संपादकीय - हिन्दी फ़िल्मी सितारे हिन्दी बोलने में शर्माते क्यों हैं ? 3

सोचने का मुद्दा यह है कि जो कलाकार हिन्दी में संवाद बोल कर करोड़ों रुपये कमाते हैं, वे अचानक पुरस्कार समारोहों में अंग्रेज़ी क्यों बोलने लगते हैं। यदि आपको हिन्दी बोलनी नहीं आती तो आपकी कमज़ोरी के साथ सहानुभूति की जा सकती है, मगर अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ ख़ान जैसे लोग जब अंग्रेज़ी बोलने लगते हैं तो लगता है कि बेईमानी की जा रही है।

अप्रैल 2022 में हिन्दी को लेकर बॉलीवुड में एक बहस सी छिड़ गयी थी जब कन्नड़ के जाने माने सितारे किच्चा सुदीप ने कहा था कि, “हिन्दी अब राष्ट्रभाषा नहीं रही, बॉलीवुड साउथ फ़िल्मों के सामने स्ट्रगल कर रहा है। ” 
सोशल मीडिया में सुदीप का एक वीडियो ख़ासा वायरल हुआ था। इस वीडियो में उनसे एक व्यक्ति ने पूछा कि एक पैन इंडिया फिल्म कन्नड़ में बनाई गई। इस पर सुदीप ने कहा, मैं करेक्शन करना चाहता हूं… हिंदी अब राष्ट्रीय भाषा नहीं रही। बॉलीवुड अब पैन इंडिया फिल्म बना रहे है। वो लोग तमिल और तेलुगु में फिल्में डब कर सक्सेस के लिए स्ट्रगल कर रहे हैं। फिर भी वह कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। लेकिन, आज हम लोग ऐसी फिल्में बना रहे हैं, जो हर जगह देखी और सराही जा रही हैं।
किच्चा सुदीप ने रामगोपाल वर्मा की कुछ हिन्दी फ़िल्मों में भी अभिनय किया है। मगर वे दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के सुपर विलेन हैं… और ज़ाहिर है कि अच्छे कलाकार भी हैं। मगर कई बार बहुत से लोग ग़लत समय पर मुंह खोल बैठते हैं और विवाद को जन्म दे देते हैं। 
मैंने अपनी ही एक कहानी में कहा है, “इन्सान को बोलना सीखने में तीन से पाँच वर्ष लगते हैं। मगर इस बात को सीखने में उम्र गुज़र जाती है कि कब नहीं बोलना है।”
किच्चा सुदीप की बात हिन्दी के बड़े सितारे अजय देवगन को नाग़ावार गुज़री और उन्होंने एकदम ट्वीट कर डाला, ”किच्चा सुदीप मेरे भाई… आपके अनुसार अगर हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा नहीं है तो आप अपनी मातृभाषा की फ़िल्मों को हिन्दी में डब करके क्यों रिलीज़ करते हैं? हिंदी हमारी मातृभाषा और राष्ट्र भाषा थी, है और हमेशा रहेगी… जन गण मन…”
उस पर किच्चा सुदीप ने सफ़ाई देते हुए जवाब भी दे दिया, ”हेलो अजय सर, मैंने जिस संदर्भ में अपनी बात कही थी, मेरा मानना है कि शायद वह बिल्कुल अलग रूप में आप तक पहुँची है। जब मैं आपसे व्यक्तिगत तौर पर मिलूंगा तो शायद मैं आपको यह बात समझा पाऊंगा कि वह बयान क्यों दिया गया था। इसका मक़सद दु:ख पहुंचाना, उकसाना या कोई बहस शुरू करना नहीं था… मैं ऐसा क्यों करूंगा सर?”
