फ़ेसबुक और व्हाट्सएप का एक ज़बरदस्त योगदान है कि कवियों, ग़ज़लकारों, टीकाकारों एवं लघुकथाकारों को एक ऐसा मंच मिलने लगा है जहां वे अपनी रचनाओं को प्रकाशित कर पाते हैं और उन्हें प्रतिक्रिया भी तत्काल मिल जाती है।

पिछले 20 वर्षों में विश्व में कम्पयूटर एवं स्मार्ट फ़ोन क्रान्ति ने इन्सान के जीवन को पूरी तरह से बदल डाला है। कनाडा के ब्लैकबरी फ़ोन ने सबसे पहली क्रान्ति की थी जब हमने पाया कि हम अपनी ई-मेल चलते-फिरते कभी भी कहीं भी देख सकते हैं और वहीं उसका जवाब भी दे सकते हैं। मगर यहां सब कुछ अंग्रेज़ी में होता था। ब्लैकबरी सही मायने में देवनागरी से जुड़ पाती इससे पहले ही मार्केट से बाहर हो ली।
पहला आई फ़ोन मार्केट में 2007 में आया तो पहला एंड्रायड फ़ोन एच.टी.सी. ड्रीम का लॉन्च 22 अक्तूबर 2008 को किया गया। यानी कि मामला सिर्फ़ और सिर्फ़ दस बारह सालों का है।
ज़ाहिर है कि इस प्रकार की तकनीकी क्रान्ति के कारण ही सोशल मीडिया भी हमारे जीवन में प्रवेश कर पाया। याद रहे कि फ़ेसबुक आम आदमी के सामने वर्ष 2006 में ही आया यानी कि आज से करीब तेरह वर्ष पहले। और याहू से अलग हुए दो मित्रों ब्रायन एक्टन और जैन कौम ने वर्ष 2009 में व्हाट्सएप नाम के मैसेंजर एप को ईजाद किया।
व्हाट्सएप की ख़ासियत यह है कि इसे अपने स्मार्ट फ़ोन पर आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है और यह ऐप आपकी कांटेक्ट लिस्ट में से स्वयं ही नंबर चुन लेता है। आप बिना कोई ख़र्चा किये विश्व के किसी भी हिस्से में केवल वाई.फ़ाई के ज़रिये एक दूसरे से फ़ोन पर बात भी कर सकते हैं और ईमेल की तरह संदेश और फ़ोटो भी भेज सकते हैं।
वैसे तो ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे सोशल साइट भी ख़ासे लोकप्रिय हैं मगर लोकप्रियता के शिखर पर फ़ेसबुक और व्हाट्सएप ही माने जा सकते हैं।
एक बात तो साफ़ है कि आज की युवा पीढ़ी इन दो सोशल मीडिया से इस कदर जुड़ चुकी है कि उन्हें इनके बिना जीवन अधूरा और सूना सूना लगने लगता है। यदि किसी के फ़ोन का चार्जर ना मिले या फिर फ़ोन कहीं खो जाए तो जीवन जैसे थम सा जाता है। केवल दस बारह सालों में पूरा विश्व किस प्रकार तकनीक का ग़ुलाम हो जाता है इसका प्रमाण हैं फ़ेसबुक और व्हाट्सएप।
विश्व में फ़ेसबुक का इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे अधिक भारत में है जो कि करीब सताईस करोड़ है। यह संख्या अमरीका से भी कहीं अधिक है। याद रहे कि इनमें से अधिकांश के पास स्मार्ट फ़ोन है जिस पर ये फ़ेसबुक पोस्ट करते हैं या पढ़ते हैं।
विश्व भर में व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वालों की संख्या करीब डेढ़ अरब है। व्हाट्सएप के ज़रिये संदेश, फ़ोटो, वायस मैसेज भेजे जा सकते हैं साथ ही साथ वीडियो कॉल भी की जा सकती है। यानी कि सबसे अधिक लोकप्रिय सोशल मीडिया वह्ट्सएप और फ़ेसबुक ही हैं। और आपको जान कर हैरानी हो सकती है कि फ़ेसबुक ने करीब पांच साल पहले व्हाट्सएप को उन्नीस अरब डॉलर में ख़रीद लिया था। यानी कि आजके दिन फ़ेसबुक और व्हाट्सएप का मालिक एक ही है।
एक बात सोच कर आनन्द उठाया जा सकता है कि यदि मनमोहन देसाई आज फ़िल्में बना रहे होते और उनके अमर, अकबर और एन्थनी बचपन में कहीं खो जाते तो उन्हें ढूंढने के लिये फ़ेसबुक का इस्तेमाल ज़रूर किया जाता। फ़िल्म की कहानी औऱ स्क्रिप्ट में बहुत से बदलाव लाने पड़ते।
फ़ेसबुक मित्रों और मित्रों के समूह से संपर्क बनाए रखने का एक अनमोल तरीका तो है ही, उसके साथ ही साथ लोग आपकी सोच के बारे में क्या सोचते हैं, इसे भी उनकी पोस्ट के माध्यम से जानने का मौक़ा मिलता है।
