Saturday, May 18, 2024
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शशि श्रीवास्तव की कहानी – रौशनी रूबरू

नश्तर सी तीखी तेज धूप व लू के थपेडे कोई हमारे सामने आकर तो देखे चमडी ना उधेड दी तो…! वाले तेवरों में वसूली गैंग के गुंडो से समूचे परिवेश पर काविज थे। अम्मू  भी कम नहीं,  उनके तेवर भी उधेड देव, हम का डरते हैं वाले। मुकाबले के लिये तैयार। आदत के मुताबिक रुक रुक के दरवाजा खटखटा रही थीं।
“अब इतनी दोपहर में? नींद से बोझल आँखें लिये मै ऊबी उकताई  दृष्टि  से खिडकी का पल्ला खोलकर
गेट की ओर देखने लगी। गेट पर बाजी खडी थीं सर पे  कफन  की तरह सफेद दुपट्टा लपेटे।
“अरे ! इत्ती धूप में  आपको आना पडा ,   ताहिर?  उनके हाथ से सिले कपडों का पैकेट लेते हुये मैने पूछ लिया था।
“नाम ना लेव ऊ दइजार का”  दुपट्टे से मुंह का पसीना पोंछती अम्मू   बरामदे में ही बैठ गईं उनके बैठ जाने पर उनके चेहरे पर  निगाह पडी तो  पाया कि उनकी आँखें सुर्ख और पपोटे सूजे  हैं। और वे अपने आँसू पोछ रही थीं पसीना  नहीं पसीना  तो उनके आता ही नहीं वे कई बार बता चुकी थीं। लगा जैसे वे रास्ते भर रोती हुई आई हैं और अब भी उनके भीतर का गुबार शांत नहीं हुआ है। भीतर कहीं दर्द का दरिया बह रहा है  जिसकी नमी आँखों की   सतह पर ठिठक गई है। छूते ही धारों धार बरस पडेगी।   
“अंदर आइये यहाँ तो बहुत गर्मी है।” मैने कमरे के अंदर घुसते हुये उनसे कहा।आम दिनों में उस जगह से टस से मस ना होने वाली अम्मू  आज किसी आज्ञाकारी बच्चे सी मेरे पीछे चली आईं और दीवार का सहारा लेकर कटे पेड-सी ढह गई थीं।
क्या हुआ आज फिर ताहिर से कहा सुनी।
इससे पहले कि बाजी अपना मुँह  खोलें, गेट फिर खटका। मैने आंगन मे जाने की बजाय फिर खिडकी का सहारा लिया। गेट पर निशा खडी थी दुपट्टे से मुंह लपेटे।
“आज कालोनी जायेंगी ?” उसने मुझे देखते ही पूछ लिया।
“क्यो कुछ मंगाना है।
“मंगाना कुछ नहीं, ब्लाउज देने हैं ठीक कराने को। इस बार पता नहीं किसकी नाप के सिल दिये। मेरी नाप के तो हैं नहीं, कपडा बस मेरा है। इनका भी अब काम में मन नहीं  लगता।” एक सांस में ही उसने शिकायतों की गठरी खोल डाली। जब से मुन्नी थोड़ी सयानी हुई है और उसके नाज नखरे शुरू हुये हैं  तबसे ये आम धारणा बन गई है उनके बारे में  खासकर निशा की कि “अम्मू का मन अब काम में नहीं लगता एक आँख मुन्नी पे रहती है एक आँख से सिलाई करती हैं। फिर अच्छे काम की उम्मीद करना ही मूर्खता है। एक तो कपडा खराब कराओ ऊपर से सिलाई भी देव! ये अच्छा है।” निशा अक्सर मेरे सामने अम्मू में कीडे निकालने लगती है।
