विशेष रिपोर्ट : “अंग्रेज़ी का प्रभाव तो अच्छा है मगर दबाव नहीं” – अमीश त्रिपाठी 3

(लन्दन – 13 अगस्त 2020 – कथा यू.के. संवाददाता)

आज कथा यू.के., और नेहरू सेन्टर (भारतीय उच्चायोग, लंदन) के साझा प्रयास से नेहरू सेन्टर लंदन के प्लैटफ़ॉर्म पर एक ज़ूम कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मेज़बान थे डॉ. अमीश त्रिपाठी (निदेशक नेहरू सेन्टर) एवं मुख्य अतिथि थे श्री विरेन्द्र शर्मा (सांसद)। 
कवि सम्मेलन की शुरूआत में कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी संस्था के अध्यक्ष श्री कैलाश बुधवार को श्रद्धांजलि अर्पित की और उनकी सेवाओं को याद किया। कैलाश जी का हाल ही में निधन हो गया था। उसके बाद मशहूर शायर राहत इंदौरी को भी याद किया गया जिनका निधन दिल का दौरा पड़ने से हो गया था। 
कवियों का स्वागत करते हुए नेहरू सेंटर के उप-निदेशक श्री बृज कुमार गुहारे ने प्रसन्नता ज़ाहिर की और कहा कि कथा यूके द्वारा की गयी यह पहल महत्वपूर्ण है कि कोविड काल में नेहरू सेन्टर के प्लैटफॉर्म पर कवि सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। 
नेहरू सेन्टर के निदेशक और मशहूर लेखक श्री अमीश त्रिपाठी ने कथा यूके और उसके महासचिव तेजेन्द्र शर्मा का धन्यवाद किया कि नेहरू सेन्टर में हिन्दी का इतना उल्लेखनीय कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि अपने परिवार में वे पहले व्यक्ति हैं जिनकी पढ़ाई लिखाई अंग्रेज़ी माध्यम से हुई, मगर उनके घर की भाषा हिन्दी ही है। उनका मानना है कि अंग्रेज़ी का प्रभाव तो अच्छा है मगर दबाव नहीं। उन्हें इस बात की ख़ास प्रसन्नता थी कि ज़ूम के माध्यम से यह कवि सम्मेलन पूरे विश्व में देखा जा रहा है। 
ब्रिटेन की लेबर पार्टी के सांसद एवं कथा यू.के. के मित्र श्री विरेन्द्र शर्मा का कहना था कि कथा यूके, नेहरू सेन्टर और भारतीय उच्चायोग इस बात के लिये बधाई के पात्र हैं कि भारत के 74वें स्वतन्त्रता दिवस के उपलक्ष्य में एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया है। यह ब्रिटेन के भारतीय समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिये महत्वपूर्ण कदम है। 
कवि सम्मेलन में भाग लेने वाले कवि थे तेजेन्द्र शर्मा (लंदन), ज़किया ज़ुबैरी (लंदन), पद्मेश गुप्त (ऑक्सफ़र्ड), निखिल कौशिक (वेल्स), जय वर्मा (नॉटिंघम), शिखा वार्ष्णेय, इंदु बारोठ, ऋचा जैन जिन्दल, आशुतोष कुमार, तिथि दानी, स्वाति पटेल, मिनी नारंग एवं तरुण कुमार (हिन्दी अताशे – भारतीय उच्चायोग)। बेहतरीन संचालन किया युवा कवि आशिष मिश्रा ने।
कवि सम्मेलन की शुरूआत करते हुए युवा कवयित्री स्वाति पटेल ने स्वतंत्रता की महत्ता समझाते हुए अपनी कविता में कहा – स्वतंत्रता है क़ीमती, स्वतंत्रता अमूल्य है / हैं कौन लोग जो इसे मुफ़्त का समझ रहे।
ऋचा जैन जिंदल ने प्रथम विश्वयुद्ध के भारतीय सिपाहियों को याद करते हुए अपनी कविता पढ़ी – क्या आप जानते हैं ब्राउन पॉपी के फूलों को / अपनी ही ज़मीन पर प्रतिबंधित / और गोरी मिट्टी में दफ़न हो चुके / साहस और निष्ठा के प्रतीक…
आशुतोष कुमार ने भारत के विश्वगुरू होने पर गौरवान्वित महसूस करते हुए पढ़ा – भारत हूँ आज़ाद हूँ मैं / विश्वगुरु का शंखनाद हूँ मैं / दुश्मनों से कभी भयभीत नहीं / सीने में उबलता फ़ौलाद हूँ मैं।
शिखा वार्ष्णेय ने भगवत गीता के बिम्ब का प्रयोग करते हुए आज के भारत में धर्म-युद्ध की याद दिलाई – गांडीव उठाओ पार्थ यह धर्म युद्ध है / अपने ही मोह को त्याग, बनना बुद्ध है।
इंदू बरोठ ने युवा पीढ़ी में राष्ट्रगान की महत्ता को दर्शाने वाली कविता पढ़ी – चलो मिलकर राष्ट्रगान गाए हम / स्वतंत्र भारत का उद्घोष लगाए हम।
