Tuesday, March 17, 2026
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विरेंदर ‘वीर’ मेहता की दो लघुकथाएँ

1 – मंज़िलें और भी हैं
“नहीं आज नहीं।” कहता हुआ वह आगे बढ़ गया। ‘बार’ के बाहर खड़ा गार्ड भी हैरान था, सातों दिन पीने वाला शख्स आज बिना पिये जा रहा था।
वह आगे बढ़ता गया लेकिन उसके मन-मस्तिष्क में बेटी की बात घूम रही थी। “पापा, आज आप ड्रिंक नहीं करेंगें और चर्च में हमारे लिए ‘प्रेयर’ भी करेंगें।”
आखिर वह उस दोराहे पर आ खड़ा हुआ, जहां से एक रास्ता रैन-बसेरे की ओर से जाता था। वहाँ के गंदे-अधनंगे बच्चों के कुछ मांगने के लिए पीछे पड़ जाने की आदत के चलते; वह उधर जाने से कतराता था। दूसरा रास्ता ‘सर्वशक्तिमान’ के दरवाजे पर जाता था जिस ओर जाना उसने महीनों पहले बंद कर दिया था क्योंकि ठीक एक वर्ष पहले उसके ख़ुद के हाथों हुई दुर्घटना में अपने परिवार को खोने का जिम्मेदार भी वह ‘उसे’ ही मानता था।
‘क्या करे और क्या न करे’ की स्थिति में वह कुछ देर सोचता रहा और फिर एक ठंडी सांस लेकर बुदबुदाते हुए रैन बसेरे की ओर चल पड़ा। “नहीं बिटिया नहीं! मैं जीवन भर भटकता रहूँगा इन्हीं गलियों में, लेकिन अब ‘उधर’ कभी नहीं जाऊँगा।”. . .
“अरे बाबू, कछु खाने को दे ना।” जिस बात से वह डर रहा था, वही हुआ। रैन बसेरे के ठीक सामने शोर मचाते बच्चों में से कुछ बच्चों के साथ वह बच्ची भी उसकी टाँगों से आ चिपकी।
“अरे चलो, दूर हटो।” सहज प्रतिक्रिया वश उसने बच्चों को दूर धकेल दिया और तेज कदमों से वहाँ से निकल जाना चाहा, लेकिन नीचे गिरे बच्चों में से बच्ची के रोने की आवाज से उसके पाँव अनायास ही थम गए।  “कहीँ लगी तो नहीं? बोल न, क्या खाएगी बिटिया?” वह ख़ुद भी नहीं जानता था कि आज ऐसा क्यों हुआ लेकिन कुछ क्षणों में ही वह उस बच्ची के साथ और बच्चों को भी ब्रेड लेकर बांट रहा था।
रोने वाली बच्ची अब मुस्करा रही थी और वह उसे एक टक देख रहा था। महीनों के बाद उसने आज ‘नैंसी’ को हँसते देखा था। “नैंसी मेरी प्यारी बेटी!” वह बुदबुदाया।
“क्या देख रहे हो पापा? आज मैं बहुत खुश हूं, आज आपने मेरी दोनों बातें मान ली।”
“पापा!. . . दोनों बातें।” वह जैसे सोते से जाग गया हो। “हाँ, मान ही तो ली मैंने दूसरी बात भी। ये ब्रेड खाते बच्चे भी तो नन्हें-नन्हें ‘ईसा’ ही हैं और ये बच्ची मेरी नैंसी।”
सुनो बेटी।” उसने जाती हुई बच्ची को पुकारा। “आज तुमने अपनी ही दुनियाँ में भटकते  मुझ मुसाफ़िर को उसकी मंजिल का पता दे दिया है। थैंक्यू नैंसी, थैंक्यू. . . !”
बच्ची कुछ नहीं समझी पर वह मुस्कराता हुआ आगे बढ़ चला था।
2 – दिन अभी ढला नहीं
“कितने साल गुजर गए सुधा, लेकिन ज़्यादा नहीं बदला हमारा गाँव। बस कुछ आधुनिकता की निशानियों को छोड़; वही बाग-बगीचे और वही हरे-भरे रास्ते।” शाम की सैर के बीच छाई चुप्पी को भंग करते हुए उमाशंकर जी ने पत्नी से बात शुरू की।
“सही कहा आपने। कुछ बगीचों की बाड़ जरूर टूटी-फूटी लकड़ियों की जगह मेटल की खपचियों से बन गयी है, पहले से सुंदर और ज़्यादा मजबूत।”
सुधा ने सामने नजर आते बग़ीचों की बाड़ के उस पार लहलहाती फसल को निहारते हुए उत्तर दिया।
बरसों बाद लौटे थे वे गाँव। बहुत पहले ही अपनी ज़िद के चलते अपना संयुक्त परिवार छोड़ बच्चों को लेकर विदेश चले गए थे क्योंकि वह नहीं चाहते
थे कि गाँव के देहाती-अनपढ़ माहौल में उनके बच्चे सांस लें। और फिर समय गुजरता गया, उन्होनें अपने बच्चों को शिक्षित और आधुनिक नागरिक के साथ सफल इंसान भी बनाया लेकिन शायद उचित संस्कार नहीं दे पाए। परिणामतः आज फिर वह अपने गाँव में लौट आए थे, नितांत अकेलेपन को लेकर।
“मैं जानता हूँ सुधा, तुम्हारे लिए गाँव में रहना कठिन है लेकिन बच्चों से मैं अपना अपमान बर्दाश्त कर सकता हूँ पर उनका बार-बार तुम्हारा अपमान करना, यह बर्दाश्त नहीं होता था। ख़ैर, उन्हें सही संस्कार नहीं दे सके; ये दोष भी तो हमारा ही है।”
“आप ऐसा न कहें और परेशान भी न हों। मुझे यहाँ कोई दिक़्क़त नहीं होगी।” पति की बात का प्रत्युत्तर देते हुए वह कहने लगी। “सच तो ये है कि मैं सारा जीवन यही समझती रही कि उच्च शिक्षा और आधुनिक सभ्यता से ही हम संतान को एक अच्छा इंसान बना सकते हैं। लेकिन अब जाकर समझी हूँ कि संस्कार तो प्रकृति के वो बीज होते हैं जो परिवार के बुजुर्गों और अपनों के सानिध्य-प्रेम में ही पैदा होते हैं। काश कि हमने अपने बच्चों की परवरिश यही परिवार के बीच रहकर की होती, तो जीवन की ढलती सांझ में हम अकेले नहीं होते।”
“सुधा, बीता हुआ समय तो लौटकर नहीं आता लेकिन हम चाहें तो अतीत का प्रायश्चित कर सकते हैं।” उन्होंने अपनी नजरें पत्नी की ओर जमा दी।
“कैसे. . .?”
“सुधा!” पत्नी की प्रश्नवाचक नजरों को निहारते हुए उनकी आँखों में एक विश्वास था। “हमारे समाज में और भी बहुत से परिवार बिखरे हुए हैं या बिखरने की कगार पर है, जिन्हें हम चाहें तो. . . ”
“हाँ क्यूँ नहीं, इससे बेहतर हमारे जीवन का आख़िरी पड़ाव और क्या होगा?” पति की अधूरी बात पर सहमति की छाप लगाते हुए सुधा ने मुस्कराते हुए पति का हाथ थाम लिया।
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