“थोड़ा कैमरा जूम करके दिखलाइए प्रभाकर, वह देखिए ऊपर की ओर …होटल के झरोखों से झांकती आंखें उन विधायकों की हैं, जिन्हें इस होटल में परसों दोपहर  लाया गया था।”
सड़क पर खड़े टीवी संवाददाता ने दूर होटल की बालकनी की ओर इशारा करते हुए कहा। क्षणभर में ही होटल से झांकती उन आंखों को गोल घेरे में कैद कर लाखों घरों में ताजा-ताजा परोस दिया गया।
जैसे सबके दिन फिरते हैं वैसे ही होटल के दिन फिरे …। शहर से दूर स्थित इस होटल और इसके मालिक का पूरा प्रयास था ‘लो प्रोफाइल ‘ रहने का। होटल के जन्म से ही इसके मालिक के बारे में अनेक कयास लगाए जाते रहे थे। जिस मालिक का नाम यह होटल बताता था,  उस पर लोगों को विश्वास नहीं था और जो-जो मालिक इसका लोग बताते थे,  उसके बारे में होटल के कागजात इंकार में सिर हिला देते थे।
दबी जबान से कुछ लोग यह भी कहते थे कि होटल शमशान की भूमि पर बना था। बड़े लोगों की तरह होटल के पास भी अपनी किदवंती और किस्से थे।  होटल से कुछ दूर एक नीम का पेड़ था जहां हरदयाल की चाय की छोटी सी गुमटी थी। होटल जब बनने लगा तो वहां काम करने वाले मजदूरों को चाय,  बीडी, गुटके व तंबाकू की तलब होने लगी। हरदयाल का गांव होटल के पड़ोस में ही था। जमीन उसके पास थी नहीं और मजदूरी से लेकर चौकीदारी तक का काम कर उसका मन और तन थक चुका  था। उसने वहां नीम के पेड़ की छांव में अपनी चाय की दुकान डाल ली। जब तक होटल का निर्माण कार्य चला तब तक हरदयाल के पास ग्राहकों की कमी नहीं रही। उसके बाद तो उसकी दुकानदारी हाइवे से गुजरने वाले वाहनों पर लगने वाले ब्रेक पर ही निर्भर करती गयी। हरदयाल की दुकान का कोई नाम नहीं था। उसके जैसी छोटी-छोटी दुकानें ना किसी विशिष्ट ‘नाम’ को वहन कर सकती हैं और न ही उन्हें उसकी आवश्यकता है। छोटी-छोटी जरूरतें ग्राहकों को इन बेनामी दुकानों तक पहुंचाती है।
पिछले तीन दिन हरदयाल की दुकान के लिए यादगार रहे थे। जब से विधायकों की बाड़ाबंदी इस होटल में की गई थी तब से मीडिया की आंख की पुतली इसी पर ठहरी हुई थी। मीडिया अपने लाव लश्कर और ओबी वैन के साथ होटल की घेराबंदी में मुस्तैद था । हरदयाल से अकेले काम नहीं संभल रहा था इसलिए उसने अपने छोटे बेटे ( जो कॉलेज में पढ़ता था ) को, दुकान पर दिन में सहयोग के लिए बुला लिया था। सुबह के लिए उसने अपने बड़े बेटे को कह दिया था जो कैब / टैक्सी चलाता था। ढेर सारे अनजान लोगों से घिरी हरदयाल की आंखें अक्सर चाय बनाते हुए दूर होटल के झरोखों से झांकती आंखों को देखती। हरदयाल ने बढ़ती मांग के बीच सामान की एक लंबी सूची अपने बड़े बेटे को दी। बेटे ने सूची पढ़ते हुए कहा”काका सामान तो मैं शहर से ले आऊंगा परंतु यदि यह मेला जल्दी खत्म हो गया तो बचे सामान को निकालना मुश्किल हो जाएगा।”वहीं बैठे पत्रकार ने सिगरेट का लंबा कश लेते हुए कहा”चिंता मत करो,  मेला अभी लंबा चलेगा।”
