– धड़ धड़ धड़ धड़- कापुल (कार्पोरल) जे पी वर्मा जोर-जोर से दरवाजा पीट रहा था। हैरत दरवाजा खोलने वाली युवती के चेहरे पर चस्पा थी। 
– मुझे अंदर आने दीजिए, वो लोग मुझे जला देंगे, प्लीज!!! जल्दी कीजिए, वे आ रहे हैं…. ये देखिए मेरे कपड़ों पर घासलेट डाल चुके हैं, जलाने के लिए… प्लीज!!! मुझे बचा लीजिए- युवक गिड़गिड़ाया। 
– उस कमरे के पीछे छिप जाओ- युवती ने युवक पर विश्वास करते हुए उसे अंदर का रास्ता दिखाया और दरवाजा जल्दी से बंद कर लिया। लोगों के आने का शोर तेजी से घर तक आया और फिर आगे बढ़ता हुआ धीरे-धीरे समाप्त हो गया। यानी कि भीड़ जा चुकी थी। 
युवती ने वर्मा के हाथ में काली चाय का प्याला देते हुए पूछा- अब बताओ क्या हुआ है? तुमने बहुत शराब पी रखी है। तुम एयर फोर्स में हो ना?
– जी।
– मैं तुम्हारी ड्रेस से ही पहचान गई। मेरा भाई भी एयरफोर्स में है। इसे देखकर ही मैंने तुम्हें घर में आने दिया। लेकिन पहले यह बताओ कि हुआ क्या है?
– मेरी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया है- शक्तिमान ट्रक का।
– हे भगवान ! तुम एयरफोर्स में ड्राइवर हो? 
– हां । 
– क्या एक्सीडेंट में कोई मर गया ?
– पता नहीं… हां… शायद कई लोग मर गए, मुझे ठीक से मालूम नहीं- वर्मा जोर-जोर से रोने लगा। युवती सन्न रह गई। उसे चुप भी नहीं कराया। वह रोता रहा। थोड़ी देर बाद उसने फिर पूछा – कहां पर हुआ यह एक्सीडेंट?
– कमांड हॉस्पिटल के पास वाली डेयरी के बाहर… गाड़ी का ब्रेक बहुत कमज़ोर था, लगा नहीं… पता नहीं कितने….वह फिर रोने लगा। 
– तुम्हारे कपड़ों पर घासलेट किसने डाला?
– आज वहां शिवरात्रि का मेला लगा है, भीड़ बहुत है, मुझे जलाने के लिए उन लोगों ने मुझ पर केरोसिन डाल दिया। माचिस जला ही रहे थे कि मैं जोर लगाकर भागा। अगर एक दो सेकंड की देर हो जाती तो वो मुझे जला डालते। उसका रोना लगातार जारी था। मौत से बचकर आया था वह किसी तरह। ऊपर से नशे में भयंकर टुन्न। शिवरात्रि का दिन। आने वाली मौत की दहशत से वह अभी उबर नहीं पाया था। वैसे उसका नशा हिरन हो चुका था। युवती ने उसे कुछ देर के लिए अकेला छोड़ दिया। वर्मा वायु सैनिक की ड्रेस पहने था जो केरोसिन से पूरी तरह भीगी थी। घर भर में केरोसिन की गंध फैली थी। वह उस कमरे में एक-डेढ़ घंटे तक वैसे ही बैठा रहा। 
शाम बहुत जल्दी हो जाती है इस पहाड़ी इलाके में। करीब 4:30 बजे से ही धुंधलका छाने लगता है। युवती कमरे में आई और बोली- मैंने बाहर एक टैक्सी बुला दी है। यहीं मोहल्ले की है। तुम चुपचाप पीक चले जाओ। अब तक वो सब भी चले गए होंगे। लेकिन एक बात जरूर कहूंगी- तुम मेरे भाई जैसे हो, शराब पीना छोड़ दो। अब जल्दी करो, जाओ। 
वर्मा का नशा काफी कम हो चुका था। वैसे तो उसका नशा तभी उतर गया था जब उस पर केरोसिन का जरीकेन उल्टाया गया था। पर उसका शरीर अभी भी पूर्णतः नियंत्रित न था। युवती से कुछ कहने की उसकी कोई इच्छा न बची थी। जान बचाने की कृतज्ञता इतनी अधिक थी कि भरी आंखों वह उसे बार-बार हाथ जोड़ता हुआ घर से बाहर निकला और बाहर खड़ी टैक्सी में बैठ गया। टैक्सी ने उसे वायु सेना स्टेशन पहुंचा दिया। 
उधर अजीब नजारा था। दूध की डेरी के गेट पर ढलान बहुत गहरी थी। मुड़ते हुए रास्ते की समकोण की गहरी ढलान, अंग्रेजी के अक्षर एल के आकार की थी। ढलान खत्म होती थी छोटे से पुल पर। और पुल टेढ़ा था। उसी पुल पर वायु सेना का शक्तिमान थ्री टनर ट्रक आधा लटका था। पहली ही चपेट में उसने तीन खोमचे वालों को रौंद डाला, दो ठेले वालों को उड़ा दिया तथा नौ ग्राहकों और मेला देखने वालों को तगड़ी ठोकर मारी। फिर पुल पर लटक गया रेलिंग तोड़ते हुए। आंकड़ा कुछ ऐसा था- पांच उसी समय सांस लेने से पहले ही दम तोड़ गए। बाकी नौ लोगों को मिलिट्री अस्पताल में ले जाया गया, जहां हॉस्पिटल में लगभग सबका कोई न कोई अंग बेकार हो गया और काट दिया गया। किसी का हाथ कटा, किसी का पैर, कोई सिर से घायल हुआ तो कोई पेट से। बहरहाल उस हत्यारे शक्तिमान ट्रक ने पाँच की जान ली और कम से कम पाँच को जीवन भर के लिए अपंग बना गया, छोटे-मोटे घायलों की तो गिनती भी न की।    
हादसा दोपहर के वक्त हुआ था। पुल पर शिवरात्रि का छोटा सा मेला लगा था। हालांकि इस हादसे के बाद उग्र भीड़ ने उसके ड्राइवर यानी कि वायुसैनिक कापुल वर्मा को केरोसिन डालकर जलाने का पूरा इंतजाम कर लिया था, पर ऐन वक्त पर न जाने कौन सी गैबी ताकत से जोर लगाकर वर्मा ने अपने को छुड़ाया और एक तरफ भाग निकला, जिसका जिक्र ऊपर आ चुका है। जब कापुल वर्मा हाथ न लगा तो भीड़ का गुस्सा शक्तिमान ट्रक पर उतरने लगा। आधा लटका तो वह था ही, भीड़ उसे धक्का देकर पुल के नीचे गिराने लगी। पर शक्तिमान पूरा शक्तिमान था। थोड़ा बहुत हिला हो शायद, पर तभी कहीं से पुलिस के दो जवान वसूली छोड़कर डंडा फटकारते आ गए। उनकी गालियां सुन कर भीड़ काई की तरह फट पड़ी। उन्होंने पास के  पुलिस स्टेशन से इमरजेंसी सहायता मांगी। लिहाजा पाँच मिनट में वहां पुलिस का मेला लग गया। शक्तिमान वायु सेना का था, इसलिए तुरंत वायुसेना पुलिस को भी बुला लिया गया। फिर वही सब सिलसिला शुरू हुआ- घायलों को अस्पताल पहुंचाना, लाशों की शिनाख्त, पंचनामा, मौका-ए-वारदात की फोटोग्राफी आदि। 
