जिस दिन मुंबई की टिकट हुई उसी दिन से अपनी तो रातों की नींद उड़ गयी थी. एक तो हम पहली बार अकेले मुंबई जा रहे थे, ऊपर से कुछ लोगो से मिलने का सपना भी देख रहे थे. असल डर इस बात का था कि हमने अक्सर लोगो को कहते सुना था की मुंबई बहुत फास्ट है ….वहां का आदमी बहुत मेहनत करता है …लोकल में सफ़र करना किसी चुनौती से कम नहीं ..आदि आदि और ये तो हमने भी अपनी चार आँखों से देखा था लोगों को लटक कर लोकल में सफ़र करते हुए, जब हम पिछली बार मुंबई गए थे. अब हम ठहरे महा स्लो यानी धीमी गति के इन्सान सो डर सताना और नींद उड़ना तो जायज ही था. खैर हम मुंबई पहुंचे..
लोकल से बचने का पहला प्रयास ये किया कि भले ही बेटा लेने आया पर हम टैक्सी बुक करा कर घर पहुंचे. दो चार दिन के बाद हमने बेटे कहा कि हमें कुछ लोगो से मिलना है पर कैसे जाएँ? लोकल तो बस की नहीं और मुंबई बहुत फास्ट है, हम तो वन पीस में निकल भी नहीं पायेंगे. हमारी बात सुनकर बेटा हँस पड़ा …’बताओ हम इतनी गंभीर बात कर रहे हैं और ये आजकल के बच्चे किसी बात को गंभीरता से लेते ही नहीं’ हम गुस्से में बोले ….’अरे नहीं मम्मी आप गुस्सा नहीं होइए, असल में मुंबई फास्ट नहीं है, यहाँ का आदमी स्लो है” वह बोला और फिर हँस पड़ा. हम कुछ समझे नहीं… ..अरे मम्मी एक दो दिन जाओगी बाहर, तो खुद समझ आएगा आपको यहाँ का आदमी दिल्ली के आदमी से कितना स्लो है.

