स्त्री विमर्श प्रायः मध्य वर्गीय स्त्री को केंद्र में रखकर उसके दैहिक व आर्थिक स्वतंत्रता की बात करता है। कुछ विद्वान स्त्री विमर्श का प्रारंभ सिमोन द बुआ की पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स‘ (1949) तो अन्य मैरी एलमान की पुस्तक ‘थिकिंग एबाउट वीमन (1968) से मानते हैं। भारत में नारीवादी आंदोलन का प्रारंभ नवजागरण से हुआ।
पं.रमाबाई , तारा बाई शिंदे, सावित्रीबाई फुले आदि ने स्त्री स्वतंत्रता व समानता की बात की। पं.रमाबाई ने अपनी पुस्तक ‘स्त्री धर्म नीति‘(1882), ‘द हाइ कास्ट हिन्दु विमेन‘(1883) में पितृ सत्ता का विरोध व स्त्री स्वावलंबन स्वतंत्रता व शिक्षा पर अपने विचार लिपिबद्ध किए। ज्योतिराव फुले का मानना था कि समाज तभी शिक्षित व विकसित होगा जब उसमें रहने वाली स्त्रियां शिक्षा का लाभ ले सकेंगी। अतः उन्होंने व उनकी धर्म पत्नी सावित्रीबाई फुले ने नारी की स्थिति में सुधार लाने के लिए ‘महिला सेवा मंडल ‘की स्थापना की और 1848-1952 तक अठारह पाठशालाएं खोलीं और 1855 मे रात्रि पाठशाला भी खोली जिससे अधिक से अधिक स्त्रियां शिक्षा प्राप्त कर सकें। ताराबाई शिंदे ने अपनी पुस्तक ‘स्त्री पुरूष तुलना‘ में लिंगाधारित भेदभाव का विरोध किया और स्त्री की सामाजिक स्थिति का यथार्थ अंकन किया।
विकासकालीन ( संवत् 1981- 2004 ) प्रमुख कथा लेखिकाओं में सुभद्रा कुमारी चौहान, उषा देवी मित्रा , महादेवी वर्मा , कमला चौधरी , शिवरानी देवी , सुमित्रा कुमारी सिन्हा , चन्द्र किरण सौनरेक्सा, कमला त्रिवेणी शंकर , तेजरानी पाठक , तारा पांडे आदि का नाम समादर से लिया जाता है।
1920 मे पेशावर,पाकिस्तान में जन्मी चन्द्र किरण ने आदमखोर, जवान मिट्टी, कहीं से कहीं नहीं, और दिया जलता रहे कृतियों में तत्कालीन समाज की समस्याओं (विशेष रूप से स्त्री संबंधी ) को लिपिबद्ध किया है।
शोधालेखः
श्रीमती चन्द्र किरण सौनरेक्सा का जन्म 1920 में पेशावर में श्री रामफल मांगलिक के घर में हुआ । नवीं कक्षा के उपरांत घर पर रहकर ही इन्होंने प्रथमा , विशारद, साहित्य रत्न आदि की परीक्षाएं उत्तीर्ण की तथा बंगला , गुजराती तथा उर्दू का ज्ञान अर्जित किया । उनके पति श्री कांति चंद्र सौनरेक्सा भी हिंदी के प्रसिद्ध लेखक , आलोचक एवं उत्तर प्रदेश के डिप्टी कलेक्टर थे । श्रीमती चन्द्र किरण सौनरेक्सा ने 11 वर्ष की अल्पायु से ही लिखना आरंभ कर दिया था । इनकी पहली कहानी ‘घीसू चमार ‘ 1931 में ‘विजया‘ पत्रिका में प्रकाशित हुई । इन्होंने 400 से अधिक कहानियों का सृजन किया जो समय–समय पर विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई। कुछ कहानियां बंगला , मराठी और रुसी भाषाओं में अनुदित की गई । उनकी कहानियों का एक मात्र संग्रह ‘आदमखोर‘ है जिसमें इनकी ‘गृहस्थी का सुख‘, ‘छलिया‘ , ‘अकीला ‘, ‘ चाय में नींबू ‘, ‘रुपया ‘, ‘जीजी ‘, ‘ मर्द ‘,’ कमीनो की जिंदगी में ‘, ‘ बेजुबां ‘, ‘ दो रोटियां ‘,’ परंपरा ‘ आदि कहानियां संकलित हैं । इस कृति पर हिंदी साहित्य सम्मेलन ने इन्हें ‘सेक्सरिया पुरस्कार ‘ से सम्मानित भी किया था। 1950 से लंदन विश्वविद्यालय की स्नातक कक्षाओं में इनकी कहानियां पढ़ाई जा रही हैं ।