कर्नाटक के एक और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया भी बहस में कूद पड़े और उन्होंने कहा, ”हिंदी न तो कभी हमारी राष्ट्र भाषा थी और न कभी होगी। प्रत्येक भारतीय का यह कर्तव्य है कि वह देश की भाषाई विविधता का सम्मान करे। हर भाषा का अपना एक समृद्ध इतिहास होता है, जिस पर लोगों को गर्व होता है। मुझे कर्नाटक का होने पर गर्व है।”
स्टीफ़ेन ऑल्टर, फ़ैन्टेसीज़ ऑफ़ अ बॉलीवुड लव थीफ़ में ओंकारा फ़िल्म के सेट के बारे में लिखा, हालाँकि फ़िल्म हिन्दी में बन रही है, लेकिन सेट पर कम-से-कम पाँच भाषाएँ इस्तेमाल हो रही हैं। निर्देशन के लिए अंग्रेज़ी, और हिन्दी चल रही है। संवाद सारे हिन्दी की एक बोली में हैं। पैसे लगाने वाले गुजराती में बातें करते हैं, सेट के कर्मचारी मराठी बोलते हैं, जबकि तमाम चुटकुले पंजाबी के हैं।
वहीं नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का कहना है कि फ़िल्म की स्क्रिप्ट रोमन हिन्दी (यानी कि अंग्रेज़ी अक्षरों) में आती है। मेरी कामना है कि वो हिन्दी (देवनागरी) में आए। उन्होंने यह भी दावा किया कि सेट पर हिन्दी का उपयोग लगभग न के बराबर ही होता है। उन्होंने बात को हल्का सा व्यंग्य देते हुए कहा कि सच तो यह है कि यदि कलाकार अपने निर्देशक की बात आधी-अधूरी ही समझेगा तो भला अपना बेस्ट कैसे दे पाएगा।  
मुझे दशकों पहले हिन्दी के वरिष्ठतम गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की कही बात याद आ गयी, उर्दू के बिना हिन्दी फ़िल्मी बनाई ही नहीं जा सकतीं। फ़िल्मों की गीत तो उर्दू के बिना लिखे ही नहीं जा सकते। शायद इसीलिय पंडित प्रदीप, नरेन्द्र शर्मा, भरत व्यास, अन्जान और इंदीवर ने शुद्ध हिन्दी में फ़िल्मी गीत लिखे। 
लगता था कि यह विवाद फ़िलहाल थम गया है मगर ऐसा हो नहीं रहा। अभी हाल ही में हिन्दी गायिका एवं अभिनेत्री सोना महापात्र ने एक सख़्त बयान दे डाला है। सोना ने कहा कि ये शर्म की बातबात है कि बॉलीवुड के कुछ अभिनेता हिंदी फिल्म उद्योग में काम करने के बावजूद हिंदी में पारंगत नहीं हैं। सोना महापात्र अपने विचारों के प्रति बेहद ईमानदार हैं और बॉलीवुड में महिलाओं के द्वेष को दूर करने से कभी नहीं हिचकिचाती हैं।
सोना ने इस बारे में आगे कहा कि ‘साउथ सिनेमा जहां अपनी संस्कृति को अपनाता है, तो वहीं कुछ हिंदी फिल्म एक्टर्स भाषा तक को ठीक से बोलने के लिए संघर्ष करते हैं’। इतना ही नहीं भाषा पर चल रहे विवाद के बारे में बात करते हुए सोना कहती हैं कि ‘मैं एक बात कह सकती हूं कि मैंने ‘आरआरआर’ और ‘पुष्पा’ देखी है और इसे देखने के बाद मैं एक भी बात कह सकती हूं, सलाम! प्रयास, कला निर्देशन, कास्टिंग सभी शानदार थी’।