मगर जब हम फ़ेसबुक पर हिन्दी के इस्तेमाल के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि भारत में क़रीब 90 प्रतिशत लोग अमरीकन अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं, करीब 9 प्रतिशत ब्रिटिश अंग्रेज़ी का इस्तेमाल करते हैं और एक प्रतिशत से कम लोग देवनागरी वाली हिन्दी का प्रयोग करते हैं।
यहां एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि ये आंकड़े बताते हैं कि कितने भारतीयों ने हिन्दी को अपनी डिफ़ॉल्ट भाषा बनाया है। इस बात के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं कि अपनी पोस्ट और मैसेंजर में कितने भारतीय हिन्दी का इस्तेमाल करते हैं।
मैं इससे बिल्कुल भी हैरान नहीं होता। क्योंकि भारत में अधिकांश पढ़े लिखे लोग अंग्रेज़ी जानते हैं और बहुतों को तो यह ज्ञान भी नहीं है कि फ़ेसबुक पर हिन्दी में टाइप किया जा सकता है। फ़ोन पर देवनागरी में टाइप करने के बारे में तो वे सोच ही नहीं पाते।
रोमन में हिन्दी लिखने का रिवाज भी व्हाट्सएप और फ़ेसबुक के बाद ही बढ़ा है। इसीलिये कुछ कोनों से ये आवाज़ भी सुनाई देने लगी कि हिन्दी अब रोमन लिपि में ही लिखी जाए तो बेहतर होगा। मगर हमें देवनागरी लिपि के बचाए रखना होगा। इसी लिपि के माध्यम से हम संस्कृत को पढ़ सकते हैं। हमारी संस्कृति और हमारे धार्मिक ग्रन्थ तो संस्कृत भाषा में ही हैं। हमें प्रयास करते रहना होगा कि अपनी युवा पीढ़ी को देवनागरी से जोड़े रखने के प्रयास जारी रहें।
जब जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35ए को हटाया गया तो वहां वाई. फ़ाई, व्हाट्सएप और फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर बैन लगाना पड़ा। जहां सोशल मीडिया जानकारी का महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है वहीं फ़ेक न्यूज़ और अफ़वाहों के लिये भी इसका प्रयोग किया जाने लगा है।
एक पुरानी कहावत है कि जो आँख देखती है ज़रूरी नहीं कि वही सच हो। मगर सोशल मीडिया के इस्तेमाल करने वाले इस मूल बात की अनदेखी कर देते हैं। आपको याद होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान की प्रतिनिधि ने फ़िलिस्तीन की एक फ़ोटो दिखा कर भारत पर आरोप लगाया था कि भारत कश्मीर में कश्मीरियों पर ऐसे ज़ुल्म ढा रहा है।
यदि इतने बड़े स्तर पर सोशल मीडिया का दुरुपयोग हो सकता है तो ज़ाहिर है कि इस बात का ख़्याल रखना ज़रूरी है कि इन माध्यमों का इस्तेमाल ज़िम्मेदारी से किया जाए। हमें समझना होगा कि ये आभासी दुनिया है। इसे असली दुनिया मानने की ग़लती ना की जाए।
तुलना, ईर्ष्या और जलन जैसी प्रवृतियों से बचा जाए। जैसे अपने जीवन में सोचते हैं कि उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे… ठीक वैसे ही सोचने लगते हैं भला उसकी पोस्ट पर मेरी पोस्ट से अधिक लाइक क्यों। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लिखे हुए शब्दों को इमोशन पढ़ने वाला देता है। इसलिये पूरा ख़्याल रखा जाए कि शब्दों में कम से कम हिंसा रखी जाए… अगर हिंसा को पूरी तरह से हटा ही दिया जाए तो ग़लतफ़हमियां नहीं होंगी।
फ़ेसबुक और व्हाट्सएप का एक ज़बरदस्त योगदान है कि कवियों, ग़ज़लकारों, टीकाकारों एवं लघुकथाकारों को एक ऐसा मंच मिलने लगा है जहां वे अपनी रचनाओं को  प्रकाशित कर पाते हैं और उन्हें तत्काल प्रतिक्रिया भी मिल जाती है।