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“मैं मुख्यमंत्री कार्यालय से बोल रहा हूं,  मुख्यमंत्री जी चाहते हैं आज शाम को आपके पिता उनके व विधायकों के सामने लोकगीतों की प्रस्तुति दें। आयोजन स्थल का पता लिखिए।”सुबह-सुबह नरेंद्र के मोबाइल पर अनजान नंबरों से यह आवाज उभरी। नगेंद्र ने अनुमान लगाया अभी आठ बजे हैं,  सात घंटे शहर पहुंचने में लगेंगे। उसे खुशी हुई कि फोन उसके पास आया था। गलती से फोन राजेंद्र के पास आ जाता तो ….। वह राजेंद्र को इस कार्यक्रम में न ले जाए तो ? लेकिन पिता राजेंद्र को साथ ले जाए बिना नहीं मानेंगे। उसे अपने पिता के जिद्दीपन पर गुस्सा आया। राजेंद्र उसका छोटा भाई था। राजेंद्र ने उसे बिना बताए बहुत से कार्यक्रम कर लिए थे। उसने साजिंदों को फोन कर तैयार होने को कहा। वह पिता के कमरे में गया जो खिड़की की तरफ करवट लेकर लेटे हुए थे। जब से सांस की तकलीफ ज्यादा बढ़ी थी,  कमरे से बाहर वे कम ही निकलते थे। नगेंद्र को डर था कि कहीं बीमारी की वजह से पिता मना ना कर दें। उसने धीरे से कहा”बाबा”( वह बचपन से ही अपने पिता को बाबा बुलाता था )। हरमन सिंह ने करवट बदलते हुए उसे  संशयित नजरों से देखा। बीमारी ने हरमन सिंह के चारों ओर शंका की परत गाढी कर दी थी। परिचित चेहरे व आवाज भी उसके मन में किसी अनिष्ट की आशंका की धुंध पैदा कर देते थे।”वह मुख्यमंत्री कार्यालय से फोन आया है। शाम को राजधानी के एक होटल में कार्यक्रम के लिए बुलाया है।”नगेंद्र ने कहा।
नगेंद्र की आशंका के विपरीत हरमन सिंह ने धीमी आवाज में कहा”ठीक है।”उससे नगेंद्र की स्थिति छुपी नहीं थी।  तीन महीने बाद नगेंद्र को अपनी बेटी की शादी भी करनी थी।”“राजेंद्र से बात हो गई क्या?”हरमन सिंह ने पलंग से बैठते हुए पूछा। नगेंद्र इस प्रश्न के लिए पहले से ही तैयार था। मैं होलू (बेटे ) से कह कर उसे बुलवा देता हूं। आप ही उससे बात कर लें। राजेंद्र पुश्तैनी मकान के दूसरे हिस्से में रहता था। बंटवारे में हरमन सिंह नगेंद्र के हिस्से आया और दोनों भाइयों के हिस्से आया अबोलापन ! राजेंद्र को पता था कि पिता के दबाव के कारण ही नगेंद्र उसे ले जाने के लिए तैयार हुआ होगा। साजिंदों के कारण उन्हें एक दूसरे के कार्यक्रमों की सूचना मिलती रहती थी। उम्र और बीमारी के तकाजे ने हरमन सिंह को कार्यक्रमों की प्रस्तुति से दूर कर दिया था। दोनों भाई अब अपने अलग-अलग कार्यक्रम करने लगे थे। बहुत जरूरी होने पर ही हरमन सिंह उनके साथ जाता था। एक-दो बार तो राजेंद्र नगेंद्र को बिना बताए पिता को भी अपने साथ कार्यक्रमों में ले गया। जब नगेंद्र को पता चला तो उसने राजेंद्र से कहा”काका रहे तो मेरे साथ और कार्यक्रमों में तू उन्हें ले जाए यह नहीं चलेगा।”हरमन सिंह ने कोशिश की थी दोनों भाई साथ-साथ कार्यक्रमों में प्रस्तुति दें लेकिन अविश्वास के कांटे झाड़ियों की शक्ल ले चुके थे। दोनों के पास अपनी-अपनी छोटी सेकंड हैंड कार थी जिसमें  साजिंदों के साथ वे प्रस्तुति देने जाते थे।
