Wednesday, May 22, 2024
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अनिल प्रभा कुमार की कहानी – एक नाम

भला यह भी कोई बात है कि इन्सान भीतर तक तड़प उठे और वह भी इतनी छोटी सी बात पर?  ज़िन्दगी का सच तो यही है जो सामने है। बस यथार्थ नाम का यह महाजन ज़िन्दगी के दरवाज़े पर आकर एक दहाड़ लगाता है और सारा ज्ञान, संयम, निर्लिप्तता और आध्यात्म चूहों की तरह पिछले दरवाज़े से भाग निकलते हैं। सामने बच जाता है, एक मामूली सा इन्सान अपनी सारी कमज़ोरियों के साथ।
“माँ , तुम कंट्रोल फ़्रीक हो। चाहती हो सब कुछ तुम्हारी मर्ज़ी से हो। तुम्हारा नियन्त्रण रहे हर बात पर। जैसा तुम सोचो, समझो और चाहो, वही ठीक, बाक़ी सब ग़लत।”
“यह बात नहीं” वह मिमियाई।
“तो फिर आपको क्या परेशानी है? कोई कुछ भी करे।“
“यह ’कोई’ नहीं, मेरा अपना ख़ून है।”
“यह भी क़ाबू में रखने की एक चाल है।”
“इस छोटी सी बात में चाल कहाँ से आ गई?”
“तो फिर क्या है?”
यही तो वह शब्दों में बता नहीं पाती कि यह क्या है? बात देखने में वाक़ई छोटी  सी ही है पर पता नहीं क्यों उसके लिए जीने-मरने जैसी बड़ी हो रही है। नसीहतें और  दुनियादारी का ज्ञान।  वह अपने को ही शांत करने की कोशिश करती है। पीछे हट जाओ। तुम्हें क्या? तुम मोह में धँस रही हो। स्वीकार करते जाओ, ज़िन्दगी में जो भी, जैसे भी आए। जीवन- धारा के साथ बहना सीख लो। विरुद्ध धारा में डूब जाओगी।
नहीं होऊंगी संलिप्त किसी भी बात में। ऐसा उसने सोचा था।
 सोच तो तिनके की तरह उड़ जाती है सवाल की पहली ही फूँक से।
“क्या नाम रखा है नाती का?”
वह हकलाने लगती है।
“वह उसके माँ-बाप ने ही रखा है, अपनी पसन्द का।”
“क्या?”
“अमरीकी नाम है।”
“उस नाम का अर्थ क्या है?”
“मालूम नहीं।”
“ओह!” पूछने वाले का सहानुभूति में मुँह लटक गया।”
“असल में दामाद अमरीकी है। बेटी भी यहीं की जन्मी –पली है तो वे बच्चे का नाम अमरीकी ही रखना चाहते थे। यहीं के समाज से घुला-मिला सा।“ वह बिना वजह सफ़ाई देती जा रही थी।
“आप तो हिन्दी की विदुषी हैं। भारतीय संस्कृति की पैरोकार। कम से कम आपसे पूछना तो चाहिए था ।”
पूछने वाले ने खुरच दिया न ज़ख़्म। उसे नि:शब्द हथौड़ों की चोटें अपने सिर पर पड़ती महसूस होती हैं।
“आपके अहं को चोट लगी है। जो आपने सुझाव दिए, हमने उन्हें स्वीकारा नहीं। बस आप इसी बात को मुद्दा बनाकर बैठ गई हैं।”
वह सोचती है, क्या सच में यही बात है? थोड़ा तो सच होगा ही।  वह अपना ज़ख़्म सब को दिखाती जो फिरती है।
“मैंने तो तन्वी को इतना प्यारा नाम सुझाया था – सोहम। अब तन्वी को पसन्द ही नहीं आया तो मैं क्या कर सकती हूँ।” उसने फ़ोन पर बताया था अपनी एक सहेली को।
हफ़्ते भर बाद उसी सहेली का भी नाती होने का  घोषणा-कार्ड मिला।
“हमें यह बताते हुए ख़ुशी होती है कि हमारे परिवार में एक नया सदस्य आया है – सोहम।”
उसने अपने को ठगा –सा महसूस किया। बता तो देना था कि हम यह नाम रख रहे हैं। पिछले दरवाज़े से चुराने की क्या ज़रूरत थी।
“देखो तन्वी, जो नाम तुमने नापसंद कर दिया। बॉस्टन वाली आंटी ने वही नाम उठा लिया।” उसने बेटी के आगे शिकायत के बहाने अपनी तड़प का एक टुकड़ा परोस दिया।
“सब आपकी ग़लती है। हमने सबसे पहले “ओम” नाम ही चुना था और आपने कह दिया कि पुराना नाम है। ओम प्रकाश आपके दादा जी का नाम था। अब आपको शिक़ायत करने का कोई हक़ नहीं।“
“उस वक़्त तो शुरुआत ही थी। सोचा, बहुत से नाम मिलेंगे। फिर बाद में कह तो दिया था कि चलो “ओम” ही रख लो।”
“एक बार मना कर दिया तो दोबारा कौन वही नाम रखेगा?”