“फिर क्यों सिलाती हो अम्मू से ?” मेरे मुंह से औचक निकल गया था पर मैने आगे के शब्दों का बीच में ही गला घोट दिया था। अम्मू  की जैसी मनःस्थिति है उसमें वे किसी और के सामने अपना मुंह नहीं खोलेंगी अगर ये अंदर आइ तो वे चुपचाप  बिना कुछ कहे चली जायेंगी। अम्मू कपडे सबके सिलती हैं पर हर वक्त उनके सर पर लदी रहने वाली गठरी में बंद दुःख दर्दों की सीवन मेरे सामने ही उधेडती हैं। किसी को उनके बारे मे जानने की  ना इच्छा है और ना ही वक्त। वक्त तो मेरे पास भी नहीं पर अम्मू  के लिए निकाल लेती हूँ। मैं सोच रही थी फिर भी औपचारिकता निभाई।
अंदर आओ गेट खुला है।
“अभी नहीं अभी तो खाना भी नहीं बना।” कहती वो अपने घर की ओर मुड गई। इससे पहले कि मैं खिड़की बंद करूं, वो वापस मुडी और बोली,
“अरे हरी धनियां होगी जरा सी।”
“हाँ ले लो, आओ। मैने मुंह छूने भर को कहा था कि वह बोल पडी।
“अरे नहीं यहीं से पकडा दीजिये, रिंकी खाना मांग रही है, अभी  ब्लाउज दे जाऊँगी जरा उनको दे आइयेगा।” उसने कहा था। कुछ ही देर में वो ब्लाउज के साथ शिकायतों का पुलिंदा  फिर खोल गई।” 
“आधे अधूरे कपडे भेज दिये। पता नही चार दिनों में क्या कर लेंगी।” ठीक से सिले नहीं  तभी खुद देने नहीं आईं। तोते को छींक आ गई होगी, बस लेके बैठ गई होंगी।” निशा का गुस्सा सातवें आसमान पर चढा था।
“चिंता ना करो ठीक कर देंगी’ पहले भी तो कितनी बार ठीक।” मेरी बात के बीच में ही वो बोल पडी थी।
 “हुँह, पहले तो बहुत कुछ कर देती थीं पर अब तो उस तोते के नाज नखरों के मारे।   इतना काम फैला लिया है कि हमारे काम की तो चिंता ही नहीं, जानती है कि हम कहाँ जाने वाले! पिछली दीवाली की याद नहीं, ऐन पूजा के पहले ब्लाउज लेकर आई थी, पूजा में बिना धुला ब्लाउज पहनना पडा था मुझे।शाम को जायें तो देख लीजियेगा। ना सिल पायें तो वापस कर दें। फिर लौट कर देखूंगी।ना होगा तो फिर कोई और बुटिक ढूंढा जायेगा।” निशा का गुस्सा सातवें आसमान से नीचे उतरने को तैयार ही नहीं था। वो कई बार पहले भी अम्मू से आगे कपडे ना सिलाने की कसम खा चुकी थी पर हर बार लौट के बुद्धू घर को आये वाला मामला हुआ था। “अपने तोते से फुर्सत मिले तब ना! आप माने या ना माने जब से इनका तोता स्कूल जाने लगा है, तब से काम में मन नहीं लगता इनका।”
निशा को पूरा यकीन है कि मैं अम्मू की पैरोकार हूँ। सो उनकी गलतियों का बखान पहले मुझसे ही करती है। उसके बाद अम्मू का नंबर आता है। दरअसल कई बार मैने इस बात पर अम्मू की पैरोकारी की भी है कि अम्मू अपनी बच्ची से कितना प्यार करती है कितना नहीं ये वे जाने इस बात पर उंगली उठाने का क्या मतलब है! अब ये तो कहीं नही लिखा कि गरीब आदमी अपने बच्चे को प्यार नही कर सकता।वेउसे चाँद सितारे तोड कर दे-दें हमे क्या  करना!”