‘आदमखोर ‘ संग्रह की पहले कहानी को चेकस्लोवाकिया की साहित्य अकादमी ने एशिया –अफ्रीका की सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित किया था। ‘ तरुण ‘, ‘कहानी‘, ‘ महिला‘, ‘वीणा ‘ आदि पत्रिकाओं में इनकी ‘टोटका‘, ‘ दूसरा बच्चा‘, ‘सुभद्रा‘, ‘ दीवारें ‘, धर्म मरा राष्ट्र जीया‘, ‘सौत‘ , ‘ बर्थडे ‘ , ‘ आदि कहानियां प्रकाशित हुई। (1) यद्यपि विषय की दृष्टि से इनकी रचनाओं को पारिवारिक, सामाजिक , राजनीति, ऐतिहासिक तथा पौराणिक वर्गों में विभाजित किया जा सकता है तथापि एक वर्ग की कहानियों में अन्य वर्गों की रचनाओं की विशेषताएं सम्मिलित मिलती हैं ।
चंद किरण जी ने नियमित रूप से कहानी लेखन का प्रारंभ 1937-1938 से कर दिया था। अपनी रचना प्रक्रिया के विषय में उनका अभिमत है -” सन् सैंतीस अड़तीस से नियमित रूप से लिखने लगी । अपने आसपास के दायरे में जब जहां भी व्यक्ति के प्रति व्यक्ति का अथवा समाज का अन्याय दृष्टिगत होता वहां ही अश्वत्थामा के प्रण की तरह जो विचलन अंदर से उठती थी उसे प्रकट करने का एकमात्र उपाय लेखनी से उस शोषित जीव के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करना ही था। ” ( 2) इन्होंने अर्थ के विषम विभाजन के फलस्वरुप उत्पन्न वर्ग भेद –धनी और निर्धन तथा उसके कारण उत्पन्न वैषम्य को अपनी कहानियों का वर्ण्य विषय बनाया है। धनाढ्य व्यक्तियों द्वारा धन के अपव्यय एवं सर्वहारा वर्ग के शोषण तथा निम्न एवं निम्न मध्यवर्ग के नरकतुल्य जीवन पर उन्होंने व्यंग्यात्मक दृष्टि डाली है । डॉ. प्रभाकर माचवे के मतानुसार -” भारतीय जीवन की टूटती हुई ‘गिरस्ती‘ , नारी की तकलीफों और आर्थिक विषमता की रस्साकशी में जीवन का आधि–व्याधि जर्जरित होना यह सब बहुत ही यथार्थ रूप लेकर उनकी कहानियों में उतरा है ।“(3)
‘ आदमखोर‘ कहानी बेजुबां सर्वहारा वर्ग के अभावग्रस्त जीवन की तुलना में धनिक शोषकों के जीवन की झांकी प्रस्तुत करती है । परिस्थितियों से प्रताड़ित होकर आदमखोर अपनी कोमल भावनाओं को खोकर एक नर पिशाच में परिवर्तित हो जाता है । ‘परंपरा ‘ एक श्रमिक के ध्वस्त सपनों की मार्मिक कथा है। वह अपने पुत्र को ऊंची शिक्षा दिलाने और सभ्य नागरिक बनाने की आकांक्षा करता है किंतु परिस्थितियों की प्रतिकूलताएं उसके सपनों को चूर– चूर कर देती हैं । लेखिका ने स्पष्ट किया है कि यह केवल एक श्रमिक की व्यथा ना होकर परंपरा से चलती आई त्रासदी है जो इसी प्रकार चलती रहेगी । ‘ रुपया ‘ रचना में अर्थ लोभी एवं अवसरवादी व्यक्तियों की वास्तविकता को व्यंग्य के माध्यम से उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है ।