1
प्यार का मुझको मेरे, इनआम भी नईं चाहिए,
हां मगर झूटा कोई इलज़ाम भी नईं चाहिए।
ज़िन्दगी चुक ही गई अब राह में चलते हुए,
नाम चाहे हो न हो, बदनाम भी नईं चाहिए।
वो कभी इक वक़्त था जब मुन्तज़िर थे शाम के,
ज़िन्दगी के वास्ते अब शाम भी नईं चाहिए।
हर क़दम इक मौत का जलवा दिखाया ज़ीस्त ने,
रब की जानिब से कोई पैग़ाम भी नईं चाहिए।
बिल यक़ी ज़ाया ही होनी है, हर इक पल ज़िन्दगी,
ऐसी दुनिया में हमें कोई काम भी नईं चाहिए।।
2
बस जुदा होकर हरासां कर गया,
ज़िन्दगी लेकिन चरागां कर गया,
जब ये पूछा साथ तो चल पाओगे ?
उलझनों में था सो हाँ हाँ कर गया,
देखते बनती थी उसकी कश्मकश,
मुस्कुराने भर को सामां कर गया,
क्या ये कम है ज़िन्दगी के वास्ते,
ख़लवतों की राह आसां कर गया
दूर तक .देखा किये हम रहगुज़र,
दिल का इक कोना सा वीरां कर गया,
3
सीने में जलन,थक के हुयी चूर ज़िन्दगी,
देखी कहाँ है आज तक पुर नूर ज़िन्दगी,
वो कौन सी जगह है जहाँ हम भी हंस सकें,
खुशियों से रंगा-रंग हो भरपूर ज़िन्दगी,
कितने दिलों में बच रहा तूफ़ान प्यार का,
कितनों को रास आ गई मग़रूर ज़िंदगी….
जब भी उठाये हाथ हैं कुछ मांगने को आह
मिल तो गयी है ज़िन्दगी रंजूर ज़िन्दगी,
जीने की आरज़ू में बहुत दिन गुज़र गए,
अब ले भी जाओ मुझसे बहुत दूर ज़िन्दगी,
तीन ग़ज़लें - उर्मिला माधव 5उर्मिला माधव
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