हालांकि छोटी मोटी घटनाएं तो हर शहर में हर रोज घटती ही रहती हैं और धीरे-धीरे उनके बारे में लोग भूल भी जाते हैं। पर एक तो यह घटना छोटी न थी, दूसरे इसमें वायुसेना  की गाड़ी ने यह किया था, तीसरे वाहन चालक वायुसैनिक पिये हुए था। सिविल केस भी था और मिलिट्री भी। इस छोटे से पहाड़ी शहर के लिए यह केस बहुत बड़ा था। सारे शहर में केवल इस केस की ही चर्चा थी। फिर मृतकों के परिवार वालों का भरपूर दबाव भी था। घायलों की मिलिट्री अस्पताल में सेवा-सुश्रूषा के अतिरिक्त कोई पूछताछ न थी। यह रेलवे या रोडवेज़ की बस न थी कि तुरंत कुछ मुआवजा घोषित हो जाता। लिहाजा मीडिया, सिविल पुलिस तथा मृतकों और घायलों के आश्रितों का दबाव, वायु सेना स्टेशन के अधिकारियों तथा पूर्वी कमान के प्रभारी एयर मार्शल रिपुदमन सिंह के लिए सिरदर्द बन गया। सिविल पुलिस को कापुल वर्मा से मिलने भी न दिया गया। 
उधर एलएसी पांडे भी बाल-बाल बचा। वह मेला लगा होने के कारण पहले ही शक्तिमान से उतर गया था वर्मा से यह कहकर कि- तू दूध लेकर आ, मैं एएससी में सब्जी लेता हूं। वह एएससी में ही था जब शक्तिमान ने यह दुर्घटना कर डाली। एएससी पहुंचकर आधा पौन घंटा तो वह सब्जी, राशन इशू कराकर एक ओर रखता रहा, पर जब एक घंटा बीत गया और वर्मा शक्तिमान लेकर नहीं पहुंचा तो वह गालियां देता हुआ एएससी से बाहर निकला और डेयरी की ओर बढ़ा। सड़क के इस पार से ही उसे शक्तिमान पुलिया पर लटका दिखा। वह पहले तो कुछ समझ न पाया, पर भीड़ और पुलिस की गाड़ियां देखकर तुरंत पलट गया और तेजी से एएससी में आ गया। उसने तुरंत पीक पर फोन लगाया, तो पता चला कि वहां दुर्घटना की खबर पहुंच चुकी है। फिर उसने एमटी सेक्शन में फोन करके राशन के लिए दूसरी गाड़ी भेजने को कहा। 
एएससी के जवानों ने उससे बाहर निकलने को मना किया, क्योंकि वह वायु सेना की यूनिफार्म में था और यूनिफार्म देखकर भीड़ भड़क सकती थी। अतः वह वहीं रुका रहा जब तक कि टाटा गाड़ी नहीं आ गई राशन लेने। अब तक उसे भी वर्मा का पता न था। बहरहाल जब वह स्टेशन पहुंचा, तो सबसे पहले गार्ड रूम पर पुलिस और सुरक्षा अधिकारी ने उससे सारी बातें पूछीं। पर वह क्या बताता? जो देखा था कह दिया, जिससे कोई बात नहीं बनी। थोड़ी देर बाद वह अपनी बैरक में था। 
हम लोग उस समय व्यू पॉइंट पर फ्लाइंग डिस्क खेल रहे थे। हम यानी मैं, अस्थाना, मेहता और विपिन। बीच-बीच में कभी फूल कुमारी या लक्ष्मी भी अपनी दुकान छोड़कर खेलने लगतीं। ऐसा वे भी तभी करतीं जब कोई पर्यटक वहां न होता। यह सारा वायु सेना स्टेशन ही पीक पर बना है और उसी के बीच में है व्यू पॉइंट, जहां घूमने के लिए पर्यटकों की आवाजाही निरंतर होती ही रहती है। कुछ तो नियमित पर्यटक हैं। शहर से कभी भी आ जाते हैं एंजॉय करने। कुछ जोड़े भी नियमित रूप से हाज़िरी देते हैं। कुछ नशाखोर भी पीक पर आकर वहाँ के जंगल में अपनी तलब पूरी करते हैं। 
खैर… हमारे खेल में विघ्न डाला तेजी से आते हुए कापुल सिन्हा ने। आते ही ताली पीटकर सबको बुलाया- सुनो यार ! गजब हो गया।
– क्या हुआ? हम उसके पास पहुंच चुके थे।
– वर्मा का एक्सीडेंट हो गया ! 
– क्या ?? कैसे ?? वह ठीक तो है?? हमारे पास बहुत से सवाल थे। 
– अभी ज्यादा नहीं मालूम हुआ है। सुनते हैं डेरी गया था शक्तिमान से, वहीं पुलिया पर शक्तिमान फिसल गई।
– वर्मा ठीक तो है? 
– वर्मा का तो पता नहीं, पर….
– पर क्या बे, जल्दी बताता क्यों नहीं? 
– कई लोग मर गए हैं।
– ओह शिट ! लेकिन कैसे? 
– अबे आज शिवरात्रि का मेला लगा है वहीं पुलिया पर।
– मेला !! अरे साला !! वर्मा तो आज सवेरे से ही फिट था। 
– अरे दारू तो हम सबने साथ पी थी पर वो साला भांग भी खाकर गया है। पांडे उसे भांग भी खिला कर ले गया है।
– कुछ पता चला कितने लोग मरे हैं?
– अभी पूरा पता नहीं चला है, पर पांच तो वहीं…ऑन द स्पॉट कहानी खत्म। 
– जेपी की कोई खबर नहीं मिली?
– अभी तक तो नहीं।
– और पांडे ? वही तो गाड़ी लेकर गया था?
– उसका भी मुझे नहीं मालूम।
– साले तो तुझे यह कैसे मालूम हुआ कि जेपी का एक्सीडेंट हुआ है?
– गार्ड रूम पर अभी कापुल शमशेर मिला था, उसी ने बताया। मैं खुद चार पेग खींच कर आ रहा हूं। जल्दी से गुटका फाँक गया कि कहीं शमशेर को सूंघ मिल गई तो लगेगा कानून पेलने। 
– आज उसे कहां सूंघने की फुर्सत होगी? इतना बड़ा एक्सीडेंट हुआ है, इन कमीनों की नींद हराम होगी। अब तक तो एओसी का फोन आ लिया होगा। 
– एओसी को छोड़ यार, मुझे तो जेपी की चिंता लगी है- मेहता परेशान हो चुका था।
– साले भेजा तो पिलाकर तूने ही था, अब क्यों फट रही है।
– तुम हो बकलोल ! उसने आज पहली बार पी है क्या? या पीकर पहली बार गाड़ी चला रहा था क्या? 
