1

एक सुकून है जो दिल माँग रहा है
तलाश रहा है उस शनिवार को
जो बचपन में मिलता था,मानो
तरस रहा है उस अवकाश को
जो अब हिस्सा नही है मेरे
जीवन की किताब का

एक नींद सी है जो पलकों से झांक रही है उनींदी सी
खोज रहीं है बिस्तर का वो कोना जहां सपने सजते है
कुछ अलग सी दुनिया जहां,
सबसे बड़ा नशा ही सुकून है।

क्या क्या नही खो दिया
इस भाग दौड़ में मैनें
खुद को भी एहसास नहीं है
सब कुछ कमा लिया लेकिन
वो बचपन वाली बात नहीं हैं।

काश कि किसी दिन ऐसा हो
कि महसूस हो पहली बार खुली
नींद सुबह की लालिमा ओढ़े
वक्त मुट्ठी में लिए मै झूम रहा हूँ
बेफ़िक्री ओड़े,लेकिन जाने क्यों
अलग ही धुन में बैचेन घूम रहा हूँ

काश! काश कुछ ऐसा हो जो मैँ सोच रहा हूँ

2

आज कल कुछ भी आम नहीं है
इंसान तो है
लेकिन ज़िंदगी में रफ़्तार नहीं है।

सन्नाटा सा है गलियों में रुका हुआ
चौराहे शांति से सन्नाटे भरे
वक्त मानो खुद ही को कोस रहा है।

उदास अकेली सी बाल्कनी
जहाँ जाने वाला कोई नहीं
आज कल बाहर रास्ता भी
कुछ भी तो आम नहीं है।

ठहरे हुए इस वक़्त में
जहाँ जीवन आराम कर रहा है
कुछ है जो खो गया था सबका
वापिस जीवित हुआ है।

साफ़ आसमान में चहकते पक्षी
फ़सलो को गलते देखना
और आँगन में पिघलती धूप
मौसम भी बदल गया है

कुछ फ़ुरसतें जो आम थी
लेकिन नसीब के पार है
अब मिलेंगी कब तब अरसे बाद
अकेले में सोचता सा हूँ

रूटीन सा अब एक जीवन है
किसी सुकून के वास्ते ख्वाब
कच्ची-पक्की यादें है मेरे
किसी पुराने बस्ते में क़ैद
आज कल कुछ भी आम नहीं है!

मैं खास होने लगा हूँ
रफ्तार से चलते चलते
बेवजह हँसते हँसते
मैँ “मैँ”होने लगा हूँ

यतिश वत्स
मुजफ्फरनगर निवासी यतिश वत्स पेशे से बिज़नेसमैन, दिल से रेडियो जॉकी और शब्दों से प्रेम करते हुए शौकिया तौर पर डायरी के पन्नो पर हिंदी इंग्लिश में कविताये लिखते है.

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