तब वह सोचती थी कि कितनी अजीब बात है। पहले बच्चा हो तो ले। पता तो चले कि लड़का है या लड़की। फिर उसी के हिसाब से नाम सोचेंगे। पर यहाँ इन लोगों में कहाँ इतना धीरज? डॉक्टर भी बीस सप्ताह का गर्भ होने पर पूछते हैं “आप बच्चे का लिंग जानना चाहेंगे?”
“हाँ हाँ, कब से बेचैन हैं जानने को?”
“भई क्यों जानना चाहते हो? फिर अचम्भा क्या रह जाएगा ?”
“जानना ज़रूरी है कि बच्चे की नर्सरी कैसी बनाई जाए? लड़का है तो मोटर कारों और स्पोर्ट्स टाइप की सजावट वाली नीली और अगर लड़की है तो परियों जैसी हर चीज़ गुलाबी रंग की।”
कई आवाज़ें आई थीं सहमति की। वह चुप कर गई। बताया नहीं कि उसे ये बातें बहुत बेकार सी लगती हैं। एक तो यहाँ के लोग बच्चे ही कम पैदा करते हैं तिस पर लड़के लड़की दोनों का स्वागत। भारत जैसा भ्रूण-परीक्षण का कोई क़ानूनी पचड़ा नहीं। फिर भी शौक़िया मरे पड़ते हैं बच्चे का लिंग जानने को।
“तुम लोग क्या चाहते हो?”
“लड़की “ दोनों एक साथ बोले थे।
“क्यों?”
“लड़कियाँ ज़्यादा संवेदनशील होती हैं। बुढ़ापे में माँ- बाप का ख़याल रखती हैं।”
“अगर बच्चे के दादा को वंश का नाम चलाने वाला चाहिए होगा, तो?”
“है न, बड़े भाई का बेटा।“
जिस दिन वह परीक्षण के लिए जाने वाले थे उसने फ़ोन पर ही बड़े प्यार से समझा दिया।
“देखो बेटा, जो भी बच्चा भगवान देगा, सिर माथे पर। बस शिशु स्वस्थ हो, यही प्रार्थना करो।”
शाम को मिले तो दामाद ने पूछा था – “बूझिये, लड़का या लड़की?”
वह पति –पत्नी देखते रहे थे उन दोनों के हाव- भाव। चेहरे पर चमक और चाल में मुस्तैदी थोड़ी कम लगी।
“लड़का।”
“ अरे कैसे अनुमान लगाया?”