– तो ठीक है बेटा! एक तू ही इंटेलिजेंट है, बाकी हम सब ठहरे बकलोल। अब झेल जा। 
– अरे यार! तुम गलत समझ गए। मेरा मतलब है…
– अबे मतलब मत समझा। हमारी समझदानी तो ऐसे ही है। तेरा मतलब हमारी समझ में नहीं आएगा। अब तू रैण दे। 
– अरे यार! मैं तो तुम्हें यह बता रहा था कि शक्तिमान में ब्रेक ही नहीं है।
– ब्रेक नहीं है? तो जेपी उसे ले कैसे गया? बल्कि जाने से पहले यहां फूलकुमारी से चाय पीकर भी गया है।
– अबे यहां कौन सी भीड़ है? डेरी पर तो मेला लगा है। ब्रेक नहीं लगी होगी और एक्सीडेंट हो गया।
– अरे यार तो कंट्रोल करना चाहिए ना।
– तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे जेपी ने जानबूझकर…
– जानबूझकर नहीं बे, पर नशे में तो था ही…
– नशे से कुछ नहीं होता… असल में शक्तिमान का सेल्फ स्टार्ट भी कल से डाउन था- मेहता ने जैसे रहस्योद्घाटन किया।
– क्या? तो तुम लोग ऐसी गाड़ी ले ही क्यों जाते हो? प्रश्न मेहता से था क्योंकि यह एक्सीडेंट उसी के सेक्शन का मामला था। वह भी ड्राइवर था।
– छोड़ो यार! तुम लोग नहीं समझोगे यह हाई लेवल पॉलिटिक्स।
– हाँ, बात सही है। हम ठहरे बकलोल! तेरे जैसे इंटेलिजेंट तो हैं नहीं जो यह पॉलिटिक्स समझें। – कोई बात नहीं बेटा! धीरे-धीरे समझ जाओगे। अब चलो सेक्शन चल कर देखते हैं। वहां से कुछ पता चलेगा।
– अब तूने की है कुछ समझदारी की बात। चल…
चारों इसी तरह बातें करते पीक से वापस आने लगे, कि लच्छो यानी लक्ष्मी चिल्ला कर बोली- मेहता! आठ चाय हो गईं।
– अस्थाना के नाम लिख दे- मेहता बोला।
– हां बेटा खोपड़ी, दिखा दिया ना अपनी लाला बुद्धि। सबका अपना-अपना लिख दे लच्छो! हम लोग जेपी का पता करके आते हैं।
– जल्दी आना अस्थाना पता करके। मेरा दिल नहीं लग रहा है। जेपी मिले तो यहां ले आना- यह बात फूल ने कही। 
– ठीक है हम लोग आते हैं। 
एम टी सेक्शन- यानी मोटर ट्रांसपोर्ट सेक्शन में बड़ी गहमागहमी थी। लगभग सारा स्टाफ जमा था। सेक्शन इंचार्ज फ्लाइंग अफसर दुबे भी उस दिन शहर गए थे, लेकिन वह दूसरी ओर गए थे। उन्हें एक्सीडेंट का पता नहीं लगा। सेक्शन के ड्यूटी इंचार्ज वारंट अफसर यादव बार-बार उनके घर फोन लगा रहे थे, पर वह तो कैंपस में थे ही नहीं। वह दौर मोबाइल फ़ोन का न था। वायु सेना स्टेशन का मुख्य टेक्निकल ऑफिसर यानी सी टी ओ विंग कमांडर बावला थोड़ी देर में ही एम टी सेक्शन आ चुका था। बाकी सारे ड्राइवर और एम टी फिटर यानी टेक्नीशियन वहीं जमा थे। सी टी ओ बावला, फ्लाइंग अफ़सर दुबे के न होने के कारण झुंझला रहा था। उसने शक्तिमान को शहर से खींचकर लाने के लिए छोटी क्रेन वाली गाड़ी ले जाने के लिए एक ड्राइवर तथा एक टेक्नीशियन को नियुक्त किया, साथ में वायुसेना के दो सशस्त्र पुलिस तथा दो गार्ड भी जिप्सी में बैठकर गए। सीटीओ ने एडजुटेंट फ्लाइंग अफसर श्री कुमार को भी उनके साथ जाने को कहा। इसके साथ ही उसने सिविल पुलिस को भी फोन कर दिया कि हम शक्तिमान लेने आ रहे हैं।
यह सब इंतजाम करके उसने कमांडिंग अफसर को सूचित किया। कमांडिंग अफसर ने भी उसे हर सूचना देते रहने की ताकीद की। अब उसने एम टी सेक्शन की ओर निगाह डाली। वहां वारंट अफसर यादव सहमे से बैठे थे। बावला ने उनसे पूछा- मिस्टर यादव कापुल वर्मा की क्या खबर है?
– अभी तक उसकी कोई खबर नहीं मिली सर ! 
– वह पीता है? 
– सर, पीता तो है पर…
– पर क्या? वो आज भी पिए होगा….
– पर सर, गाड़ी चलाने में कभी फाल्ट नहीं हुआ।
– फाल्ट नहीं हुआ? व्हाट रबिश? फाल्ट नहीं हुआ का क्या मतलब? गाड़ी चलाने में फाल्ट नहीं हुआ तो गाड़ी में फाल्ट होगा।
– सर गाड़ी ठीक थी। पता नहीं क्या हुआ? 
– पता चल जाएगा, क्या हुआ। पाँच-सात लोग मर चुके हैं। सात-आठ भर्ती हैं, उनका भरोसा नहीं कब टपक जाएं। मिस्टर यादव ! जैसे ही वर्मा का पता चलता है, मुझे इन्फॉर्म करो। मैं घर पर हूं।
– ओके सर, मैं तुरंत इन्फॉर्म करूंगा सर।
– और दुबे जैसे ही आए मुझसे बात कराओ- जाते-जाते सीटीओ ने निर्देश दिए। 
– ओके सर! मैं उनके आते ही आप से बात कराऊंगा- सैल्यूट ठोंकते हुए वारंट अफसर यादव ने कहा। 
सीटीओ के जाते ही यादव ने सार्जेंट गुप्ता को बुलाया और खुसर-पुसर करने लगा। गुप्ता सेक्शन में सब की ड्यूटी लगाता था और यादव का मुंह लगा था। थोड़ी देर तक बातें करने के बाद गुप्ता यादव से कहकर अपना बैग उठाकर घर चला गया। 
अब आगे फ्लाइंग अफसर दुबे कब आया, शक्तिमान गाड़ी कब वापस लाई गई, एम टी सेक्शन में क्या हुआ? ये सब बातें धीरे-धीरे आप को मालूम हो ही जाएंगी। मुख्य बात है कापुल जे पी वर्मा की वापसी। 
जब वर्मा की टैक्सी पीक पर पहुंची, बैरियर पर डीएससी के जवान के साथ पुलिस का कापुल जोरा सिंह भी खड़ा था। जोरा सिंह को ताकीद की गई थी कि किसी वायु सैनिक को स्टेशन के बाहर न जाने दिया जाए। वर्मा की टैक्सी बैरियर पर ही रुक गई। जोरा सिंह कापुल वर्मा को देखकर चौकन्ना हो गया। उसने वर्मा से पूछा- कहां थे वर्मा? सब लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, और यह तुम्हारे कपड़ों से केरोसिन की गंध क्यों आ रही है?
– सर वो लोग केरोसिन डालकर मुझे जलाने जा रहे थे।
– माय गॉड! कौन थे वो? 
– मेले की भीड़।
– तब तुम बच कैसे गए? 