उदाहरणार्थ ‘ रुपया ‘ कहानी मे कुलीन तथा स्वार्थी लोगों पर तीखा व्यंग्य किया गया है। ‘चाय में नींबू‘ कहानी में शारीरिक अक्षमता की तुलना में ग्रामीण स्त्रियों की परिश्रम शीलता और सहन शक्ति को रेखांकित किया गया है । ‘जीजी ‘और , ‘बर्थडे में आधुनिक सभ्यता पर व्यंग्य है। ‘ ‘टोटका‘ कहानी ग्रामीण स्त्रियों के अंधविश्वास की खिल्ली उड़ाती है । ‘ इकलाई ‘ कहानी में द्वितीय महायुद्धोपरांत सुरसा– सी बढ़ती महंगाई के कारण अभावग्रस्त निम्न मध्यवर्गीय परिवारों का मार्मिक चित्रण है।
निर्धनता और परिवारिक क्लेश अनेक समस्याओं को जन्म देती हैं। प्रायः ऐसे परिवारों में पति क्रोधी , शंकालु और दुर्व्यसनी होते हैं । अपनी कुछ ना कर पाने की असमर्थता के आक्रोश को वे पत्नी को मार–पीट कर , गाली– गलौज कर उतारते हैं । ‘कमीनों की जिंदगी में ‘ कहानी में एक मध्यवर्गीय परिवार की गृहिणी कुसुम की त्रासदी वर्णित है। मद्यप , शंकालु दृष्टि वाले पति की डांट– फटकार , मार, मायके ना जाने देने की जिद्द उसकी जिंदगी को कड़वाहट से भर देती है। लेखिका ने कलुआ भंगी और उसकी पत्नी बसंती की कथा समानांतर रूप में प्रस्तुत कर स्त्रियों को आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी बनने की प्रेरणा दी है। कलुआ शराबी , कबाबी , दुराचारी है जो अपनी पत्नी को मारता– पीटता रहता है । बसन्ती अधिक समय तक कलुआ की उद्दंडता सहन नहीं करती क्योंकि वह आर्थिक रूप से पति पर निर्भर नहीं है। वह उससे बराबरी से लड़ती है और घर छोड़कर चली जाती है । वह हरिया से ब्याह कर दूसरा घर बसा लेती है। उसकी जिंदगी कुसुम से कहीं बेहतर है जो कुलीन होने के कारण बसंती जैसा आचरण नहीं कर पाती। वह उसी घर में रहती , अत्याचार सहती, घुल घुलकर मर जाना चाहती है । ‘दो रोटियां ‘ कहानी में मध्यवर्गीय परिवार की नववधु सारे दिन घर के काम में पिसती रहती है जिसका दूसरों की दृष्टि में कोई मूल्य नहीं है। उसकी नियति ‘कमीनो की बस्ती में ‘ की कथा नायिका कुसुम की भांति घुल– घुलकर मरना है।
कुछ कहानियों में लेखिका ने निर्धनता के साथ ही अवैध संबंध, अनमेल विवाह, बहुविवाह, रुढियों परम्पराओं के प्रति अविश्वास , विधवाओं की समस्या को भी विवेचित किया है। उन्होंने इसके लिए अशिक्षा , अर्थ , लोभ और नारी के आर्थिक परावलम्बन को कारक माना है। पुरुषों के अतिरिक्त परिवार और अन्य कुटुंब जनों का व्यवहार भी कम दोषी नहीं होता । ‘दूसरा बच्चा‘ कहानी में गुलाबी को अर्थाभाव के कारण