सुनीता खोखा की कविता - मुहब्बत के चश्मे 1
  • सुनीता खोखा

तुम्हारी बनाई हुई सरहदें
मेरे मीठे गीतों को
कैद नहीं कर पाएंगी…
मैं
खुश्बू में लिपटे हुए
नग्में लिखती हूँ
उनके लिए
ये नफ़रत की दीवारें
बहुत छोटी हैं…..
तुम
सत्ता की भूख से  बेहाल
कत्लो-गारत फैलाते हो
नस्लों को नशे में डूबो
बारूद बोते हो
हवाओं को खौफजदा कर
चाहते हो तुम
कि-
जुबानों पर लग जाएं ताले
कलम हो जाए तुम्हारी बन्धक
पर भूल जाते हो ये
कि -शबनम की बूंदें
हुक्म नहीं बजाती
परिंदे गुलामी नहीं करते
बारिशें
हुक्मरानों के इशारे नहीं समझती
कोई शहनशाह नहीं चुरा सका
तितलियों के परों से रंग
चांदनी बेधड़क बरसती है
महल व झोंपड़ी में संग संग
सुनो
बोटियों की तरह
बच्चियों का सौदा कर
आबरू का नाम ले
बहनों पर पहरे धर
कमसिन हाथों में बंदूक थमा
भाई को भाई से लड़ा
तुम लाख अन्धेरे फैलाओ..
तुम लाख अन्धेरे फैलाओ..
मैं …डरूँगी नहीं
मैं..जन्मती रहूंगी ऐसी औलाद
जो
हमेशा यकीन रखेगी
अमनो-चैन में
जो हमेशा मानेगी
ये कि
वक्त की टहनी पर उगेंगे
ऐसे लम्हें
जहां हसेंगे बच्चे खिलखिला कर
पाजेब के घुंघरुओं की आवाज
दबा लेगी फौजी बूटों की टपटप को
जानते हो
अनन्त प्रकाशपुंजों को
सर्जती मैं
तुम्हारी वर्जनाओं को
सिर्फ और सिर्फ
इसलिए सहती आई हूँ
क्यों कि
मैं जानती हूँ
कि
मैं
इस धरती पर हूँ ही इसलिए
कि
खिलते रहें प्यार के फूल
और
सूखने न पाएं
मुहब्बत के चश्मे 💐💐💐
ई-मेलः sunitakhokha@gmail.com

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