– बस किसी तरह धोखा देकर भाग निकला और एक घर में छुप गया।
– थैंक गॉड। तुम बच गए। चलो, बाकी बातें बाद में होंगी। 
वे दोनों टैक्सी से ही कापुल वर्मा की बैरक में आ गए। बैरियर से डीएससी के जवान ने गार्ड रूम फोन करके बता दिया कि कापुल जेपी वर्मा आ गया है और कापुल जोरा सिंह के साथ बैरक गया है। जोरा सिंह वर्मा को बैरक में छोड़ कर आ गया। वर्मा अब होशो हवास में था। जोरा सिंह ने उससे कहीं जाने को मना किया और कापुल मेहता तथा कापुल शर्मा से- जो उसकी बैरक में उसके साथ रहते थे- उसकी निगरानी करने को कहा। कापुल मेहता और कापुल शर्मा भी उसी के सेक्शन में ड्रायवर थे। वर्मा से मेहता और शर्मा ने कुछ न पूछा और उसे नहा लेने को कहा, क्योंकि केरोसिन की दुर्गंध अभी भी उसके शरीर से आ रही थी। 
वर्मा ने साबुन से रगड़-रगड़ कर नहाया, फिर भी केरोसिन की गंध उसके शरीर से जा नहीं रही थी। असल में वह गंध उसके मन में बसी थी, इसलिए वह उससे उबर नहीं पा रहा था। मेहता मेस से चाय लेकर आया। उन तीनों ने चाय पी। नहाकर और चाय पीकर वर्मा कुछ स्वस्थ हुआ, तब उसने उन दोनों को बताया। 
मेहता ने छूटते ही कहा- ब्रेक फेल हो गई ना। 
– हां ! वर्मा ने बताया। 
चूंकि सेल्फ स्टार्ट भी नहीं था, इसलिए डेरी से धक्का लगा कर शक्तिमान स्टार्ट की गई थी। उस डेरी के गेट पर काफी ढलान है, जहां शक्तिमान तेजी से नीचे की ओर आने लगी। ब्रेक बहुत हल्के थे, और धक्के से स्टार्ट की थी, अतः गति भी थोड़ी अधिक थी। फिर ढलान पर ब्रेक लगी नहीं। बहुत कोशिश की पर शक्तिमान पुल पर फिसलती चली गई और फिर वही हुआ जिसका वर्णन ऊपर आ चुका है- बताते हुए वर्मा फिर असहज हो गया। 
शर्मा ने उसे सांत्वना देते हुए कहा- देख तू परेशान न हो। जो हो चुका, हो चुका। यह बता तूने डिफेक्ट रजिस्टर में नोट किया था कि नहीं?
– अरे यार, डिफेक्ट रजिस्टर में दोनों बातें लिखी थीं इसने। मैं भी तो था उस समय इसके साथ। वहीं से हम पीक गए थे- मेहता ने कहा। 
– दो बातें कौन सी?
– अरे एक तो यह कि- ब्रेक्स आर वीक। दूसरे, सेल्फ स्टार्ट नॉट वर्किंग।
– फिर तू चिंता किसलिए कर रहा है? तेरा कुछ नहीं होगा- शर्मा ने कहा। वैसे भी वह सीनियर था और अनुभवी भी। 
– सर, कई लोग मर गए- वर्मा ने लगभग रोते हुए कहा।
– अरे मर गए तो मर गए, उनका अंत आ गया था। तूने जानबूझ कर तो नहीं मारा न उनको !  फिर यह साले फौज वाले गाड़ियाँ ठीक नहीं कराएंगे तो क्या ब्रेक की जगह अपना सर दे देंगे हम- शर्मा गुस्से में था। 
– तू थोड़ा आराम कर ले, सो ले। हम लोग यहीं हैं। और किसी से कुछ न कहना- मेहता ने वर्मा से कहा। 
वर्मा एक किनारे जाकर अपने बिस्तर पर लेट गया। वे दोनों बातें करते रहे। फौज में फौजी को सिविल पुलिस के हवाले करने की प्रथा नहीं है। यदि वह खुद पकड़ लिया जाए तो कोई बात नहीं, पर स्टेशन से उसे पुलिस के हवाले कभी नहीं किया जाता। इस केस में भी यही हुआ। सिविल पुलिस कह-कह कर हार गई कि वह ड्राइवर का बयान लेना चाहती है। पर वायु सेना के अधिकारियों ने उसे वर्मा से मिलने नहीं दिया। 
उस रात वर्मा अपने बारे में ही सोचता रहा। रात नौ बजे मेहता ने वर्मा के लिए मेस से खाना ला दिया। पर दो चार कौर खाकर वर्मा ने मना कर दिया। उसे बार-बार कुचले हुए लोगों के शव दिख जाते और उसका मन उल्टी करने का होने लगता। फिर केरोसिन की गंध भी उसके मन में बसी थी। मेहता ने उसे अकेला छोड़ दिया। वर्मा सो गया पर बीच-बीच में कुछ बड़बड़ाता भी जाता। शर्मा और मेहता ने कोशिश की कि उसकी बातों को समझ सकें पर उसके शब्द अस्पष्ट थे। हां, इतना जरूर सुनाई दे रहा था- मुझे छोड़ दो, मैंने कुछ नहीं किया, गाड़ी में ब्रेक नहीं हैं। 
उधर दूसरी ओर एलएसी पांडे से पूछताछ की गई। गार्ड रूम पर वह यही कहकर बच गया कि मैं तो एएससी चला गया था, वहां राशन निकलवाया, बड़ी देर हो गई तो बाहर आया। बाहर शक्तिमान लटकी देखकर वापस एएससी आ गया और फोन किया। यह सब कैसे हुआ, मैं नहीं जानता। हां, उसने यह जरूर कहा कि गाड़ी में ब्रेक नहीं लग रही थीं इसलिए वर्मा शक्तिमान बहुत धीरे-धीरे चला रहा था। उसे छोड़ दिया गया।
पूर्वी वायु कमांड से कोर्ट ऑफ इंक्वायरी का आदेश आ गया। ट्रोपो संचार यूनिट के ऑफिसर कमांडिंग विंग कमांडर परसू को कोर्ट ऑफ़ इंक्वायरी का इंचार्ज नियुक्त किया गया। परसू एक ईमानदार टेली कम्युनिकेशन अफ़सर था। यह बात ज़रूर थी कि वह स्टेशन कमांडर ग्रुप कैप्टन कुमार से सर्विस में सीनियर था पर रैंक में जूनियर, लेकिन वह उससे डरता नहीं था। 
बहरहाल, विंग कमांडर परसू ने एमटी सेक्शन जाकर इस केस से जुड़े सभी कमीशंड तथा नॉन कमीशंड अधिकारियों को तलब किया। उसने सबसे एक साथ बात नहीं की। सभी को अकेले-अकेले बुलाया और सब के बयान रिकॉर्ड किए। इसमें पंद्रह से बीस दिन लग गए। वैसे तो वर्मा को दोषी ठहराना बहुत सरल था, पर उसे लगा कि वर्मा का उतना दोष नहीं है जितना उसे दिया जा रहा है। दूसरी बात उसने पाई की एमटी सेक्शन के अफसर दुबे और सेक्शन इंचार्ज वारंट अफसर यादव दोनों वर्मा को फंसाना चाहते हैं। उन दोनों का कहना था कि शक्तिमान की कोई कंप्लेन नहीं थी। जब वर्मा से उसने पूछताछ की तो वर्मा ने साफ-साफ कह दिया कि उस समय पिए हुए था। परंतु उसने यह भी बताया कि सेक्शन से शक्तिमान ले जाते समय उसने डिफेक्ट रजिस्टर में दो कंप्लेन लिखी थीं- ब्रेक्स आर नॉट वर्किंग प्रॉपर्ली और सेल्फ स्टार्ट नॉट वर्किंग।  उसने यह भी बताया कि वारंट अफसर यादव के घर फोन करके उसने कहा भी था कि गाड़ी नहीं ले जाऊंगा, पर उन्होंने रिक्वेस्ट की तो मैं गाड़ी लेकर चला गया। शक्तिमान को ले जाते समय भी उसे धक्का मारकर एमटी सेक्शन के गेट की ढलान पर स्टार्ट किया गया था और  गार्डरूम में गाड़ी बुक आउट करते समय शक्तिमान स्टार्ट ही थी, क्योंकि बंद होने पर फिर धक्का लगा कर स्टार्ट करना पड़ता। और यही कारण था कि डेरी से धक्का लगा कर स्टार्ट की गई शक्तिमान गेट की ढलान से फिसलती गई और ब्रेक न लगने की वजह से पुल पर लटक गई, जहां मेला लगा था। उसने भीड़ द्वारा अपने ऊपर केरोसिन डालकर जलाने का प्रयास करने की बात भी बताई। परसू ने जब दुबे और यादव से डिफ़ेक्ट रजिस्टर के बारे में कहा, तो दोनों साफ़ मुकर गए। यादव ने कहा- सर ऐसा रजिस्टर होना तो चाहिए पर बहुत दिन से सेक्शन में है नहीं। 
– होना चाहिए पर बहुत दिन से सेक्शन में है नहीं? क्यों नहीं है?
