संपादकीय - जब रक्षक ही भक्षक बने 1
वेन कज़न्स और सारा एवरार्ड (साभार : Metro)
मित्रों बहुत अच्छा लगता है जब आप मुझे व्हट्सएप पर पुरवाई के संपादकीय के बारे में संदेश भेजते हैं। कुछ मित्रों के लिये तो यह साप्ताहिक ख़ुराक जैसा होता जा रहा है। आप ने इस बार बहुत से विषय सुझाए हैं।
एक मित्र का कहना है कि क्योंकि मैं पंजाब से हूं तो मुझे कैप्टन अमरिन्दर सिंह, सिद्धु, चन्नी, राहुल और प्रियंका के बारे में लिखना चाहिये। वहीं दूसरे मित्र ने सलाह दी कि लखीमपुर खीरी में न्याय और कानून व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गयी है, इसलिये मुझे भारत में सिकुड़ते लोकतंत्र पर क़लम चलानी चाहिये। वहीं एक मित्र ने कहा कि तेजेन्द्र भाई आपको पता है कि कोरोना से अधिक मारक है बढ़ती महंगाई… इस बारे में संपादकीय ज़रूरी है।
एक मित्र ने तो फ़ोन करते हुए आग्रह किया, “तेजेन्द्र भाई, आप तो हिन्दी फ़िल्मों पर लगातार लिखते रहे हैं। आपको आर्यन ख़ान और ड्रग्स के मुद्दे पर अवश्य लिखना चाहिये।”
किसी भी संपादक के लिये अद्भुत संतुष्टि का अहसास हो सकता है जब हमारी वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यबाला जी ऑडियो संदेश देकर कहें, “तेजेन्द्र, पुरवाई के तुम्हारे संपादकीय पढ़ना अब मेरी बहुत सख़्त ज़रूरत बन गयी है।” कहना न होगा कि यह पुरवाई पत्रिका के लिये गर्व का पल है।
मगर मित्रों इस बीच ब्रिटेन में एक ऐसी वहशी घटना घटित हुई है जिसने ब्रिटेन वासियों के दिल में पुलिस पर विश्वास को ज़ोरदार झटका दिया है। ऐसी घटनाएं आम तौर पर पश्चिमी देशों में कम ही सुनाई देती हैं। लंदन में कुछ साल पहले पुलिस द्वारा एक अश्वेत युवा स्टीवन लॉरेंस की हत्या का मामला उछला था। केस अदालतों में लम्बे अरसे तक खिंचा। मगर यह साबित हो गया कि यह रंगभेद और जातिवाद का ही मामला था।
मगर वर्तमान मामले में तो पुलिस अधिकारी ‘वेन कज़न्स’ एवं बलात्कार की शिकार महिला ‘सारा एवरार्ड’ दोनों ही श्वेत हैं। यानी कि यह मामला सीधा अपहरण, बलात्कार, हत्या और शव को जलाने का है। हर ब्रिटेन वासी के होंठों पर एक ही सवाल है कि यदि रक्षक ही भक्षक बन जाए तो भला ऐसे समाज में लोग कैसे अपने आप को सुरक्षित महसूस कर सकते हैं।
मामला कुछ यूं हुआ कि 03 मार्च 2021 को ऑफ़-ड्यूटी पुलिस काँस्टेबल वेन कज़न्स घरवालों से झूठ बोल कर निकला कि वह ड्यूटी पर जा रहा है। जबकि सच यह है कि उस समय वह ड्यूटी पर था नहीं। 48 वर्षीय कज़न्स ने कोरोना लॉकडाऊन का हवाला देते हुए दक्षिण लंदन के ब्रिक्स्टन इलाके से 33 वर्षीय सारा एवरार्ड को गिरफ़्तार किया। और उसे हथकड़ी लगा दी।
