अव्वलम, सबलम, बकलम, टक्लम, पकड़म, जकड़म, सपलम, परपम, खुजलम, मरकम दस तरीके के साहित्यकार होते हैं ये हमने साहित्य की काली कोठरी में घुसकर जाना। जो इस कोठरी में घुस गया इसके माहौल में रच बस भले न पाए लोग उसे काले मुँह वाला अवश्य मान लेते हैं क्योंकि वह विरला ही होता है।
अब उसकी पहचान आप कैसे करेंगे? बस जो चीख रहा हैं उसे ही इस माहौल में दिक्कत हो रही है। अव्वलम बहुत उम्दा लिखते हैं। छपते भी हैं। वे सबलम, व अन्य को कुछ बोलते तो नहीं मगर मन में उनसे हर घोर प्रतिभाशाली जूनियर से फेड अप रहते हैं। उन्हें बगल में उनकी तेजी से बढ़ती लंबाई से घबराहट रहती है । वे अपने बराबर के लोगों से चिढ़ते-कुढ़ते उनकी बड़ी लकीर आपस में मिटाते रहते हैं। उनका एक गैंग होता जिसकी वजह से वे वहाँ आ गए होते हैं । ये दूसरी श्रेणी को छोड़ तीसरी या चौथी के लोगों से थोड़ा लाभकारी ताल्लुक रखते हैं। इनका अपना गैंग तो इन्हें पतंग की तरह उड़ाता रहता ही है… बाकी भी तरजीह देते हैं। ये कबूतरों की तरह होते हैं दाने चुग-चुग कर अपनी दुनिया अर्थात प्रसिद्धि और किताबों में आत्ममुग्ध रहते हैं ।
फेड अप होने के भिन्न-भिन्न कारण है। साहित्यकार… साहित्यकर्मी किसी भी प्रकार का हो फेड अप होकर उपजता है, रहता है, मरता है। साहित्यकर्मी इसलिए लिखा आजकल साहित्यकार कम साहित्यकर्मी ज्यादा हैं। अब आप कहेंगे इसमें क्या फर्क साहित्यकार जन्मजात होता है। साहित्यकर्मी साहित्य से संबंधित काम कर-कर के साहित्यकार बन जाता है। जैसे कम्पाउंडर अपने गाँव में फर्जी नुस्खे लिखकर डॉक्टर बन जाता है। वैसे वह भी होता तो अनुभवी है बस उसके पास डिग्री नहीं होती।
सबलम ठीक-ठाक औसत सा लिखते हैं मगर चाँद पर पहुँचने की तीव्र लालसा से पैसे देकर यहाँ-वहाँ छपते, सम्मानित होते हैं। गौरवान्वित हुआ हूँ… चाँद पर पहुँच गया हूँ… जैसी पोस्ट लगाते हैं। मगर किश्त भरकर ये गौरव पाया हूँ नोट देकर भी आया हूँ ये कभी नहीं बताते। ये भ्रम हमेशा बनाकर रखते हैं कि काबलियत से छपा-सम्मानित हुआ हूँ। सदस्यता की शर्त पूरी करने की वजह से पत्रिका में जगह पाया हूँ। बकलम हर वक्त सभी केटेगरी के साहित्यकारों-साहित्यकर्मियों की खाट खड़ी करते रहते हैं।
उन्हें शब्दों से रहपट, लात घूंसे जमाते रहते हैं। लिखते भी ठीक-ठाक हैं। व्यंग्यकारों को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। वैसे अन्य में भी यह काबलियत खूब पाई जाती है।
टक्लम बोर भाषाई आलोचक प्रोफेसर होते हैं इनके सिर पर चाँद खिला होता है मुख पर हमेशा बारह बजे होते हैं ये हमेशा विद्वान की विशेष मुद्रा में रहते हैं। जो साहित्य के गले पर अँगूठा रख साहित्यकारों, साहित्यकर्मियों की बखिया उधेड़-उधेड़ कर अधिकतर जबरदस्ती साहित्यकार बन जाते हैं। वे ताउम्र बकते हैं मगर उन्हें आपकी विद्वता का कोई जवाब नहीं सब कहते तो हैं सुनना, पढ़ना कोई पसंद नहीं करता। उनकी किताबें जिस तरह चोरी चकारी से बनती है उसी तरह की चोरी चकारी के काम आती है। गिनी चुनी कविताएँ जिस तरह की बुद्धि से परे की नीरस बात होती है उन्हें कोई घास नहीं डालता। मगर ये प्रसिद्धि और सम्मान पा भी जाते हैं।
अपवाद तो हर बात का है उनमें भी कोई होनहार साहित्यकार हो सकता है । पकड़म नई-नई सुंदर दुखी महिलाएँ ढूँढते हैं उन्हें सब्ज़बाग दिखाते हैं। नए नवोदित लालसा-युक्त बंदे-बंदी पकड़ते हैं। उनके पैसों से भव्य आयोजन कर उनके राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय उद्धारक बनते हैं। उनसे मनोरंजन करते या पैसे वसूलते हैं। मनोरंजन से मतलब ये नहीं कि हमबिस्तर हो जाते हैं। दूर से भी मनोरंजन कुछ पुरुष कर लेते हैं। उन्हें काग़ज़ थमा-थमा कर, उन्हीं के पैसे से छाप-छाप कर साहित्यकार बनाते-बनते हैं।