हरमन सिंह जैसे ही घर से बाहर निकल धूप के सामने आया ,  उसकी चौंधियायी-सी आंखों के सामने खड़ी दोनों कारों में उसको बैठाने की प्रतिस्पर्धा होने लगी। अक्सर पिता के साथ जाते नगेंद्र और राजेंद्र में यही झगड़ा रहता था कि पिता किसकी गाड़ी में जाएंगे? अधिकांश मौकों पर सफलता छोटा होने के कारण राजेंद्र को मिलती थी। पिता का राजेंद्र की कार में बैठना आज नगेंद्र के चेहरे पर गहरी शिकन छोड़ गया था क्योंकि मामला सरकारी कार्यक्रम का था। कहीं राजेंद्र इस मौके का फायदा न उठा ले और वह हाथ मलता रह जाए।
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हरमन सिंह होटल के बाहर बरामदे में लंबे इंतजार की थकान से पस्त होकर सीढ़ियों से उतर कर गमलों के पास बैठ गया। कार्यक्रम की समाप्ति पर कुछ देर मुख्यमंत्री ने उसे बात करने के लिए रोक लिया था। गमले के पास बैठे उसने सोचा शायद नगेंद्र और राजेंद्र की गाड़ियां होटल के मुख्य गेट पर उसका इंतजार कर रही होंगी क्योंकि यहां उन्हें रुकने नहीं दिया गया होगा। चप्पे-चप्पे पर तैनात पुलिसकर्मी देख उसे रात में चमकता यह होटल एक अभेद्य दुर्ग की तरह दिखने लगा। बाहर मुख्य गेट पर जब हरमन सिंह को इंतजार करते काफी समय हो गया तो वहां तैनात एक महिला पुलिस कांस्टेबल ने उससे पूछा”बाबा किसका इंतजार कर रहे हो?”हरमन सिंह ने जब अपने बेटों के बारे में बताया तो उसने विस्मय से कहा”बाबा उन दोनों गाड़ियों को तो यहां से निकले  काफी समय हो गया। आपके पास उनके मोबाइल नंबर हैं क्या ?”
हरमन सिंह का कभी मोबाइल से नाता नहीं जुड़ पाया था। बेटे भी नहीं चाहते थे कि वह मोबाइल रखें और कोई भी व्यक्ति सीधा कार्यक्रम में प्रस्तुति के लिए हरमन सिंह से बात करे। वह अकेला कहीं आता-जाता भी नहीं था इसलिए उसे कभी मोबाइल की जरूरत महसूस नहीं हुई।
“नंबर तो याद नहीं है,  शुरुआत के तीन अंक याद हैं -नौ,  चार, सात …।”हरमन सिंह ने अपनी याददाश्त टटोलते हुए कहा।
“तीन अंकों से क्या होगा बाबा ? मोबाइल नंबर दस अंको का होता है। आप चाहो तो वहां केबिन में बैठ जाओ मैं भीतर जाकर हमारे अफसर से बात करती हूं। क्या पता वहां आपके बेटों का नंबर उनके पास मिल जाय।”महिला कांस्टेबल ने सांत्वना देते उसे कहा।””रहने दे बेटी,  तेरे अफसरों के पास कहां मेरे बेटों का नंबर होगा? सुबह फोन भी मुख्यमंत्री कार्यालय से गया था और इतनी रात गये वह तो बंद हो चुका होगा। वैसे भी जिन्हें फोन कर बाप की याद दिलानी पड़े उन्हें फोन ना करना ही बेहतर है। लाने के लिए दोनों भाई व्याकुल रहते हैं और छोड़ने के लिए दोनों अनिच्छुक !”उसने इशारे से सड़क के कोने से आती रोशनी को देखकर पूछा”बेटी, वहां क्या है ?”
