
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु ने मीडिया को दो धड़ों में बांट दिया है। एक तरफ़ वो मीडिया जो चिल्ला चिल्ला कर रीया चक्रवर्ती को दोषी घोषित कर चुका है। तो दूसरी तरफ़ वो मीडिया है जिसको देख कर साफ़ पता चलता है कि उन्होंने पैसे लेकर रिया को एक प्लैटफॉर्म देने का काम किया है। यदि अर्णव गोस्वामी पहले धड़े के नेता हैं तो राजदीप सरदेसाई दूसरे दल के सरगना।
बहुत सही चित्र उकेरा है। मीडिया अब न्यूज़ नही, व्यूज़ देती है। सबकी अपनी अपनी लॉबी है, अपने अपने एजेंडे। रही बात राजदीप सरदेसाई की, तो उसे मैं कतई पत्रकार नहीं मानती। एक नौजवान की असमय मृत्यु को सभी ने trp का मैदान बना लिया है।
माननीय संपादक महोदय जी ने इस लेख के माध्यम से मीडिया के मध्य तटस्थता का दिखाने का प्रयास किया है।
यह मीडिया की चिल्लाहट की वजह से ही घाघ ड्रग्स माफिया को उजागर होने की संभावना है… पाकिस्तान का डी भारत में धुआं धुआं कर बिकता है…उसी धन से आतंकियों का मंसूबा बढ़ता है…
यह उचित समय है जिसमें सरकार को मीडिया की आचार संहिता
निर्धारित करनी होगी तभी समस्या का समाधान सम्भव है।
सम्पादकीय में भी आप यही संकेत दे रहे हैं।
शुक्रिया
प्रभा मिश्र