संपादकीय : पद्म सम्मानों के बहाने कुछ बातें 3

ग़ौर करने लायक बात यह है कि विदेशों में पांच सम्मान साहित्य एवं शिक्षा के लिये घोषित किये गये हैं मगर इनमें से एक भी किसी हिन्दी लेखक या संस्था संचालक के लिये नहीं है। ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा एवं यूरोप में हिन्दी लेखक केवल लिखने का काम नहीं करते। बल्कि वे हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये भी बहुत से कार्यक्रमों का  आयोजन करते हैं। ठीक उसी तरह हमारे मीडिया कर्मी भी रेडियो और टीवी के ज़रिये भारतीय प्रवासियों को भारत से जोड़े रखने में विशिष्ट भूमिका निभाते हैं।

गणतन्त्र दिवस 2020 की पूर्वसंध्या पर जारी की गयी सूची में कुल मिला कर 141 विभूतियों को भिन्न भिन्न श्रेणियों में पद्म पुरस्कारों से नवाज़ा गया। 7 पद्म विभूषण, 16 पद्मभूषण एवं 118 पद्मश्री सम्मानों की घोषणा की गयी। उल्लेखनीय बात यह है कि हर श्रेणी में विदेश से कोई न कोई नाम शामिल है। कुल मिला कर अमरीका  से 5, ब्रिटेन एवं बांग्लादेश से दो दो व कना़डा, फ़्रांस, ब्राज़ील, मॉरीशस, अफ़ग़ानिस्तन और इंडोनेशिया से एक एक व्यक्ति का चयन हुआ है।

मॉरीशस के भूतपूर्व राष्ट्रपति सर अनिरुद्ध जगन्नाथ को पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया तो सयद मुअज़्ज़म अली (राजनीतिज्ञ – बांग्लादेश, एवं प्रो. जगदीश शेठ – साहित्य एवं शिक्षा – अमरीका के लिये पद्मभूषण की घोषणा हुई।

ब्रिटेन के दो सांसदों बॉब ब्लैकमैन (सांसद – हैरो पूर्व, कंज़र्वेटिव पार्टी) एवं बैरी गार्डिनर (सांसद – उत्तरी ब्रेण्ट – लेबर पार्टी) को भी पद्मश्री से अलंकृत किया जाएगा। बॉब ब्लैकमैन और बैरी गार्डिनर भारत के अभिन्न मित्र हैं और हर स्थिति में भारत के साथ खड़े दिखाई देते हैं। 

बैरी गार्डिनर तो गुजराती और हिन्दी के बहुत से वाक्य बोल लेते हैं जबकि बॉब ब्लैकमैन के बारे में कहा जाता है कि उनका शरीर अंग्रेज़ है और आत्मा भारतीय। 

अन्य पद्मश्री सम्मान पाने वालों में शामिल हैं – सुश्री लिया डिस्किन – सामाजिक कार्यकर्ता – ब्राज़ील; श्री इनामुल हक़ – भूगर्भविज्ञान – बाँगलादेश; श्री एस.पी. कोठारी – साहित्य एवं शिक्षा – अमरीका; डॉ. पृथ्विंदर मुखर्जी – साहित्य एवं शिक्षा – फ़्रांस; डॉ. तेत्सु नाकामुरा – सामाजिक कार्यकर्ता – अफ़गानिस्तान (मरणोपरान्त); डॉ. प्रसन्त कुमार पटनायक – साहित्य एवं शिक्षा – अमरीका; श्री रॉबर्ट थुरमैन – साहित्य एवं शिक्षा – अमरीका; श्री एगस इन्द्र उदायना – सामाजिक कार्य – इंडोनेशिया; डॉ. रोमेश टेकचन्द वाधवानी – व्यापार एवं उद्योग – अमरीका; एवं श्री प्रेम वत्स – व्यापार एवं उद्योग – कनाडा…

ग़ौर करने लायक बात यह है कि विदेशों में पांच सम्मान साहित्य एवं शिक्षा के लिये घोषित किये गये हैं मगर इनमें से एक भी किसी हिन्दी लेखक या संस्था संचालक के लिये नहीं है। ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा एवं यूरोप में हिन्दी लेखक केवल लिखने का काम नहीं करते। बल्कि वे हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये भी बहुत से कार्यक्रमों का  आयोजन करते हैं। ठीक उसी तरह हमारे मीडिया कर्मी भी रेडियो और टीवी के ज़रिये भारतीय प्रवासियों को भारत से जोड़े रखने में विशिष्ट भूमिका निभाते हैं।

इन तमाम गतिविधियों के लिये उन्हें भारत सरकार से कोई वित्तीय सहायता भी नहीं मिलती और ये तमाम काम अपने निजी साधनों से किये जाते हैं। सच तो यह है कि भारत का हर लेखक या प्रकाशक एक सवाल ज़रूर पूछता है कि आप अपने यहां हिन्दी के प्रोग्राम क्यों नहीं करवाते… या फिर आप हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये अपने देश में क्या कुछ करते हैं।

अमरीका में हर साल हिन्दी के कवि सम्मेलन राष्ट्रीय स्तर पर करवाए जाते हैं। कनाडा में हिन्दी राइटर्ज़ गिल्ड के माध्यम से बेहतरीन कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। ब्रिटेन में हिन्दी कार्यक्रमों का आयोजन ब्रिटेन की संसद में किया जाता है। यहां कई संस्थाएं साहित्यिक गतिविधियों को लेकर सक्रिय हैं।  

इन तमाम देशों के  ऐसे कई साहित्यकार रचनाशील हैं जिन्हें प्रवासी हिन्दी साहित्यकार कहा जाता है। उनमें से बहुत से लेखकों को ब्रिटेन की महारानी, भारत के राष्ट्रपति, भारत के कई प्रदेशों की साहित्य अकादमियों व भारतीय उच्चायोगों द्वारा हिन्दी साहित्य के लिये सम्मानित किया जा चुका है।

तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

3 टिप्पणी

  1. पद्म सम्मानों पर आपका लेख बहुत जरूरी और सार्थक लगा, सचमुच हिंदी के प्रचार-प्रसार में प्रवासी साहित्यकारों की भूमिका स्तुत्य है,वे बडा काम कर रहे हैं, भारत सरकार को उन्हें भी सम्मानित करना और उनके विशिष्ट योगदान के लिए आर्थिक मदद देनी चाहिए,, मैं आप के द्वारा हिन्दी के लिए किये जा रहे प्रयासों की सराहना करती हूं,,जय हिन्द,जय भारत,जय हिन्दी,,
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं—-पद्मामिश्रा जमशेदपुर झारखंड,भारत

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