“वह ? वह तो चाय की दुकान है। पर बाबा इतनी रात को ठंड में कहां जाओगे? आप केबिन में बैठो, मैं वहीं चाहे मंगवा देती हूं।”महिला कांस्टेबल ने नर्म स्वर में कहा।
“रहने दे बेटी, मैं खुद ही वहां चला जाता हूं। वहां आग जल रही है तो थोड़ा ताप भी लूंगा। हरमन सिंह इस होटल की अभिजात्यता और कोलाहल से दूर एकांत के लिए तड़पते हुए बोला।
हरदयाल की चाय की गुमटी पर एक व्याकुलता पसरी थी। मुख्यमंत्री के होटल से निकलते ही पत्रकारों को उसकी ‘बाइट’ लेनी थी। हरमन सिंह के होटल की भव्यता के घेरे से बाहर आने का इंतजार कर रहे पत्रकारों के लिए  वह होटल की कुलीनता के फ्रेम से असंगत लग रहा था। हरमन सिंह ने जैसे ही पानी पीकर जग मेज पर रखा,  पहला सवाल सामने था।”बाबा आप इस होटल में क्या कर रहे थे?” एक पत्रकार ने पूछा। दूसरे पत्रकार ने हरमन सिंह के पारंपरिक लिबास को देख कर कहा”मेरी अभी होटल के अंदर एक विधायक से फोन पर बात हुई है। आज शाम लोकगीत का कार्यक्रम था। यह उसी कार्यक्रम में प्रस्तुति देने आए थे। है ना बाबा? पर बाबा आप यहां क्या कर रहे हैं? आप अपने साथियों के साथ गए नहीं?”इस नुकीले सवाल से हरमन सिंह को बचाया हरदयाल की आवाज ने-”बाबा चाय पियोगे ?”इस सर्द रात में वह चाय पीने ही तो आया था इस दुकान पर। उसने अपने कपड़ों की जेब को टटोला। हमेशा की तरह वहां रुपए नहीं थे। वह कभी भी बाहर प्रस्तुति देने जाते हुए रुपए नहीं रखता था। यह उसकी सालों पुरानी आदत थी। उसे अपनी इस आदत पर झुंझलाहट हुई।
उसने संकोच से झिझकते हुए कहा ”नहीं।” हरदयाल उसके जेब टटोलने से सारी बात समझ गया था उसने डिस्पोजल गिलास में चाय आगे करते हुए कहा”बाबा,  लो पियो।”
डिस्पोजल गिलास के कागज की तपन से बचने के लिए हरमन सिंह ने संकोच से पूछा”कांच का गिलास है क्या?”हरदयाल ने एक कांच के गिलास में चाय उसको पकड़ा दी। चाय की घूंट लेते हुए उसने देखा वह चारों ओर से पत्रकारों से घिरा था और उनके मोबाइल उसका वीडियो बना रहे थे।”बाबा अंदर कितने विधायक हैं ? कोई अंदाजा या कोई गिनती ?”एक पत्रकार ने पूछा।
विधायक … ऊब और नीरसता से उसके लोक गायन को सुनते विधायक,  बार-बार घड़ी और इधर-उधर देखते विधायकों की संख्या कितनी होगी उसने सोचा।
“मुख्यमंत्री आप को कैसे दिख रहे थे? खुश कि परेशान”एक सवाल उसकी ओर बढ़ा।
मुख्यमंत्री… रामनिवास से उसकी पहली मुलाकात करीब तीस साल पहले एक शादी में हुई थी। तब तो रामनिवास विधायक भी नहीं बना था। सामान्य पृष्ठभूमि व महत्वकांक्षा से लबरेज आंखों वाले रामनिवास ने उससे तब कहा था”लोकगीतों की मिठास मुझे बहुत प्रिय है।”गरीब, सादगी पसंद और ऊर्जावान रामनिवास की स्मृति अभी भी उसके पास थी। उसके बाद भी दो-तीन कार्यक्रमों में उससे मिलना हुआ लेकिन ज्यादा बात नहीं हुई। उसे रामनिवास की याददाश्त पर आश्चर्य हुआ कि सालों बाद भी उसे उस मुलाकात की याद थी इसीलिए उसने उसे आज कार्यक्रम में बुलाया था। अंतर्यामी मुद्रा में मिले रामनिवास से उसे उन घरेलू औरतों की याद आ गई जिन्हें अपने घर के प्रत्येक कोने में रखी चीजों का पता होता है। ठीक उसी तरह रामनिवास को भी होटल में एक-एक विधायक का पता था।