सोना आगे कहती हैं कि ‘उन्हें अपनी संस्कृति को अपनाते हुए देखना बहुत अच्छा था। हमारे पास बॉलीवुड में कई सितारे हैं, लेकिन यहां ऐसे स्टार्स भी हैं, जो मुश्किल से हिंदी बोल सकते हैं और ये शर्म की बात है, क्योंकि एक हिंदी फिल्म स्टार के रूप में भाषा में पकड़ होनी चाहिए। साउथ की फिल्मों में भारतीय सौंदर्य शास्त्र काफी दमदार हैं’। इन दिनों सोना बॉलीवुड फिल्मों में गाने के अलावा लाइव शो में ज्यादा ध्यान दे रही हैं। इस बारे में बात करते हुए वो कहती हैं कि ‘मैं अभी वहां कुछ करना चाहती हूं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि मैं इंडस्ट्री से अलग हो रही हूं’।
वर्तमान समय के सुपर-स्टार अक्षय कुमार और आमिर ख़ान और बहुत सी नायिकाएं भी बम्बइया अंदाज़ में हिन्दी बोलते हैं। उनके शीन-क़ाफ़ बिल्कुल भी दुरुस्त नहीं होते। वे ख़बर को खबर, दरवाज़ा को दरवाजा, और ख़ास को खास ही कहते हैं। संजय दत्त की हिन्दी तो बेचारी हमेशा डरती रहती है कि कहीं मुन्ना भाई उसका गला ही न दबा दें। 
मामला यहीं नहीं थमता। ऐसे पत्रकार जो कि हिन्दी भाषा का कमाते और खाते हैं, उनका उच्चारण भी इतना दोषयुक्त होता है कि कई बार तो कोफ़्त होने लगती है कि भाई जिस भाषा का खाते हो उस पर थोड़ी मेहनत तो कर लो। मज़ेदार बात यह है कि ये लोग अंग्रेज़ी में भी अपना भाषाई तड़का लगाना नहीं भूलते और कह देते हैं – ही इज गोइंग टु बाई ए सर्ट, बट टुमारो ही विल फलाई इन बिजनस कलास टु जूरिख।”
सिनेमा जगत सहित शहरी भारत के संपन्न हिन्दी-भाषी परिवारों की एक विचित्र स्थिति बनी हुई है। उनके घरों में अंग्रेज़ी बोली जाती है। समाचार-पत्र अंग्रेज़ी का आता है। हिन्दी की पत्रिकाएं न तो आती हैं न पढ़ी जाती हैं। बच्चे इंग्लिश मीडियम से पढ़ाई करते हैं और हिन्दी के बारे में बेचारे से हो जाते हैं। इससे प्रवासी साहित्यिक लेखन को कितना नुकसान हो रहा है, इस पर अगले संपादकीय में बातचीत करूंगा। 
हिन्दी सिनेमा में नायिकाएं दक्षिण भारत से आती रही हैं – भानुमती, वैजयन्ती माला, वहीदा रहमान, रेखा, जया प्रदा, श्रीदेवी जैसी एक लंबी कतार है। जैमिनी गणेश, कमल हसन जैसे कलाकारों ने भी हिन्दी फ़िल्मों में आने की कोशिश की। उनसे अपेक्षा रखना कि वे हिन्दी में पारंगत हों उनके प्रति अन्याय भी हो सकता है। 
मगर सोचने का मुद्दा यह है कि जो कलाकार हिन्दी में संवाद बोल कर करोड़ों रुपये कमाते हैं, वे अचानक पुरस्कार समारोहों में अंग्रेज़ी क्यों बोलने लगते हैं। यदि आपको हिन्दी बोलनी नहीं आती तो आपकी कमज़ोरी के साथ सहानुभूति की जा सकती है, मगर अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ ख़ान जैसे लोग जब अंग्रेज़ी बोलने लगते हैं तो लगता है कि बेईमानी की जा रही है। 
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

