बाशी और मुर्मू साथ पढ़ते – पढ़ते अच्छी सहेलियाँ बन गयी थी | वह दोनों स्विट्जरलैंड के रॉयल इन्टरनेशनल स्कूल में कक्षा तीन की छात्राएँ थी | ये एक बड़ा और मंहगा स्कूल था, जिसमें कई देशों के बड़े अधिकारियों और उद्योगपतियों के बच्चे ही पढ़ते थे | बाशी जापान और मुर्मू बांग्लादेश की रहने वाली थी | दोनों की मातृभाषाएँ अलग थी, जिससे वह स्कूल की अनिवार्य भाषा अँग्रेजी में बातें किया करती थी |
वह दोनों रूम-मेट भी थी | साथ पढ़ती, साथ खेलती और आपस में दोस्ताना लड़ाई – झगड़े भी करती| बाशी कभी मुर्मू की चोटी खींच लेती, तो मुर्मू  भी उसकी पीठ पर हौले से धौल जमाने में न चूकती | बाशी चीख कर उसे पकड़ने के लिये दौड़ती, तो मुर्मू भी हॉस्टल में चीखकर हँगामा कर देती | वार्डन सब समझती थी, सो दोनों को डांट कर चुप करा देती और दोनों फिर से चुपचाप पढ़ाई करने लगती |
स्विट्जरलैंड में सर्दियों की छुट्टियाँ हुई तो दोनों सहेलियाँ भी एक महीने के लिये अपने देश वापस लौट गयी | मुर्मू के अब्बा एक बड़े व्यापारी थे, जिनका कई देशों में आयात – निर्यात का कारोबार था | उन्होंने गर्मी की छुट्टियों में सपरिवार विदेश पर्यटन की योजना बनायी थी | सो, मुर्मू के आते ही वह लोग अगले हफ्ते की फ्लाइट पकड़कर रवाना हो गये | वह लोग बैंकॉक आये थे, जो थाईलैंड की राजधानी थी | वहाँ उनका परिवार एक होटल में ठहरा और घूम – घूम कर शहर के पर्यटन स्थलों का आनन्द उठाने लगा | 
मुर्मू को वहाँ के खूबसूरत पार्क और सुनहरे बौद्ध मन्दिर खूब पसन्द आये थे | उसकी इच्छा कोई ऐतिहासिक स्थल भी देखने की थी | उसके अब्बा ने बताया कि इस देश में अभी भी किस्से – कहानियों वाले राजा- रानी का ही शासन चलता है | मुर्मू को आश्चर्य के साथ जिज्ञासा भी हुई | अतः एक दिन उसके परिवार ने वहाँ के राजा का प्रसिद्ध राजमहल देखने का निश्चय किया |
वह सब अगले दिन राजमहल जा पहुँचे | वहाँ भी पर्यटकों की खूब भीड़ थी | एक विशाल झील के बीचोबीच राजा का शानदार महल बना था | सामने दर्जनों फव्वारे चल रहे थे | साफ पानी में सूरज की तेज रोशनी पड़ने से शीशे जैसी चमक परावर्तित होकर महल पर पड़ रही थी, जिससे सारा महल चमचमा रहा था | भीड़ के बीच मुर्मू और उसका परिवार भी मंत्रमुग्ध सा घूमने लगा |
तभी मुर्मू की नजर लगभग पचास मीटर दूर खड़ी एक सुन्दर लड़की पर पड़ी | वह राजकुमारियों जैसे बेहद सुन्दर और महँगे कपड़े पहने महल की ओर देख रही थी | उसके अगल – बगल काफी भीड़ थी | कुछ लोग सुरक्षाकर्मियों जैसी वर्दी भी पहने थे | बाशी को पहचानते मुर्मू को देर न लगी | उसे बहुत अच्छा लगा | उसने खुशी के मारे ज़ोर से पुकारा – “बाशीssss”| 
लेकिन बाशी न सुन सकी | मुर्मू की आवाज भीड़ के शोर में दब गयी थी | लेकिन अब वह अपने को रोक न सकी | वह भीड़ के बीच तेजी से घुसते हुए बाशी की ओर लपकी | छोटी बच्ची होने के कारण उसे कोई असुविधा न हुई | देखते ही देखते वह भीड़ के बीच घुसते हुए बाशी के पीछे जा पहुँची | उसे गुस्सा भी आया था कि इतनी ज़ोर से पुकारने के बावजूद बाशी उसकी आवाज नहीं सुन सकी थी |
अपनी दोस्ती के स्वभाव अनुसार उसने नजदीक पहुँचते ही बाशी की पीठ पर एक ज़ोर का धौल जमाया – “बाशी की बच्ची, रोकने से रुकती भी नहीं |” 