“तुम्हारी चाल से।”
तन्वी ने अपनी बाहें पति के गले में डाल दीं।
“चलो कोई बात नहीं। बेटा भी चलेगा। बड़ा होकर अपने डैड का काम में हाथ बंटाएगा।” उसने अपने पति को तसल्ली दी।
अब लड़का निश्चित था तो उसके स्वागत की तैयारियाँ भी उसी निश्चितता के साथ चल पड़ीं। नीला रंग प्रमुख हो गया।
नाम?  बहुत बड़ा प्रश्न था। बिना बेटी –दमाद के कहे, वह अपने-आप ही उत्साह में जुट गई। इन्टरनेट, पुस्तकों और पत्रिकाओं में नाम खोजने।
“मॉम, आप अपना सोचिए हम अपना ढूँढते हैं ।”
उसे लगा जैसे उसके ऊपर एक बड़ी भारी ज़िम्मेदारी है। अपने वंशज को उसकी पहचान दिलाने की। इस पागल सभ्यता की भीड़ में वह खो न जाए।उसे एक सुन्दर सा नाम देना होगा जो उसकी पहचान बताएगा कि वह कौन है? किस मूल की वह शृंखला  है? वह बालक उस का भी अंश होगा उसकी धमनियों में उसका भी ख़ून होगा। उसका अपना रोम-रोम हुलस रहा था तब। लग गई वह भी शब्दकोषों के पलटने में। सम्बन्धी, सहेलियों को भारत तक में ईमेल और फ़ोन कर दिए- सुझाव देने के लिए। अपने चुने नामों के सुझाव वह बेटी को आगे भेज देती।
“ना। आप समझती नहीं। यह शब्द जीभ में मरोड़ पैदा करते हैं। भला कौन बुलाएगा यहाँ? आप केवल नाम के अर्थ पर ध्यान दे रही हैं। नाम बुलाने में सुन्दर लगना चाहिए।” एक अपेक्षित उत्तर आ जाता। 
वह स्वयं उलझ –उलझ जाती है। कई ध्वनियाँ तो अमरीकी उच्चरित ही नहीं कर पाते।
“ममी ध्यान रखिएगा। जानती हैं आपकी सहेलियों के बच्चों के नामों का क्या हुआ? आरती तो बदल गई आर्टी में और तरुण हो गया टरून। वह प्रशान्त और मृत्यंजय? बाबा रे, कोई  छोटा, आसान, कोमल स्वरों वाला नाम नहीं होता?”
वही तो सोचती रहती हूँ। नाम का अच्छा सा मतलब भी तो हो। यथा नाम तथा गुण। बच्चे को एक नाम देकर हम उसके साथ ही अपेक्षाओं की डोर भी बांध देते हैं।
“बेकार की बातें। यहाँ यही नाम चलते हैं- जॉर्ज, रॉयन, टिमोथी, चार्ली वग़ैरह। क्या इनके कुछ अर्थ होते हैं? क्या यह लोग जीवन में ऊँचा नहीं चढ़ते?”
तर्क की इतनी परतें पहले तो कभी उसके सामने न खुली थीं। वह स्वीकार नहीं कर पाती ये सब दलीलें। बस मन नहीं मानता।
बच्चे के आगमन के दिन पास आते जा रहे थे और कोई सर्व सम्मत नाम पकड़ में ही नहीं आ रहा था कि हाँ, बस यही चाहिए।
“हमने नाम  निश्चित कर लिया है। आपकी भागदौड़ ख़त्म।”
भावी नाना- नानी दोनों उत्सुक। “क्या तय किया?”
बेटी –दामाद दोनों ने एक दूसरे को गहरी नज़रों से देखा। 
“ अभी हम किसी को नहीं बताएंगे सिवाय इसके कि अमरीकी नाम है।”
वह केवल अपने शरीर का ही संतुलन नहीं बनाए रही बल्कि चेहरे पर भी इस आघात  की एक झुर्री तक नहीं उभरने दी। उसे अपनी इस क्षमता पर ख़ुद भी विश्वास नहीं हुआ।
पति के साथ एकान्त पाते ही मुखौटा अपने आप उतरा ही नहीं बल्कि चिन्दी- चिन्दी हो गया।
वह भी चुप थे पर परेशान नहीं।
“ बताइये, हम कैसे जुड़ पाएंगे उस ग़ैर नाम से जो पहले कभी जाना- सुना ही नहीं। जो न हमारी भाषा का है और न ही हमारी संस्कृति का।”
