Sunday, May 10, 2026
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अरविंद दीक्षित की दो लघुकथाएँ

1. चमक

“रानू !अब चलो भी ,मेक अप में न जाने कितना समय लगाती हो तुम लोग !डाक्टर हमारा इन्तजार तो करेगी नही ,देरी हुई तो वे चली जाएंगी.”

इनकी आवाज से अपने मुरझाये  चेहरे  को  सँवारने की असफल चेष्टा से मेने  छुटकारा  पाना चाहा. डाक्टर से ये पहले  ही अपाइंटमेंट ले  चुके  थे.मेरी गर्भ परीक्षण रिपोर्ट इनके मनोकूल नही आई थी. इसीलिए ही हम हास्पिटल जा रहे हैं.

बैग कंधे पर डाल कदम बढ़ा ही रही थी क़ि मेरी नन्ही बेटी चेतना जो होमवर्क कर रही थी बोल पड़ी –“मम्मी प्लीज !मुझे जरा बता जाइये क्या नागिन अपने अंडे खुद ही खा जाती है ?”

चेतना का प्रश्न मेरी चेतना जगा गया, मेरा उत्तर था –“हा! बेटी, नागिन ही अपने अंडे खाती है.” जाओ बाहर जा पापा से कह दो कि मम्मी हास्पिटल नही जायेगी.

एक बार फिर मेरी नजर आईने पर पड़ी —अरे ! ये क्या! मेरा मुरझाया चेहरा अपने आप केसे चमक उठा .

2. एक कथा दो अंत

“पापा ! आप गेट पर ही ठिठके …देखो देखो ..आप के बड़ी मुसीबत से ख़रीदे प्लाट को, हम दोनों भाइयो ने बाँट कितने सुन्दर बंगले बनाये बिलकुल एक जैसे –वो देखो बड़ा हाल,उधर स्लीपिंग रूम किचिन मंदिर सर्वेंट क्वाटर बगीचा …”

“बेटे मेरा कमरा ..अंदर चल बताओ न ?”

“उफ़, रहे न मास्टर ..अंदर जाने में ..बिछा कालीन गंदा हो जाएगा न ! रही बात आपके कमरे की …आप रह तो रहे है किराए के मकान में …और आप ही बताइये …प्लाट में जगह ही कहाँ बची”.

……….उलटे पाँव ही लौटने को हुए मास्टर आनंदी लाल तभी …किसी आवाज ने खींचा उनका कुरता ओ आवाज सुनाई दी —

“मेरे सदय! कब से इतने निर्दय ….पूरब में पश्चिम की कथा ….”

“अरी कलमुही तुम! स्वर्ग में भी …बेटों के अपयश की चिंता ..”

“आखिर माँ हूँ न ! मैं बताओ वैसा लिखो “

आज्ञा पालन करना ही था, चल पड़ी कलम ——

बेटे ने कहा –“आप का कमरा ..सब यही जान लगे …आप का कमरा ..हम दोनों भाइयो के बंगलो के मध्य ….जिसके दरवाजे खुलते दोनों बंगलो में …जाने कब हमे आप की आप को हमारी जरुरत पड़े ,,बस बाकी बातें अंदर जहा आपकी बहूएँ आरती सजाये कर रही आप का इन्तजार ……”

….कलम ने रुक, मुड़ पूछना चाहा, “अब तो खुश ?”

पर कोई नही था वंहा गूंज रहा था कलमुंही का तकिया कलाम ..

“सुधर गए”

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