मिनी नारंग ने बहुत ही संवेदनशील दो कविताएं सुनाईं। अपनी ही बनाई कलाकृतियों से बातें करते हुए मिनी कहती हैं – अपनी कल्पनाओं में मंद मंद मुस्काती हूँ / और जाने अनजाने में ढेरों बातें कर जाती हूँ।
नॉटिंघम की वरिष्ठ कवयित्री जय वर्मा जी लहू के रंग को स्वतंत्रता संग्राम में लाल हुई माटी के रंग से तुलना करते हुए अपनी कविता पढ़ी – लाल रंग होता है लहू का मगर माटी का लाल रंग देखा था कभी / पैरों में थी बेबसी की बेड़ियाँ, आज़ादी की चिंगारी जलाई थी कभी।
ब्रिटेन की आशान्वित करने वाली कवयित्री तिथि दानी ने अपनी ताज़ा तरीन कविता सीधे अपने मोबाइल से पढ़ते हुए सवाल किया – जाने कहाँ कहाँ लिए फिरती हो / तुम्हारी काया से लिपटी हुई साड़ी में / सूखा हुआ भारत…
अब बारी थी संचालक आशीष मिश्रा की। उन्होंने तरन्नुम में अपना गीत सुनाया – कैसे कविता पूरी कर दूँ बिन बोले मैं गांधी पर / झाँसी की रानी के साहस और सुभाष चंद्र की आंधी पर… 
वरिष्ठ कवयित्री ज़किया ज़ुबैरी जी ने अपनी भारत की यादों को ताज़ा करते हुए एक विरह गीत सुना कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। कवियों एवं फ़ेसबुक पर सुनने वालों ने एक मन से ज़किया जी के गीत की सराहना की – जाये बसे परदेस हो सैयां दिल को लागा रोग / कैसी कैसी बातें करते आसपास के लोग।
वेल्स के निखिल कौशिक ने अपनी प्रभावशाली आवाज़ में अपनी कविता के माध्यम से भारत देश के मन की बात समझाई – मैं भारत हूँ जो आज / सुनों वही भारत था वर्षों पहले / वर्षों से भी वर्षों पहले / सदियों से भी सदियों पहले। निखिल कौशिक की कविता को विशेष रूप से पसन्द किया गया।
ब्रिटेन के महत्वपूर्ण कवि ऑक्सफ़र्ड से पद्मेश गुप्त ने समयाभाव के कारण बस एक मुक्तक और एक कविता का पाठ किया। दरअसल सभी श्रोता उनसे लंबे कविता पाठ की अपेक्षा लगाए बैठे थे। पद्मेश जी का कहना था – फूलों में फूलों सा महकना है / तो काटों में काटों से उलझना ही पड़ेगा / चंदन की धरती पर जन्म लिया है हमने / सापों से मुक़ाबला तो करना ही पड़ेगा।।
भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी तरुण कुमार ने आज के हालात पर टिप्पणी करते हुए अपनी कविता पढ़ी – माना घनघोर अंधेरा है / चहूँ ओर तिमिर का डेरा है / विपदा यह कैसी आई है / हर ओर मायूसी छाई है।
कवि सम्मेलन की अंतिम रचना रही तेजेंद्र शर्मा की ग़ज़ल जिसमें उन्होंने अपनी जन्मभूमि भारत से लगभग माफ़ी मांगते हुए कहा – शान में तेरी अब मैं गीत नहीं गाता हूँ / अब तो जीवन में बस बुराई देख पाता हूँ।
कवि सम्मेलन में ब्रिटेन के वरिष्ठ साहित्यकार दिव्या माथुर और आलोचक एवं अध्यापक अरुणा अजितसरिया भी मौजूद रहीं।
अंत में तेजेन्द्र शर्मा ने सभी कवियों, नेहरू सेंटर, भारतीय उच्चायोग, विरेन्द्र शर्मा सांसद एवं फ़ेसबुक से जुड़े तमाम श्रोताओं को धन्यवाद कहा। और उनका मानना था कि यह कवि सम्मेलन कथा यूके द्वारा ब्रिटेन के कवियों की युवा पौध को विश्व भर के सुधि श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करने का एक प्रयास है। भविष्य में भी ऐसे प्रयास होते रहेंगे। 

4 टिप्पणी

  1. कथा यू के ,नेहरू सेंटर और भारत के उच्चायोग के सम्मलित
    प्रयासों से एक गरिमामय आयोजन था जिसे विश्व मे देखा गया।
    आयोजन कर्ताओं को साधुवाद ।

  2. शान में तेरी अब मैं गीत नहीं गाता हूँ…
    अहा! पीड़ा एक लेखक की, जो भारत अपने ह्रदय में बसाए रखता है। जिस लगन और जोश एवं ईमानदारी के साथ कथा UK हिंदी साहित्य की सेवा में रत है, ये केवल कोई साधक ही कर सकता है। आपकी पूरी टीम को प्रणाम

  3. काश ऐसा होता कि अंग्रेजी का प्रभाव बिना दबाव के होता :——
    [वैश्विक हिंदी सम्मेलन ] ​अंग्रेजी माध्यम की विवशता और शुभम की आत्महत्या वैश्विक संगोष्ठी भाग -3, झिलमिल में श्रीमती लीना मेंहंदले रचित – भास्वती सरस्वती

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