वारा लंदन में सीनियर सिटीजन को मिलने वाली मुफ्त सुविधाओं की भी अच्छी जानकारी दी गई है। ओएस्टर कार्ड, सिटीजन एडवाइस ब्यूरो जैसी सुविधाओं का वर्णन करते हुए लेखिका ने संकेत दिया है कि ऐसे प्रयास भारत में बुजुर्गों की स्थिति बेहतर बनाने में भी लाभप्रद हो सकते हैं।
जीवन पर्यंत अहंकार में डूबे व्यक्ति के अंतिम समय उसके हृदय में आने वाले अपराधबोध को शब्द देती कहानी है “अनकहा कुछ”। यह कहानी लंदन में मरणासन्न रोगियों के जीवन में खुशियों का संचार करने वाले “हॉस्पिस” की जानकारी देते हुए पाठकों में कौतूहल जगाती है। भारतीय पाठकों के लिए किसी मरणासन्न रोगी को इतनी सुविधाएं देने वाले हॉस्पिस का विवरण किसी अजूबे से कम नहीं है।
–“वहाँ मरीजों की हर सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाता है। भव्य बैठक में आरामदायक सोफे, टेलीविजन, भांति भांति की खेलें, चाय कॉफी की सुविधाएं सभी कुछ तो हैं। बिल्कुल घर जैसे। सबके लिए है।”(कहानी का एक अंश)
इस कहानी का अंत इतना मार्मिक हो गया है कि नायक के नितांत स्वार्थपरक होने की जानकारी होते हुए भी पाठकों को उससे सहानुभूति हो जाएगी।
हम भले ही समानता के कितने दावे करें, लेकिन समाज में लिंगभेद आज भी जारी है। स्त्री और पुरूष का यह टकराव तो सदियों से चला आ रहा है, लेकिन मामला तब और भी पेंचीदा हो जाता है, जब बात समलैंगिकता की हो। ट्रांसवेस्टाइट व्यक्ति शारीरिक रूप से पुरूष होते हुए भी स्त्री की वेशभूषा में रहना पसंद करता है, लेकिन उसका यह स्वाभाविक गुण समाज में सदैव उपहास का ही कारण बना है, अतः वह किसी से अपने दिल की बात नहीं कह पाता। क्या उसका सच जानने के बाद भी कोई उसकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा सकता है? भारतीय समाज के लिए आज भी ऐसे विषय बड़े जटिल हैं, लेकिन लेखिका ने इस कहानी के माध्यम से ऐसे व्यक्ति को आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखने और पाठकों को उसकी बात समझाने का मौका दिया है।
हर व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा छुपी होती है, जिसे उसके अभिभावकों का प्रोत्साहन मिले तो उसका व्यक्तित्व निखर जाता है, लेकिन जब अपनों द्वारा ही उसे हतोत्साहित किया जाए, तो उसे प्रतिभा-प्रदर्शन के लिए संघर्ष करना पड़ता है। ज्यादातर व्यक्ति इस संघर्ष से टूटकर बिखर जाते हैं, लेकिन कुछ जुझारू व्यक्ति हार नहीं मानते, येन केन प्रकारेण अपनी मंज़िल की राह तलाश ही लेते हैं। अपनी लेखन की प्रतिभा से अपने परिवार को चकित करने वाली मजबूत इरादों वाली महिला की कहानी है, “महकती बयार”। यह कहानी परिवार के प्रति समर्पित उन महिलाओं को राह दिखाती है, जो परिस्थितियों के विपरीत होने पर स्वयं को पराजित मानकर हताश हो जाती हैं। लेखिका ने इस कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया है कि यदि आज आप अपने लक्ष्य तक पहुंच पाने में असमर्थ हैं, तो भी अपने मन के भीतर दबी चिंगारी को बुझने न दें, बल्कि धैर्य और सूझबूझ से कदम बढ़ाते रहें, एक दिन वो चिंगारी, मशाल बनकर स्वयं दैदीप्यमान हो उठेगी।
जीवन में आगे बढ़ने के लिए आत्मविश्वास पहली ज़रूरत है। आत्मविश्वास से लबरेज व्यक्ति बड़ी ही आसानी से दूसरों की सराहना और विश्वास का पात्र बन जाता है, लेकिन जब ऐसा व्यक्ति दूसरों का विश्वास जीतकर उनका विश्वास तोड़ दे, तो?? “नकाब” कहानी में एक ही नायक, अनेक नायिकाओं के साथ विश्वासघात करता है और आपस में एकदूसरे से परिचित होते हुए भी उन्हें इस बात की भनक तक नहीं लगने देता। सच्चाई सामने आती भी है तो ऐसे मोड़ पर, जब सिवाय बर्दाश्त करने के और कुछ नहीं किया जा सकता।