इसका जवाब वे दोनों नहीं दे पाए। पर उस रजिस्टर में कंप्लेन दर्ज करने के बारे में कापुल मेहता ने भी कहा, क्योंकि वह उस समय वर्मा के साथ था। परसू ने सारे स्टाफ से पूछा।  स्टाफ में दो धड़े हो गए। एक धड़ा वह था जो यादव से खुन्नस खाता था। वह वर्मा की ओर  हो गया। दूसरा धड़ा चमचों का था। ये यादव और दुबे की चापलूसी करते थे और ड्यूटी आदि में फायदा उठाते थे। यह वर्ग यादव की ओर ही रहा, जिसमें सार्जेंट गुप्ता उसका प्रमुख सिपहसालार था। उसे सबसे बड़ा चमचा माना जाता था। गौरतलब है कि डिफ़ेक्ट रजिस्टर गुप्ता ने ही गायब किया था- यादव के निर्देश पर। 
बहुत सारी पूछताछ के बाद कोर्ट ऑफ इंक्वायरी पूरी हो गई। विंग कमांडर परसू ने कापुल वर्मा से कहा- मैं पूरी कोशिश करूंगा वर्मा, लेकिन ये सारे बुड्ढे तुम्हारे पीछे पड़े हैं, तुम्हारे पीने को लेकर। ये तुम्हें ही कसूरवार ठहरा देंगे। अच्छा होगा अगर तुम पीना छोड़ दो और शांति से इस केस पर सोचो।
– मैंने पीना उसी दिन से छोड़ दिया है सर- वर्मा ने विश्वास से कहा।
– कंप्लीटली ?
– यस सर! मैंने उस दिन के बाद से हाथ भी नहीं लगाया है- वर्मा ने कहा।
– गुड! यह तुमने बहुत अच्छा किया। देखो! मैं तुम्हारी क्या हेल्प कर पाऊंगा- परसू ने थोड़ी निराशा से कहा। 
– थैंक यू सर! जोरदार सैल्यूट ठोंका वर्मा ने।
विंग कमांडर परसू ने कोर्ट ऑफ इंक्वायरी की रिपोर्ट स्टेशन कमांडर ग्रुप कैप्टन कुमार को दे दी। स्टेशन कमांडर रिपोर्ट पढ़कर जल-भुन गया। उसने परसू को बुलाया। वह परसू को बॉस कहता था और परसू उसे कमांडर। उसने परसू से कहा- यस बॉस! यह क्या इंक्वायरी की है तुमने?
झुकते हुए परसू ने पूछा- क्यों, क्या हो गया कमांडर? 
– ये तुमने कापुल वर्मा के लिए क्या लिखा है? इस तरह की गाड़ी चलाने में बहुत रिस्क है? व्हाट डज़ इट मीन बॉस? 
– कमांडर गाड़ी में प्रॉब्लम थी, और एक्सीडेंट के बाद भी शक्तिमान बड़ी मुश्किल से पीक तक आ पाई है। हमारे जवान कितनी ख़राब गाड़ियां चलाते हैं सर !
– मुझे नहीं लगता कि शक्तिमान में कोई प्रॉब्लम थी। और वर्मा इतना पीकर गाड़ी कैसे चलाता? यह तो होना ही था।
– सही कहा कमांडर! यह तो होना ही था, पर इसलिए नहीं कि वर्मा पिये हुए था, बल्कि इसलिए कि कोई भी ड्राइवर इस शक्तिमान ले जाता, तो उसका ऐसा ही हाल होना था।
– बहुत खूब बॉस! देख रहा हूं कि तुमने यह इंक्वायरी कुछ अधिक ही मन से की है!
– मैं हर काम कुछ अधिक ही मन से करता हूं, इसीलिए अभी तक यहां पड़ा हूं। 
– मिस्टर परसू, थैंक्यू।
– थैंक्यू कमांडर! अगर ज़रूरत पड़े तो फिर बुला लेना, चलता हूं। 
परसू खड़ा होकर जाने लगा।
– मुझे नहीं लगता कि मुझे तुम्हें फिर बुलाने की जरूरत होगी।
– कोई बात नहीं, मिलने का कोई न कोई सिलसिला तो चलता ही रहेगा, थैंक यू! कहकर परसू कमांडर को सैल्यूट मारता हुआ उसके कमरे से बाहर हो गया। स्टेशन कमांडर उसे गुस्से से घूरता रहा। स्टेशन कमांडर के पास फिलहाल उस रिपोर्ट को ऊपर भेजने के अलावा कोई चारा न था। ऊपर, यानी पूर्वी कमांड के मुख्यालय। मुख्यालय! जहां एयर मार्शल रिपुदमन सिंह और उसका खूंखार स्टाफ इसी ताक में रहता है कि कब किस स्टेशन या यूनिट में कुछ कांड हो और उसे दबाया जाए। उनकी कमाई का ज़रिया इस तरह की घटनाएं ही थीं। और फिर, रोब बरकरार रखने के लिए उनके पास यही सारे हथकंडे थे।
तो ख़ैर, पीक का स्टेशन कमांडर इंक्वायरी रिपोर्ट लेकर खुद कमांड गया और संबंधित अधिकारियों को दी। उसे पढ़कर अफसर की त्यौरी चढ़ गई। उसने रिपोर्ट अपने दूसरे साथी को दी। वह भी चौंक गया। उसने कमांडर से कहा- सर! यह क्या! 
कमांडर को पता तो था ही, पर भोलेपन के साथ बोला- क्या, कोई प्रॉब्लम है क्या? 