इस बात का निशा ने बहुत बुरा मान लिया कई दिन उसका मुंह फूला रहा। उसका पक्का यकीन है कि अम्मू की काम में ढिलाई की वजह मुन्नी ही है। अम्मू या तो अपना काम करें ठीक से या तो बैठ कर अपनी मुन्नी की मिजाज पुरसी करती रहें। अब बहुत हो गया। 
अम्मू की भी अपनी मजबूरी है। इधर मुन्नी को छींक आई उसके हाथ पांव में हरारत हुई कि बाजी के हाथ पांव फूले।काम धंधा खाना पीना सब छोड़ के बैठ जाती हैं। कई बार मैने समझाया भी कि “जरा जरा सी बात पर इतना परेशान क्यो हो जाती हैं। बच्चा है ये सर्दी, खांसी, जुकाम, बुखार तो लगा ही रहता है।”
“का करैं, बडी मुश्किल से अल्ला मियाँ ने हमे ई नेमत अता करी है। ईका कौनो तकलीफ होत है तौ हमरे हाथ पांव फूल जात हैं,  हमसे कछु होतै नहीं।बाजी सफाई देतीं  बस एक यही खराबी है अम्मू में बाकी वे हीरा हैं। एक तो घर बैठे कपडे सिल जाते हैं दूसरे कपडो में थोडी बहुत कढाई या लेस बगैरा लगाने का कोई अलग से पैसा नहीं लेतीं। फिर भी कभी-कभी वक्त पर कपडे ना दे पाने की एक मात्र कमी इन लोगों के लिये उनका अक्षमय अपराध क्यों  बन जाता है! इसलिए कि वह गरीब है! जरूरत मंद हैं!उन हाई फाई बुटीक की तरह नहीं जो ग्राहकों को अपने ठेंगे पर रखते हैं। और ये लोग इससे पहले कपडे देने लेने के लिये खुशी खुशी दस चक्कर लगाया करती थीं। तब बुटीक वालों पर इतना गुस्सा कभी नहीं आया निशी को। या घर में और किसी को भी। सच ही कहा है किसी ने कि इंसान आसानी से मिल जाने वाली चीजों की कद्र नहीं करता।
विचारों के समुद्र में डुवकियां लगाती मैं कब अपने घर  से निकल कर अम्मू का द्वार खटकाने लगी थी, मुझे पता ही नहीं चला। अंदर से अम्मू की तीखी तुर्श आवाज से ये मेरा पहला परिचय था। आखिर ऐसा क्या हो गया अम्मू के  साथ कि उनको इतना गुस्सा आ रहा है! तभी ताहिर के चबा चबा कर बोले गये उन शब्दों ने मुझे सब समझा दिया था। 
“ई तुम्हारी कोई नहीं, ओके लिये जान देती हौ और हम तुम्हारे सगे भतीजे ओकी कौनो चिंता नहीं!” 
“ई बुचिया हमार कोई नहीं, और तुम सगे! बडे आये सगे! जब हम ई जमीन पै आपन ठिकाना बनाय लिया तौ सब सगे चले आये। ऊ दिन जब आदमी के मरै के बाद ससुराल से निकाल दई गई थीं और तुमरे अब्बा  से दुइ चार दिन रहे की मोहलत मांगी रही तब तुमरे अब्बा की जुबान नहीं खुली कि चलौ जब तक कौनो ठिकाना नहीं तब तक बनी रहौ। ओई तुमरे अब्बा जब तुमरी अम्मा के मरै के बाद तुमका हमरे मत्थे मढै चले  आये तब हम सगे हुइ गये! बडे आए सगे! कान खोलि के सुनि लेव, ई बुचिया के सिवा हमार कोई सगा नहीं है इस दुनियाँ में।”  
मेरे हल्के हाथों से द्वार पर की गई खट-खट की आहट शायद उन दोनों की आपसी मुंहाचाही के शोर में बिला गई थी। इसीलिये अम्मू और ताहिर एक दूसरे पर  जवाबी गोलीबारी में लगे हुये थे। मैने इस वक्त चुप चाप लौट जाना ही मुनासिब समझा।
पर ताहिर के उस रहस्योद्घाटन ने मेरी निगाहों में अम्मू का कद और बढा दिया था। मैने तय कर लिया था कि ये बात फिलहाल ना मैं किसी से कहूँगी और ना अम्मू के सामने ही ये जाहिर करूंगी कि मैने ताहिर की बातें सुन ली हैं। अगर वे कभी बतायेंगी तो ठीक है। मैने खुद को समझाया था जैसे।इसी बीच अंधेरे के अजगर ने बाजी की पूरी बस्ती को निगल लिया था। ऊपर से लाइट भी चली गई थी। अंधेरा और बस्ती की खस्ता हाल सडक  देख मेरी किसी भी गलती पर कटखने कुत्ते सी दौड पडने वाली सयानी दाँत पीसने  लगी थी। क्या जरूरत थी इस तरह देर शाम अम्मू के यहाँ आने की! किसी गड्ढे में पैर फंस गया तो लेने के देने पड जायेंगे।
 खैर, जैसे तैसे चींटी जैसी चाल से संभल संभल कर अम्मू की बस्ती वाली टूटी सडक पार कर कॉलोनी वाली मेन रोड पर पहुंची थी कि पीछे से चिर-परिचित चप्पल की  घसड फसड आवाज सुनाई पडी थी। पलट कर देखा तो सदा की तरह अपनी ही धुन में लंबे लंबे डग भरती अम्मू चली आ रही थी।
“अम्मू ! इस वक्त ?” मैने उन्हे देखते ही पुकार लिया था। 
“अरे मंझली बऊ! आप इधर से कैसे ?”