फ़ेसबुक एक ऐसा मंच भी है जहां हर मेम्बर अपनी अपनी या अपने परिवार की उपलब्धियां गिनवा सकता है, दिखा सकता है सुनवा सकता है। यहां तक कि अपने मित्रों की रचनाएं पढ़ कर उन पर समीक्षात्मक लेख भी लिखे जाते हैं।
विशेषकर विदेशों में बसे भारतीय हिन्दी लेखकों को फ़ेसबुक और व्हाट्सएप के ज़रिये भारत के हिन्दी समाज के साथ अपने काम और उपलब्धियों को साझा करने का बेहतरीन मौक़ा मिलता है। प्रकाशकों ने भी फ़ेसबुक पर अपने अपने पेज बना रखे हैं जिन पर वे अपनी नयी किताबों की पब्लिसिटी करते हैं।
फ़ेसबुक अपने मित्रों का जन्मदिन याद करवाने का एक बेजोड़ ज़रिया है। आप हर सुबह उठ कर सबसे पहले अपने मित्रों को जन्मदिन की बधाई दे सकते हैं क्योंकि फ़ेसबुक आपको उनके जन्मदिन भूलने नहीं देता।
सोशल मीडिया ने कहानीकारों एवं उपन्यासकारों को नये नये थीम दिये हैं। व्यंग्यकार एवं हास्यकवि तो धड़ल्ले से फ़ेसबुक और व्हाट्सएप सिचुएशन पर खिंचाई करते दिखाई दे जाते हैं। दिल्ली की डॉ. रश्मि के कहानी संग्रह का नाम ही ‘व्हाट्सएप कहानियां’ है। गिरीश पंकज, जयंती, गीताश्री, आकांक्षा पारे जैसे लेखकों ने सोशल मीडिया को केन्द्र में रख कर उपन्यास लिखे हैं। मुझ समेत बहुत से समकालीन लेखकों ने इस विषय पर कलम चलाई है।
बहुत से सीनियर लोग फ़ेसबुक को व्याभिचार का अड्डा कहने से बाज़ नहीं आते। उनका मानना है कि फ़ेसबुक पर प्रचार कम अनाचार अधिक होता है। मैं उनसे कतई सहमत नहीं हूं। मेरा मानना है कि जीवन में हर वस्तु का उपयोग या दुरुपयोग हो सकता है। मयस्सर इस बात पर है कि हम किसी चीज़ का किस तरह इस्तेमाल करते हैं।
यू-ट्यूब और फ़ेसबुक की नवीनतम उपलब्धि हैं बंगाल की रानू मंडल। रानू एक रेल्वे स्टेनशन पर गाने गा कर भीख मांगा करती थी। रानू ने बताया कि उसके पास रहने को घर नहीं है, पेट भरने के लिए गाती थी। गाना सुनकर कोई बिस्किट दे देता तो कोई खाना या रुपया। ऐसे ही उसकी जिंदगी गुजरती थी। उसकी आवाज़ लता मंगेशकर से काफ़ी मिलती है। वह अपना प्रिय गीत –  ‘इक प्यार का नग़मा है, मौजों की रवानी है…’   गाया करती थी।
कुछ युवाओं को उसकी आवाज़ अच्छी लगी और उन्होंने विडियो बना कर टिक-टॉक और यूट्यूब पर लोड कर दिया। वहां से यह विडियो पहुंचा फ़ेसबुक पर… वीडियो वायरल हो गया। उसे हिमेश रेशमिया ने भी देखा… बस हो गया काम।
अब रानू बॉलिवूड में पहुँच गई है ! बात की जानकारी हिमेश रेशमिया के इंस्टाग्राम अकाउंट से दी गई। हिमेश रेशमिया ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक विडियो शेयर किया, जिसमें रानू हिमेश के साथ स्टूडियो में एक गाना रेकॉर्ड करती नजर आई। इस गाने को काफी पसंद किया जा रहा है।
कमाल तो यह हुआ कि इस सबको रानू की बेटी ने भी देखा। बेटी को माँ की शक्ल पसन्द नहीं थी। दस साल पहले उसे छोड़ गयी थी।… अब सेलेब्रिटी माँ की शक्ल अचानक पसन्द आने लगी… माँ बेटी में मिलाप हो गया… सोशल मीडिया ने अपना किरदार निभा दिया।
सोशल मीडिया की बड़ी घटना थी 2006 में ट्विटर का उदय। पूरे विश्व में हर महत्वपूर्ण व्यक्ति अपनी बात ट्वीट करके लोगों तक पहुंचाता था। ट्विटर ने बहुत से राजनेताओं का भविष्य बनाया बिगाड़ा। भारत के फ़िल्म कलाकारों ने भी ग़लत ट्वीट कर परेशानियां मोल लीं। और अंततः ट्विटर ने अक्टूबर 2022 को दम तोड़ दिया। अब वो मिस्टर  ‘एक्स’ के रूप में जाना जाता है। यानी कि सबसे लोकप्रिय सोशल साईट और उसकी प्यारी सी चिड़िया बस सोलह सावन ही देख पाए।
अभी तो सोशल मीडिया अपने शैशव काल में हैं। यह कहां जा कर रुकेगा आज नहीं कहा जा सकता। कल किसने देखा है, कल किसने जाना है…
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