लेकिन गलती यह हुई कि मुर्मू के मुँह से ये वाक्य उसकी मातृभाषा बांगला में निकले थे, जिसे वहाँ कोई समझ नहीं पाया था | जबकि आगे की ओर जा रही बाशी की पीठ पर पीछे से अचानक यह धौल पड़ते ही उसके मुँह से चीख निकल गयी और वह संभलते – संभलते भी लड़खड़ा कर आगे की ओर गिर पड़ी | 
“अरे पकड़ो, किसी ने बाशी पर हमला किया है, बचाओ उसे |” – जापानी भाषा में चीखते सुरक्षाकर्मियों की भीड़ ने बाशी को उठाया | – “अरे, उसे फर्स्ट-एड दो, कहीं ज्यादा चोट तो नहीं लग गयी ?” कुछ लोग बाशी को उठाकर भीड़ से बाहर एक सुरक्षित जगह की ओर दौड़े | 
किसी ने कहा – “अरे, उसे भी पकड़ों, जिसने हमला किया है|” कुछ सुरक्षाकर्मियों ने मुर्मू को भी ज़ोर से पकड़कर घेर लिया और उसे भी खींचते हुए उसी सुरक्षित जगह की ओर लेकर चल दिये |
 “मुझे छोड़ दो, मैंने जानबूझकर कुछ नहीं किया | वह मेरी दोस्त है |” – यह सब देख मुर्मू ज़ोर – ज़ोर से रोने लगी, लेकिन उसकी बांग्ला भाषा के कारण वहाँ कोई उसकी बात समझ नहीं पा रहा था | 
तभी मुर्मू को कुछ याद आया – “उसने ज़ोर से पुकारा – “अब्बूssss अब्बूsssss ! बचाओ मुझे |” 
उसके अब्बू भी मुर्मू को ही खोज रहे थे | बांग्ला भाषा में आयी यह चीख सुनकर उन्हें किसी अनहोनी की आशंका हुई | वे आवाज की दिशा में दौड़ पड़े | भीड़ की हलचल देखकर उन्होने जल्द ही मुर्मू को खोज लिया | सुरक्षाकर्मियों से अँग्रेजी में पूछा – “मेरी बेटी मुर्मू के साथ आखिर यहाँ हो क्या रहा है ?” 
सुरक्षाकर्मियों ने बताया कि वह जापान के राजदूत की बेटी बाशी के बॉडीगार्ड हैं | इस लड़की ने उसे अचानक पीठ पर धक्का देकर गिरा दिया था | 
“अब्बू ! ” – उन्हें सामने देख मुर्मू ने झटके से अपना हाथ छुड़ाया और दौड़कर रोते हुए उनसे लिपट गयी | वह डर के मारे कुछ बोल नहीं बोल पा रही थी |
उसे सांत्वना देते हुए अब्बू बोले – “मेरी बेटी ऐसी नहीं है, जरूर कोई गलतफहमी हुई होगी |” वह चारों तरफ खड़े सुरक्षाकर्मियों से बहस करने लगे |
तभी अचानक ही डरी हुई मुर्मू की फिर से चीख निकल गयी – “आsssआह…..|” अब्बू ने घबराकर पूछा – “क्या हुआ बेटी ?” 
मुर्मू ने सहमते हुए कहा – “किसी ने अभी ज़ोर से मेरी चोटी खींची |”
“चोटी …..? यहाँ तेरी चोटी कौन खींचेगा ?” – वह आश्चर्यचकित होते हुए बोले |
“मैं हूँ मुर्मू ! तेरी बेस्ट फ्रेंड बाशी, और कौन खींचेगा ? हाहाहाहा |” – इस मधुर स्वर में वहाँ जैसे अनेक घंटियाँ बज उठी थी | अँग्रेजी में बोले गये ये वाक्य सभी की समझ में आये थे |
       सबने चौंककर देखा, वह सुरक्षाकर्मियों के पीछे चुपके से आकर खड़ी बाशी ही थी | उसके बाएँ हाथ पर चोट के इलाज वाली एक छोटी सी मरहम- पट्टी चिपकी थी | अब तक वह सामने आ गयी और मुर्मू को अपनी ओर खींचते हुए बोली – “भेंट नहीं करेगी अपनी आफत की पुड़िया से ?” 
      समवेत हँसी का ठहाका छूटा | दोनों सहेलियाँ एक दूसरे से स्नेहवश चिपक गयी थी | कुछ गिले-शिकवे भी फूट पड़े – “तूने बताया नहीं था कि सर्दी की छुट्टियों में बैंकॉक जायेगी ?” 
– “तूने भी तो नहीं बताया था कि तू भी बैंकॉक ही आयेगी ?”
“हाहाहाहा” – ……और अब इस यादगार पर्यटन की शाम को वह दोनों ठहाके लगाते हुए सपरिवार जापानी दूतावास में रात का भोजन कर रहे थे | कहीं कोई गिला शिकवा नहीं था |

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