1 – भवितव्य
मैंने वक्त की आँखों में झाँक कर कहा -स्वप्न।
मेरी स्मृति से रिसने लगे खून।।
मैंने नीले आकाश को देख कर कहा-मैं उडूँगा  एक दिन।
मेरी इच्छा कैद कर दी गयी चाहरदीवारियों में।।
मैंने कहा आजादी हर साँस की कीमत।
मेरी आवाज को दफ़्न करने की कवायद शुरु हो गयी।।
हर जायज सवाल को धकियाते हुए कुछ लोग।
विपक्ष के रास्ते नेपथ्य में चले गए।।
मैंने वक्त की आग से जली डालियों से कहा।
अगर तुम उम्मीद पर हो तो तुम्हें अगले मौसम का इन्तज़ार करना चाहिए।।
कुछ लोग पेड़ों को काटने के बाद उनकी जड़ों को उखाड़ रहे थे।
यह समझ कर कि अब इनका जिन्दा होना मुमकिन नहीं।।
मैंने पलट कर अपने फटे जूते से कहा, तुम मेरा साथ दो।
ऐसा नहीं है कि कोई सर्दी जाए ही नहीं।।
मशाल जलाना जितना जरूरी नहीं है कठिन समय में।
उससे ज्यादा जरूरी है ज़ज़्बे को जलाए रखना।।
वह आदमी अपनी पीठ पर एक छिली हुई हँसी के साथ।
अब भी तेज-तेज चल रहा था पथरीले रास्ते पर।।
कुछ अनुमान बहुत सटीक होते हुए भी।
अक्सर सही नहीं होते हैं किसी के बारे।।
मैंने फिर से खुद पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए कहा।
सचमुच लड़ना कितना जरूरी है अपनी कमजोरियों से भी।।
तुम कोई धृतराष्ट्र की अंध इच्छा नहीं हो।
अपने भवितव्य को देख सकते हो लड़ते हुए अपनी आँखों से।
2 – वसंत के हक़ में फैसला
तानाशाह नहीं जानता है प्रेम की वेदना!
उसकी तलब़ग़ारियों के फेर में
जाने कितने फूल झड़ गए
कितने मौसम मर गए
और कितनी उम्मीदो ने कर ली खुदकुशी…
अब फिर वसंत आया है लौट कर
वक्त के दरवाजे पर
तो मैं
उसकी किसी भी उम्मीदवारी को करता हूँ ख़ारिज
और कहना चाहता हूँ उससे
कि तुम अपनी इच्छाओं के जहरीले फन समेट लो
ताकि जिन्दगी की हरी डाल पर यह फूल खिल सके।
एक बदकार शासक के लिए सबसे बड़ी चुनैती यही है
कि वह जब हवा में मुट्ठियाँ भींचकर
शब्दों को तोप के गोले की तरह उछाल रहा हो
तो ठीक उसी समय वसंत के हक़ में
दिया जाए फैसला
और कहा जाए उसे
अलविदा!
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