कज़न्स ने एक प्राइवेट कार का इस्तेमाल किया। वह युनिफ़ॉर्म में नहीं था फिर भी उसने पुलिस की पेटी बांध रखी थी। सारा इतनी डर गयी थी कि वह समझ भी नहीं पाई कि कज़न्स उसे इधर उधर घुमा रहा है… उसे किसी पुलिस स्टेशन नहीं ले जा रहा। दरअसल ब्रिटेन में पुलिस पर आम आदमी को इतना भरोसा रहता है कि वह सोच ही नहीं सकता कि पुलिस वाला किसी प्रकार का नुक़्सान कर सकता है या धोखा दे सकता है।
मगर सारा एवरार्ड की किस्मत पूरी तरह से ख़राब थी क्योंकि वेन कज़न्स तो पूरी तरह से तैयारी करके आया था कि उसे आज किसी अकेली लड़की की इज्ज़त लूटनी है और फिर उसकी हत्या करनी है। उसने अमेज़ॉन से हथकड़ियां भी ख़रीदी थीं इसी सिलसिले में। ऐसे लोगों का दिमाग़ी संतुलन बिगड़ा अवश्य रहता होगा। अन्यथा हत्या और शव को आग लगाना कोई ठीक दिमाग़ का व्यक्ति नहीं कर सकता।
याद रहे कि ब्रिटेन की गृहमंत्री एक भारतीय मूल की महिला प्रीति पटेल हैं। विपक्षी दल लेबर पार्टी के नेता केयर स्टामर ने प्रीति पटेल और प्रधानमंत्री बॉरिस जॉन्सन पर इस विषय में संसद और संसद के बाहर हमला बोला है। 
वेन कज़न्स ने अपने शिकार के लिये तैयारी तो पहले से कर रखी थी। सारा एवरार्ड की बदकिस्मती यही रही कि उसके हत्थे वह बेचारी चढ़ गयी। आमतौर पर ऐसी घटनाएं बॉलीवुड की हिन्दी फ़िल्मों में देखा गया है जहां ‘वर्दी वाला गुण्डा’ मौक़ा मिलते ही अपने शिकार पर टूट पड़ता है। मगर इस मामले में बिना वर्दी वाले पुलिसमैन ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपनी वहशत की बलि चढ़ा दिया।
कज़न्स 2002 में पुलिस सेवा में भर्ती हुआ था। 2011 तक वह सिविल न्यूक्लियर काँस्टेबुलरी में रहा और उसके बाद मेट्रोपॉलिटन पुलिस में स्तानांतरित हो गया।
कज़न्स ने पहले से तय कर रखा था कि वह अपने शिकार को लंदन से दूर किसी सुनसान स्थल पर ले जाकर उसकी इज्ज़त लूटेगा। इसके लिये उसने केण्ट के एक ऐसे इलाके का चयन किया जो कि लंदन से करीब 120 मील दूर है। वह डोवर तक सारा को ले गया। वहां उसने सारा को किराए की कार से निकाल कर अपनी कार में बिठाया। वहां से वह नज़दीक के ग्रामीण इलाके में ले गया जो अपेक्षाकृत सुनसान था। वैसे भी छोटे इलाकों में देर रात तक लोग बाहर नहीं रहते।
वहाँ उस वहशी दरिंदे ने सारा का बलात्कार किया और फिर अपनी पुलिस की बेल्ट से उसका गला घोंट दिया। 
रात करीब 02.31 बजे कज़न्स को एक पेट्रोल पंप पर सी.सी.टी.वी. कैमरे ने देखा जहां वह कुछ पेय ख़रीद रहा था। यानि कि 21.30 पर सारा को उठाया और 02.31 पर वह पेट्रोल पंप पर मौजूद था। यानि कि इन पाँच घंटों में वह अपनी वहशत भरी कार्यवाही पूरी कर चुका था।
सुबह होने से पहले वह दो बार उस स्थान पर वापिस आया जहां उसने सारा का मृत शरीर फेंक दिया था। मगर अगले दिन जैसे ही सारा की तलाश तेज़ हुई तो कज़न्स ने पेट्रोल ख़रीदा। अब उसने तय कर लिया था कि वह सारा के जिस्म को जला देगा।
