संपादकीय - मशीनों के दौर में मानव पुस्तकालय 7

आज विश्व भर में हर संस्था मानव को हटा कर मशीन का उपयोग कर रही है। रेलवे में टिकटें मशीन बेच रही है; बैंक में सारा काम मशीनों के हवाले किया जा रहा है ; सुपर मार्केट में भी मशीनें ग्राहक की सेवा कर रही हैं। मानव की उपस्थिति को गौण किया जा रहा है। बी.आर. चोपड़ा ने 1957 में एक फ़िल्म बनाई थी ‘नया दौर’। इस फ़िल्म के कलाकार थे दिलीप कुमार, वैजयन्ती माला, अजित, जीवन, नज़ीर हुसैन और जॉनी वॉकर। संगीत था ओ. पी. नैय्यर का। इस फ़िल्म में एक तरफ़ तो मशीन (बस) और इन्सान (टाँगा) के बीच लड़ाई थी तो दूसरी ओर साहिर का गीत था – “साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिल कर बोझ उठाना।”

क्या आपने कभी मानव पुस्तकालय यानि कि ह्यूमन लायब्रेरी के बारे में सुना है? आइये आज एक ऐसी संस्था के बारे में जानते हैं जिसने विश्व में एक नया आंदोलन शुरू किया है, एक नयी सोच पैदा की है। 
मानव पुस्तकालय (Human Library) डेनमार्क का एक अंतरराष्ट्रीय संगठन और आंदोलन है। इसकी शुरूआत वर्ष 2000 में कोपेनहेगन, डेनमार्क में की गयी। इसका उद्देश्य लोगों के पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए उन्हें उन लोगों से बातचीत करने में मदद करना है जिन्हें वे सामान्य रूप से नहीं मिलते हैं। संगठन पुस्तकों के बजाय इन्सानों को उधार देने के लिये पुस्तकालयों की प्रक्रिया का उपयोग करता है।
मानव पुस्तकालय की शाखाएं 80 से अधिक देशों में मौजूद हैं। मानव पुस्तकालय अपने नाम के अनुसार, सही अर्थों में, इन्सानों का एक पुस्तकालय है । यह संस्था ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करती है जहां पाठक खुली पुस्तकों के रूप में स्वयंसेवी मनुष्यों को उधार ले सकते हैं और उनसे बातचीत कर सकते हैं। ज़ाहिर है कि ऐसे लोगों के पास सामान्य रूप से हमारी पहुंच नहीं होती है।

संपादकीय - मशीनों के दौर में मानव पुस्तकालय 8

एक मानव पुस्तकालय में, पुस्तकों के स्थान पर, आप इन्सानों को “उधार” ले सकते हैं। ये लोग अपनी अनूठी जीवन कहानियों के साथ अपने आप को “किताबों” के रूप में प्रस्तुत करने वाले स्वयंसेवक होते हैं। एक निश्चित अवधि के लिये तयशुदा राशि का भुगतान करने पर, आप उनसे बातचीत कर सकते हैं,  सवाल पूछ सकते हैं और उनकी कहानियां सुन सकते हैं। क्योंकि आप ये कहानियां पात्रों के मुख से सुनते हैं इसलिये यह छपी हुई किताबों से कहीं अधिक रुचिकर होती हैं।
इस संस्था का नारा है कि – “हम इन्सानों को पुस्तकों की तरह प्रकाशित करते हैं।  हमारे बुकशेल्फ से हर मानव-पुस्तक, हमारे समाज  के किसी न किसी हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। ये मानव पुस्तकें  अक्सर अपनी जीवन शैली, विश्वास, विकलांगता, सामाजिक स्थिति, जातीय मूल आदि के कारण भेदभाव का शिकार हो चुकी होती हैं । उनसे बातचीत करके हम अपने समाज को बेहतरी से समझ पाने में सक्षम हो सकते हैं”।
संस्था के संस्थापक, रोनी एबर्जेल का कहना है कि ‘मानव पुस्तकालय’ को एक ऐसे उद्देश्य के तहत  शुरू किया गया था जिसके भीतर, “आप चल सकते हैं, एक इन्सान को उधार ले सकते हैं और एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण विषय के बारे में बात कर सकते हैं। आदर्श रूप से, हम चाहते थे कि लोग उन मुद्दों के बारे में बात करें जिनके बारे में वे आम तौर पर बात नहीं करते हैं, या संभावित रूप से बात करना पसंद नहीं करते हैं, लेकिन हमें इन तमाम मुद्दोंके बारे में बात करने की ज़रूरत है।”
जैसा कि मैंने पहले ही बताया है कि ये  मानव “पुस्तकें” दरअसल स्वयंसेवक हैं जो विविध पृष्ठभूमि से आते हैं और उनके पास अनुभव हैं जिन्हें वे अपने मानव पाठकों के साथ साझा करने के इच्छुक हैं। पारंपरिक किताबों की तरह, मानव पुस्तकों में भी ऐसे शीर्षक होते हैं जो उनके अनुभवों का वर्णन करते हैं जैसे कि ब्लैक एक्टिविस्ट, क्रॉनिक डिप्रेशन, सर्वाइवर-ऑफ़ ट्रैफिकिंग, मुस्लिम, लातीनी, ट्रांस-जेंडर और भी  बहुत से । कभी-कभी आमने-सामने और कभी-कभी छोटे समूहों में, मानव पुस्तकालय एक ऐसा सुरक्षित माहौल बना देता है जहां लोग किसी भी अन्य व्यक्ति के साथ जुड़ सकते हैं।
ज़ाहिर है कि कोविद 19 के ज़माने में इन मानव पुस्तकों से भी सुरक्षित दूरी बनाए रखना आवश्यक है । इसलिये संस्था ने ज़ूम एवं अन्य ऑनलाइन माध्यमों से पाठक एवं पुस्तक के सेशन आयोजित करने का रास्ता ढूंढ निकाला है।