“वो दवाई उधर नही मिली, सो इधर आना पडा पर आप!” सफाई देने के बाद मैने पूछा।
“बुचिया का लिवाय जाय रही हैं।” सामने के घर में चल रहे टयूशन सेंटर की ओर इशारा किया था उन्होंने।
“आप तनी देर रूकौ ,हम भीतर से बुचिया का लिवा लाई।”अम्मू  झटपट गेट खोल कर भीतर चली गई। मैने तब तक थोड़ी सब्जी ले ली।
“बऊ जी ई भूखी हुइयै, येका तनी कछु खाय का लै देई, फिर आपसे बात करित हन सहसा मुझे निशा की बातें याद हो आई। दस दस मिनट पे कुछ ना कुछ ठूँसती रहती है फिर भी हमारी बुचिया कछु खाती नहीं का रोना। अब उसके बदन पे मांस नहीं चढता तो कोई क्या करे!  बाजी इधर उधर देखने लगीं कि उनकी बुचिया को आइसक्रीम का ठेला दिखाई पड गया बस वो उधर ही दौड पडी अम्मू भी उसके पीछे हो लीं। उनकी बुचिया एक घर के बाहर फुलवारी के लिये बने घेरे पर बैठकर आइसक्रीम खाने लगी। बाजी जल्दी से मेरी ओर बढ आईं।  कुछ देर कुछ सोचती-सी इधर उधर का जायजा लेती रहीं फिर बोलीं, “बउ जी आपको देर तौ नहीं होय रही है, कछु जरूरी बात करनी है। आप हियाँ मिल गईं, नईं तौ सवेरे-सवेरे आपके घर आतीं हम।” अम्मू कुछ संकोच व बेचारगी के से भावों से मेरी ओर देख रही थीं। अम्मू जरूर किसी नई आफत से मुकाबिल हैं। आखिर इस ऊपर वाले को मुसीबतों का ठीकरा फोडने को अम्मू के सिवा और किसी का सर नहीं मिलता अम्मू का मुरझाया चेहरा देखती सोच रही थी मैं  कि अम्मू बोल पडीं, “बऊ जी, आपको देर हुइ रही होयेगी, अभईं आप जाओ हम सुबह आ जायेंगी।”
“अरे नहीं ऐसी भी क्या देर! आप बताओ पर यहाँ इतनी आवा जाही के बीच ?” अम्मू  मेरे सवालों को हवा में ही लपक कर जल्दी से बोलीं ।
“ऊ गाड़ी खडी है, ओके पीछे।” अम्मू हांफती  डांफती  लंबे लंबे डग भरतीं    एक गाड़ी की ओर लपक लीं। मै भी उनके पीछे हो ली। 
“हाँ अब बताइए।” मैने उनसे पूछ लिया। 