भिक्षावृत्ति अपनानी पड़ती है । उसे एक बच्चे के साथ भीख मांगते देख वीरेश्वर उसकी यह कहकर भर्त्सना करता है कि ‘उसे बच्चा पैदा करने की क्या जरूरत थी‘ वही अवसर मिलते ही उसकी दुरावस्था का अनुचित लाभ उठाते हुए उसका यौन शोषण कर दूसरे बच्चे की मां बना देता है। परिस्थिति की गंभीरता समझते ही वह वहां से भाग जाता है । स्पष्ट है कि उसे किसी प्रकार का अपवाद सहना नहीं पड़ता । भिखारिन ही कलंकित होती है। वह ही दोनों बच्चों के पालन– पोषण का दायित्व उठाती है । ‘अकीला‘ कहानी की नायिका अकीला पति की अनुपस्थिति में परपुरुष से अनैतिक संबंध रखती है। यद्यपि उसका पति उसे क्षमा करने के लिए तैयार हो जाता है किंतु उसकी अवैध संतान को स्वीकार नहीं कर पाता। अकीला कथान्त में क्षयरोग से ग्रस्त हो प्राण त्याग देती है।
‘धर्म मरा राष्ट्र जीया‘ कहानी की नायिका राष्ट्र विभाजन के समय परिवार से बिछड़ जाती है और आतताईयों की हवस का शिकार बनती है। जब वह किसी प्रकार घर लौटने में सफल होती है तो परिवार वाले उसे स्वीकार नहीं करते हैं। इस कहानी में नायिका दोषी नहीं है किंतु पुरुष समाज उसे ही दंडित करता है। उक्त रचना के विपरीत ‘मर्द‘ कहानी का सत्येंद्र सही अर्थों में एक पुरुष है। कुंभ मेले में खोई पत्नी के गुंडों से बचकर घर लौटने पर वह परिवार के विरोध के बाद भी उसे अपनाता है । ‘गृहस्ती का सुख‘ कहानी में निर्धनता के साथ ही बहु विवाह एवं अनमेल विवाह की समस्या विवेचित की गई है । सैंतीस वर्षीय विवाहित शिव सहाय अपनी पहली पत्नी को सुंदर और स्वस्थ होते हुए भी केवल इसलिए त्याग देता है क्योंकि वह बांझ है । वह अपनी माता के हठ और स्वयं गृहस्थी सुख की लालसा से तेरह वर्षीय मातृ पितृहीना लक्ष्मी से विवाह कर देता है । लक्ष्मी प्रत्येक वर्ष एक बच्चे को जन्म देकर आठ बच्चों से शिवसहाय की गृहस्थी को तो भरा पूरा कर देती है किंतु स्वयं पौष्टिक आहार, उचित देखरेख के अभाव में रोग ग्रस्त हो मृत्यु को प्राप्त हो जाती है । उसकी संतानों में भी केवल चार ही जीवित रहती हैं और वे भी भरपेट भोजन ना मिलने के कारण दुर्बल और अस्वस्थ रहती हैं। ‘सौत‘ तथा ‘ सुभद्रा ‘ कहानियों में भी धनाभाव , बाल एवं अनमेल विवाह की समस्याओं को उठाया गया है । ‘सौत‘ कहानी की चौदह वर्षीय अल्हड़ , शरणार्थी बालिका मोतिया के जीवन की सारी मस्ती और प्रसन्नता एक वृद्ध की परिणिता बनते ही समाप्त हो जाती है। ‘ सुभद्रा ‘ कहानी में सुभद्रा अनाथ बालिका है। उसके मामा –मामी हर प्रकार का अत्याचार करते हैं। वे धन के लोभ में उसका एक वृद्ध से विवाह करने के लिए तैयार हो जाते हैं। सुभद्रा , ‘सौत‘ कहानी की मोतिया से इस दृष्टि से भिन्न है कि वह न केवल वृद्ध से विवाह करने से मना कर देती है बल्कि अनेक कष्ट सहने के उपरांत