मनीष श्रीवास्तव बादल की तीन ग़ज़लें
नफ़रतों को काटती है उल्फ़तों की धार बस
ये कहाँ की मुंसिफ़ी है ये कहाँ की रीत है
क्यों नहीं कहते हो खुल के क्यों ये लब ख़ामोश हैं
मुझको फ़ुर्सत है नहीं जो प्यार की पोथी पढूं
उनके जीवन मे फ़क़त इतना दख़ल मेरा रहे
अब समझ आयीं उसे ग़ज़लों की सब बारीकियां
हुस्न की पेचीदगी “बादल” नहीं समझा कभी
जिस्मों में जुम्बिश होती, साँसों की आवाजाही है
पत्थर चाहे मूरत बनकर मंदिर में पूजा जाए
धनवानों को देख ग़रीबी बेबस हो रब से पूछे
बात क़लम की लंबी – लंबी, तलवारों पर हंसती है
सारे बर्तन झगड़ा करते शोर बहुत करते, लेकिन-
उम्र हुई तो पैर थिरकना कम हो जाता है अक्सर
उसने कब ‘डॉलर’ को अपने सपने में देखा “बादल”
आज के माहौल में भी हिचकिचाता है बहुत
कोशिशें नाकाम थीं तो मंदिरों का रुख़ किया
पर कटे पंछी का यारों हौसला तो देखिए
सत्य की पगडंडियों पे लोभ के झटके भी हैं
चाहता चहरे पे सबके वो ख़ुशी, बस इसलिए
सत्य की रक्षा भला कैसे करे वो झूठ से
बारहा जज़्बात का है क़त्ल होता, इसलिए
RELATED ARTICLES