“का बताई बऊ जी, हमार तौ तकदीरै खराब है, चाहे जित्ते हाथ पैर पटकौ, मुला चैन से रहब बदै नहीं है।” कह कर जमीन में बैठकर अपने आँसू पोछने लगीं कुछ देर लगी थी उन्हे सामान्य होने में। अल्ला मियाँ कौ लागत है हमसे कौनो दुश्मनी है, हम माँ बेटी का साथ ऊपर वाले का भी अच्छा नहीं लग रहा है। सोचित हैं हम दूनौ माँ बेटी जहर खा के मर जायँ तौ सबके करेजे जुडा जायँ। अम्मू के शब्द जैसे किसी अंधे गहरे कुएँ से निकले थे। वे फिर आँसू  पोंछने लगीं कि मैने सांत्वना व साथ का हाथ रखा था उनके कंधे पर।
“अल्ला मियाँ को आपसे दुश्मनी नहीं, ईश्वर जिसे परीक्षा के लायक समझते हैं, उसी  की परीक्षा सबसे ज्यादा लेते हैं। हुआ क्या ? कोई नई बात!” मैने उनकी भीगी आँखों में सीधे देखते हुये पूछ लिया।
“हुआ का, वई तहिरवा जेका हम बिन माँ का बच्चा सोचि के रख लिया रहा कि  छोट बच्चा है बिन माँ का, हम पाल दें। सोचा, पुन्न का काम है। पुन्न तौ मिला नईं, लागत है जैसे साँप का पाल लिया। जीना हराम करे है। येका बाप सिखात है, हम जानती हैं। मुला ऊका हम कछु बिगाड नहीं सकती हैं। सो अब हम अपन जी पक्का करि लिया है कि अब अपनी बुचिया केे साथ या तौ हम जहर खाय लें या यहाँ से कहीं  और चली जायँ।” अम्मू का निर्णायक स्वर सुन मैं हतवाक सी उनका मुंह देखती रह गई थी ।
“अरे ! यैसे कैसे आप अपने खून पसीने से एक एक पैसा जोड के बनाया घर दूसरे को सौंप के चली जायेंगी! एक्सीडेंट के डर से क्या कोई रास्ता चलनाछोड देता है!
थाने में शिकायत करिये इन लोगों की। कहिये कि वो आपकी बच्ची को परेशान करता है। उससे जबरन शादी करना चाहता है कि आपका जो भी है, उस पर उसका पक्का कब्जा हो जाये।”
“अरे बऊ जी हम गरीब,  ऊपर से औरत जात, कौन सुनत है! फिर हम का रिपोट कराई ऊ तौ हमार शिकायत पहिलेई करि आया है थाने में।”
“आपने कौन सा जुर्म कर दिया है जो वो आपको ?” 
“अब का बताई आपसे।” वे निरीह निगाहों से कुछ देर मेरा मुंह देखतीं रहीं फिर बोलीं, “अच्छा एक बात बताओ बऊ जी,  बारह  बरस पहिले कौनो बच्चा गायब हुइ गया होय तौ जौन ऊ बच्चा लै गवा होय तौ पुलिस ऊका पकरि सकत है!”
“ये कैसी बात कर रहीं हैं! मैं समझ नहीं पा रही हूँ। बारह वर्ष पहले बच्चा गायब हो गया! किसका?”
