(1)
सब मांग रहे हैं अपना-अपना हक
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स्नेह के रंग में रंगा वह घर वह आंगन
जहां खिले रहते थे अनगिनत फूल
जिनकी खुशबू से घर ही नहीं
महक उठता था सारा गांव
जो तेज हवाओं में भी
मिलते रहते थे एक दूसरे के गले
जब से उस आंगन में  दूर-दूर से उड़
आ गईं हैं रंग बिरंगी तितलियां
तब से बाबा तुलसी की यह पंक्ति
“सुत मानहिं मात-पिता तबलौं ,अबलानन दीख नहीं जबलौं ”
होने लगी है चरितार्थ अक्षरश:
उस आंगन में
इसी कारण शायद
अब नहीं रहना चाहते हैं एक साथ
रसोई के बरतन और नींद के बिस्तर
दरवाजों ने तो जैसे कसम ही खा ली है
एक दूसरे का मुंह न देखने की
अब नहीं सुनाई देती है आंगन में
एक साथ बैठ कुर्सियों के हंसने की आवाजें
अब नहीं दिखाई देती हैं अलाव के पास
सुलगती बीड़ियां करते हुए सलाह
कि कैसे लानी है कल के सूरज से अंजुली भर आग
जिससे नहला सकूं आंगन का उदास चूल्हा
वे आतुर हैं कब्जाने को वह घर
घर के कमरे और वह आंगन
जिसकी मिट्टी में खेल
उठते-गिरते जवां हुईं थीं
बचपन की लड़खड़ाती आदतें
वे जता रहे हैं अपना-अपना अधिकार
उस धरती पर
जो नहीं रखी जाती किसी की छाती पर
सिर्फ उतनी को छोड़ जितनी ओढ़ता है कोई
दरवाजे पर खड़ा वह नीम
जिसने झुलाया था जिनको अपनी बांहों पर
न जाने कितने सावन
आज स्वाधिकार में देख
समेटना चाहते हैं उसका स्नेह
सिर्फ अपनी सीमा में
भूलकर उसके क्षत-विक्षत होते शरीर की पीड़ा
उनके एकाधिकार की बानगी झलकती है साफ
“पानी गए न ऊबरै”कहने वाले रहीम के उस पानी पर
जिसे वह नहीं करना चाहते हैं साझा
एक दूसरे के साथ
यह भूलकर कि अब नहीं बचा है उनकी आंखों में
थोड़ा सा भी पानी
इतना ही नहीं
सब दौड़-दौड़ कर लगा रहे हैं गले
द्वार पर रखे हल से लेकर,डिब्बे में रखी सुई तक को
जिनके संग्रह में नहीं था कोई योगदान
उनके होने का
पर हैरत की बात तो यह है
कि कोई नहीं जता रहा है हक
चौखट का सहारा लिए
माथा पीटती उन धुंधली नजरों पर
उन निशब्द लरजते होंठों पर
हक के साथ जिनके हक से
सब मांग रहे हैं अपना-अपना हक़
(2)
इस हत्यारे समय में
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उन्हें आता देख भाग खड़ी होती हैं सड़कें
भाग खड़े होते हैं वह चौराहे
जहां रहते हैं मुश्तैद कानून के लम्बे हाथ
उन्हें आता देख गिरने लगते हैं औंधे मुंह
एकाएक,घबराकर
सीना ताने खड़े शटर
दौड़ पड़तीं हैं नंगे पांव
चबूतरे पर बैठीं गलियां
होकर सीढ़ियों की पीठ पर सवार
छिपने को छत की गोद में
वे जब बोलते हैं
तो बन्द हो जाते हैं बोलना
लोहार के हथौड़े
बन्द हो जाते हैं चिल्लाना
सब्जियों और फलों के ठेले
इतना ही नहीं बन्द हो जाता है धड़कना
अचानक धड़कते शहर का हृदय
वे घूमते हैं छुट्टे सांड़ की तरह
एक गली से दूसरी गली
करते हुए,सरेआम नुमाइश अस्त्रों की
ताकि जन्म से ही पहले कुचल सकें
उन संभावनाओं को
जिनसे पैदा हो सकता है प्रतिरोध
खोलकर किसी घर का दरवाजा
उनके आने से
धीरे-धीरे लाल होने लगती है धरती
धीरे-धीरे आग में नहाने लगते हैं घर
धीरे-धीरे घबराकर कूदने लगते हैं खिड़कियों से
बसों और कारों के शीशे
और धीरे-धीरे थमने लगतीं हैं दौड़ती हुई सांसें
तड़प-तड़प कर
वे दे जाते हैं न जाने कितने जख्म
वे फैला जाते हैं न जाने कितनी नफरत
जिसे भरने के लिए सूरज
न जाने कितनी बार
फैलाता है अपने हाथ
धरती न जाने कितनी बार
काटती है चक्कर
बादल न जाने कितनी बार
बरसते हैं झमझमाकर
और न जाने कितनी बार,
थक हार ,खूटियों से लटक
आत्म हत्या कर लेते हैं कलैण्डर
ठीक उसी समय जब सारा शहर मना रहा था मातम
कराह रहीं थीं शहर की गलियां और सड़कें
वे मना रहे थे जश्न
आलीशान होटल के कमरे में
मेज पर खड़ी बोतल को घेर
टकराते हुए जाम
वे उड़ा रहे थे बेखौफ
कस के साथ धुएं के छल्ले
अंगुलियों के बीच मुट्ठी में फंसी खाकी और खादी को
करते हुए अस्तित्वहीन
अब जब कि इस हत्यारे समय में
कितना मुश्किल है बच पाना
उन हत्यारी नजरों से
जिनके सामने नतमस्तक हैं सिंहासन
ऐसे भयावह समय में भी
कविता कर रही है जद्दोजहद
बचाने को यह सुन्दर संसार
इन हत्यारी नजरों से ।
अरविन्द यादव
पाखी, समहुत, कथाक्रम,अक्षरा, विभोम स्वर ,सोचविचार, सेतु , समकालीन अभिव्यक्ति, किस्सा कोताह, तीसरा पक्ष, ककसाड़, प्राची, दलित साहित्य वार्षिकी, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, विचार वीथी, लोकतंत्र का दर्द, शब्द सरिता,निभा, मानस चेतना, अभिव्यक्ति, ग्रेस इंडिया टाइम्स, विजय दर्पण टाइम्स आदि पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. सम्पर्क - arvindyadav25681@gmail.com

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