55 टिप्पणी

  1. सोशल मीडिया के सभी पक्षों पर आपने प्रकाश डाला है। बढ़िया संपादकीय। मेरी हार्दिक शुभकामनाएं तेजेंद्रजी।

  2. इस बढ़िया संपादकीय के लिए आपको साधुवाद। सामाजिक माध्यमों पर सांगोपांग टिप्पणी और रेशा- रेशा मीमांसा।
    हिन्दी को नागरी में लिखना बखूबी संभव है। लोग न लिखें यह बात अलग है। हिन्दी के लिए लोगों के मन में अपेक्षित प्यार नहीं है।
    कितने लोग हिन्दी में लिखते हैं, यह कौन मालूम करे! हिन्दी के लिए सरकारी अमला तो बहुत बड़ा है। शोशेबाजी भी बहुत। पर ठोस काम नहीं दिखता।
    बहरहाल, इस संपादकीय टिप्पणी के लिए आपको पुनः बधाई।

  3. सोशल मीडिया को एक ही आलेख में इतिहास से वर्तमान तक प्रस्तुत करना और वह भी रोचकता के साथ उदाहरणों के साथ!!! सोशल मीडिया के फायदे और नुकसान दोनों को तर्कपूर्ण तरीके से विश्लेषित कर हिंदी सरीखी वैज्ञानिक भाषा लिपि को उपादेयता को बताना और उसे बचा कर रखने की पुरजोर पुख्ता प्रयास करना,,,क्या कहने!