“ जब एक बार अमरीकी जमाई स्वीकार कर लिया है तो बच्चे को भी कर लो।” उनकी आवाज़ कहीं बहुत दूर से आई थी।
“ बच्चा अपनी माँ का भी तो है। आधा अधिकार तन्वी का भी तो उस पर है। अन्तिम नाम तो उसे पिता का ही मिलेगा। फिर नाम का पहला हिस्सा माँ की पहचान बताता क्यों न हो?” जो वह है, उसका नाम भी दोनों की साझी वसीयत बताता होना चाहिए न।”
“एक बार बच्चे को गोद में उठाओगी तो सारी दलीलें,  सारी चोटें और सारी आहतता भूल जाओगी।“ वोह क्या सोच रहे हैं, पढ़ नहीं पाई। आँखों पर पलकों के परदे गिर चुके थे।
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धड़कते दिल, उस दिल की गहराई से निकली प्रार्थनाएँ। अस्पताल के गलियारों में अंतहीन चहलक़दमी। आ ही गई वह घड़ी।
मुट्ठियाँ कसे, बन्द आँखों का गुलाब। धीमे से पलकें खुलीं। दो काले भंवरे उसकी आँखों से उलझ गए। एक अलग तरह की झुरझुरी। सारा बदन ममता से झनझना गया। कुछ भी याद नहीं रहा सिवाए इसके कि वह उसका अपना है। होंठ बच्चे के सिर पर रख दिए।
“भई, अब तो बता दो कि इसे क्या कहकर पुकारें?” पीछे से बच्चे के नाना ने पूछा।
“जस्टिन मारिओ स्मिथ”
हैरान। जो होठों से बोल नहीं पाई वह फटी आँखों ने बोल दिया।
नई माँ चहकी। “मुझे जस्टिन बीवर बहुत पसन्द है। गायक, रॉक- स्टार और मारिओ- सबसे हॉट मेल मॉडल।”
वह खड़ी न रह सकी। धम से बैठ गई। पहला सवाल मन में यही कौंधा कि बच्चा बड़ा होकर अपने नाम का मतलब, इतिहास पूछेगा। पूछेगा कि किस से प्रेरित होकर यह नाम दिया है तो इसका जवाब क्या होगा?
वह अपनी अनुवांशिकता को इस बच्चे में बचा कर रखना चाहती थी। आंशिक ही सही। समझौते पर उतर आई हारी बाज़ी लौटाने के लिए। कहीं हल्की सी उम्मीद थी। शायद बीच का नाम ही वह भारतीय रख दें। हालांकि इसका भी कोई मतलब नहीं होता। वह औपचारिकता भी नहीं रही थी अब। लगा, दोनों गालों पर तड़ातड़ तमाचे जड़ दिये गए हैं। शायद  दख़लंदाज़ी की सज़ा।
जस्टिन मारिओ स्मिथ- वह नाम दोहराती है। कई -कई बार। इतना बेगाना नाम? इन स्वरों को वह नहीं पहचानती। वह धीरे से इस नाम को बोलने की कोशिश करती है। आवाज़ गले में अटक जाती है। वह यन्त्रणा से गुज़र रही है। इस बच्चे के रक्त, माँस मज्जा में इसकी माँ का भी अंश है जिसे उसने आधुनिकता के नशे में ख़ुद ही नकार दिया है। वह झुलस रही है अपनी बेटी के अधिकार के लिए, उसकी वंशता के सम्मान के लिए।
वह तड़प – तड़प उठती है। उस बच्चे के लिए जिससे उसकी पहचान ही छीनी जा रही है। 
कोई नहीं समझता और सुनता उसकी बात।
मुस्कुराना असम्भव था।  बुत बनी बैठी रही। बुत बेबसी में गहरे डूब रहा था। निराशा के बुलबुलों से सांस थकती रही। अचानक आशा का एक छोटा सा सतरंगी बुलबुला पकड़ में आ गया। उसे आँखों में भर लिया।
“अभी तीन दिन बाक़ी हैं। तुम आख़िरी दिन तक नाम दे सकते हो।“
“जाने दो माँ। नाओ गिव इट अप।”
बच्चे के माँ बाप ने उन्हें अनदेखा करके कोई और बात करनी शुरु कर दी।
उसके पति ने आँखें तरेरीं। आँखों ने बोला- “अब कितना और ज़लील होना चाहती हो?”
