संदीप तोमर का व्यंग्य - पड़ोस उवाच 1
  • संदीप तोमर

हमारे पड़ोसी बहुत ही दिलचस्प हैं, मित्रता और यारी दोनो की अद्भुद मिशाल। आजकल तीर्थाटन पर थे। बोल गए ज्योतिप्रसाद जी जरा मकान का ख्याल रखिऐगा। बस हम यूँ गए और यूँ आये। हमें मालूम था कि पड़ोसी देश सेवक के न ही रिश्तेदार हैं ना ही उनके भक्त फिर कैसे यूँ  जा और यूँ आ सकते हैं।
बहराल जिम्मेदारी बड़ी चीज होती है। हालांकि हम ये सोचते रहे कि हिफाजत रखनी है या बस ख्याल रखना है। सवाल ये भी दिमाग की चक्करघिन्नी बनाये रहा कि चिन्ता उन्हें मकान की है या मकान के सामान की है। हम भी पांच दिन तक नजरें जमाये रहे। निगाह ताले पर गड़ाए रहे। मन मे सोचते रहे कि कोई साला ताले को नजर भर देखे भी तो उसकी आँखों को नोच डालें।मारे उसको कसकर दो भालें।
हमारी एक नजर पड़ोसी धर्म निभवा रही थी, दूजी बीवी से खुद को बचवा रही थी।
इस बीच अपने कामकाज एकदम ठप्प थे। लेखन में भी कोरे गप्प थे। हम पड़ोसी के तीर्थ की सफलता की कामना करते रहे। उधर ताला चोर हमारे कुफ्र से डरते रहे। यकीन मानिए। इन पांच दिनों में मोहल्ले भर में कोई वारदात नही हुई। और अपने लेखन की एक कदम आगे बढ़ी नही सूई।
बस अंतिम दिन एक चूक हुई। हमें जोर की हाजत लगी थी। यूँ तो हम जब भी लघु या दीर्ध शंका जाते थे तो एक असिस्टेंट बैठा जाते थे। लेकिन  कमबख्त उस वक़्त कोई असिस्टेंट नही था, और हमारा जाना जरूरी हो चुका था। बस इन आधे घण्टे में बंटाधार हुआ, तीर्थ समाप्ति के उदघोष हुआ। पड़ोसी आगमन हो चुका था यानी हमारा आचमन नष्ट हो चुका था। हमने एक बारगी मुस्तैदी का सबूत देने का मन बनाया। पड़ोसी को जाकर चेहरा दिखाया, जाते ही पड़ोसी बोले-” क्या ज्योतिप्रसाद जी आपको कोई जिम्मेदारी देने का क्या लाभ? जब हमारे ताला खोलने का आपको अहसास नही हुआ तो किसी के तोड़ने का क्या होता। आपके भरोसे तो ….।”
उनके अधूरे वाक्य ने सब कुछ बोल दिया था। पड़ोसी का सब विश्वास तोड़ दिया था।
हम समझ गए पड़ोसी पक्का घाघ है। ये प्रसाद न खिलाने का कुटिल प्रयास है।
हमारी सेवा समाप्त हो चुकी थी। की-बोर्ड हमें वापिस बुला रहा था। हम लेखन उपक्रम में जुट अपना मन हल्का करने का प्रयास कर रहे थे।

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