    किसी ने सही कहा कि जड़ को पकड़ो तो
    तो बात बनती है,सोशल मीडिया ने आम आदमी की नब्ज़ को पकड़ा है और इस खूबसूरती से पकड़ा कि नज़ीर,आदरणीय डॉक्टर तेजेंद्र शर्मा जी के गहन विश्लेषित परंतु सहज और सारगर्भित रूप से सामने है।
    डॉक्टर शर्मा जी को बधाई।

  4. डॉ स्नेहलता श्रीवास्तव, अध्यक्ष हिन्दी साहित्य भारती मध्यप्रदेश

    बहुत अर्थवती प्रस्तुति। रोचक और सम्यक विवेचन- बधाई।

  5. बहुत अर्थवती प्रस्तुति। रोचक और सम्यक विवेचन- बधाई।
    डॉ स्नेहलता श्रीवास्तव, अध्यक्ष हिन्दी साहित्य भारती मध्यप्रदेश।

  6. बहुत बहुत बधाई व अभिनंदन तेजेन्द्र जी ।अत्यंत रुचिकर संपादकीय! एक – एक प्वाइंट को पकड़कर पूरा चिट्ठा कितनी सहजता से खोला है कि कई जगह तो अचानक मुस्कान आ गई है। ‘उसके लाइक मेरे से ज़्यादा कैसे भला?’
    एक बात बहुत सही है कि हमारे सामने बहुत से रास्ते हैं लेकिन चलना किस पर है यह तो अपनी बुद्धि पर है न!
    समसामयिक विषय पर जागरूक करता एक रुचिपूर्ण संपादकीय हेतु आपका अभिनंदन

  7. सर आपने सोशल मीडिया की उपयोगिता और दुरोपयोगिता को बहुत प्रभावशाली और रोचक ढंग से अभिव्यक्त किया है। हार्दिक बधाई सर..

  8. यह संग्रहणीय और उपयोगी लेख है।हर अच्छे संसाधन का दुरुपयोग भी होता है।
    फेसबुक खोलते ही वीभत्स तस्वीरें ग्लानि पैदा कर दो ती हैं।यह बेहयाई रुकनी चाहिए।यह किसी भी तरह उचित नहीं है। यह कम से कम हम भारतीयों के लिए गाली ही होने।

    इसका सदुपयोग हो।
    व्हाट्सएप पर कुछ प्राईवेसी है ? शायद नहीं।
    इन साधनों का प्रयोग काम में बेहतरी और समय की बचत के लिए हुआ था। अब यह मनोरंजन का साधन है।
    साहित्य में कोई किसी का भी मैटर अपने नाम से भेज देता है।हिन्दी के फॉन्ट में एकरूपता नहीं।
    कोरोना में online पढ़ाई की सुविधा से अभावग्रस्त महरूम रहे। अति हर चीज़ की बूरी होती है। अब बात इतनी आगे बढ़ चुकी है कि कब्ज़े के बाहर हो गयी है।
    साइबर अपराध बढ़ रहे हैं। संतुलन में सब हो तो सही है।प्रश्नाकुल संपादकीय की बधाई।

  9. अभिवादन एवम् बधाई सम्पादक जी, आजकल हर खासोआम की जिन्दगी से जुड़े सोशल मीडिया का सांगोपांग वर्णन किया है। अगर करने पर आ जाये तो अमृत का भी दुरुपयोग हो सकता है विष का सदुपयोग हो सकता है। सोशल मीडिया की क्या बात। गम्भीरता से लिखे संपादकीय के लिए धन्यवाद।