संपादकीय - मशीनों के दौर में मानव पुस्तकालय 9

भारत की अपनी एक केमिकल इंजीनियर अंदलीब कुरैशी ने कुछ साल पहले मुंबई में इस मुहिम को  आगे बढ़ाया । अंदलीब अपनी कॉरपोरेट नौकरी से छुट्टियां मनाने घर आई थी जब उन्हें इस संस्था के बारे में पता चला।  
“मैं एक सैनिक परिवार से आती हूं । हमारा परिवार एक उदार मुस्लिम पृष्ठभूमि वाला परिवार है। परिवार की सोच सादी है लेकिन प्रगतिशील भी। और मैं अपने मूल्यों को बहुत गंभीरता से लेती हूं । यह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि जीवन के प्रति हमारी सोच क्या है। शिक्षा और व्यक्तित्व की स्वतंत्रता को मेरे परिवार में हमेशा प्रोत्साहित किया गया है। हमारी माँ की मृत्यु हमारे बचपन में ही हो गयी थी। इसलिये हमारा पालन पोषण हमारी दादी ने किया था।”
अंदलीब कुरैशी का कहना है कि, ह्यूमन लाइब्रेरी अब वास्तविक और सच्ची कहानियों को जीवंत करने का स्थान बन गया है, जिनका संपादन नहीं किया गया है। मैं मुंबई में भी ऐसी शुरूआत करना चाहती थी क्योंकि यह शहर अद्भुत और अनूठी कहानियों वाले लोगों से भरा है,” अंदलीब ने आगे कहा। “मेरे लिए किताबों के साथ समस्या हमेशा यह रही है कि वहां एकतरफ़ा बातचीत होती है। लेकिन एक मानव पुस्तक के साथ, आपको सीधे सीधे एक भुक्तभोगी के मुंह से अविश्वसनीय रूप से वास्तविक और दिलचस्प कहानियां सुनने को मिलती हैं… और यहां तक ​​कि अपनी ‘किताबों’ के साथ बातचीत भी होती है, जो कि आप एक नियमित पुस्तकालय में नहीं कर सकते हैं।”
अपनी लॉन्च के साल भर के भीतर ही, मानव पुस्तकालय – मुंबई ने कई मील के पत्थर पार कर लिए हैं। यह संस्था ने 13 आयोजन कर चुकी है और इनके पास 55 से अधिक पंजीकृत मानव-पुस्तकें हैं, और इसने 3,700 से अधिक पाठकों को सेवा प्रदान की है। यह भारत के किसी भी अन्य शहर की तुलना में अधिक है – याद रहे कि भारत में दिल्ली, हैदराबाद, इंदौर और चेन्नई समेत करीब नौ शहरों में यह संस्था काम कर रही है।
जून 2018 से दिल्ली के कनॉट प्लेस में मानव पुस्तकालय – दिल्ली’ की शुरूआत की गयी। और अब यह ब्रांच भी ख़ासी सक्रिय है। 
आज विश्व भर में हर संस्था मानव को हटा कर मशीन का उपयोग कर रही है। रेलवे में टिकटें मशीन बेच रही है; बैंक में सारा काम मशीनों के हवाले किया जा रहा है ; सुपर मार्केट में भी मशीनें ग्राहक की सेवा कर रही हैं। मानव की उपस्थिति को गौण किया जा रहा है। बी.आर. चोपड़ा ने 1957 में एक फ़िल्म बनाई थी ‘नया दौर’। इस फ़िल्म के कलाकार थे दिलीप कुमार, वैजयन्ती माला, अजित, जीवन, नज़ीर हुसैन और जॉनी वॉकर। संगीत था ओ. पी. नैय्यर का। इस फ़िल्म में एक तरफ़ तो मशीन (बस) और इन्सान (टाँगा) के बीच लड़ाई थी तो दूसरी ओर साहिर का गीत था – “साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिल कर बोझ उठाना।
मानव पुस्तकालय भी आवाज़ दे कर कह रहा है – इन्सान बनो… कर लो भलाई का कोई काम !
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

11 टिप्पणी

  1. अत्यंत सराहनीय प्रयास।कभी समय मिला तो अपने जीवन के उतार चढ़ाव मैं भी साझा करना चाहूंगी।मेरी जीवनी पर जर्मनी में कुछ स्नातकों ने लिखा भी है और जर्मनी में प्रकाशित होनेवाली पत्रिका “meine welt” ने इसे छापा भी है ।

  2. संपादकीय एक नए और कम प्रसारित विषय पर है ।चौकाने वाली जानकारी ।ये तो बुद्धिजीवी बेरोजगार युवाओं के लिए
    रोजगार प्रदान करने की दिशा में नया विचार है इसका स्वागत होना चाहिए ।
    मशीन के स्थान पर मानव का होना सुखद है ।
    Prabha mishra

  3. अनूठी पहल। रोचक जानकारी। इस संस्था से कैसे जाय , इस विषय मे कुछ सूचना हो तो साझा करें। साधुवाद।

  4. सराहनीय प्रयास। इस महत्वपूर्ण जानकारी को साझा करने के लिए अशेष विशेष आभार।

  5. वाह, अप्रतिम जानकारी। अत्यन्त रोचक भी और ज्ञानवर्धक भी।
    सम्पादक बधाई के पात्र हैं। सर्वथा अछूता विषय है। जानकर अभूतपूर्व रोमांच-सा भी हुआ।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.