——
उसका मन नहीं मानता। तपती बालू पर लोटता है। सोच दिमाग़ में आग लगाती है। संताप की लपटों की झुलस।  चिंगारियों के घेरे में एक पहचान सिर्फ़ एक नाम की वजह से।  वही नाम जो कितना कुछ बोल देता है। वह  कौन है? किस मूल का है? किस सभ्यता और संस्कृति का वाहक है वह। क्या अपेक्षाएँ रही होंगी इसे यह नाम देने वाले की।
इस भीड़म-भीड़ दुनिया में अणु की तरह एक नन्हा सा प्राणी कितना इतिहास छिपाए होता है। सिर्फ़ इस नाम में इतनी ताक़त कहाँ से आ गई जिसने बच्चे को उसकी सारी वसीयत से दिवालिया बनाकर,  एक नई पहचान दे दी । अब जिसके पीठ टेकने के लिए कोई पृष्ठ भूमि नहीं होगी। न होगा इतिहास और न ही कोई  परम्परा। मूल्य और संस्कारों की धुरी से वंचित डोलता रहेगा दुनिया के इस शून्य में।
ऐसे ही मौक़े पर उसके पति उद्धारक की भूमिका में आ जाते हैं।
“तुम हर बात को इतनी तीव्रता से क्यों महसूस करती हो? छोटी- छोटी बात को जीने-मरने का सवाल बना लेती हो। छोड़ो भी, एक नाम ही तो है। वह कहते हैं न, गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो, सुगन्ध तो वही रहेगी। बच्चे तो बच्चे ही होते हैं। तुम उसे प्यार करोगी ही।” 
“जब जब यह नाम पुकारूँगी लगेगा पता नहीं किस को बुला रही हूँ।”
“वह उनका बच्चा है, तुम्हारा नहीं। कह तो दिया उन्होंने कि आपने अपने बच्चों के नाम रख लिए अब हमें अपने का रखने दीजिए।”
“ठीक है। तुम जो मर्ज़ी नाम रखो। मैं इसे अपने किसी सुन्दर से देसी नाम से ही पुकारूँगी।“ उसने जाती हुई उम्मीद का आख़िरी कोना पकड़ लिया था।
“कितना अशिष्ट ?” तन्वी ने वहीं मलबे की दीवार खड़ी कर दी।
वह दीवार नहीं, सूरज को देखती है जो डूब रहा है धीरे धीरे। जब तक रोशनी का एक धब्बा  भी रहेगा, रात रुकी रहेगी। वह आप्रवासी है इस देश में। उसकी बेटी आप्रवासी की संतान और तीसरी पीढ़ी? उसके रक्त का अनुपात क्षीण होते होते एकदम  विलुप्त हो जाएगा। वह अथाह समुद्र में क्यों अपने अंश को बचाए रखना चाहती है? समर्पण करने में क्यों अपने को असमर्थ पाती है। लगता है उसकी पकड़ छूटती जा रही है परिस्थतियों से। 
उसकी रुह कराहती है। तड़पती है इस अनहोनी को न रोक पाने की विवशता में।
वह शिथिल पड़ चुकी थी। सोचती है, तो काट लूँ अपने को इस सबसे?  फिर यह काटना अंशों में नहीं होगा। पूरा ही काट लूँगी इस सारे मोह से।
“हर बात को अति तक खींचने की ज़रूरत नहीं होती। ज़िन्दगी में संतुलन बना कर रखना होता है। नई पीढ़ी  है। अमरीका में पली है। ज़रूरी नहीं कि उनकी सोच भी वही हो जो तुम सोचती हो।”
“नहीं, सोचती नहीं। बहुत गहनता से महसूस करती हूँ। तुम सबके लिए छोटी सी बात है और मेरे लिए उस नन्ही जान को पहचान दिलाने की तड़प।”
“क्यों चिन्ता करती हो” अठारह साल का होगा न तब अपने आप अपना नाम बदल लेगा।”
दोनों चुप।  असलियत जानते थे।
उन्होंने नरमाई से पत्नी के कंधे पर हाथ रख दिया।
“सुनो, मुझे भी बुरा लगता है पर तुम्हारी तरह नहीं। मैं अपनी सीमा जानता हूँ। समझौता कर लेता हूँ।”
तन्वी ने भी शायद यही कहा था। 
“माँ, जब मैंने स्वीकार कर लिया है तो आप भी कर लें। आपके कहने में आकर मै अपने घर में क्लेश नहीं करना चाहती। आपका यूँ सोचना, बात करना, बच्चा होने की ख़ुशी पर पानी फेर रहा है। जब यहीं रहना है तो एक अलग- थलग सा नाम रखकर, क्या बाक़ी लोगों से कट जाना ज़रूरी है? इसका यही नाम रहेगा- जस्टिन। आप समझौता कर लीजिए।”
वह सोचती है समझौता किस से करे? हालात से या अपने दिल से?
