अस्तित्व बचाने को
धुंध निहार रहा हूँ
ख़ुद को नही
ख़ुदा को मार रहा हूँ
ऊँचाई की चाह में
सीढ़ी बना रहा हूँ
गिरने के डर से
बिन दर्द कराह रहा हूँ…
माला की चाह में
मोती जुटा रहा हूँ
डूबने के डर से
नौका चला रहा हूँ…
पानी की चाह में
कुआँ खोद रहा हूँ
प्यासे की राह से
पानी हटा रहा हूँ…
कर्मों को तौलने
तराजू टटोल रहा हूँ
गुनाहों का मोलकर
सस्ते में बेच रहा हूँ…
नाव में छेद से
पानी को रोक रहा हूँ
डूबने से बचने
नदी में ही कूद रहा हूँ…
लहरों से लड़ने
हुंकार भरता हूँ
इसकी विकरालता से
मन को मोड़ता हूँ…