  10. प्रभु एक सप्ताह में एक सन्दर्भ से संबद्ध इतनी सूचनाएं कैसे एकत्रित कर लेते हैं आप कि विषय का कोई भी पक्ष अछूता जान नहीं पड़ता। कोई शोधार्थी / विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा हो तो उसे भी आपके विविध संपादकीय विविध विषयों CURRENT AFAIRS की सांगोपांग जानकारी देने मे समर्थ है । आज के संपादकीय में सोशल मीडिया के पूरे इतिहास को समेटते हुए अन्य कितने ही मुद्दों पर आपने सह्रदय पाठकों का ध्यान केंद्रित करने का सफल प्रयास किया है। सोशल मीडिया के सभी प्रकारों की यथोचित जानकारी सहित फेसबुक और व्हाट्सएप को सर्वाधिक लोकप्रिय बताना तो सटीक है ही सोशल मीडिया के डार्क पक्ष को भी सीमित शब्दों में समेटना श्रेयस्कर है।सताइस करोड़ और डेढ़ अरब के बड़े फासले और नब्बे प्रतिशत उपभोक्ता का अंग्रेजी प्रयोग बढिया जानकारी है और इसी माध्यम से देवनागरी लिपि के संरक्षण की तार्किक अपील नितांत सराहनीय है। सिनेमा और साहित्य पर वास्तव में सोशल मीडिया ने सबसे अधिक प्रभाव छोड़ा है कि आभासी दुनिया में मिले लोग भी अपने से लगने लगे हैं। कोशिश के समय में सोशल मीडिया ने जो दायित्व निभाया उसकी सराहना निर्विवाद है.. फिर भी इसके दुरूपयोग से बचना नितांत अनिवार्य है। शोध के क्षेत्र को भी सोशल मीडिया ने विस्तार दिया है… बहुत उपयोगी और समाज सापेक्ष संपादकीय आदरणीय।

    • किरण जी आपकी विस्तृत और सारगर्भित टिप्पणी संपादकीय को हर कोण से समझने में सहायता करती है। हार्दिक आभार।

  11. Your Editorial of today gives a detailed evaluation of the social media of the present times including their years of origin.Of Facebook,What’s App,Instagram n Twitter(now X).
    Very informative n encouraging.
    How social media enabled Himesh Reshmayia discover an anonymous singer like Ranu n changed her life is remarkable indeed!
    Warm regards.
    Deepak Sharma

  12. आदरणीय संपादक महोदय,
    सोशल मीडियम की ‘दुधारी तलवार’ का ऐसा तीखा ‘धारदार’ आकलन!! अनेकानेक साधुवाद!

  13. आम आदमी से लेकर ख़ास तक बढ़ते हुएसोशल मीडिया पर निर्भरता के विचार पढ़ते हुए समस्त बातों में एक तथ्य उजागर होता है कि हिंदी को रोमन लिपि में लिखने का चलन बढ़ रहा है, सम्पादकीय में देवनागरी के लुप्त होने की चिंता भी है जो कि सही है हमें ये भी जानकारी नहीं कि देवनागरी लिपि का प्रयोग कितने प्रतिशत है ।
    इस शोध के लिए साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  14. बहुत सुंदर. सार्थक. सारगर्भित संपादकीय लिखा आपने..आभासी दुनिया के सकारात्मक और नकारात्मक दोनो पक्षों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है आपका आलेख.सच पूछें तो आज एक मुखर. सक्रिय मित्र की भूमिका भी निभा रहा है फेसबुक..सारी दुनिया को आंखों के सामने साकार कर .हमारी जानकारी भी बढाता है.और यात्राओं का सुख भी घर बैठे मिल जाता है जहां समयाभाव या व्यक्तिगत कारणों से जाना संभव नहीं.हो पाया था..बस.बच्चों पर इसका दुष्प्रभाव न पडने दें..इसका कोई सरल मनोवैज्ञानिक समाधान खोजना होगा..हार्दिक बधाई आपको भाई.इस सुंदर और महत्वपूर्ण मुद्दे को आपने संपादकीय का विषय बनाया.साधुवाद. प्रशंसनीय. संग्रहणीय आलेख..बहुत बहुत बधाई के साथ शुभ कामनाए. मंगलकामनाए..सादर प्रणाम

    • पद्मा आपका निरंतर स्नेह पुरवाई के संपादकीय को हर सप्ताह कुछ नया देने के लिये प्रेरित करता है। हार्दिक आभार।

