Friday, April 17, 2026
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निज़ाम फतेहपुरी की दो ग़ज़लें

1
ग़ज़ल नक्ल हो अच्छी आदत नहीं है।
कहे खुद की सब में ये ताकत नहीं है।।
है  आसान  इतना  नहीं  शेर  कहना।
हुनर है क़लम  का  सियासत नहीं है।।
नहीं  छपते  दीवान  ग़ज़लें  चुराकर।
अगर पास खुद की लियाक़त नहीं है।।
हिलाता  है  दरबार  में  दुम जो यारों।
कहे सच  ये  उसमें  सदाक़त  नहीं है।।
जो डरता  नहीं  है  सुख़नवर वही है।
सही  बात  कहना  बगावत  नहीं  है।।
सभी खुश  रहें  बस  यही  चाहता हूँ।
हमारी  किसी  से  अदावत  नहीं  है।।
दबाया है झूठों  ने  सच इस कदर से।
कि सच भी ये सचमें सलामत नहीं है।।
दरिंदे भी  अब  रहनुमा  बन  रहे  हैं।
ये अच्छे दिनों  की  अलामत नहीं है।।
निज़ाम आज बिगड़ा है ऐसा जहाँ मे।
किसी की भी जाँ की हिफाजत नहीं है।।

2

दूर मुझसे  न  जा  वरना  मर जाऊँगा।
धीरे-धीरे   सही   मैं   सुधर    जाऊँगा।।
बाद  मरने   के   भी   मैं   रहूंगा   तेरा।
चर्चा होगी  यही  जिस  डगर  जाऊँगा।।
मेरा  दिल  आईना  है   न   तोड़ो  इसे।
गर ये टूटा तो फिर  मैं  बिखर जाऊँगा।।
नाम  मेरा  भी  है   पर  बुरा  ही   सही।
कुछ न कुछ तो कभी अच्छा कर जाऊँगा।।
मेरी फितरत में है लड़ना सच के लिए।
तू  डराएगा  तो  क्या  मैं  डर जाऊँगा।।
झूठी दुनिया में दिल देखो लगता नहीं।
छोड़ अब ये महल अपने घर जाऊँगा।।
मौत सच है यहाँ बाकी धोका निज़ाम।
सच ही कहना है कह के गुज़र जाऊँगा।।
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