Thursday, May 21, 2026
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पुरवाई के संपादकीय ‘कहर ढा रही है महंगाई की मार…!’ पर प्राप्त पाठकीय प्रतिक्रियाएं

पुरवाई के संपादकीय ‘कहर ढा रही है महंगाई की मार…!’ पर निजी संदेशों के माध्यम से प्राप्त पाठकीय प्रतिक्रियाएं

डॉक्टर सदानंद गुप्ता
यूरोप ने जो जीवन पद्धति अपनाई है और जो जीवन दृष्टि है उसका परिणाम भयावह होना ही है । पर यूरोप और अमेरिका की जीवन दृष्टि का फल शेष दुनिया को भी चखना पड़ रहा है।
सुधाकर अदीब
आपने इंग्लैंड की महंगाई और अर्थव्यवस्था का बहुत विस्तृत एवं यथार्थ खाका खींचा है। जबकि हमारे कांग्रेस के युवराज आप ही के यहाँ जाकर भारतवर्ष की बहुत ख़राब छवि पेश कर रहे हैं। यहाँ गरीबों को मोदी सरकार मुफ़्त अनाज दे रही है। 130 करोड़ की आबादी को मुफ्त कोविड टीकाकरण उपलब्ध कराने के अलावा। पेट्रोल डीज़ल की कीमत ज़रूर बढ़ी हुई थीं। परंतु GST से आमदनी में बढ़ोत्तरी होते ही सरकार ने पेट्रोल डीजल पर एक्साइज ड्यूटी कम करके पेट्रोल के दाम 9.5 ₹ प्रति लीटर और डीजल के दाम 7 ₹ प्रति लीटर कल से घटा दिए हैं और उज्ज्वला योजना के लाभार्थी गरीब लोगों को वर्ष में 12 सिलिंडर तक 200 ₹ प्रति सिलिंडर सब्सिडी भी लागू कर दी है। और उधर राहुल अपने वामी साथियों के साथ इंग्लैड की धरती पर जाकर अंडबंड बकता फिर रहा है।
अरुण सिंह
सम्पादकीय देखा। बहुत भयावह तस्वीर है यह तो। जिसे हम तुर्रम खां समझते हैं, वहाँ भी….. उफ्फ ! पूरी दुनिया पूरी रसातल में जा रही है। बहुत तथ्यों के साथ लिखा है आपने।
पूनम माटिया
तेजेन्द्र जी, आपने तथ्य- सम्पन्न संपादकीय लिख कर लंदन और अन्य यूरोपीय देशों की हालत से अवगत कराया जो वाक़ई भयावह और चिंताजनक है। ऐसी वैश्विक स्थिति में भी भारत की अर्थव्यवस्था सम्भली हुई है और आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की उपलब्धता है, यह बड़ी बात है जिसे रेखांकित किया जाना और समझना आवश्यक है। गर्म देश होने के कारण कम अज़ कम घरों को गर्म करने के लिए फ्यूल तो नहीं चाहिए होता साथ ही भारत सरकार की दूरदर्षिता के कारण स्थितियाँ नियंत्रण में हैं।
डॉक्टर सुषमा देवी
अत्यंत चिंताजनक स्थिति है, युद्ध ने हमेशा यही तस्वीर दिखाई है आदरणीय, फिर भी हम ये दोहराते हैं…
कीर्ति माहेश्वरी
कल मैं भी श्रीलंका के समाचार देखते हुए जब यही चिंता व्यक्त कर रही थी तो श्रीमान जी ने कहा था कि भारत की हालत भी पतली हो रही हैl… पर पश्चिमी देश भी इन्हीं समस्याओं से जूझ रहे हैं, आश्चर्य!
प्रगति टिपणिस, मॉस्को
आज का सम्पादकीय कितने सारे प्रश्न उठाता है। पहला प्रश्न तो युद्ध ही है। युद्ध किसी मसले का हल होता ही नहीं , पर क्या प्रतिबंधों के आक्रमण अस्त्रों के आक्रमण से कम आँकें जा सकते हैं? रूस ने अपने कुछ मुद्दों के लिए यूक्रैन पर युद्ध कार्रवाई की, जवाब में समूचे पश्चिमी जगत ने रूस पर प्रतिबन्ध लगाए। दोनों पक्षों के देशों में पिस आम जनता रही है और कुछ लोग इसमें अपनी जेबें गर्म कर रहे हैं। विश्व में स्थिति को बदलना होगा, कोई राष्ट्र या समूह पूरी दुनिया के लिए पुलिस बनकर नहीं रह सकते। आपसी आर्थिक निर्भरता की दुनिया में अब कोई भी राष्ट्र शायद खुद को दूसरे से बड़ा नहीं कह सकता।
डॉ तारा सिंह अंशुल
अभी-अभी पुरवाई का संपादकीय पढ़ा – “कहर ढा रही है महंगाई की मार”
पुरवाई के संपादक तेजेन्द्र शर्मा जी द्वारा ब्रिटेन में महंगाई पर हकीकत बयानी कर वास्तव में वैश्विक, समसामयिक मुद्दा उठाया है। बहुत अच्छा विषय चुना आप ने जो सीधे मनुष्य के रोज़मर्रा की जिंदगी जीने के लिए… उसके जीवन यापन से जुड़ा है ।
यकीनन, सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती महंगाई के फलस्वरूप ज़िंदगी में कितना दर्द, कितनी कठिनाइयां बढ़ती जा रही हैं।
कामोबेश विभिन्न देशों में, निःसंदेह पहले वैश्विक महामारी और अब रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से हर जगह बच्चों की अच्छी परवरिश, शिक्षा-दीक्षा, जीवन यापन कठिन होता जा रहा है।