“हम आपको पूरी बात बताती हैं, काहू से कहिओ ना बऊ जी।” अम्मू के प्रार्थना की मुद्रा में जुडे हाथ व चेहरे पर लाचारी व दयनीयता की स्याही पुती देख मेरा दिल भर आया था।
“असल मा हमार भाई की ससुराल हमरी ससुराल के बगल वाले गाँव मा है, सो इन लोगन का कहूँ से पता चलि गवा है कि बुचिया हमार औलाद नही है, येका हम कहूँ से चुरा लाई हैं, असल मा जिस दिन हम ऊ बार  आई रहीं, ओई दिन स्टेशन के इलाके में दंगा हो गवा रहा। कई औरतें और बच्चा गायब हुइ गये रहे। ई बुचिया एक बेंच के नीचे  हमका पडी मिली थी। सच्ची बुचिया कसम, बऊ जी हम ईका येसने नइ उठा लिया, पहिले पुलिस वालेन के सामने ही लै गईं। मुला ऊ हमका उल्टा धमकाय लागे कि पाले नई चुक रहा सो अपनी मुसीबत हमरे माथे मढि रही है, जाओ भागो हियाँ से। तब हम कसम खाय के बताया कि हमरे औलाद नही है, तबहिं तौ हमरे ससुराल वाले हमका निकाल दिहिन। बच्चा होते तौ हम ऐसे काये भटक रहीं होतीं। लेकिन तबहू ऊ बच्चे का रख्खे का तैय्यार नही भये। बोले, ‘तुम्हारे तो बच्चा है नहीं, येका ले जाओ मगर अपना पता बता जाओ। कोइ पूछेगा तौ बता देंगे।’ फिर हम का करतीं, लाती ना तौ का छोड देतीं ई नन्ही जान कौ! अब तुमही बताओ हम का करै! हमें तौ अब अपनी बुचिया कौ ऊ अपढ गंवार से बचाना है। ओके लिये हम ई घर का, ई दुनिया भी छोड़ सकतीं हैं। अब आप  ही कौनो रास्ता बताओ।”
“रास्ता तो मेरे पास एक ही है कि आप लखनऊ चली जाइये और अपने घर को ताला लगा जाइए।”
“हाँ यही तौ हम चहती हैं, कितनी बार आपकी बहन कहि चुकी हैं, पर हमरी बुद्धि मै नहीं आवा, अब हम मुन्नी के लै कौनो खतरा मोल नही लै सकती है। आप उनै बता देव, कहें तौ हम कल ही रात मा चली जाब। आज की रात तौ जैसे तैसे काट लेव मुला कालि।
“ठीक है एक बार मैं उससे पूछ लेती हूँ। लखनऊ में ही हैं कहीं  गये तो नहीं है ये लोग।” मैने अम्मू  से  अगले दिन शाम को कालोनी में मिलने को कह कर  विदा ली।
पर दूसरे दिन काफी देर इंतज़ार करने के बाद भी जब अम्मू नहीं आईं। क्या हो  गया कहीं ताहिर सच मे तो पुलिस के पास नहीं चला गया! और पुलिस ने झगडे फसाद के डर से मुन्नी को ले जाकर किसी अनाथालय के हवाले तो नहीं कर दिया! अम्मू का तोता है वो उसके प्राण बसते हैं उसमें। कैसे जियेगी वो उसके बिना! चलूँ देखूं तो कि हुआ क्या! मेरा भावुक अंतर जैसे ही अम्मू के घर जाने को हुआ कि दुनियादार दिमाग ने उसका हाथ पकड लिया। बोला, पागल हुई हो! एक तो इतनी देर वैसे भी हो गई है।ऊपर से अम्मू के घर का रास्ता अभी कल ही कितनी बार गिरते-गिरते बची हो। हारकर वापस आ गई पर अम्मू की चिंता वेताल सी सारी रात सर पर सवार रही। जिसने नींद को आँखों के आस पास फटकने तक नहीं दिया। पहली बार ये अहसास हुआ कि दुनिया भर की जानकारी रखने का दम भरने वाले हम खुद को ही पूरी तरह से कहाँ जान पाते हैं! अब अम्मू से मुझे हमदर्दी बेशक थी पर उनकी चिंता कभी मुझे सारी रात सोने नहीं देगी। उनसे इतना लगाव कब कैसे और क्यों हो गया मुझे नहीं पता। खैर, जैसे तैसे सुबह के सत्र का काम निबटाया और अम्मू के घर जाने के लिये निकलने लगी कि निशा आ गई।
“कुछ पता चला आपको! छूटते ही पूछ लिया था उसने।”
“किसका पता चला?” सवाल के एवज सवाल करती मैं उसका मुंह देखने लगी थी।
“अरे वही आपकी अम्मू, पुलिस ले गई दोनों को। साथ में ताहिर को भी। मैं अभी उन्हीं के घर गई थी, रावी के स्कूल गई थी सोचा ब्लाउज ठीक हो गये हों तो लेती चलूँ ।उनके घर में तो ताला लगा था। पडोसियों ने बताया, सुना खींच तान में अम्मू के हाथ में चोट भी लग गई थी।”
“अरे ये कब हुआ!”
