ओ आषाढ़ के काले घन,
बरसो न यों रीते मन,
पावस की पुरवैया लाओ,
व्योम के आगोश से आओ,
करो दूर धरा की अगन,
ओ आषाढ़ के काले घन…।
घनघोर घटा के चित्र बना,
रवि संग मिल रंगोली सजा,
न खेलो आँखमिचोली गगन,
चित्रकार ज्यों खुद में मगन?
बरसो बन सतरंगी मन,
ओ आषाढ़ के काले घन…।
गरज गरज क्यों करे है शोर,
मन मुड चले प्रिय की ओर,
बरसो झूम,नाचे मन मोर,
चातक तके निर्निमेष नयन,
बरसो प्रेम बन धरा गगन,
ओ आषाढ़ के काले घन…।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.