29 टिप्पणी

  1. हिंदी भाषा के मुद्दे पर खुला और स्पष्ट संपादकीय। ये हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी का दुर्भाग्य ही रहा कि इस संवैधानिक दर्जा देने के बाद भी इस पर ध्यान नहीं दिया गया। भले ही बोलचाल की भाषा प्रत्येक व्याक्ति की एक मौलिक अभिव्यक्ति है, लेकिन जिस तरह हिंदी की अवेहलना की जाती है। वह असहज करता है। आपने अपने संपादकीय में जिस तरह इस मुद्दे से जुड़े हर बिंदु पर बात की है, और सिलसिलेवार तथ्यों का वर्णन किया है। वह उल्लेखनीय है और इस दिशा में अच्छी पहल है। हिंदी को उसका सम्मान देने के लिए नियमों से आगे बढ़कर जन जन की भागीदारी बहुत जरूरी है, इस बात को केवल अभिनेताओं को ही नहीं प्रत्येक भारतीय को समझना होगा।
    एक महत्वपूर्ण सम्पादकीय के लिए हार्दिक साधुवाद सर. . .!

    • विरेन्द्र भाई हम सब का प्रयास होना चाहिये कि हिन्दी भाषा को उसका समुचित आदर मिले।

  2. इस बहुत ही सामयिक संपादकीय के लिए बधाई. मैं स्वयं अनेक अवसरों पर यही बात कह और लिख चुका हूँ. हिन्दी सिनेमा के शुरुआती दिनों से उसकी पटकथाएँ अंगरेजी में और संवाद रोमन लिपि में लिखे जाते रहे हैं. अत्यल्प समय के लिए प्रेम चंद बंबई गये तो यह बात उन्होंने भी अनुभव की. वे अपनी कहानियों के प्लॉट भी अंग्रेजी में लिखते थे.
    हिन्दी-भाषी समाज की यही सबसे बड़ी विडंबना है कि वह अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत से प्यार नहीं करता. उसके प्रति गौरव का भाव भी नहीं रखता.
    चलचित्रों की दुनिया तो और भी नकली और प्रायः पूरी की पूरी ही मायावी है. यहाँ सब कुछ समझौते पर आधारित है. कहानियों में चाहे आदर्श का प्रतिपादन होता हो, इस फिल्मी दुनिया के कर्णधारों के व्यक्ति त्व और आचरण में उसकी झलक नहीं मिलती.
    भाषा और संस्कृति के आदर्श स्वरूप का अनुसंधान बॉलीवुड में न करना ही उचित है.
    मजरूह सुलतान पुरी का वक्तव्य बचकाना लगता है. लिपि बदलने से भाषा नहीं बदलती. अगर ऐसा होता तो हिन्दी के प्रेमाख्यानक- पद्मावत, अखरावट आदि और जायसी, कुतुबन, मंझन जैसे रचनाकार अरबी साहित्य में गिने जाते, क्योंकि उनकी लिपि अरबी थी. हिन्दी फिल्मों के नगमे उर्दू शायरों ने लिखे. पर “जैसे मंदिर में हो कोई जलता दीया” में उर्दू कहां है? इसे लिखा तो जावेद अख्तर ने है. पर यह उर्दू नहीं है.

    वैसे भी उर्दू हिन्दी में शब्दों के अलावा कोई भेद नहीं.
    आज तो मस्जिदों के नाम भी देवनागरी में लिखे जा रहे हैं. देवबंद में उन्होंने बकायदा संकल्प पारित किया है कि हिन्दी में काम करें.
    उर्दू अपनी शब्दावली और लिपि के कारण मर रही है. लखनऊ जैसे शहर में अब उर्दू का कोई रिसाला नहीं दिखता. पता नहीं मजरूह ने क्या देखकर वह हलकी बात लिखी.
    नुक्ते तो अब कम ही इस्तेमाल होते हैं. उच्चारण का विवेक भी नहीं रह गया है. पर जो सबसे अफसोसनाक बात है, वह है हिन्दी के लुप्त होते शब्दों की. उनकी जगह अंग्रेजी ले रही है.
    हमारे हिन्दी शिक्षक भी बस फूल मालाएँ और उपहार लेने में व्यस्त हैं. उनसे पूछिए कि कक्षा के बाहर हिन्दी के लिए क्या करते हैं!
    लम्बी सूची है. बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.

    • डॉक्टर साहब इस विस्तृत एवं सारगर्भित टिप्पणी से आपने पुरवाई के इस सप्ताह के संपादकीय के महत्व को रेखांकित कर दिया है।

  3. अच्छा विश्लेषण।
    शिक्षा क्षेत्र में जब तक 1835 की नीति रहेगी तब तक मानसिकता बदलना कठिन है। लेकिन हम नहीं तो कोई तो अवश्य बदलाव करेगा, भारत के अनुरूप। क्योंकि भारतभूमि इसे विशिष्ट बनाती है जो अन्यत्र नहीं है। जैसे तकनीक पश्चिम को विशिष्ट बनाती है।

  4. आपने हिंदी सिनेमा के कलाकारों की भाषाई हीनताबोध के बारे में बहुत अच्छा संपादकीय लिखा है। इससे हिंदी के प्रति लोगों का रुझान बढेगा।

    एक निवेदन, हिंदी में नुक्ता वाले शब्दों का प्रयोग नुक्ताविहीन ही होता है : वाचन में और लेखन में भी। हमने वैसे शब्दों को अब हिंदी का बना दिया है, जिसमें नुक्ता की आवश्यकता नहीं लगती। यह विचारणीय है।