उसने दो हरे रंग के मलबा डालने वाले बैग भी ख़रीदे। उन में उसने सारा के जले हुए शरीर को होड्सवुड, एशफ़र्ड में एक तलाब में फेंक दिया। यह तलाब उसके घर से बिल्कुल सटा हुआ था। 
याद रहे कि कज़न्स आर्थिक रूप से एक संपन्न व्यक्ति है। उसका घर एक वैभवशाली प्रॉपर्टी है। उसने पूरा एक महीना रेकी में बिताया और डील केंट, जहां वह रहता था, से लंदन की यात्राएं कीं ताकि यह पता लगाया जा सके कि अपने अपराध को कैसे बेहतर तरीके से अंजाम दिया जाए।
हमले से कई दिन पहले, उसने एक किराए की कार बुक की, जिसका उपयोग वह अपहरण के लिए करेगा, साथ ही अमेज़ॉन पर एक कालीन सुरक्षित रखने वाली स्वयं-चिपकने वाली फिल्म का एक रोल भी ख़रीदा। इससे एक बात तो तय हो जाती है कि एक विवाहित जिसकी 11 वर्ष की बेटी और 9 वर्ष का पुत्र है मानसिक रूप से विक्षिप्त ही होगा जो किसी अन्जान महिला के साथ ऐसा हिंसात्मक और क्रूर व्यवहार करेगा। मैं जान बूझ कर वेन कज़न्स की पत्नी और बच्चों के नाम नहीं दे रहा। 
ध्यान देने लायक बात यह है कि वह इस सब के बाद बिना किसी अपराधबोध के वेन कज़न्स अपने घर अपनी पत्नी और बच्चों के पास वापिस भी आ गया। उसने अपने पशुओं के डॉक्टर से अपने कुत्ते की सेहत के बारे में बातचीत भी की। 
कुछ दिन बात वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ उस जंगल भरे इलाके में भी छुट्टी मनाने गया जहां उसने सारा के शव को जलाया था। 
उसे 8 मार्च को काम पर वापिस लौटना था मगर उसने अपने को बीमार बता कर छुट्टी ले ली। और उसके अगले ही दिन उसे उसके घर से गिरफ़्तार कर लिया गया। 
पुलिस से पूछताछ करने पर उसने अलिफ़ लैला जैसी एक झूठी कहानी गढ़ ली कि पूर्वी युरोपीय गिरोह उसे धमका रहा था। उस गिरोह ने सारा एवरर्ड को अगवा करके उन्हें सुपुर्द करने के लिये बाध्य किया। और यह भी कि उसने एक वैन में तीन लोगों के सुपुर्द सारा को सौंप दिया था जब वह जीवित थी।   
वेन कज़न्स पर केस चला। कोर्ट में सारा की माँ ने कहा कि जब हम बोलें तो कज़न्स को बाध्य किया जाए कि वे हमारी ओर आँखों में आँखें डाल कर देखे। वह उससे जानना चाहती थी कि अपने अंतिम पलों में उनकी बेटी पर कितना अत्याचार हुआ। 
याद रहे कि ब्रिटेन में फांसी की सज़ा पर 1965 में रोक लगा दी गयी थी। इसलिये वेन कज़न्स को सारा के बलात्कार और हत्याकाण्ड में उम्र क़ैद की सज़ा दी गयी। मगर पुलिस की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी इस विषय में कुछ नये नियम बनाने में जुट गये हैं। लंदन की पुलिस मुखिया डेम क्रेसिडा डिक ने कहा है कि वे सारा हत्याकाण्ड से स्तब्ध हैं और पुलिस फ़ोर्स में सुधारों के लिये एक निष्पक्ष आयोग का गठन करेंगी। लोगों में पुलिस के प्रति विश्वास में होती कमी को देखकर वे सख़्त नाराज़ भी हैं और निराश भी। मगर उन्होंने कमर कस ली है… बदलाव लाने ही हैं।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