यद्यपि वे दोनों अफसर फ्लाइट लेफ्टिनेंट यादव और स्क्वाड्रन लीडर मोहन कमांडर से बहुत जूनियर थे और उससे इस तरह बातचीत नहीं कर सकते थे, पर उन्हें पता था कि यहां कमांडर की गर्दन उनकी पकड़ में है। यादव बोला- प्रॉब्लम! इसमें तो प्रॉब्लम ही प्रॉब्लम है सर! ऐसे कहीं कोर्ट ऑफ इंक्वायरी होती है? अरे सर! इस केस के लपेटे में तो आप भी आ जाएंगे।
स्क्वाड्रन लीडर मोहन आग में पेट्रोल डालते हुए बोला- आपको तो पता है सर! इस तरह के सारे  केस एयर कमोडोर बाजपेई सर देखते हैं, और आप तो जानते हैं हाउ टफ़ ही इज़! आपको तो अपनी नौकरी बचानी मुश्किल हो जाएगी सर! इस तरह के केस में एक ओर तो लोकल प्रेशर बहुत है और दूसरी ओर सिविल पुलिस भी रोज डंडा किए रहती है। ऐसे में यह रिपोर्ट किसी को मिल गई, तो सर आप कहां जायेंगे? 
इतने जूनियर अफ़सरों के ये बोल सुनकर स्टेशन कमांडर ग्रुप कैप्टन कुमार बुरी तरह घबरा चुका था। एक तो ये दोनों अफसर उसे जलील कर रहे थे, दूसरे उसे अब खुद भी चिंता होने लगी थी। यह तो वही जानता था कि पीक का स्टेशन कमांडर वह कैसे बना था और उस पद की क्या अहमियत थी। इसकी जगह अगर किसी सूखी जगह पर होते, तो वक्त पर तनख्वाह ही हाथ आती, बाकी का क्या कहा जाए? यह सब आगा-पीछा सोचकर स्टेशन कमांडर ने उनसे पूछा- अब क्या करना चाहिए? 
मोहन मद्रासी हिंदी में बोला- सर! यू आर बॉस। आपको मालूम- क्या करना ठीक। हम इतना कर सकता है कि आप नेक्स्ट वीक रिपोर्ट दे दीजिए, हम इधर का देख लेगा। लेकिन आपको भी हमारा केयर करना है। 
स्टेशन कमांडर थोड़ा आश्वस्त हुआ। बोला- श्यौर, थैंक्स फॉर योर सजेशन। मैं अगले हफ्ते आऊंगा। फिलहाल यादव….
स्टेशन कमांडर ने अपना ब्रीफकेस खोलकर एक छोटा सा गिफ़्ट पैकेट यादव की ओर बढ़ाया। यादव ने पैकेट लिया, उसे ड्रॉर में रखा और मुस्कुराते हुए बोला- थैंक्स सर! हम तो हमेशा आपके बारे में सोचते हैं। आप कोई चिंता न करें सर। बस इसका ध्यान रखें कि बीमार तो कोई भी हो सकता है और इतना तो आप के अधिकार क्षेत्र में है। कमांडर उसे थैंक्यू कहता हुआ कमरे से बाहर निकल आया।
अब रास्ता साफ था। हुआ यह कि विंग कमांडर परसू की रिपोर्ट स्टेशन कमांडर के पास ही रह गई और चार दिन में दूसरी रिपोर्ट बन गई। पूछताछ भी वैसे ही की गई। पर सब दिखावा था। इस बार कोर्ट ऑफ़ इंक्वायरी की स्टेशन कमांडर के प्रिय स्क्वाड्रन लीडर सिन्हा ने, जो मुख्य अभ्यास अफसर था। उसने चार दिन में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। उसके अनुसार कापुल वर्मा एक प्रसिद्ध नशेड़ी था, लिहाज़ा सारा दोष उसी का था। 
बस, यह रिपोर्ट पहुंच गई कमांड में। दो बार स्टेशन कमांडर को कमांड भी जाना पड़ा। फिर सब जैसे ठीक हो गया। जनजीवन यथावत चलता रहा। कापुल वर्मा को गाड़ियां चलाने की मनाही थी, अतः वह अपने सेक्शन में ही रहता और अनुरक्षण का कार्य देखता रहता। उसे कोई खास जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती थी, सो वह वहीं अपना टाइम पास करता और जो काम उसे दिया जाता, उसे आराम से करता रहता। एमटी सेक्शन में कुल मिलाकर छोटी-बड़ी पच्चीस-छब्बीस गाड़ियां थीं। कभी किसी में पंक्चर हो जाता, तो किसी की ब्रेक ख़राब हो जाती, किसी का काँच तो किसी का सस्पेंशन। इसी तरह की परेशानियां दूर करने के लिए सेक्शन में 20 एमटी फिटर और टेक्नीशियन के साथ एक ड्राइवर भी था- कापुल वर्मा। 
वैसे वर्मा की हालत गरीब की जोरू की तरह ही थी, पर बाकी सबमें इतनी हिम्मत न थी कि वर्मा पर अपना हक चला सकें। वर्मा भी राजी खुशी सब काम कर देता, पर अगर कोई तेवर दिखाता तो कह देता सर मुझसे यह काम नहीं होगा। कोई उसे कुछ कह नहीं पाता और दिन गुजरते गए। कमांड में मीटिंग होती रही और इस हाई प्रोफाइल केस पर जब कोर्ट ऑफ इंक्वायरी की रिपोर्ट एयर मार्शल रिपुदमन सिंह के सामने रखी गई, तो वह बहुत गंभीर हो गया। उस पर सिविल पुलिस तथा स्थानीय नेताओं का बहुत दबाव था कि कापुल वर्मा पर सिविल केस चलाया जाए। लेकिन उसे यह मंजूर न था, उसमें उसकी तौहीन होती है। पर वह यह भी नहीं चाहता था कि उस पर उंगली उठे। इसलिए उसने कापुल वर्मा के खिलाफ कोर्ट मार्शल के आदेश दे दिए। यह कोई बड़ी बात न थी। उसे पता था कि इसमें काफी देर लगने वाली है और तब तक न वह वहां रहेगा न दूसरे लोग। नार्थ ईस्ट में काम करने की अवधि वायुसेना ने तीन साल रखी है। तीन साल बाद सबका ट्रांसफर होना ज़रूरी है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए उसने कोर्ट मार्शल का आदेश दे दिया। वैसे पूरी कमांड में तीन कोर्ट मार्शल की तैयारी तो चल ही रही थी, एक और हो जाने से एयर मार्शल को क्या फर्क पड़ने वाला था। यह निश्चित था कि वर्मा का बलि का बकरा बनना लगभग तय था।
कुछ महीने यूं ही गुजर गए। न तो वर्मा का कोर्ट मार्शल हुआ, न ही उसे कोई खास ड्यूटी सौंपी जाती। नहा धोकर सुबह सेक्शन चला जाता और अनुरक्षण यार्ड में जाकर टाइम पास करता। वैसे तो कुछ न कुछ मेंटेनेंस काम रहता ही है वहां पर, लेकिन उस पर किसी का ज़ोर तो था नहीं। उसकी मर्जी होती तो किसी की सहायता कर देता, अन्यथा किसी कोने में जाकर सो जाता। जब मर्ज़ी चाय नाश्ता करने चला जाता। वारंट अफसर यादव और उसके चमचे वर्मा से कुछ करने को कहते तो वह मना कर देता और यही कहता- सर डिफ़ेक्ट रजिस्टर दे दो, काम कर दूंगा। इस पर उन लोगों की बोलती बंद हो जाती। सेक्शन का अफ़सर दुबे भी वर्मा को समझाने की कोशिश करता, लेकिन वर्मा पर किसी का कोई ज़ोर न था। कोर्ट ऑफ इंक्वायरी हो चुकी थी, कोर्ट मार्शल की तैयारी भी चल रही थी, इसलिए कोई उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता था।