  15. सर्वाधिक सामयिक एवं महत्वपूर्ण संपादकीय तेजेंन्द्र जी!
    बहुत बहुत शुक्रिया आपका।

  16. बहुत दिल से लिखा गया संपादकीय दिल के करीब लगा l दरअसल फेसबुक, व्हाट्स एप हो या यूट्यूब इसने आम व्यक्ति को अपनी प्रतिभा बड़े वर्ग तक पहुंचाने का काम किया है l दोस्त दिए हैं, वरिष्ठों का मार्गदर्शन दिया है, और खाली समय का सदुपयोग करने का एक साधन भी l फेसबुक जीवन का हिस्सा है फिर क्यों ना कहानियों का भी हिस्सा बने l फेसबुक लाइव ने तो क्रांति ही कर दी l कोरोना काल में इसका प्रयोग समय काटने के लिए तरीके से हुआ था l आवाज आ रही है, मैं दिख रहा/रही हूँ से बड़े ही अनप्रोफेशनल तरीके से हुआ था, आज इसे डिजिटल हिस्ट्री के तौर पर देखा जा रहा है l देश -विदेश में बैठे साहित्यकारों को लाइव सुनने का, प्रश्न पूछने का मौका उपलबद्ध करवा रहा है, जो शायद ही बड़े से बड़ा साहित्यिक कार्यक्रम ना कर पाए क्योंकि जाने और ठहरने का खर्चा और समय की उपलब्धता की विवशता रहती है l बाकी विज्ञान के हर टूल ही तरह इसके नकारात्मक प्रभाव भी हैं l इसलिए सतर्क रहने की आवश्यकता तो है l ट्विटर की बात आपने सही कहीं l ट्विटर तो फिर भी मिस्टर x बन गया, गूगल की कई सेवाएँ तो बंद हुई तो किसी भी आकार -प्रकार में शुरू ही नहीं हुई l फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है, और हम जैसे फेसबुकिए भी 🙂 l आपके संपादकीय की प्रतीक्षा रहती है l शानदार संपादकीय के लिए बधाई l

    • वंदना जी आप की टिप्पणी हमारे लिये सच में महत्वपूर्ण है। और इस अंक के लिये तो आपने देव आनन्द पर एक बेहतरीन लेख भी पुरवाई के पाठकों के लिये दिया है। आपको डबल शुक्रिया।

  17. पिछले लगभग बीस बर्षों में हुई सूचना क्रांति की एक वृहद जानकारी देती हुई बहुत ही सार्थक संपादकीय।

  18. सोशल मीडिया का‌ आभार कि लंदन से आभासी दुनिया पर लिखा लेख हम भारत में पढ़ रहे हैं…
    समकालीन समाज को उकेरता बढ़िया लेख
    तकनीकी तेरे रूप अनेक
    जैसे
    किरणें बिखरेता सूर्य एक…

  19. आपने अपने संपादकीय ‘कल किसने देखा है ‘ में सोशल मिडिया के इतिहास के बारे विस्तृत रुप से लिखते हुए इसके उपयोग और दुरुपयोग के बारे में बहुत ही अच्छी जानकारी दी है।
    रानू जैसे अनेक व्यक्तियों को सोशल मिडिया से लाभ पहुंचा है, वहीं आमजन को अपने सुख -दुःख, उपलब्धियों को शेयर करने का एक महत्वपूर्ण प्लेटफार्म मिला है। आज व्यक्ति देश -विदेश कहीं भी किसी से भी व्हाट्सअप से जुड़ सकता है, बात कर सकता है। लेखकों के लिए अपनी रचनाएं प्रस्तुत करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफार्म मिल गया है। एक क्लिक से ही आज सारी जानकारियां उपलब्ध हैं, वहीं एक क्लिक के जरिये वह अपनी उपलब्धियों को, अपने कार्य को देश-विदेश तक पहुँचाकर अपनी धाक जमा सकता है।
    यह सच है कि सोशल मिडिया आज जहाँ व्यक्ति की आवश्यकता बन गया है, वहीं व्यक्ति का अधिकतम समय इस प्लेटफार्म पर बिताने के कारण वह समाज से कटने लगा है, अवसादग्रस्त होने लगा है। अक्सर चरमपंथी इसे अपने दुष्प्रचार का हथियार बनाकर लोगों को भ्रमित भी कर देते हैं। व्यक्ति को अपने नाक, कान खुले रखकर इस माध्यम से जुड़ना चाहिए।
    हालांकि ट्विटर का स्थान ने मिस्टर ‘एक्स’ ने लिया है लेकिन फेसबुक, व्हाट्सअप अभी भी लोगों को लुभा रहे हैं।
    आपका का यह कहना कि अभी तो सोशल मीडिया अपने शैशव काल में हैं। यह कहां जा कर रुकेगा आज नहीं कहा जा सकता। कल किसने देखा है, कल किसने जाना है…सत्य है।
    साधुवाद आपको।