“कल रात ही तो।” निशा ने बताया और ये कहती हुई चलती बनी,  “चलूँ  फिर रावी आती होगी। मुझे तो अब दीपावली के दिन पुराना ब्लाउज पहनना पडेगा। ये तय है।” निशा को अपने ब्लाउज की चिंता थी और मेरे भीतर  अम्मू के मुस्तकबिल को लेकर निराशा व अवसाद का कुहासा पसर गया था। कैसे  जियेगी अम्मू अपनी बुचिया के बिना! पुलिस अम्मू को तो छोड़ ही देगी दो चार दिनों में पर मुन्नी अब उनके साथ रह पाये ये मुमकिन नहीं। धर्म  ध्वजा वाहक कहाँ मानेंगे कि एक माँ के लिए ममता से बडा कोई धर्म नहीं होता। पर एक दिन ही बीता था कि दोपहर की तेज तीखी धूप में गेट खटका था जैसी कि उम्मीद थी अम्मू  थीं पर आज जैसे उनका कायांतरण हो गया था। आज उनके होठों पर सप्रयास चिपकाई गई मंद मुस्कान की जगह उनका पूरा  चेहरा ही नहीं उनका अंग अंग ताजा खिले फूलों सा मुस्करा रहा था। पिछले आठ सालों में मैने अम्मू को कभी इतना तनाव मुक्त नहीं देखा।
“आपकी बडी चिंता हो रही थी।” मैने छूटते ही कहा था।
“चलौ, सब बताती हैं, मै जब तक गेट बंद करके आई  माँ बेटी ने सदा की तरह बरामदे का कोना पकड लिया था उनकी दुनियावी। चिंताओं से लगभग मुक्त मगन मुख मुद्रा देख कर लग रहा था कि सूरज के लगभग जला देने वाले तेवर उन्हें जरा भी प्रभावित नहीं कर पाये हैं।
वाक्ई मन का मौसम हरा भरा हो तो बाहरी तपिश का असर नहीं होता। उनके बगल मे कुर्सी पर बैठते हुये सोच रही थी कि अम्मू बताने लगीं, “ऊ आपन हरकत से बाज थोडै ना आवा, सँझै का शिकायत करि आवा रहा। हमैं कछु लागि रहा था कि ई कछु खिचरी पका रहा है चुप्पे चुप्पे, तभई तौ डर लगि रहा था हमैं और बई हुआ। आदतन अम्मू  सर से खिसक गये दुपट्टे को ठीक करने लगीं फिर बोलीं 
जैसेई हम माँ बेटी खा पी के लेटीं, कि दरवाजा खटका। हम सोचा कि ताहिरवा खुदै खोली, ओकेर बाप होई। रोज खोलतै रहा मुला ऊ बखत चुपाई मारि गवा, हम जब तक उठीं दरवाजा तोड़ै लाग ऊ लोग, खोला तौ सामने चार पांच पुलिस वाले और उनके संग चार पांच आदमी रहे, हम तुरतै समझि गई कि ई सब तहिरवा का किया धरा है, तभई जौन सबसे आगे रहे दरोगा जी बोले, “ये तुम्हीं फातिमा हो, हमे पता चला है कि तुम्हारे घर में कोई हिंदू लड़की है और तुम इसे कहीं से चुरा कर लाई थीं। देखो, सीधे से सच बता दो वरना बहुत गडबड हो जायेगी। दंगा भी हो सकता है। दंगा क्या  होता है जानती तो होगी।अगर बात सच है तो लडकी हमारे हवालै कर दो। दारोगा अकड रहा था और हम ओका मुंह देखि रही  थीं। समझै माँ नहीं आ रहा था कि का करैं!  फिर पता नहीं का सूझा हमे कि भीतर गईं और येका लिवा  लाईं। और  दरोगा के आगे ढकेल दिया।” अम्मू मुन्नी के कंधे पर हाँथ रख कर बोली फिर कुछ देर लंबी-लंबी सासें लेकर छोडी फिर बोलीं, “हम कहा, लेव दरोगा जी, लै जाव। हमरे घर मा अंधेरा करे से दंगा होय से बचा  सकत हौ तौ बचा लेव, हमरा का रहि पैबे तौ रहिबे ,ना तौ मरि जाव। तनिक रुकौ, ये का कपडा  लत्ता तौ लै आई।” भीतर गई और बस सोचि लिया कि जौन लोग हमरी कमाई खाय के लानी बैठे है, उनकी मंसा पूरी ना होवै देव। हमरे बाद देखित हैं कौन  कचौरी खबात है ई हरामखोर का।” अम्मू अपनी बायीं कलाई पर बंधी  पट्टी सहलाने लगीं कि मैंने पूछ लिया, “ये चोट कैसे लगी?” इससे पहले कि अम्मू बोलतीं मुन्नी बोल पडी।