इससे हुआ कुछ यूं कि वर्मा की हिम्मत बढ़ गई। एक तो सब जानते थे कि यादव ने डिफ़ेक्ट रजिस्टर गायब करवाया है। इससे वर्मा को लोगों की सहानुभूति मिलने लगी। दूसरे, उसने हर तरह का नशा छोड़ दिया, नानवेज खाना छोड़ दिया और सात्विक जीवन बिताने लगा। शाकाहारी भोजन करना, समय से जागना, सोना और रात सोने से पहले गीता पढ़ना- जो वह कहीं से पा गया था। इन सबसे उसका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था। तीसरे वह आश्वस्त था कि कोर्ट मार्शल में उसे सबसे ज्यादा दंड यही मिल सकता है कि उसे वायु सेना से निकाल दिया जाए। इसके लिए वह मन बना चुका था। ड्राइवर तो अच्छा था ही- लिहाज़ा सेना से बाहर जाकर गाड़ी चलाने का हुनर तो उससे कोई छीन नहीं सकता था। इसलिए वह निर्द्वंद्व हो चुका था। इस बीच मेरा भी ट्रांसफर हो गया मुंबई, फिर तो यह कहानी मेरे लिए कहानी बन के रह गई।
ऐसा नहीं कि मेरे पीक छोड़ देने से कहानी ख़त्म हो गई। वर्मा की कहानी चलती रही या यूं समझ लीजिए कि तेज़ चलने लगी। कमांड से आदेश आ गया- डीसीएम यानी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मार्शल का। अगर विंग कमांडर परसू की रिपोर्ट होती तो कोर्ट मार्शल की नौबत नहीं आती। पर उस स्थिति में वायुसेना की बदनामी होनी स्वाभाविक थी, इसलिए स्क्वाड्रन लीडर सिन्हा की रिपोर्ट के आधार पर ही वर्मा के कोर्ट मार्शल के आदेश आ गए।
वर्मा को वैसे तो एहसास था कि कुछ भी हो सकता है, पर जब कुछ सामने घटने लगता है, तो ही उसकी भयावहता पूरी तरह से अनुभव की जा सकती है। वर्मा ने बहुत कोशिश की कि सेक्शन के कुछ लोग उसके पक्ष में बोलें। मेहता और शर्मा ने तो उसका साथ दिया, पर कोर्ट को सबूत चाहिए। और शर्मा या मेहता यह सिद्ध नहीं कर सके कि शक्तिमान ट्रक में कोई डिफ़ेक्ट था या उस दिन वर्मा ने किसी रजिस्टर में कुछ लिखा था। वारंट अफसर यादव या एमटी सेक्शन के अफ़सर दुबे की बात को ज़्यादा प्रामाणिक माना गया कि ऐसा कोई डिफ़ेक्ट रजिस्टर वहां था ही नहीं। और वर्मा दारू पीकर ट्रक चला रहा था, जो कि नियम के खिलाफ था। इसीलिए वह शक्तिमान को कंट्रोल न कर सका और पाँच लोगों की हत्या और नौ लोगों की विकलांगता का कारण बना। 
इस कोर्ट मार्शल में वर्मा को अपराधी ठहराया गया। उस पर कई धाराएं लगाई गईं और उसे 3 सजाएं दी गईं। एक तारीख़ से उसकी एयरक्राफ़्ट्मैन के पद पर पदावनति यानी डिमोशन, छः महीने का सश्रम कारावास सिविल जेल में और शक्तिमान को नुकसान पहुंचाने के कारण उसकी मरम्मत के लिए उसकी तनख्वाह से निश्चित धनराशि की कटौती। क्योंकि वर्मा की नौकरी बच गई थी, अतः उसे कोई मलाल न था। उसने सहर्ष ये दंड स्वीकार कर लिया। वायुसेना के संबंधित अधिकारियों के लिए तो वर्मा को दंड मिल गया और केस समाप्त हो गया। पर उनके लिए यह एक केस था, वर्मा के लिए नहीं। 
वर्मा को कोर्ट मार्शल से सीधे जेल भेज दिया गया। जेल में उसने बड़ी खुशी से 6 महीने काटे। दरअसल उसे पाँच लोगों की मौत और नौ लोगों की विकलांगता का तीव्र अपराधबोध तो था ही। इस दंड से उसे लगा कि ईश्वर ने उसको माफ किया है, इसीलिए उसकी नौकरी बची है। बहरहाल, उसने छः महीने जेल में बड़ी खुशी से बिता दिए। इस बीच उसका ट्रांसफर भी वहां से कर दिया गया। अमूमन कोर्ट मार्शल के बाद अपराधी का ट्रांसफर भी कर ही दिया जाता है, जिससे उस स्थान का माहौल न बिगड़े। तो अपनी जेब कटने के बाद, अपनी उतरी हुई रैंक के साथ वर्मा पीक से राजस्थान आ गया किसी दूसरी यूनिट में। उसकी तनख्वाह से पैसे भी कट गए, जो शक्तिमान की मरम्मत में लगे थे। अब वर्मा एक नई यूनिट में था- नई जगह, नए लोग, नई ड्यूटी। 
नई जगह वर्मा के लिए बहुत अच्छी साबित हुई। नशा वह पहले ही छोड़ चुका था। अब वह एक सुधरा हुआ इंसान था। उसने नई यूनिट में अपनी ड्यूटी बहुत अच्छी तरह से निभाई। शादी उसने की न थी। अकेला रहता था। ड्यूटी के बाद भी ज़रूरत होती तो ड्यूटी के लिए तत्पर रहता। उसके अधिकारी उससे बहुत प्रसन्न थे। हालांकि पता सबको था कि उसका कोर्ट मार्शल हो चुका है, किंतु यह भी सच्चाई सबको पता थी कि उसे फंसाया गया था। और अब वह एक अच्छा इंसान बन चुका था। इसी तरह एक साल बीत गया। वर्मा की व्यक्तिगत रिपोर्ट में सर्वोत्तम लिखा गया यानी कि एक्सीलेंट। उसका काम ही ऐसा था कि कोई अधिकारी उसके खिलाफ लिख ही नहीं सकता था। वह एक आदर्श वायु सैनिक बन चुका था।
सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन वायु सेना मुख्यालय दिल्ली से एक पत्र आया- वर्मा के लिए। उसमें लिखा था कि वर्मा के व्यक्तिगत रिकॉर्ड में चार बार रेड इंक एंट्रीज हो चुकी हैं,  अतः उसे क्यों न वायु सेना से आदतन अपराधी के नाम पर डिस्चार्ज कर दिया जाए। यानी कि निकाल दिया जाए। वर्मा इसके लिए कतई तैयार न था। बमुश्किल 12 वीं पास करके वह वायु सेना में ड्राइवर के रूप में भर्ती हुआ था। उसे यह नौकरी चाहिए थी और दूसरा विकल्प न था। उसने एक अच्छे वकील से मिलकर एक अच्छा जवाब बनाया, जिसमें उसकी व्यक्तिगत रिपोर्ट का हवाला भी था, जो उसे सर्वोत्तम सिद्ध करती थी और वायु सेना मुख्यालय भिजवा दिया।  समय बीतता गया। वर्मा आश्वस्त था कि शायद सब ठीक हो गया है लेकिन कहीं कुछ भी ठीक न था। वर्मा के जवाब देने के आठ महीने बाद एक दिन अचानक वायु सेना के मुख्यालय का पत्र मिला कि उसे तत्काल 14 दिन में ही नौकरी से निकाला जा रहा है- बिना किसी लाभ के। उसके पास कुछ न था- न नौकरी, न रुपए, न ही कोई पेंशन, ग्रेच्युटी की रकम भी नहीं थी क्योंकि वह शक्तिमान के लिए दी जा चुकी थी। इस तरह बड़े बेआबरू होकर वर्मा को वायुसेना छोड़नी पड़ी। 
