डॉ. ममता मेहता की ग़ज़ल 1
  • डॉ. ममता मेहता

मन ये बियाबान नहीं है
खाली है वीरान नहीं है
*****
हल्की फुल्की एक दो बातें
भारी कुछ सामान नहीं है
*****
आये,बने हैं घर मालिक
कोई भी मेहमान नही है
*****
बेकल पंछी भटक रहा क्यों
राहें तो अनजान नहीं है
*****
सूनी बगिया बाट निहारे
फूल खिले निगहबान नहीं है
*****
भीतर जख्म हरे हरे हैं
बाहर पर निशान नहीं है
*****
गम किसका क्यों करें
खोने को आसमान नहीं है

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.