जकड़म साहित्यकारों को उनकी कुंठा जकड़े रहती है… ये शाही असफल होते हैं। उम्र भर किलसते- भुनते हैं। इतना किलसते भुनते हैं कि इनका शरीर इनकी आत्मा से हमेशा दिक्कत में रहता है। अच्छा ठीक-ठाक लिखते भी हैं मगर बहुत कम क्योंकि दूसरों की उपलब्धियों से ये परेशान रहते हैं। साहित्य इनकी जॉब से अलग साइड हॉबी होती है। ज्यादा लिख पाने का वक्त नहीं मिला होता है। ये चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की तस्वीर हमेशा दिखाते व्याख्यायित करते रहते हैं। हमेशा खुद को इकलौता टॉपर समझते हैं।
सपलम वे ग़ैर-साहित्यिक या जरा से साहित्यिक लोग होते हैं ये जिसे चाहे साहित्यकार बना सकते हैं। बहुत कम लिखते हैं या नहीं भी लिखते। संपादकों को इसी केटेगरी में रख सकते हैं। इनका जिस मुंडे- कुड़ी पर दिल आ जाये, जो दोस्त बन जाये, जो इनपर हाथ रख पाये उसे स्टार बना देते हैं। इनकी नाग देवताओं की तरह सब पूजा करते हैं। नाग इसलिए कहा ये जिस पर रूष्ट होते हैं वह इनका काटा हुआ व्यक्ति कभी पानी नहीं माँगता है। दरअसल ये होते साहित्यकार ही हैं मगर इनके भीतर का संपादक-प्रकाशक इनके साहित्यकार को सटक गया होता है। ये जिसे जब चाहें बेस्ट-सेलर या मैथलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, निराला, प्रेमचंद बना सकते हैं।
एक का गुण दूसरे में पाया जा सकता है। एक केटेगरी में कोई अपवाद हो सकता है वह अपने दिल पर न ले क्योंकि दिल बहुत नाजुक होता है वह इस पोस्ट के बोझ से अटैक खा सकता है। अपने हर अजीज मित्र के स्वास्थ्य के लिए इसीलिए रोज प्रार्थना करती हूँ। मेरे अनेक मित्र भी उक्त किसी केटेगरी में हो सकते हैं, बल्कि हैं।
जिन तीसरी चौथी श्रेणी के साहित्यकारों पर अव्वलम वर्ग की कृपा रहती है वे अपनी गैंग बनाकर रहते हैं। अव्वलम वर्ग से वे यह गुर सीख गए हैं। एक दूसरे से उसकी पीठ खुजाकर अपनी खुजवा रहे हैं।
परपम को सबको खुश करने का नशा होता है इनका वश चले तो ये एक अंतरिक्ष यान में भरकर सब लिखने वालों को चाँद पर रख आएँ उसका किराया भी अपनी जेब से भर दें। भले वे आपस में लड़- लड़ कर तू इस लायक कहाँ था तू मेरी जगह कैसे पहुँच गया। धक्के दे-दे कर सबको जमीन पर धकेल धराशायी कर दें। खुजर्म तू मेरी किताब की समीक्षा कर मैं तेरी की करूँगी करूँगा वर्ग है। तू मुझे पतंग बनाकर उड़ा मै तुझे पतंग बनाकर उड़ाऊंगा गैंग है। इनके अघोषित गठबंधन बन गए हैं। इनकी पतंगें अक्सर आकाश में लहराती हुई दिखती हैं। ये आपस में एक दूसरे को सम्मानित प्रशंसित भी करते रहते हैं।
मरकम अपने जीवन से पूरी तरह निराश हताश वर्ग के होते हैं। ये साहित्यक बाघों चीतों में स्वयं को पकड़े गए हिरन मेमने गाय के रूप में देखते हैं। किसी तरह का कोई रिएक्शन नहीं देते बस जब तक जान रहती हैं कान हाथ या टांग हिलती दिखती है।
माफीनामे सहित ये लेख मित्रो को, प्यार सहित, अर्पित – समर्पित कर रही हूँ। कृपया इस पर अपनी कटु दृष्टि के फूल अर्पित करने की कृपा करें। मिर्ची अधिक महसूस हो सकती है दो चार चमच्च शहद रखकर ये लेख पढ़ना मगर अब तो पढ़ चुके हैं। दौड़ दौड़ कर मुझे गालियाँ बक सकते हैं.

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