    • धन्यवाद अशोक जी। नुक़्ते को लेकर सोच अभी भी बंटी हुई है वरना बेचारा जलील… ज़लील हो कर रह जाएगा।

  5. सर! फिल्मी जगत के कुछेक कलाकारों के ब्याज से आपने हिन्दी की उपेक्षा को लेकर जो पीड़ा व्यक्त की है, वह शतप्रतिशत उचित और मर्म को झकझोरने वाला है। दरअसल, सर! जो कलाकार हिन्दी में संवाद बोल कर करोड़ों रुपये कमाते हैं, वे अचानक पुरस्कार-समारोहों में अंग्रेज़ी इसलिए बोलत हैं कि हिन्दी उनके लिए मात्र रोज़ी-रोटी का माध्यम है। उसके प्रति उनके मन में कोई आदर या सम्मान भाव नहीं, अपितु बाज़ार में टिके रहने की उनकी विवशता है। अन्यथा वे कभी का हिन्दी का जुआ अपने कन्धों से उतार फेंके होते, लेकिन यहीं यह भी उल्लेख्य है सर कि यह केवल अमिताभ, शाहरूख, अक्षय, किच्चा सुदीप, सिद्धरमैया आदि का मामला नहीं है, यह कमोवेश हर व्यवसाय से जुड़े लोगों का मामला है। ‘जग जानै इंग्लिश हमैं’ का नशा आज का नहीं है। यहाॅं ‘एक ही हो तो ज्ञान सिखाइए, कूपहि में यहाॅं भाॅंग पड़ी है। दूसरी चीज, आपने अपनी कहानी में जो लिखा है कि “इन्सान को बोलना सीखने में तीन से पाँच वर्ष लगते हैं। मगर इस बात को सीखने में उम्र गुज़र जाती है कि कब नहीं बोलना है।” यह भी हम भारतवासियों की पुरानी और एक तरह से लाइलाज बीमारी है, जबकि घर -परिवार के साथ-साथ प्राथमिक स्तर की पुस्तकों, खासकर कबीर के दोहों आदि के माध्यम से कब, क्या, कहाॅं और कैसे बोलना चाहिए, इन चीजों का बोध कराया जाने लगता है। ऐसे में हर संवेदनशील और हिन्दी-प्रेमी आहत हैं। नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी और सोना महापात्र जैसे लोगों की पीड़ा जायज़ ही है। ….. फिर भी सर आपको आश्वस्त करते हुए कहना चाहूॅंगा कि तमाम उपेक्षाओं के बावजूद हिन्दी का भविष्य अत्यन्त समृद्ध और उन्नत है।
    सादर अभिवादन के साथ।

      • इस स्नेह एवं आत्मीयता के लिए हृदय से आभारी हूॅं सर। सादर प्रणाम।

  6. सटीक सामयिक प्रश्न उठाता विचारणीय आलेख ।सभी अपनी ढपली अपना राग अलापने में लगे हैं।देश,भाषा,संस्कृति की किसको पड़ी है।

  7. अब ऐसे लोगों को क्या कहे सर जी, जिस मां के बलबूते पर यह सीने हस्ती करोड़ों में खेल रही है। उसको मां कहने में उन्हें शर्म आती है। मंच पर हिंदी बोल देंगे तो इनका रुतबा कम हो जाएगा इसीलिए हिंदी को बिगाड़ो और टूटी-फूटी अंग्रेजी ही सही बोलो।

  8. A very interesting Editorial. Drawing attention to how most film stars converse in ENGLISH on the sets of a Hindi movie.
    Also, your readers get to know so much more about our Southern n Bollywood film stars.
    Stephen Alters observations about 5 different languages having been spoken on the sets of Onkara movie are compelling indeed.
    Yes one must speak in Hindi when one is getting an award for a Hindi film.
    Regards
    Deepak Sharma

  9. फिल्म उद्योग तो हिंदी, कहा जाए हिंदी सिनेमा यानी कमाने के लिए हिंदी और जीने के लिए अंग्रेजी ? इस विरोधाभास पर उत्तम कटाक्ष है आज की सम्पादकीय विचारणीय और प्रसारणीय ।
    Dr Prabha mishra