———
हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा है। कोई राजनीतिक सम्मेलन का शोर- शराबा। डेमोक्रैटिक पार्टी ने सैनेटर पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है – जस्टिन मारिओ स्मिथ। 
 सुरक्षा का गहरा पहरा। भीड़ बाहर दीवानी हुई जा रही है- अनियंत्रित।
तन्वी भी भाग रही है मुख्य द्वार की ओर। शिथिल सी। वह युवावस्था की ऊर्जा को कहीं समय की झोली में डाल आई है। बस भीतर जाना चाहती है। बाहर कुछ लोग चौकन्ने से खड़े है। काले सूट पहने, आँखों पर धूप का चश्मा लगाए। शरीर स्थिर पर निगाहें सैटेलाइट- सी हर जगह घूम रही हैं। कहाँ, किसकी ओर यह भेद काला चश्मा छिपा जाता है।
बाहर लॉबी में मॉनीटर लगे हैं। एक प्रभावशाली दिखता पुरुष माइक पर कुछ बोल रहा है। भीड़ है। शोर है। कुछ सुनाई नहीं देता। तन्वी की उसे देखकर बेचैनी बढ़ रही है।  कितने लम्बे अरसे से नहीं मिल पाई उससे। आज गौरव का क्षण है वह यहाँ होना चाहती थी।
मुख्य दरवाज़ा खुल नहीं रहा। उसकी शिथिल काया भीड़ को पार करना चाहती है। काले चश्मा वाला सुरक्षा कर्मचारी उसे रोक लेता है। तन्वी कभी टेलीविज़न स्क्रीन पर बोलते आदमी और कभी अपनी ओर इशारा कर रही है। याचना का भाव है उसके चेहरे पर। वह आदमी पल भर को रुक कर उसके सांवले चेहरे पर आँखे गड़ा देता है। दरवाज़ा शायद खुल रहा है।
दूसरा सुरक्षा कर्मचारी भी पास आकर खड़ा हो जाता है। तन्वी का हाथ फिर स्क्रीन की दिशा में उठा है। 
दूसरे सूट वाले आदमी ने शायद कठोरता से इन्कार में सिर हिलाया है।
दरवाज़ा फिर से बन्द हो गया।
भीड़ का रेला आया और तन्वी के कमज़ोर पाँव उखड़ गए। वह भीड़ में बहने लगी।
तन्वी छटपटा रही है। गुहार लगा रही है शायद अपने बेटे के नाम की। उसकी आवाज़ इस भीड़ में गुम हो गई।
अचानक धुएँ का ग़ुबार-सा उठता है और सब कुछ लुप्त होता जा रहा है। किसी की कोई अलग पहचान नहीं। सभी धुँधली आकृतियाँ। तन्वी भी उसी धुएँ की चपेट में आती जा रही है।
“तन्वी, बचो।” वह अपनी ज़िन्दगी की सारी ताक़त लगा कर चीख़ना चाहती है। गले में आवाज़ घुट गई।  बेबस-सी घों घों की आवाज़।
उठकर बैठ गई। क्या था यह सब? 
माथे पर चिपचिपाहट थी, ठंडी गीली सी।
अंधेरे में आँखे गड़ाए दिल का ज़ोर ज़ोर से धड़कना महसूस करती रही। पति शायद निश्चिंत सो रहे थे और वह कितना कुछ लाँघ आई।
अचानक उसे लगा कि अन्धेरा इतना सघन नहीं था जितना उसे लग रहा था। वह आस-पास की चीज़ों को थोड़ा –थोड़ा देख पा रही थी। 
चेहरा घुमाया। उसकी नज़र दीवार के निचले हिस्से पर लगी छोटी –सी  नाइट लाइट पर पड़ी।  उसकी मद्धम दूधिया रोशनी स्थिर थी। कहीं कुछ कम्पन नहीं। वह उसे देखती रही।
वह रोशनी धीमे से सरककर उसकी आँखों में आ बैठी। वे चमक गईं।
यूँ ही बहुत देर तक बैठी रही।उंगलियों के पोरों पर अठारह साल गिने। कुछ हिसाब लगाया। चेहरे की मुस्कान ने साथ दिया।
हौले से सिर तकिए पर रख दिया।
नाइट- लाइट की हल्की सी रोशनी अब उसके चेहरे पर तिरछी होकर पड़ रही थी।
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अनिल प्रभा कुमार
ईमेल : Aksk414@hotmail.com 
पता: 119 Osage Road, Wayne. NJ 07470.USA
मोबाइल:  973  978  3719
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