“पता है आंटी हमरे कपडा लेन गई और आपन हाथ काटत चली आईं। इत्ता खून बहे लगा कि पुलिस वाले भी घबराय गये। जल्दी से गाड़ी में बैठा लेन और सीधे अस्पताल पहुंचायेन। हम तौ घबराय गई और जोर जोर से रोय लगे।”
“तुम रहीं कहाँ ?” मैने पूछा। इस बार जवाब देने की कमान अम्मू ने संभाल ली।
“येऊ का बैठाल लिहेन ऊ लोग आपन गाड़ी मा।बडे वाले दरोगा जी बडे भले आदमी हैं, ईका खबायन पिबायन।”
“वो सब तो ठीक है पर उस शिकायत  का क्या हुआ, जो ताहिर ने किया?” मैने अम्मू को याद दिलाया।
“हाँ वई तौ बताबै जाय रही है, ई इतना जोर-जोर से रोई कि ऊ सब समझिगे। 
 आखिर मनई मानुष होत हैं, कौनो जानवर तौ होत नईं पुलिस वाले, हमार मरहम पट्टी करवाएन, फिर घर छोडि गे और तहिरवा का पहिले तौ दुइ डंडा लगायन फिर कहेन कि माँ बेटी के पीछे मरने को तैयार, बेटी भी रो रो के मरी जा रही है। फिर तुम्हारे पेट में दर्द काहे हो रहा है। खबरदार इन माँ बेटी की ओर आँख उठा के भी देखा कबहुँ। जौन दिन शिकायत मिली तौ उलटा लटका देव। समझे! सीधी तरह रहे का होय तौ रहो वरना रसता नापौ। आपन नंबर दै गे है कि कबहुँ कौनो दिक्कत होय तो बताना।” अम्मू ने  आज अपनी सारी उदासी व अवसाद बुहार कर फेंक दिया था। उनकी मुग्ध मगन मुद्रा देख सदा उनके कंधे पर बेताल सा लटका रहने वाला दुःख भी अपना सर धुन रहा होगा। मैं सोच रही थी। शाम  गहरा गई थी।  
“अच्छा अब चलित हैं बऊजी।” अम्मू ने अपनी बुचिया का हाथ पकडा और गेट के बाहर निकलीं  कि सामने से आती किसी गाड़ी की हेडलाइट ठीक उनके चेहरे पर पडी थी। उस दम अम्मू का चेचकरू साँवला चेहरा दुनिया की सबसे सुंदर माँ में तब्दील हो गया था जैसे।
शशि श्रीवास्तव 
शिक्षा – कला स्नातक
सम्प्रति – स्वतंत्र लेखन 
रचना कर्मः कहानी, आलेख व समीक्षायें  लगभग सभी प्रमुख हिन्दी दैनिकों यथा आज अमर उजाला, हिंदुस्तान, जनसत्ता, देशबंधु, जन संदेश टाइम्स, नई दुनियां, हरिगंधा व कई लघु पत्रिकाओं यथा अक्षरा, लमही, साहित्य सरस्वती, आधारशिला व कई अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित। तीन कहानी संग्रह ‘तू कहीं सो गई तो’ ‘मेघछाया’ व राम हरण प्रकाशित हो चुके हैं।दो वर्ष तक दैनिक अमर उजाला में बाल कविताओं का प्रकाशन।
6/80 पुराना कानपुर कानपुर 
208002
मोबाइल – 9453576414
शशि श्रीवास्तव
शशि श्रीवास्तव
संपर्क - shashi16854@gmail.com
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