“तुम हर समय बच्चों की प्लेट में से कुछ न कुछ क्यों खाती हो?कितना चिड़चिड़ करते हैं कभी कभी वो!” राघव ने अपनी पत्नी ऋचा से कुछ नाराज़गी जताई।
“कभी कभी चिड़चिड़ाते हैं पर जब मैं नहीं खाती तो खुद ही कहते हैं कि आओ चख लो! ये नहीं दिखाई देता तुम्हें?”
“पर तुम ऐसा करती ही क्यों हो? अपना-अपना खाएं ना सब! इसमें क्या बुराई है?”
ऋचा गम्भीर हो गई “जब हम छोटे थे तब से मम्मी की आदत थी अपने हिस्से की हर चीज़ भैया को देने की! भैया की आदत ही हो गई सबसे ज़्यादा लेने की! पापा खाने से पहले हमेशा पूछते थे ‘बच्चों ने खाया? तुमने खाया?’ तो अपनी शादी और बच्चे होने के बाद भैया की अपने बीवी-बच्चों का ख़्याल रखने की आदत तो रही पर उन्हें कभी लगा ही नहीं कि मम्मी को भी खाने की इच्छा हो सकती है!पापा तो बहुत पहले ही चले गए थे! बाद में घर में चीज़ें आतीं और खत्म हो जातीं। मम्मी को पता तो रहता था पर…”
बहते हुए आंसुओं को पौंछते हुए भरे गले से ऋचा ने आगे कहा “अक्सर मम्मी कहती थीं इस बात को कि ‘अपने हलक का निवाला खिलाने का हर्जाना भर रही हूं!’ इसलिए मैं अपनी हिस्सेदारी अभी से तय कर रही हूं!”

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