संग्रह की अगली कहानी “अंधेरों के बीच” ऑटिज़्म बीमारी से पीड़ित ऐसी बच्ची की कहानी है, जिसका शरीर तो एडल्टहुड की ओर अग्रसर है लेकिन मानसिक रूप से वह बच्ची ही है। ऐसी बच्ची, जिसे अपने शरीर के प्रति अच्छे-बुरे की कोई समझ नहीं,  उसके प्रति स्नेह और धैर्य रखकर उसके भविष्य को अंधकारमय बनने से रोका जा सकता है, लेकिन जब उसके भोलेपन का लाभ उठाकर उसका शोषण किया जाए, तो उस बच्ची को न्याय कैसे मिले? रोंगटे खड़े कर देने वाली इस कहानी में हाइड्रो थेरेपी, एडल्ट ट्रेनिंग सेंटर जैसे उपचारों के बारे में बताया गया है, जो ऐसे बच्चों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। यह कहानी बताती है कि ऐसे बच्चे परिवार में रहते हुए भी कितने असुरक्षित होते हैं। जिस संवेदनशीलता के साथ लेखिका ने ऐसे बच्चे की पीड़ा को कहानी का रूप दिया है, वह अवश्य ही पाठकों की आंखें नम कर जाएगी।
भारतीय समाज विधवाओं के प्रति कितना क्रूर रवैया रखता है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पति की मृत्यु के बाद विधवा स्त्री को जीतेजी पति की चिता के साथ जलाकर मार डालने को सती प्रथा के नाम से महिमामण्डित किया जाता रहा है। भले ही 1829 से भारत में इसे गैरकानूनी घोषित करने के बाद से इस प्रथा पर रोक लगी है, लेकिन विधवाओं के प्रति आज भी समाज का रवैया उदार नहीं है। व्यर्थ की आशंकाओं से घिरे पुरातनपंथी लोग आज भी विधवा स्त्री को अनेक शुभ कार्यों से दूर रखते हैं। वे इस बात की तनिक भी परवाह नहीं करते कि उनका ऐसा व्यवहार एक स्त्री के आत्मसम्मान को कितनी बड़ी ठेस पहुंचाता होगा। ऐसे लोगों के साथ कैसी युक्ति से काम लेना चाहिए कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे, इस बात की सीख देती कहानी है “प्रतिरोध”।
“लानत है ऐसी पढ़ाई पर … जिसकी रोशनी में इंसान गलत परंपराओं और अंधविश्वासों को मानने से इंकार ना कर सके।” कहकर लेखिका ने आँख मूँदकर रूढ़ियों का निर्वाह करने वालों को कड़ी फटकार लगाई है।
 सामाजिक नियम समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन विडंबना यह है कि उन नियमों से बँधे रहने के लिए अक्सर व्यक्ति को अपनी स्वाभाविक इच्छाओं की बलि देनी पड़ती है। अपवाद भले ही मिल जाएं, लेकिन कमोबेश पुरुष प्रधान समाज में कुर्बानी की उम्मीद महिलाओं से ही की जाती है। लड़कियों को बचपन से ही ऐसा वातावरण मिलता है कि वे दूसरों के लिए जीने को ही अपने जीवन का लक्ष्य समझने लगती हैं। “उडारी” कहानी आत्मबोध के धरातल का वह यथार्थ है, जो नारी वर्ग के लिए सकारात्मक सोच रखता है और उनके लिए आनंद मार्ग भी खोलता है। हमारे भारतीय समाज में नारी को “देवी” का सात्विक आवरण ओढ़े रहना सिखाया जाता है, भले ही वह नारी रूप में कुंठित होती रहे। क्या ऐसा करना उसके स्वयं के प्रति अन्याय नहीं? उडारी कहानी नारी को स्वयं का अद्भुत साक्षात्कार कराते हुए आत्म-आनंद के साथ जीने का विस्तृत फलक देती है। यह कठोर यथार्थ पर मानवीय संवेदना और प्रेम की कहानी है। जज्बातों के उड़ान की कहानी है। अपनी भावनाओं और सामाजिक बंधनों में बंधी औरत की कहानी है, जो सांसारिक बंधनों को परे रख अपने पंख पसार कर खुले आकाश में उड़ जाना चाहती है।
अरुणा जी का सामान्य प्रसंगों को भी रोचक ढंग से लिखने का अंदाज कहानियों में नई जान डाल देता है। इस कहानी संग्रह “रॉकिंग चेयर” में अनेक साधारण प्रसंग भी उनकी लेखन शैली के कारण विशिष्ट लगने लगते हैं। उदाहरण के तौर पर–
“सुबह के सूरज की तिरछी फाँक ने कमरे में खेलते खेलते उसे जगा डाला।(उडारी)
“टूलिप्स, सफेद, डेज़ी लाल और पीला गुलाब वापिस उसकी तरफ ठीक वैसे ही देखते हैं, जैसे उसकी निगाह को पहचानते हों।”(इंग्लिश रोज़)
“होटल के अपरिचित पलंग पर पड़े, दोनों अपने अपने दुःख समेटे, सोने जागने की बारीक रेखा को एकदूसरे से छुपाते रहे।”(छोटा सा शीशमहल)
भावना गौड़ की कलम से - विविध भावों और संभावनाओं के झूले में झुलाती रॉकिंग चेयर 6
भावना गौड़
bhavana.gaur.888@gmail.com

1 टिप्पणी

  1. वाह भावना जी आपने प्रत्येक कहानी की विस्तृत समीक्षा की है ।अरुणाजी की कहानियां कुछ दिलचस्प, कुछ मार्मिक और कुछ मानवीय संवेदना भरी हैं, कई रंग नज़र आते हैं अरुणाजी की कथाओं में ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

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