अपने लिए योग्य वर के मिलने पर ही उससे विवाह कर अपने जीवन को बिखरने से बचा लेती है। लेखिका के अनुसार पुरुष का अहंकार इतना प्रबल होता है कि वह पत्नी को अपनी क्रीत दासी समझकर अनावश्यक अधिकार जमाने की चेष्टा करता है। ऐसे में यदि उसे परिवार के अन्य लोगों का सहयोग मिल जाए तो फिर ‘ सोने में सुहागा ‘ की कहावत चरितार्थ होती है । संयुक्त परिवारों में सास, दादी, ननद , जेठानी आदि नई बहू पर रौब जमाना अपना हक समझते हैं। निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में प्रायः ये वृद्धाएं अशिक्षित , रुढिग्रस्त और अन्धविश्वासी भी होती हैं जिसका दुष्परिणाम बहू को झेलना पड़ता है । इस दृष्टि से ‘दो रोटियां‘,’इकलाई‘,’ परंपरा ‘, ‘अफसर का बेटा‘ कहानियां उल्लेखनीय हैं। ‘गिरती दीवारें‘कहानी में विधवा समस्या को निर्धनता के साथ जोड़कर विवेचित किया गया है । विधवा होने के पश्चात विमला के परिवार वाले उसके और उसकी पुत्री शीला के साथ दुर्व्यवहार करते हैं जिससे मुक्त होने के लिए वह दूसरों के कपड़े सिलकर अपनी जीविका का उपार्जन करती है। विमला , ‘सुभद्रा ‘कहानी की सुभद्रा के समान साहसी और दृढसंकल्पित है। दूसरों के कपड़ें सिलना उसकी सास को पारिवारिक मर्यादा के विपरीत लगता है किंतु विमला की दृढता के आगे उन्हें झुकना पड़ता है । ‘गृहस्थी का सुख‘ कहानी में आठ संतानों के हो जाने के उपरांत भी लक्ष्मी की सास उसका ऑपरेशन नहीं कराने देती। लेखिका ने ऐसी स्त्रियों पर तीखा व्यंग्य किया है । श्री शिवदान सिंह चौहान ने लेखिका की कहानियों के संदर्भ में स्वमत व्यक्त करते हुए लिखा है-” चंद्र किरण जी की प्रतिभा मानव जीवन का स्वभाविक चित्रण करने के रूप में प्रस्फुटित हुई है। मनुष्य का स्वभाविक जीवन भी एक सागर के समान अथाह और प्रकृत शक्ति का पुंज है। जैसे सागर की प्रत्येक हलचल, तरंगों के उठने और फिर पछाड़ खाकर गिरने में ,उसके निर्घोष और शांति में ,अनंत शक्ति और अपार आवेग में प्रतिभासित होती है, उसी प्रकार मनुष्य के सामाजिक जीवन की हलचलें , उसके राग –द्वेषों की प्रतिक्रियाये़ं शक्तिमय और आवेशपूर्ण होती हैं। चंद्रकिरण जी की कहानियों की श्रेष्ठता इसी में है कि उनमें मानव जीवन का ऐसा ही स्वाभाविक और शक्ति पूर्ण चित्रण मिलता है । “( 4)
लेखिका की पात्र योजना में अधिकांश निम्नमध्यवर्गीय स्त्री पुरुष हैं जो संपूर्ण जीवन अभाव में जीते हैं। अनवरत चलने वाला संघर्ष उन्हें जर्जर , रुग्ण और असमय काल का ग्रास बना देता है। उनके पुरुष पात्र विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा उनमें उस वर्ग की विशेषताएं मिलती हैं। यथा ‘गृहस्थी का सुख‘ का शिव सहाय ,’दो रोटियां ‘का रामेश्वर ; ‘जीजी‘ का गिरीश और ‘इकलाई‘ का बिसेसर निम्न मध्यवर्गीय