1
जब भी होता है जहाँ होता है,
इश्क़ इबादत का बयां होता है।
इश्क़ में शर्त नहीं होती है,
इश्क़ शर्तों पे कहाँ होता है।
बहता नस-नस में लहू के जैसा,
रूह तक में भी रवाँ होता है।
है ज़रूरत ही कहाँ लफ़्ज़ों की,
इश्क़ आँखों से बयाँ होता है।
ज़र्रे ज़र्रे में नज़र आए वही,
हर घड़ी उसका गुमाँ होता है।
2.
‘मैं’ बैठा है मेरे भीतर,
कैसे झांकू तेरे भीतर।
आशा, तृष्णा, लोभ, मोह, सब,
लगा के बैठे डेरे भीतर।
तेरा सुमिरन करवाता है,
अक्सर मन के फेरे भीतर।
जितना बाहर को भागूं मैं,
उतना ही तू हेरे भीतर।
मानुष बाहर ढूंढ रहा है,
क्यूं न तुझको टेरे भीतर।

1 टिप्पणी

  1. डॉक्टर अल्पना सुहासिनी की दोनों गजलें शानदार व जानदार।बधाई , शुभकामनाएं एवं शुभाशीष।

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