35 टिप्पणी

  1. सर निश्चय ही आपके सम्पादकीय ज्ञानवर्धक होते हैं,…आज का सम्पादकीय तो लंडन का भयावह रूप दिखाता है

  2. न्याय व्यवस्था और न्याय के रक्षकों के अधः पतन को आपने सम्वेदनशील शब्दों में लिखा है। पीढ़ियों से मनुष्य अपने बर्बर स्वभाव को नैतिकता से ढकना चाहता रहा है, परन्तु वास्तव में नैतिक हो नहीं सका। दुःखद स्थिति है।

  3. यह जानना बेहद भयावह और दुखदाई है, ऐसी मानसिकता के लोग समाज के लिए अभिशाप है

  4. इस रविवार ,संपादकीय पढ़ते हुए मन विचलित हो गया ।अकल्पनीय, जघन्य अपराध की दास्तान है ,ख़ास तौर पर पश्चिमी देशों में यदा कदा सुनी जातीं हैं,।पुलिस (रक्षक)से समाज ऐसी उमीद नहीं करता ।
    “अजब दास्तान है ये जो हक़ीक़त हो गई “।
    Dr Prabha mishra

    • दुर्भाग्य जनक घटना । ब्रिटेन में भी ऐसा हो गया , यह देख कर अचंभित हूँ । भारत में तो रक्षक अक्सर भक्षक निकलता है, मगर ब्रिटेन में भी ऐसे चरित्र हैं? दुःखद।

  5. Your Editorial of this week brought to light an irrational and shocking incident.
    It is worth pondering over these random acts of barbarity.
    Congratulations for sharing the shock and condemnation

    Deepak Sharma

  6. भारत में ऐसी जगह घटनाएं तो सीनेमाई हो चुकी है। लेकिन लंदन जैसे देश में ऐसी घटनाओं का घटित होना महिला सुरक्षा पर प्रश्न खड़ा करता है। हम कह सकते हैं कि दुनिया के किसी कोने में महिलाएं सुरक्षित नहीं है ।पुलिस के रूप में ‘रक्षक’ मानव के नाम पर कलंक एक दुर्दांत भक्षक है और ऐसे बहुरूपिया रक्षक को दुनिया के किसी भी कोने में क्यों ना हो, कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए।

    • जी वेन को उम्र कैद की सज़ा सुनाई गयी है। जैसा कि मैंने लिखा है कि ब्रिटेन में फांसी की सज़ा पर 1965 में रोक लग गयी थी।

  7. आदरणीय संपादकीय प्रसंग यथार्थ अभिव्यक्ति से परिपूर्ण है।
    इतना भयावह कृत्य दिल दहल गया।अच्छा है फांसी की सजा से एक झटके में समाप्त हो जाता लेकिन उम्रकैद से तो वह तिल तिल कर मरेगा मौत मांगेगा तो भी नहीं मिलेगी। रोज उसपर कोड बरसाना चाहिए मनुष्य के नाम पर कलंक है।

  8. मित्रों की सलाह के बावजूद भी आपने अपनी कलम ब्रिटेन में हो रही बहशी घटना पर चलाई। यह बहुत बड़ी बात है ऐसी घटना है आमतौर पर पश्चिमी देशों में कम सुनाई देती हैं। परंतु इससे यह साबित होता है कि नारी पश्चिमी देशों में भी सुरक्षित नहीं है। उसको हिंदुस्तान हो जा पश्चिम देश प्रताड़ना सहन करनी पड़ती है। आज की संपादकीय से यह पता चलता है कि आपके हृदय में औरतों के प्रति कितना सम्मान है। जिस बात पर सब ने पर्दा डालने की कोशिश की उस बात को आप ने अपनी लेखनी के माध्यम से उजागर करके यह साबित कर दिया कि आप बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न है। पुलिस के रूप में रक्षक ही भक्षक बन गया है ऐसे बहुरूपिया रक्षक को संसार में जीने का कोई हक नहीं उसे अवश्य ही सजा मिलनी चाहिए ऐसे मनुष्य समाज के लिए कलंक है।

    डॉ मुक्ति शर्मा

  9. भारत में इस तरह की घटनाएं होना आम हैं,पर लंदन में इस तरह की घटना घटित होना… मतलब
    महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं है।
    पुलिस पर सब आंख मूंद कर भरोसा करते हैं पर वही भरोसा तोड़ दे तो ???

