वीरेन्द्र मेहता की दो लघुकथाएं 3

  • वीरेन्द्र वीर मेहता

1 – आदर्श : एक जुनून

“मैं मानती हूँ डॉक्टर, कि ये उन पत्थरबाजों के परिवार का ही हिस्सा हैं जिनका शिकार हमारे फ़ौजी आये दिन होते हैं लेकिन सिर्फ इसी वज़ह से इन्हें अपने ‘पढ़ाई-कढ़ाई सेंटर’ में न रखना, क्या इनके साथ ज्यादती नहीं होगी?” हजारों मील दूर से ‘घाटी’ में आकर अशिक्षित और आर्थिक रूप से कमजोर औरतों के लिये ‘हेल्प सेंटर’ चलाने वाली समायरा, ‘आर्मी डॉक्टर’ की बात पर अपनी असहमति जता रही थी।
“ये तुम्हारा फ़ालतू का आदर्शवाद हैं समायरा, और कुछ नहीं।” डॉक्टर मुस्कराने लगा। “तुमने शायद देखा नहीं हैं पत्थरबाजों की चोट से ज़ख़्मी जवानों और उनके दर्द को, अगर देखा होता तो…!”
“हाँ नहीं देखा मैंने!” समायरा ने उनकी बात बीच में काट दी। “क्योंकि देखना सिर्फ आक्रोश पैदा करता हैं, बदले की भावना भरता है मन में।”
“तो तुम्हें क्या लगता हैं कि हमारे फ़ौजी जख्मी होते रहें और हम माफ़ी देकर उनका दुस्साहस बढ़ाते रहें।”
“नहीं, मैं भी चाहती हूँ कि उन्हें सख्त सजा मिले ताकि वे आइंदा ऐसा करने की हिम्मत न करें। लेकिन ये सब तो क़ानून के दायरे की बातें हैं और मैं नहीं समझती कि इस सजा में उनके परिवार को भागीदार बना देना उचित है डॉक्टर।” समायरा की नजरों में एक चमक उभरी आई।
“यानि कि आप दुश्मनों का साथ देना चाहती हैं!” डॉक्टर की बात में एक व्यंग झलक आया।
“डॉक्टर, हमारे दुश्मन ये भटके हुए लोग या इनके परिवार वाले नहीं हैं। हमारी दुश्मन तो सदियों से इनके विचारों में पैठ बनाये बैठी नफरत और निरक्षरता की अँधेरी रातें हैं, हमें इसी रात को सुबह में बदलना है।” वह गंभीर हो गयी।
“तो इस फ़ालतू आदर्शवाद को अपना जुनून मानती हैं आप!” डॉक्टर के चेहरे की व्यंग्यात्मक मुस्कान गहरी हो गयी।
“नहीं! ये फ़ालतू आदर्शवाद नहीं, जीवन का सच है जो हर युग में और भी अधिक प्रखर हो कर सामने आता है।”
“अच्छा! और कौन था वह जिसने ये आदर्श दिया तुम्हें।” सहसा डॉक्टर खिलखिला उठा।
“एक फ़ौजी था डॉक्टर साहब…..!” अनायास ही समायरा भावुक हो गयी। “जिसने अपनी मोहब्बत भरी अंगूठी तो मुझे पहना दी थी लेकिन ऐसे ही कुछ पत्थरबाजों के कारण अपनी क़समों का सिन्दूर मेरी मांग में भरने कभी नहीँ लौट सका था।”
डॉक्टर की मुस्कराहट चुप्पी में बदल गयी लेकिन समायरा की आँखें अभी भी चमक रही थी।

2- एक और एक ग्यारह

“नहीं समीर नहीं। ये नहीं हो सकता, तुम इस बात को यहीं खत्म कर दो।” तनु के जवाब ने उसको थोड़ा निराश कर दिया। बहुत अधिक समय नहीं हुआ था उनकी पहचान को। लगभग वर्ष भर पहले ही वह दोनों एक विशेष भर्ती अभियान के तहत एक निजि संस्थान में भर्ती हुए थे। जहां समीर का एक बाजू और एक पांव से लगभग लाचार होना और तनु का आकर्षक होते हुये भी ‘मर्दाना’ लक्षणों के कारण सहज ही बाकी स्टाफ से अलग-थलग सा हो जाना, उनकी नियति बन गयी थी। ऐसे में कब वे एक दूसरे के करीब आ गए, पता ही नहीं लगा था। लेकिन आज विवाह के प्रश्न पर तनु के इंकार ने समीर को उसकी शारीरिक अक्षमता का तीव्रता से अहसास दिला दिया।
“सॉरी तनु! मुझे लगा कि हमारा रिश्ता विवाह-बंधन में बदल सकता हैं, लेकिन मैं भूल गया था कि एक अधूरे इंसान को तुम्हारे जैसी योग्य और अच्छी लड़की के बारें में नहीं सोचना चाहिए।” उसकी आँखें नम हो गई।
“ऐसा मत कहो समीर, ख़ुद को अधूरा कह कर अपना मूल्य कम मत करो। अधूरापन तो मेरे जीवन में है, जो न पूर्ण रूप से स्त्री बन सकी और न पुरुष। ऐसा लगता है, जैसे गीली लकड़ी बन कर जी रहीं हूँ जो न जल पा रही है और न बुझ पा रही है।” अपनी बात कहती हुई तनु उठ खड़ी हुई। “समीर, एक किन्नर ही तो हूँ मैं! एक मित्र तो बन सकती हूँ पर किसी की पत्नी नहीं।”
“नहीं तनु।” समीर ने उठ कर जाती तनु का हाथ पकड़ लिया। “तुम एक अच्छी मित्र ही नहीं पत्नी भी बन सकती हो, क्योंकि ये जरूरी तो नहीं कि हमारा संबंध केवल दैहिक रिश्तों पर ही आधारित हो।”
“और ये समाज…!”
“हां तनु। ये समाज हमारी ‘फिजिकली डिसमिल्रिटीज’ (प्राकृतिक विषमताओं) पर प्रश्न उठाता रहा है, तो ज़ाहिर है कि हमारे संबंधों को भी आसानी से स्वीकार नहीं करेगा।”
“हाँ समीर, और बात इतनी भी नहीं है। एक विवाह का अर्थ शारीरिक जरूरतों के साथ वंश वृद्धि से भी जुड़ा होता है, क्या तुम इसे स्वीकार….?”
“बस और कुछ मत कहो तनु।” समीर ने उसकी बात काट दी थी। “मैं तुम्हारे हर प्रश्न का उत्तर बनने के लिए तैयार हूं, यदि तुम मेरा साथ दे सको। रही बात समाज की, तो जब हम अकेले समाज से संघर्ष करके यहाँ तक पहुंच सकते हैं तो क्या दोनों मिलकर समाज के हर प्रश्न का उत्तर नहीं बन सकते?” उसकी आँखों में झलकते विश्वास को देख, अनायास ही तनु मुस्करा उठी और उसने आगे बढ़ समीर का हाथ थाम लिया।

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