वर्मा अपने गांव अंबाला आ गया। घरवालों से बताया कि नौकरी छोड़ कर आया है। हालांकि घर वालों को कोई लॉजिक समझ में न आया। पर उसने अधिक समझाने की कोशिश भी न की और शहर में ऑटो रिक्शा चलाने लगा- किराए पर। वह वही कर सकता था और बखूबी कर रहा था, पर वो यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि वायु सेना में उसके साथ इतना बड़ा धोखा कैसे हो गया? उसे लगा वायुसेना का दोष नहीं था, दोष उसकी किस्मत का था। उसकी मस्ती उसकी नौकरी ले सकती है- यह उसने कभी न सोचा था। और जब सोचा तब उसके हाथ से उसकी नौकरी फिसल चुकी थी। उसके व्यक्तिगत रिकॉर्ड में एक्सीडेंट से पहले ही तीन रेड इंक एंट्रीज़ हो चुकी थीं। वो सब इसलिए कि कभी छुट्टियों से समय पर वापस न आया या छुट्टियां ख़त्म होने के 10 दिन बाद पहुंचा तो एक एंट्री हो गई। फिर कभी किसी से लड़ाई झगड़ा हो गया तो एक एंट्री और हो गई। इस तरह तीन बार उसे रेड एंट्री मिल चुकी थीं। वायु सेना नियम के अनुसार 4 रेड इंक एंट्री होने पर उस सैनिक को आदतन अपराधी यानी हैबिचुअल ऑफ़ेंडर माना जाता है और उसे वायु सेना से निकाला जा सकता है जिससे अनुशासन का आदर्श बना रहे।
लेकिन आदतन अपराधी होने के लिए उस सैनिक द्वारा एक जैसे अपराध करने का रिकॉर्ड होना चाहिए। वर्मा के केस में ऐसा न था। दूसरे एक्सीडेंट के केस में उसे पर्याप्त सज़ा मिल चुकी थी, जो उसने सहर्ष काटी थी। अब उसके पास कोई रास्ता न था। उसने कोर्ट में गुहार लगाने का रास्ता अपनाया। उसने दिल्ली हाईकोर्ट में केस कर दिया भारतीय वायुसेना पर। उसके वकीलों  ने यह साबित किया कि एक्सीडेंट के केस में वर्मा को पर्याप्त सजा मिलने के बाद उसे नौकरी से गलत तरीके से निकाला गया। लेकिन वायुसेना के वकीलों ने सेना के अनुशासन का हवाला दिया। वायु सेना के नियमों का हवाला दिया। और वर्मा को नौकरी से हटाना जायज़ ठहराया। 
इस बीच वर्मा किसी तरह केस लड़ने के लिए रुपए जुटाता रहा। करीब 8 साल बीत गए। केस चलता रहा। वर्मा केस लड़ता रहा इस उम्मीद में कि शायद नौकरी वापस मिल जाए। लेकिन नहीं, कुदरत को शायद यह मंजूर न था। सारी सुनवाई हो चुकी थी। 8 साल से वर्मा जिस केस का खर्च बड़ी मुश्किल से उठा पा रहा था, अब उसके फैसले का इंतजार था। दो जजों की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि वर्मा को नौकरी से नियमों के तहत ही से निकाला गया है। वह वायु सेना में आदतन अपराधी था। उसका चरित्र दूसरे वायु सैनिकों को नैतिक रूप से निराश करता था। अतः उसकी अर्जी ख़ारिज की जाती है।
वर्मा का केस हारना एक आशा का ख़त्म हो जाना है। जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई नहीं हो सकती, पर वर्मा की लड़ाई कई सवाल खड़े कर गई- भारतीय वायु सेना में कार्यरत सैनिकों पर। क्या उसे फंसाने वाले वायु सैनिकों या अधिकारियों का नैतिक चरित्र तर्कसंगत या श्रेष्ठ ठहराया जा सकता है? क्या व्यक्ति के पुराने कर्मों का प्रायश्चित कभी नहीं हो सकता? क्या न्याय और कानून वाकई इतना अपंग है कि एक व्यक्ति अपनी बेगुनाही साबित न कर सके? पूरा वायु सेना स्टेशन एक मामूली फ़ौजी के विरुद्ध खड़ा हो गया। ऐसे में न्याय की उम्मीद की भी जाए तो किससे? 
विक्षिप्तता की हालत में उसने निर्णय सुनने के बाद जज साहब के सामने ही प्रलाप करना शुरू कर दिया। हालांकि उसका वकील और उसके सहायक उसे वहां से हटाने लगे पर वह वहीं फैल गया। उसने न जाने किस दयनीय आवाज़ में जज को संबोधित किया- 
जज साहब ! अदालत ने तो सिर्फ वायु सेना नियमावली 1969, 15 (2)(g)(ii) के तहत मेरी नौकरी से छुट्टी को जायज़ ठहराया, जो आपकी अदालत के हिसाब से भले ही सही हो, लेकिन इसका जवाब कौन देगा जज साहब, कि जो अदालत एक अदने से सैनिक को न्याय न दे सके, तब उसका क्या महत्व रह जाता है? जज साहब ! क्या द्वेषपूर्ण एवं पक्षपातपूर्ण व्यवहार से वायु सैनिकों का मनोबल गिरता नहीं? उनमें निराशा नहीं आती? क्या मेरी नौकरी जाने से वे अधिकारी सुधर जाएंगे? मी लॉर्ड ! असल में, वायु सेना में भी अच्छे, बुरे, उच्च, नीच, स्वार्थी और परोपकारी सैनिक हैं। लेकिन जहां इरादा अपनी कमियों को छिपाकर, अपने मातहत सैनिकों को फंसाने का हो, वहाँ का नैतिक चरित्र हवाई ही कहा जा सकता है। आपका हुकुम सर माथे पर जज साहब। मैंने बारह साल दो महीने बीस दिन नौकरी की है, और अपने अनुभव पर कह सकता हूं कि कुछ जयचंदों के कारण पूरी की पूरी वायु सेना की गरिमा को कलंकित भी नहीं किया जा सकता।…. बाकी सब ठीक है। जय हिंद जज साहब ! जय हिंद ! 
हालांकि जज साहब कुछ परेशान और कुछ आश्चर्यचकित हैं कि ये आज क्या बक रहा है, लेकिन उसका प्रलाप उनकी समझ से परे है। पुलिस वाले उसे घसीटकर बाहर कर देते हैं। और, वर्मा को अपने शरीर से घासलेट की बदबू आज कुछ अधिक ही आ रही है, उसे लग रहा है कि उसका कोर्ट मार्शल फिर से हो गया है। पर, अब उसे फिर से जीना है।

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