  10. आदरणीय सर आप अपने संपादकीय में ऐसी घटना को विषय
    बनाया है इसे पढ़कर शायद लोग अपनी सोच बदलें ।

    घटना को देखकर कह सकते हैं, ऐसी विकृत मानसिकता के व्यक्ति कही भी पैदा हो सकते हैं । दुःख इस बात का है जब विश्व भर में महिलाएं अपना लोहा मनवा रही हैं ।कुछ एक लोग जो ऐसे घिनोने कृत्य को अंजाम देते हैं महिलाओं की आत्मा को घायल कर देते हैं।

  11. आदरणीय तेजेंद्रजी नमन , आपने समाज की विकृत मानसिकता का संवेदनशील मुद्दा उठाया उसके लिए बधाई और शुभकामनाएं . आज मानवीय मूल्य स्खलित होते जा रहे हैं और व्यक्ति मानव से दानव बढ़ने के लिए ताजी से भाग रहा है . अब धोखा जिंदगी का हिस्सा बन गया है . घटना को पढ़ते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

    • सच है दीपक, ब्रिटेन में अभी भी पुलिस को लेकर काफ़ी गहरे स्तर पर सोच विचार चल रहा है।

  12. आपकी संपादकीय इस बात की गवाही देती है कि इक्कीसवीं शताब्दी में औरत अपराधियों या मानसिक रोगियों के द्वारा अधिक बर्बरता की शिकार हो रही है, देश कोई भी हो।अब तो पिता, पति या पुत्र भी रक्षा करने की स्थिति में नहीं हैं। बलात्कार और हत्या की बढती घटनाएं दिल दहलने वाली हैं। सशक्स्त होती स्त्री का मुहावरा भी छलावा है।

  13. आपका संपादकीय रक्षक ही भक्षक बने पढ़ा स्तब्ध रह गई ।विकसित राष्ट्र ब्रिटेन में भी बीमार मानसिकता का क्रूर परिचय। अमानवीय दुर्दांत दुर्घटना से अपने परिचित कराया। दूर के ढोल सुहावने कहावत ब्रिटेन में चरितार्थ है। असलियत वही जानता है जो वहां रहता है। क्षमा पांडेय (भोपाल) भारत

  14. कितना भयवाह है ये सब।इंसान इतना हिसंक कैसे हो जाता है, समझ नहीं आता।
    बढिया संपादकीय।

  15. बहुत भयानक कृत , इस तरह सोच समझकर पूरी प्लानिंग करके किया गया बर्बर कृत्य किसी विक्षिप्त व्यक्ति के द्वारा ही सम्भव है । ऐसे कुकृत्य चाहे किसी भी देश में किए गए हो भर्त्सना की ही जानी चाहिए । पुलिस सुरक्षा का मापदण्ड होती है और यदि बाढ़ ही खेत को खाएगी तो सुरक्षा पर प्रश्न चिन्ह खड़े होने ही हैं ।
    संपादकीय में सामायिक अभिव्यक्ति सम्पादक की क्रियाशीलता और निष्पक्षता को परिलक्षित करती है । आप सजग और कलम के धनी हैं ।

  16. बहुत दुःख हुआ इस घटना को पढ़कर। हम अपने आपको यहाँ बहुत सुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि भारत में आए दिन ऐसी घटनायें देख सुनकर कलेजा मुँह को आता है..इस तरह की घटना यहाँ पढ़कर मन बहुत विचलित हो गया है….

  17. अति सम्वेदनशील विषय पर अपने निर्भीकता से कलम चलाई है, यह वाक़ई क़ाबिले-तारीफ़ है। हम भारत की ही घटनाओं से पहले से ही त्रस्त हैं, ब्रिटेन में भी रक्षक ही भक्षक हो रहे हैं। कमोबेश नारी सारी दुनियां में असुरक्षित हैं। कैसी विडम्बना है !!!
    ऐसी घटनाओं से मन खिन्न और व्याकुल हो जाता है। ऐसे राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों के लिए सरेआम अंग-भंग करने की सज़ा लागू कर देनी चाहिए।

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