तभी मुख्यमंत्री का काफिला होटल से निकला तो सारे पत्रकार उधर चले गए। हरदयाल ने नमकीन का पैकेट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा”लो,  खा लो और चाय लाऊं ?”हरमन सिंह सुबह से भूखा था। जब तक हरदयाल चाय ले कर आया,  नमकीन का पैकेट खाली हो चुका था। हरदयाल ने मुस्कुराते हुए उसे दूसरा नमकीन का पैकेट दिया। हरदयाल के छोटे लड़के ने उसे मोबाइल दिखाते हुए हर्ष से कहा”बाबा, आप तो फेसबुक पर भी हो !”हरनाम सिंह ने मोबाइल पर अपनी जवानी की फोटो देखी और हंसते हुए कहा”हां, मेरे पोते होलू ने यह सब कर रखा है।”
“मैं इस प्रोफाइल पर मैसेज छोड़ दूं क्या आपके बारे में ?”हरदयाल के छोटे लड़के ने पूछा।”नहीं,  रहने दो।”हरमन सिंह ने चाय का खाली गिलास रखते हुए कहा।
पत्रकार लौट आए थे। एक पत्रकार ने झल्लाहट भरे स्वर में कहा”मुख्यमंत्री की सुई पिछले तीन दिनों से एक ही बात पर अटकी हुई है -लोकतंत्र को तार-तार नहीं होने दिया जाएगा।”
चाय में बिस्कुट डुबाते हुए कनखियों से हरमन सिंह को देखते एक पत्रकार ने कहा”बाबा बुरा मत मानना,  अभी अंदर कुछ विधायकों से मेरी बात हुई थी। आज शाम के आपके उबाऊ लोक गायन के कार्यक्रम ने अंदर का माहौल बिलकुल ‘बोरिंग’ बना दिया है। पिछली दो शाम से बढ़िया रंगारंग कार्यक्रम हो रहे थे।”दूसरे पत्रकार ने चुटकी लेते हुए कहा”बेटा आज रात भर अपने चहेते विधायकों से बात कर लो,  मुझे खबर मिली है सुबह सभी विधायकों के मोबाइल जमा कर लिए जायेंगे।”
एक पत्रकार ने गुटका थूकते हुए कहा”वैसे भी बहुत भाव -ताव कर लिया इन विधायकों ने,  अब तो फाइनल एम.आर. पी ( अधिकतम खुदरा मूल्य ) तय होनी चाहिए।”
“उनकी मौज तो इसी में है साहब, कि यह सियासी ड्रामा लंबा चले। ऐसे मौके बार-बार कहां मिलते हैं। हाय लगेगी इन सब को हरेंद्र कुमार की। आखिर सारा पैसा तो उसकी जेब से ही जा रहा है। बाबा आपने हरेंद्र कुमार को अंदर देखा था क्या ?”होटल के झरोखों से बाहर झांकती आकृतियों की ओर इशारा करते हुए एक पत्रकार बोला।
हरमन सिंह ने होटल की खिड़कियों की ओर देखते हुए जवाब दिया”मैं हरेंद्र कुमार को नहीं जानता।”
“आप हरेंद्र कुमार को नहीं जानते? बाबा आप कौन सी दुनिया में रहते हैं? आपके मुख्यमंत्री के कई फाइनेंसरों में से एक है हरेंद्र कुमार और इस सियासी ड्रामे का एकमात्र प्रोड्यूसर !”एक पत्रकार ने हरमन सिंह की अज्ञानता मिटाते हुए कहा। अधिकांश पत्रकारों के घर जाने के बाद हरदयाल की दुकान में छाई खामोशी के बीच हरमन सिंह को वह महिला कॉन्स्टेबल आती दिखाई दी जो उसे मुख्य द्वार पर मिली थी। उसने हरमन सिंह से कहा”बाबा इस ठंड में कहां सोओगे? चाहो तो वहां अंदर केबिन में सो जाओ। सुबह मैं अपने अफसर से बात करूंगी आपको घर भिजवाने के लिए।”