  10. बात सोलह आने सच है दर्शन पुरस्कार समारोह में कलाकार अंग्रेजी इसलिए बोलते हैं ताकि लोगों को लगे वे उच्च सोसाइटी से तालुकात रखते हैं हिंदी बोलना अपनी तौहीन समझते हैं

    मैंने अपनी ही एक कहानी में कहा है, “इन्सान को बोलना सीखने में तीन से पाँच वर्ष लगते हैं। मगर इस बात को सीखने में उम्र गुज़र जाती है कि कब नहीं बोलना

  11. बात सोलह आने सच है . पुरस्कार समारोह में कलाकार अंग्रेजी इसलिए बोलते हैं ताकि लोगों को लगे वे उच्च सोसाइटी से तालुकात रखते हैं हिंदी बोलना अपनी तौहीन समझते हैं

    मैंने अपनी ही एक कहानी में कहा है, “इन्सान को बोलना सीखने में तीन से पाँच वर्ष लगते हैं। मगर इस बात को सीखने में उम्र गुज़र जाती है कि कब नहीं बोलना

  12. आपका वक्तव्य धरातल पर विचारणीय है बड़े भैया,, हिन्दी का भविष्य क्या होगा ?
    जब एक पब्लिक स्कूल में मुझे हिन्दी पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया, एक सामान्य परिवार की शिक्षिका ने मेरा उपहास किया था ।
    “ओह ! हिन्दी के लिए बोरिंग सब्जेक्ट ”
    पग-पग पर देखने को मिलता है। अपनी ही भाषा के लिए हीन भावना, बहुत कष्ट होता है ।

  13. संपादक महोदय !
    आपके द्वारा संपादकीय में उठाया गया विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिंदी सिनेमा के कई सितारे जिस भाषा के सहारे अपार यश, धन, वैभव अर्जित करते हैं, उसके प्रति उनमें कोई लगाव या प्रेम नहीं नज़र आता।
    ‘फिल्म फेयर’ जैसे पुरस्कार के दौरान जब अंग्रेजी झाड़ी जाती है, तो बहुत साफ ढंग से आप द्वारा कही गई ‘बेईमानी’ उजागर होती है। यह क्षोभ पैदा करने वाला तथ्य है, किंतु सच है।
    लगता है कि एक तरह की आत्महीनता का बोध लगभग पूरे भारतीय मानस पर है। यह सब उसी का परिणाम है।
    जब कोई मानव जाति या समुदाय उपनिवेश के दौर से गुजरता है, तो इस तरह की टूट-फूट और विकृतियां तरह-तरह से अभिव्यक्त होती है।
    अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति वास्तविक गौरवबोध कम लोगों में है।

  14. बहुत अच्छा सम्पादकीय इस अंक में । पिछले दिनों आप बहुत ही ज़रूरी संपादकीय लिख रहे हैं आदरणीय । हिन्दी को लेकर भले ही आप जैसे तमाम भारतीय और विदेशी विदेशों में अथक कार्य कर रहे हों, चिंतित हों ।परन्तु हमारे हिन्दी भाषी देश – प्रदेश में हिन्दी को यों हीन ही समझ लिया जाता रहेगा

    आपको साधुवाद, धन्यवाद इन महत्वपूर्ण संपादकीयों के लिए।

    • निधि आप आजकल पुरवाई के संपादकीय निरंतर पढ़ रही हैं। सारगर्भित टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

  15. ये हिन्दी भाषा और हिन्दी फिल्मों के साथ उसके अपने ही कलाकारों द्वारा की जा रही बहुत न इन्साफी है।
    अपना ही माल खोटा तो देनेवाले का क्या दोष !
    इसमें एक बात मुझे तब पता चली जो सोने पर सुहागा है ,जब मै खुद फिल्म में कहानी, संवाद व पटकथा लिखने के लिए अनुबंधित किया गया। मैने सामान्य रूप से देवनागरी में लिख कर निर्माता को दी तो उसने देखते ही एक क्षण में मुझे स्क्रिप्ट लौटा दी और कहा इसे अंग्रेजी नोटेशन में लिख कर लाओ ! क्योंकि अधिकांश हिन्दी फिल्म कलाकार और निर्माता निर्देशक देवनागरी पढ़ना ही नहीं जानते! कैसी विडम्बना है !!
    मेरा बॉलीवुड महान !!

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