यह संपादकीय आलेख जीवन से जुड़ा, बेहतरीन आलेख है। पुरवाई के इस संपादकीय के माध्यम से पाठक ब्रिटेन जैसे देश में बढ़ती महंगाई की हकीकत से रूबरू हुए। आपको हार्दिक बधाई शुभकामनाएं।
डॉक्टर ऋतु माथुर
आदरणीय तेजेंद्र जी,
दूर के ढोल सुहावने होते हैं, उक्ति को चरितार्थ करता आपका यह संपादकीय निश्चय ही बरतानिया समाज की वर्तमान वास्तविक परिस्थितियों को उजागर कर यह सिद्ध करता है, कि जहां आज हम अपने व पड़ोसी देशों की प्रत्येक स्थिति परिस्थितियों को लेकर तर्क-वितर्क करने में संलिप्त हैं, वहीं ब्रिटेन की वर्तमान स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है,कि हम जिस स्वप्नलोक को सत्य मानते हैं,वह वास्तविकता से कितनी अधिक भिन्न होती है।
आम आदमी विश्व के प्रत्येक कोने में आम आदमी ही रहेगा। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का ध्वस्त होना, सर्वप्रथम उस देश के आम जनता के जीवन को ही संकट पूर्ण बनाता है। आपके संपादकीय के उद्धरण युक्त इस अंक में ब्रिटेन व अन्य यूरोपीय राष्ट्रों की सामाजिक आर्थिक अर्थव्यवस्था की बखिया उधेड़ कर रख दी है,जिससे उभरी भयावह वास्तविकता वास्तव में चिंता का विषय है, क्योंकि कोई भी राष्ट्र अपने स्वस्थ,सकारात्मक, क्रियाशील बौद्धिक चेतना से संपन्न युवाओं पर भी निर्भर करता है, पर जहां बच्चों का ही भविष्य सुनिश्चित ना हो, उस राष्ट्र का भविष्य कैसे उज्जवल हो सकता है! यदि इन तमाम यूरोपीय देशों ने यूक्रेन रूस के मसले को अहम और शेखी की हवा ना दी होती और सौहार्दपूर्ण रूप से इसे सुलझाया होता तो बहुत मुमकिन है,कि हालात इतने बेकाबू न होते,किंतु इस प्रकार की उथल-पुथल की स्थितियों से निपटते हुए आशा है जल्द ही ब्रिटेन व अन्य यूरोपीय देश इस संकट से मुक्त होंगे, क्योंकि उठी पैंठ आठवें दिन ही लगती है!
मीरा गौतम
यह सम्पादकीय बेहद चिंतित कर देने वाला है.ब्रिटेन की इस हालत ने सकते में डाल दिया है.हम तो समझते थे कि ब्रिटेन हरी-हरी चुगता है.यही छाप पड़ी हुई थी मन पर. श्रीलंका के हाल ने रुला रखा था. अपने देश की बढ़ी हुई जनसंख्या चिंता का कारण बनी हुई है.उस आदरणीया सीनियर सिटीज़न महिला का दरबदर होना दुःख दे गया.ख़ुदा ख़ैर करे. सम्पादकीय में पारदर्शिता है.
डॉक्टर आरती स्मित
सरल सुबोध किंतु विचारणीय लेख ! भारत में लाखों मध्यवर्गीय जो (उच्च) से खिसककर निम्नवर्ग की क़तार में आ रहे, वृद्ध/ युवा / बच्चे कुपोषण भोग रहे और अपने स्तर को बनाए रखने के लिए लोग कोल्हू का बैल बने हैं, फिर भी अनिवार्य पूर्ति नहीं कर पा रहे, इस पीड़ा को शिद्दत से महसूस सकते हैं| श्रमिक वर्ग की बात ही क्या! पूरा विश्व एक अनदेखे आग की लपट झेल रहा है| ३०० गुना बढ़ती महँगाई की मार को क्या कहें!
निर्देश निधि
यह एक महत्वपूर्ण सम्पादकीय है।भारत ही नहीं महंगाई यूरोप में भी है।इस कदर कि लोग भूखे रहने को भी विवश हैं। जिन देशों को हम बहुत सम्पन्न समझते हैं यह उनका हाल है। आपने बहुत अच्छा लिखा। भारत ही नहीं दुनिया भर का यही हाल है।
धन्यवाद आपका पढ़वाने के लिए तेजेन्द्र जी। मेरी शुभकामनाएं आपको।
विनोद पाण्डेय
तेजेन्द्र सर, आपने ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों में बढ़ती मंहगाई पर इतना विस्तार से प्रकाश डाला कि मुझे भारत की मंहगाई कम लगने लगी l मैं समझता था ,मैं क्या बहुत लोग समझते हैं कि भारत में ही मंहगाई सबसे ज़्यादा है और सरकार कंट्रोल कर पाने में असक्षम है l
आपके इस लेख ने वैश्विक स्तर पर बढ़ती मँहगाई का जो वर्णन किया वो आँखें खोलने वाला है l
वाक़ई यह यह वैश्विक समस्या है पर दूर दूर तक इसका कोई निदान नहीं दिख रहा l शायद ख़र्चों में कटौती करके काम चलाया जा सकता है लेकिन ज़रूरत की चीजें तो चाहिए ही l
मुश्किल दौर है l
सामयिक और शोधपूर्ण आलेख l ब्रिटेन के विषय में भी बहुत कुछ जानने को मिला l
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