    • सुधा जी आपकी विस्तृत और सारगर्भित टिप्पणी पुरवाई के पाठकों के लिये महत्वपूर्ण है। आभार।

  20. बिल्कुल युक्ति संगत आलेख हमें सुदूर पढ़ने को मिल रहा है।शैशव काल के सोशल मीडिया आपकी बात से लगता है कि भविष्य की भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता, किसकी कितनी आयु। दोनों पक्षों से रूबरू कराता इस आलेख के लिए सहृदय साधुवाद आपको आदरणीय जी।

  21. तेजेन्द्र भाई, हमेशा की तरह इस बहुत रोचक विषय पर आपके सम्पादकीय पर बहुत बहुत साधुवाद। आपके इस कथन में कि सोशल मीडिया के भिन्न भिन्न माध्यमों का इस्तेमाल ज़िम्मेवारी से किया जाये में एक बहुत बड़ी सीख भी है। सोशल मीडीया वाकई में एक आभासी दुनिया है। कुछ लोग तो इसे असली दुनिया मान कर, बिना सोचे समझे, अपनी personal जानकारी और photographs इस मीडिया पर डालने की ग़लती करते हैं और फिर उन्हें इसका ख़म्याज़ा भी भुगतना पड़ता है।

    • विजय भाई आप निरंतर पुरवाई का संपादकीय पढ़ते हैं और हमें फ़ीडबैक भी देते हैं। आपका स्नेह हमारे लिये बहुमूल्य है। आभार।

  22. सोशल मीडिया का संपूर्ण इतिहास,उसके प्रयोग, दुष्प्रयोग, उसके परिणाम, दुष्परिणाम, सोशल मीडिया की कहानियाँ सबकुछ समेटे महत्त्वपूर्ण ,प्रासंगिक संपादकीय। तेजेन्द्र सर !इस ज्ञानवर्धक संपादकीय के लिए आपको बधाई ।

  23. आज की आपकी सोशल मीडिया की उपयोगिता और दुरुपयोग को विस्तृतरूप से वर्णन किया। हर चीज के दो पहलू होते है तो सोशल मीडिया इसका अपवाद कैसे हो सकती है? इसका उपयोग तो अपनी मानसिकता के अनुरूप किया जाता है, ग्रहण भी हम वही करते है जैसा हम सोचते भी है।
    अगर हमारी सम्पर्क की सीमाएँ विस्तृत हुईं है तो उसमें विद्रूपता फैलाने वाले लोग भी हैं। यू ट्यूब ने तो तो अगर सद्भावना और सहयोग बढ़ाया है तो अश्लीलता भी फैलला रहे है।
    इस जगह कबीरदास जी की सूक्ति सटीक होगी –

    साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय,
    सार-सार को गहि रहै, थोथा देय उड़ाय।

  24. प्रणाम आपको मैंने भी अपने प्रथम उपन्यास में एफ़बी को विषय वस्तु के रूप में प्रयुक्त किया है, यह उससे भी बड़ा सत्य है कि हम किस चीज़ का उपयोग या दुर्पयोग करते हैं, यह हमारी मानसिक पर निर्भर करता है।

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