सामान्य गृहस्थ हैं अतः इनमें निष्क्रिय प्रवृत्तियों का बाहुल्य है। ‘ आदमखोर ‘में जीवन ;’परंपरा‘ में रघु तथा घसीटा शोषित सर्वहारा वर्ग के प्रतीक हैं । इन सब में उच्च शिक्षा प्राप्त कर सभ्य नागरिक बनने की लालसा है किंतु प्रतिकूल परिस्थितियां उनके सपनों को चूर –चूर कर उन्हें कुमार्गगामी बना देती हैं। ‘कमीनों की जिंदगी में ‘ की कुसुम और बसंती के पति तथा ‘दूसरा बच्चा ‘ का वीरेश्वर दुराचारी पात्र हैं किंतु ‘मर्द‘कहानी में सत्येंद्र; ‘धर्म मरा राष्ट्र जीया‘ का शंकर : ‘अकीला‘कहानी का अख्तर आदर्श पात्र हैं। इनमें अन्याय के विरुद्ध लड़ने का आत्मबल है। यद्यपि ‘धर्म मरा राष्ट्र जीया‘ में शंकर पत्नी को अपना नहीं पाता तथा ‘अकीला‘ में अख्तर अवैध संतान को संरक्षण नहीं देता किंतु उनके इस आचरण को अमानवीय नहीं कहा जा सकता। राष्ट्र विभाजन के पश्चात शिविरों में रह रहीं अनेक स्त्रियों की कहानी शंकर की पत्नी से मिलती है जिसके पीछे तदयुगीन सांप्रदायिक द्वेष कारण बना है। आज भी अनेक ऐसे व्यक्ति मिल जाएंगे जो किसी की अवैध संतान को नहीं अपनाना चाहते । यहां तक कि निःसंतान दम्पति भी अनाथालय से बच्चा गोद लेने में हिचकते हैं । ‘बर्थडे ‘ का बृजकिशोर कुलीन वर्ग का होने के कारण मिथ्या प्रदर्शन में विश्वास रखने वाले अहंकारी युवकों का प्रतीक है । ‘रुपया ‘कहानी का हरिशंकर स्वार्थी , अर्थ लोलुप व्यक्ति है जो धर्म की आड़ में अपनी स्वार्थ पूर्ति करता है । वह आधुनिक युग के पाखंडी बाबाओं का प्रतिनिधित्व करता है।
चंद्रकिरण सौनरेक्सा जी के नारी पात्र उनके पुरुष पात्रों की अपेक्षा अधिक विवश हैं । ‘गृहस्थी का सुख‘ की लक्ष्मी ; ‘मर्द ‘ की सुशीला ; ‘बेजुबां ‘ की नंदी ; ‘दो रोटियां ‘की उमा ;’आदमखोर‘ की मुनिया ;’सौत ‘ की मोतियां और ‘दूसरा बच्चा ‘की गुलाबी का पूरा जीवन संघर्ष करते व्यतीत होता है । वे अत्यंत त्रासद जीवन जीती हैं तथा घुल –घुलकर एक दिन मर जाती हैं। उनके नारी पात्रों में एक वर्ग ऐसा भी है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विचलित न होकर उन्हें अपने अनुकूल बनाता है । साहस पूर्वक जीवन को व्यवस्थित कर आत्मनिर्भर जीवन जीता है । ‘सुभद्रा‘ कहानी की सुभद्रा ; ‘गिरती दीवारें‘ की विमला ; ‘कमीनों की जिंदगी ‘ की बसंती ऐसी ही स्त्रियां हैं । लेखिका ने हिंदू परिवारों की अशिक्षित बुजुर्ग स्त्रियों –सास ,दादी ,मौसी , बुआ , ननंदादि को उनकी वर्गीय विशेषताओं सहित लिपिबद्ध किया है । ‘गृहस्थी का सुख‘ में लक्ष्मी की सास;’ दो रोटियां ‘ ‘में उमा की सास और ननद ;’गिरती दीवारें ‘ में विमला की सास रूढ़िवादी निष्ठुर स्त्रियां हैं। लक्ष्मी की सास आठ बच्चों के होने के बाद भी लक्ष्मी का ऑपरेशन नहीं करने देती परिणाम स्वरूप लक्ष्मी को अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है । समुचित पौष्टिक आहार के अभाव में उसके चार बच्चे मर जाते हैं और शेष कुपोषण का शिकार हो रोगी और चिड़चिडे हो जाते हैं । ‘गिरती दीवारें‘ में विधवा विमला की सास रूढ़िवादी है। वह विमला और उसकी पुत्री पर होने वाले अत्याचार को तो रोक नहीं पाती पर विमला को दूसरों के कपड़े सिलते देखकर अपने कुल –परिवार की मर्यादा नष्ट होने का रोना रोती रहती है।‘ दो रोटियां ‘ कहानी में उमा की सास उस से सारा घर का काम करा कर भी संतुष्ट नहीं होती । ‘जीजी ‘ में सुरेखा की वृद्धा ननंद को भाभी के व्यंग्य बाणों से निरंतर आहत होना पड़ता है । ‘ इकलाई ‘ में बिसेसर द्वारा पत्नी के लिए तीन रुपये की इकलाई धोती लाना भी उसकी वृद्धा मौसी और बुआ को सहन नहीं होता । लेखिका की पात्र सृष्टि के वैविध्य , सजीवता और यथार्थता का रहस्य भी यही है कि वे सभी वर्गीय पात्र हैं । श्री विष्णु प्रभाकर ने इस संदर्भ में अपना अभिमत व्यक्त करते हुए कहा है-” किरण की शैली में कोई उलझन नहीं है । उनकी कहानियां एकदम सुलझी हुई हैं । उनमें जो चित्र प्रस्तुत किए गए हैं, वे व्यक्ति के चित्र ना होकर समस्त समाज के हैं अर्थात उनके पात्र विशिष्ट श्रेणी से संबद्ध नहीं बल्कि सर्वसाधारण का प्रतिनिधित्व करते हैं । वह व्यक्तिवादी नहीं हैं। उनकी रचनाओं में मानव मात्र का सुख– दुःख और आकर्षण –विकर्षण प्रतिध्वनित होता है । साथ ही उनकी रचनाओं में उपदेशक की मनोवृति का भी सर्वथा अभाव है ।“( 5)
लेखिका की कहानियों की संवाद योजना सोउद्देश्य है। वह कथा विकास में सहायक , पात्रों के मनोभावों की व्यंजक तथा देश काल में यथार्थता और सजीवता की सृष्टि करने वाली है । अधिकांश संवाद सरस और संक्षिप्त हैं। ‘दो रोटियां‘ कहानी में सास , बहू और ननद का वार्तालाप उद्धरणीय है–
“बहू अरी ओ बहू।“
“जी, मै गुसलखाने में हूँ“-जल्दी जल्दी भीगी देह को बिना पोछें ही धोती लपेटते हुए गुसलखाने के भीतर से उमा ने उत्तर दिया।
“बेगम गुसल कर रही हैं।“श्यामा ने मां की पुकार के उत्तर में कहा-“हुक्म दे गई है कि मेरे आने से पहले लड़के को नहला धुलाकर ,काजल तेल लगाकर, लैंस कर दो।“
“ओहो!”सास ने चमककर कहा,”कोई उसके बाप का नौकर बैठा है जो नहला धुला देगा। अरी बहू,क्या तेरा नहाना अभी तक नहीं निपटा?” (6) वार्तालाप करते हुए पात्रों के हाव भाव , मुख मुद्राएं और क्रियाएं भी बदलती जाती हैं । उनकी प्रतिक्रियाओं और चेष्टताओं में उल्लेख से संवादों में सजीवता आई है । संवाद पात्रानुकूल हैं। बच्चों के संवादों में तोतलापन है तो पश्चिमी सभ्यता के अनुयायी पात्र अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग विदेशी तरीके से करते हैं। अशिक्षित पात्रों के संवाद रुक्ष हैं । “ऐसे