हरदयाल ने बिस्कुट का पैकेट देते हुए हरमन सिंह से कहा”मैंने बेटे को घर रजाई लाने भेज दिया है। रात काफी हो गई है ,  नहीं तो खाना भी मंगवा लेता। दुकान में दोनों के सोने के लिए पर्याप्त जगह है। हरमन सिंह ने स्नेह से देखते हुए कहा”भाई क्यों परेशान हो रहे हो? वैसे भी मुझे नींद नहीं आ रही।”
रजाई में दुबकने के बाद भी सच में हरमन सिंह को नींद नहीं आयी। उसने सोचा घर पहुंचने पर जब उसके दोनों लड़कों को उसकी अनुपस्थिति का पता लगेगा तो फिर एक दूसरे से इस बात के लिए लड़ेंगे कि कौन वापस उसे लेने जाएगा। शायद ‘लिफाफे’ के लालच में फिर कोई आने को तैयार हो। लेकिन लिफाफा तो उसे कल कार्यक्रम के बाद मिला ही नहीं था। उससे किसी ने मेहनताने के बारे कोई बात नहीं की। उसने भी सरकारी मामला समझ कर नजरअंदाज करना ही उचित समझा। लिफाफे की गैरमौजूदगी उसके बेटों में एक नई लड़ाई को जन्म दे सकती है। उसकी खांसी ठंड का सहारा पाकर मुखर हो गई थी। उसने सोचा यहां प्राण निकल जाए तो भी क्या बुरा है? वैसे भी हरदयाल उसे बता ही रहा था कि जहां अब होटल है वह कभी शमशान की भूमि थी। उसे कबीर की और उसके ‘मगहर’ की याद आयी।
रहना नहीं देस बिराना है।
यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है।
यह संसार काँटे की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है।
कबीर का यह पद गुनगुनाते हुए नींद आ गयी।
सुबह हरदयाल के छोटे बेटे ने उसे बताया कि सोशल मीडिया पर हरमन सिंह के निधन की अफवाह रात को किसी ने फैला दी थी। जो ‘वायरल’ हो गयी। इसी अफवाह के चलते मुख्यमंत्री समेत अनेक लोगों ने श्रद्धांजलि के ट्वीट भी कर दिए हैं। हरमन सिंह ने चिंतित स्वर में कहा”मेरा पोता होलू फिक्र कर रहा होगा।”हरदयाल ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा”मेरा बड़ा बेटा टैक्सी चलाता है। मैं उसे बुलाता हूं। वह तुम्हें तुम्हारे गांव छोड़ आएगा। महिला कॉन्स्टेबल की रात की ड्यूटी समाप्त हो चुकी थी। वह स्कूटी लेकर अपने घर की ओर निकली तो चाय की दुकान पर हरमन सिंह को देख रुक गयी। जब उसे हरमन सिंह के घर ना जाने का पता लगा तो उसने कहा,”यह ठीक रहा बाबा। घर तो आखिर घर ही होता है । मेरे बेटे के स्कूल की परीक्षा चल रही है। यह होटल से कितना दूर है,  घर पहुंचने में एक घंटा लग जाता है। मेरे लिए तो यह होटल का तमाशा जितनी जल्दी खत्म हो उतना ही अच्छा है।”
हरदयाल ने हंसते हुए कहा”बेटी बड़ी मुश्किल से तो मेरी दुकान पर रौनक आई है। तुम क्यों तमाशा खत्म करा कर मेरी दुकानदारी ठप कराना चाहती हो ? वहां खड़े एक युवा पत्रकार ने हरदयाल से सहमति दर्ज कराते कहा,”सही कहा बाबा आपने। आपकी तो घर वापसी हो गई बाबा परंतु इन विधायकों की न जाने कब होगी।”

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