सीधे के मुंह पर सात झाड़ू और हुक्के का पानी “जैसे वाक्य और गालियों( सूअर, हरामी ) की भरमार मिलती है । पंजाबी पात्र –कुड़ियां , भैन जी , माहिया, कित्थे जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। समाज के निम्न मध्यवर्ग की दुरावस्था अभावग्रस्त पशुवत जीवन का चित्रण और उनमें भी निरीह, विवश, यातनापूर्ण जीवन जीती स्त्रियों के सजीव चित्र लेखिका की रचनाओं में मिलते हैं । समाज में प्रचलित अवैध संबंधों , बाल– अनमेल विवाह , विधवाओं की दुर्दशा , धनिको द्वारा शोषण, सर्वहारा वर्ग का संघर्षमय जीवन और अशिक्षित निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में विशेष रूप से स्त्रियों की रुढिग्रस्तता , अंधविश्वास , उच्च कुलीन वर्ग की धनलिप्सा, अपव्यय , मिथ्या प्रदर्शन , अहंकार , आदि का सजीव चित्रण किया है ।‘धर्म मरा राष्ट्रीय जी,’सौत ‘ कहानियों में स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत होने वाले राष्ट्र विभाजन, के परिणामस्वरूप होने वाले सांप्रदायिक दंगों , हिंसात्मक वारदातों , शरणार्थी समस्या का अंकन भी लेखिका ने किया है। ‘इकलाई‘ कहानी में द्वितीय महायुद्ध कालीन महंगाई और निर्धनता का यथार्थ अंकल मिलता है ।
निष्कर्षतः लेखिका की कहानियों का अनुशीलन करने के उपरांत कह सकते हैं कि उनकी रचनाएं सामाजिक विकृतियों का प्रबल विरोध करती हैं। लेखिका ने समस्याओं का अंकन तो किया है किंतु कोई ठोस सुझाव नहीं दिए हैं। उनके पात्रों के विद्रोही स्वर और आचरण ही जनता में आती जागरूकता को अभिव्यक्त करते हैं । श्री रामगोपाल सिंह चौहान ने लिखिका की रचनाओं को प्रगतिशील चेतना से अनुप्राणित माना है । उनका अभिमत है-” आपने पारिवारिक जीवन में उठनेवाली गहन समस्याओं को, विशेष रूप से नारी जीवन की समस्याओं को अत्यंत मार्मिक तथा व्यापक सचेतन दृष्टि से अपनी कहानियों में चित्रित किया है। उन कहानियों में निम्न मध्य वर्ग के जीवन में उठने वाली आर्थिक विषमताजनित समस्याओं को विशेष रूप से लिया है।…..आपकी कहानियों को हम प्रगतिशील यथार्थ वादी कहानियां कह सकते हैं।“(7)
चन्द्र किरण सोनरेक्सा के रचना संसार का सांगोपांग वर्णन करते हुए, भारत के महिला समाज की त्रासदी का मार्मिक उल्लेख किया है। ऐसे सुविचारित लेख के लिए धन्यवाद तथा साधुवाद
प्रस्तुत शोधालेख में चंद्र किरण सौनरेक्सा के लेखन की सम्पूर्ण यात्रा को आधार बना कर जो कर्मठ प्रयास डॉक्टर रुचिरा ढींगरा जी ने किया है, वह स्वतः मुखर है l एक स्त्री ही स्त्री के कोमल और कटु भावों को बेहतर समझ सकती है l क्रांति महज़ युद्ध से नहीं लेखन से भी संभव है l प्रस्तुत शोधालेख की दोनों महिलाओं के अपने अपने प्रयासों से यही विचार पुष्ट होते हैं l हार्दिक बधाई और शुभकामनायें l